सुंदर कथा १२२ (श्री भक्तमाल – श्री प्रबोधनंद सरस्वती जी) Sri Bhaktamal – Sri Prabodhanand Sarasvati ji

सर्वदा युगल स्वरूप की ही उपासना करनी चाहिए । अकेले श्रीकृष्ण की उपासना करने वाले पातकी होते है ।

गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के एक महान संत हुए श्रीपाद प्रबोधनंद सरस्वती । एक दिन वे भजन कर रहे –

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।।

उसी समय सुंदर तुलसी चंदन की सुगंध आने लगी, ध्यान में  एक नीली ज्योति प्रकट हो गयी । नेत्र खोलकर देखा तो सामने श्रीकृष्ण खड़े है । प्रबोधनंद सरस्वती ने कहा – आप यहां किस कारण से आये है ? श्री कृष्ण ने कहां की आपके भजन से प्रसन्न होकर आपको दर्शन देने आए है । प्रबोधनंद जी ने कहा – क्या हम भजन इसलिए करते है की हमे आपका दर्शन प्राप्त हो ? श्रीकृष्ण बोले: मेरे एक नख का दर्शन हो जाए इस कामना से महात्मा लोग हजारो लाखो वर्ष तपस्या करते है ।

प्रबोधनंद जी ने हाथ जोड़ कर कहा – तुम इतनी देर मेरे पास आये हो, मेरी स्वामिनी मेरी प्रिया जू को कितना विरह हो रहा होगा । मेरे कारण मेरी स्वामिनी को विरह सहन करना पडा । मेरे भजन करने का हेतु केवल प्रिया जु का सुख है । यदि आपको दर्शन देना ही है तो युगल रूप मे दर्शन दीजिए, मै अकेले श्रीकृष्ण का दर्शन कभी नही करना चाहता । इस भाव को सुनकर भगवान बहुत प्रसन्न हुए और प्रबोधनंद जी को श्री राधाकृष्ण दोनो का दर्शन हुआ । श्री प्रिया प्रियतम ने प्रबोधनंद जी को आशीर्वाद दिया और अंतर्धान हो गए ।

गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतैजः समर्चयेत्‌ ।
जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे ।।

गोपालसहस्त्रनाम मे भगवान शिव कहते है : हे पार्वती ! जो गौरतेज (श्री राधा) के बिना श्यामतेज (श्रीकृष्ण) की उपासना, ध्यान, पूजन करता है वह पातकी (घोर पापी) होता है ।

परम आदरणीय श्री श्री अतुलकृष्ण गोस्वामी महाराज द्वारा दी हुई शिक्षा के आधार पर लिखा हुआ लेख। लेखन मे भूल चल क्षमा करें । प्रस्तुति – अक्षय कुमार ।

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