सुंदर कथा ३३(श्री भक्तमाल – गौ भक्त राजर्षि दिलीप) Sri Bhaktamal -Gau bhakt Sri Dileep ji

गौ उपासक पूज्यपाद​ श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,गोऋषि श्री दत्तशरणानंद जी महाराज के कृपाप्रसाद ,प्रवचनों एवं रघुवंशम् से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ। 

महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी । देवराज के बुलाने पर दिलीप एक बार स्वर्ग गये । देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देव असुर युद्ध हुआ । युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्ग में कामधेनु मिली; किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं । कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की।  इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया- मेरी संतान (नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा । 

महाराज दिलीप को शाप का कुछ पता नहीं था । किंतु उनके कोई पुत्र न होने से वे स्वयं, महारानी तथा प्रजा के लोग भी चिन्तित एवं दुखी रहते थे । पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महाराज दिलीप रानी के साथ कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रमपर पहुंचे । महर्षि सब कुछ समझ गए। महर्षि ने कहा यह गौ माता के अपमान के पाप का फल है। सुरभि गौ की पुत्री नंदिनी गाय हमारे आश्रम पर विराजती है । महर्षि ने आदेश दिया- कुछ काल आश्रम में रहो और मेरी कामधेनु नन्दिनी की सेवा करो। 

महाराज ने गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली । महारानी सुदक्षिणा प्रात: काल उस गौ माता की भलीभाँति पूजा करती थी । आरती उतारकर नन्दिनी को पतिके संरक्षण-में वन में चरने के लिये विदा करती । सम्राट दिनभर छाया की भाँती उसका अनुगमन करते, उसके ठहरने पर ठहरते, चलनेपर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीनेपर जल पीते । संध्या काल में जब सम्राट के आगे-आगे सद्य:प्रसूता, बालवत्सा (छोटे दुधमुँहे बछड़े वाली) नन्दिनी आश्रम को लौटती तो महारानी देवी सुदक्षिणा हाथमें अक्षत-पात्र लेकर उसकी प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करतीं और अक्षतादिसे पुत्र प्राप्तिरूप अभीष्ट-सिद्धि देनेवाली उस नन्दिनी का विधिवत् पूजन करतीं ।

अपने बछड़े को यथेच्छ पय:पान(दूध पान) कराने के बाद दुह ली जानेपर नन्दिनी की रात्रिमें दम्पति पुन: परिचर्या करते, अपने हाथों से कोमल हरित शष्प-कवल खिलाकर उसकी परितृप्ति करते और उसके विश्राम करने पर शयन करते । इस तरह उसकी परिचर्या करते इक्कीस दिन बीत गये । एक दिन वन में नन्दिनी का अनुराग करते महाराज दिलीप की दृष्टि क्षणभर अरण्य (वन) की प्राकृतिक सुंदरता में अटक गयी कि तभी उन्हें नन्दिनी का आर्तनाद सुनायी दिया । 

वह एक भयानक सिंह के पंजों में फँसी छटपटा रही थी । उन्होंने आक्राम क सिंह को मारने के लिये अपने तरकश से तीर निकालना चाहा, किंतु उनका हाथ जडवत् निश्चेष्ट होकर वहीं अटक गया, वे चित्रलिखे से खड़े रह गये और भीतर ही भीतर छटपटाने लगे, तभी मनुष्य की वाणी में सिंह बोल उठा- राजन्! तुम्हारे शस्त्र संधान का श्रम उसी तरह व्यर्थ है जैसे वृक्षों को उखाड़ देनेवाला प्रभंजन पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है । मैं भगवान् शिव के गण निकुम्भ का मित्र कुम्भोदर हूं ।

भगवान् शिव ने सिंहवृत्ति देकर मुझे हाथी आदिसे इस वन के देवदारुओ की रक्षाका भार सौंपा है । इस समय जो भी जीव सर्वप्रथम मेरे दृष्टि पथ में आता है वह मेरा भक्ष्य बन जाता है । इस गाय ने इस संरक्षित वनमें प्रवेश करने की अनधिकार चेष्टा की है और मेरे भोजन की वेलामे यह मेरे सम्मुख आयी है, अत: मैं इसे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करूँगा । तुम लज्जा और ग्लानि छोड़कर वापस लौट जाओ । 

किंतु परदु:खकातर दिलीप भय और व्यथा से छटपटाती, नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाती नन्दिनी को देखकर और उस संध्याकाल मे अपनी माँ की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करनेवा ले उसके दुधमुँहे बछड़े का स्मरण कर करुणा-विगलित हो 
उठे । नन्दिनी का मातृत्व उन्हें अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान् जान पड़ा और उन्होंने सिंह से प्रार्थना की कि वह उनके शरीर को खाकर अपनी भूख मिटा हो और बालवत्सा नन्दिनी को छोड़ दे। 

सिंह ने राजा के इस अदभुत प्रस्ताव का उपहास करते हुए कहा- राजन्! तुम चक्रवर्ती सम्राट  हो । गुरु को नन्दिनी के बदले करोडों दुधार गौएँ देकर प्रसन्न कर सकते हो । अभी तुम युवा हो, इस तुच्छ प्राणीके लिये अपने स्वस्थ-सुन्दर शरीर और यौवन की अवहेलना कर जानकी बाजी लगाने वाले स्रम्राट! लगता है, तुम अपना विवेक खो बैठे हो ।यदि प्राणियों पर दया करने का तुम्हारा व्रत ही है तो भी आज यदि इस गायके बादले में मैं तुम्हें खा लूँगा तो तुम्हारे मर जानेपर केवल इसकी ही विपत्तियों से रक्षा हो सकेगी और यदि तुम जीवित रहे तो पिता की भाँती सम्पूर्ण प्रजा की  निरन्तर विपत्तियों से रक्षा करते रहोगे । 

