सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री कीताचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kitacharya ji

श्री रामचन्द्र जी द्वारा श्रीकीताजी के कन्या की रक्षा और संत हृदय कीता जी का राजा को क्षमा करना

श्री कीता जी महाराज का जन्म जंगल मे आखेट(शिकार) करनेवाली जाति मे हुआ था, परंतु पूर्वजन्म के संस्कारों से आपकी चित्तवृत्ति अनिमेषरूप से भगवत्स्वरूप मे लगी रहती थी । आप सर्वदा भगवान् श्री राम की कीर्ति का गान किया करते थे । साथ ही आपकी सन्तसेवा मे बडी प्रीति थी, यहां तक कि जब धन नही होता तब आप सन्तसेवा के लिये भगवद्भक्ति विमुख जनों (अधर्मी और नास्तिक) को जंगल मे लूट भी लिया करते थे और उससे सन्त सेवा करते थे । एक बार की बात है, आपके यहां एक सन्तमण्डली आ गयी, परंतु आपके पास धन की कोई स्थायी व्यवस्था तो थी नही, लूटने को कोई नास्तिक भक्ति विमुख भी मिला नही ,अत: आपने अपनी एक युवती कन्या को ही राजाके यहां गिरवी रख दिया और उस प्राप्त धनसे सन्तसेवा की। आपको आशा थी कि बाद मे धन प्राप्त होनेपर कन्या को छुड़ा लूंगा ।

उधर जब राजा की दृष्टि कन्यापर पडी तब उसके मन मे कुस्तित भाव आ गया । कन्या को भी राजा की बुरी नजर का पता चला तो उसने अपने पिता के घर गुप्त रूप से महल की एक दासी की सहायता से संदेश भेजा । बेचारे कीताजी क्या करते, राजसत्तासे टकराने से समस्या का हल नहीं होना था, अन्त मै उन्होने प्रभु श्री रामचन्द्र जी की शरण ली । उधर कन्या ने भी अपनी लज्जा-रक्षा के लिये प्रभुसे प्रार्थना की । भक्त की लज्जा भगवान् की लज्जा होती है, जिस भक्त ने संतो सेवा के लिये अपनी लज्जा दाँवपर रख दी हो, उसकी लज्जा का रक्षण तो उन परम प्रभु को करना ही होता है और उन्होंने किया भी । राजा जब कन्या की ओर वासना के भाव से आगे बढा तो उसको कन्या के स्थानपर भयंकर सिंहिनी दिखायी दी । अब तो उसके प्राणों पर संकट आ गये और काममद समाप्त हो गया ।

सिंहिनी ने राजा को पृथ्वी पर गिराकर बहुत डराया , उसके प्राण नही लिए । राजा थरथर कांपने लगा और उसका शरीर पसीने से भीग गया । उसने सिपाहियों को बुलाया पर एक भी सिपाही नही आया, सिपाहियों के कानों में आवाज ही नही जा रही थी। कीताजी भक्त है, यह बात तो उसे मालूम ही थी, उसे लगा कि भक्त कीताजी का अपमान करने के कारण ही उसपर ऐसा भगवान का कोप हो गया है क्योंकि महल के ऊपर सिंहिनी का चढ़ कर आना तो असंभव है । उसने उस कन्या के रूप मे दिखने वाली सिंहिनी के चरणों मे प्रणाम किया और क्षमा याचना करने लगा । भक्त श्री किताजी की जयजय कर करने लगा । भावदृष्टि बदलते ही सिंहिनी पुन: कन्या के रूप मे दिखायी देने लगी । राजा की आँखे खुल गयी, उन्होंने कीताजी के पास जाकर क्षमा प्रार्थना की । कीताजी सन्तहृदय थे, उन्होंने राजा को क्षमा कर दिया ।

श्री कीता जी की सत्यनिष्ठा और संतसेवा

श्री कीताजी भगवत्कृपा प्राप्त भक्त थे । एक बार सन्त सेवा के लिये आपको एक घोड़े की आवश्यकता थी, संतो के लिए समान लाना था और कुछ सामान संतो के निवास स्थान पर पहुंचाना था । पास मे ही फौज (सेना) की छावनी थी । आप वहाँ गये तो पहरेदार ने पूछा- कौन है ? आपने कहा – मै चोर हूँ। मेरा नाम कीता है और मै घोडा चुराने आया हूँ । आपकी इस बात से पहरेदार ने समझा कोई फौज के अधिकारी है, विनोद(मजाक) कर रहा है, अत: कुछ नही बोला । आप एक बढिया घोडे को लेकर चले आये । दूसरे दिन छावनी में घोड़े की चोरी की बात से हड़कम्प मच गया । पहरेदार ने कीताजी का नाम बताया और रात की सारी घटना बतायी ।

तुरंत ही कीताजी के यहाँ फौजदार साहब सिपाही लेकर पहुंचे तो एक वैसा ही घोडा उनके यहाँ बँधा मिला, परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि उस घोड़े का रंग सफेद था, जबकि छावनी से चोरी हुए घोड़े का रंग लाल था। इस बारे मे जब कीताजी से पूछताछ हुई तो उन्होंने सारी बात सच-सच बता दी । फौजदार ने पूछा – लापता घोड़े का रंग तो लाल था ,तुम्हारे यहां मिला हुआ घोड़ा तो सफेद है ।  रंग बदलने के बारे मे कीता जी ने कहा कि ऐसा तो प्रभुकी इच्छा से ही हुआ है, यह मेरी मानवीय सामर्थ्य की बात नही है । आपकी सत्यनिष्ठा और भगवद्भक्ति से फौज का सरदार बहुत प्रभावित हुआ और जान गया कि कीता जी सिद्ध संत है । राजा के साथ घटित घटना भी उसने सुन रखी थी । सन्तसेवा के निमित्त बहुत सा द्रव्य भेंट किया, साथ ही अपने बहुत से सैनिकों के साथ आपका शिष्य बन गया ।

शिष्य की गुरुनिष्ठा और धैर्य की परीक्षा

श्री कीता जी निष्ठावान् और सच्चे आज्ञाकारी साधकों लो ही शिष्य बनाते थे । एक बार एक साधक भक्त ने १२ वर्षतक आपकी सेवा की, परंतु आपने उसको तब भी दीक्षा नहीं दी, फिर अपने इष्टदेव प्रभु  से रामजी के स्वप्न मे आदेश देनेपर उसे दीक्षा देने का निर्णय लिया, इसपर भी आपने उसकी बडी कठिन परीक्षा ली । शीत ऋतु (ठंड) मे उससे एक घड़े मे जल मँगवाया। जब वह साधक जल लेकर आया तो उन्होंने उसके  सिरपर रखे घड़े को डण्डे के प्रहार से फोड़ दिया, जिससे उसका सारा शरीर भीग गया । ठंड से शरीर कांपने लगा ।तत्पश्चात् आपने पुनः उस से दूसरा घड़ा भरकर लाने को कहा । इस प्रकार आपने सात घड़े उसके सिरपर फोड दिये । अन्त मे जब आठवाँ घड़ा भरकर ले आया तो आपने उसको धैर्य और गुरु-आज्ञा के प्रति निष्ठाकी परीक्षा मे उत्तीर्ण मानका उसे दीक्षा दे दी ।

One thought on “सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री कीताचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kitacharya ji

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s