इसलिये तुम अपने सुख भोक्ता शरीर की रक्षा करो । स्वर्गप्राप्ति के लिये तप त्याग करके शरीर की कष्ट देना तुम जैसे अमित ऐश्वर्यशालियों के लिये निरर्थक है । स्वर्ग ?अरे वह तो इसी पृथ्वीपर है । जिसे सांसारिक वैभव-विलास के समग्र साधन उपलब्ध हैं, वह समझो कि स्वर्ग में ही रह रहा है । स्वर्गका काल्पनिक आकर्षण तो मात्र विपन्नो के लिए ही है,सम्पन्नो के लिए नहीं। इस तरह से सिंह ने राजा को भ्रमित करने का प्रयत्न किया। 

भगवान् शंकर के अनुचर सिंह की बात सुनकर अत्यंत दयालु महाराज दिलीप ने उसके द्वारा आक्रान्त नंदिनी को देखा जो अश्रुपूरित कातर नेत्रों से उनकी ओर देखती हुई प्राणरक्षाकी याचना कर रही थी । 

राजा ने क्षत्रियत्व के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उत्तर दिया- नहीं सिह ! नहीं, मैं गौ माता को तुम्हारा भक्ष्य बनाकर नहीं लौट सकता । मैं अपने क्षत्रियत्व को क्यों कलंकित करूं ?क्षत्रिय संसार में इसलिये प्रसिद्ध हैं कि वे विपत्ति से औरों की रक्षा करते हैं । राज्य का भोग भी उनका लक्ष्य नहीं । उनका लक्ष्य तो है लोकरक्षासे कीर्ति अर्जित करना । निन्दा से मलिन प्राणों और राज्य को तो वे तुच्छ वस्तुओ की तरह त्याग देते हैं इसलिये तुम मेरे यश:शरीर पर दयालु होओ । 

मेरे भौतिक शरीर को खाकर उसकी रक्षा करो; क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है, मरणधर्मा है । इसलिये इसपर हम जैसे विचारशील पुरुषों की ममता नहीं होती । हम तो यश: शरीरके पोषक हैं। यह मांस का शारीर न भी रहे परंतु गौरक्षा से मेरा यशः शारीर सुरक्षित रहेगा । संसार यही कहेगा की गौ माता की रक्षा के लिए एक सूर्यवंश के राजा ने प्राण की आहुति दे दी । एक चक्रवर्ती सम्राट के प्राणों से भी अधिक मूल्यवान एक गाय है।

सिंह ने कहा – अगर आप अपना शारीर मेरा आहार बनाना ही चाहते है तो ठीक है। सिंह के स्वीकृति दे देने पर राजर्षि दिलीप ने शास्त्रो को फेंक दिया और उसके आगे अपना शरीर मांसपिंड की तरह खाने के लिये डाल दिया और वे जाके सिर झुकाये आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे, तभी आकाश से
विद्याधर उनपर पुष्पवृष्टि करने लगे । 

नन्दिनी ने कहा हे पुत्र ! उठो ! यह मधुर दिव्य वाणी सुनकर राजा को महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने वात्सल्यमयी जननी की तरह अपने स्तनोंसे दूध बहाती हुई नन्दिनी गौ को देखा, किंतु सिंह दिखलायी नहीं दिया । आश्चर्यचकित दिलीप से नन्दिनी ने कहा- हे सत्युरुष ! तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये मैंने ही माया स्व सिंह की सृष्टि की थी ।

महर्षि वसिष्ठ के प्रभावसे यमराज भी मुझपर प्रहार नहीं कर सकता तो अन्य सिंहक सिंहादिकी क्या शक्ति है । मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दयाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं । वर माँगो ! तुम मुझे दूध देनेवाली मामूली गाय मत समझो, अपितु सम्पूर्ण कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु जानो । 

राजा ने दोनों हाथ जोड़कर वंश चलानेवाले अनन्तकीर्ति पुत्रकी याचना की नन्दिनीने ‘तथास्तु’ कहा। उन्होंने कहा राजन् मै आपकी गौ भक्ति से अत्याधिक प्रसन्न हूं ,मेरे स्तनों से दूध निकल रहा है उसे पत्तेके दोने में दुहकर पी लेनेकी आज्ञा गौ माता ने दी और कहा तुम्हे अत्यंत प्रतापी पुत्र की प्राप्ति होगी।

राजाने निवेदन किया-‘ मां ! बछड़े के पीने तथा होमादि अनुष्ठान के बाद बचे हुए ही तुम्हारे दूध को मैं पी सकता हूं । दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है और द्वितीय अधिकार गुरूजी का है। 

राजा के धैर्यने नन्दिनो के हृदय को जीत लिया । वह प्रसन्नमना कामधेनु राजा के आगे आगे आश्रम को लौट आयी । राजा ने बछड़े के पीने तथा अग्निहोत्र से बचे दूधका महर्षि की आज्ञा पाकर पान किया, फलत: वे रघु जैसे महान् यशस्वी पुत्र से पुत्रवान् हुए और इसी वंश में गौ भक्ति के प्रताप से स्वयं भगवान् श्रीराम ने अवतार ग्रहण किया। 

महाराज दिलीप की गोभक्ति तथा गोसेवा सभी के लिये एक महानतम आदर्श बन गयी । इसीलिये आज भी गो भक्तो के परिगणनामे महाराज दिलीप का नाम बड़े ही श्रद्धाभाव एवं आदर से सर्वप्रथम लिया जाता है ।  इस चरित्र से यह बात सिद्ध हो गयी की सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट से अधिक श्रेष्ठ एक गौ माता है ।

।।सर्वदेवमयी गौ माता की जय।।

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग ३

5. विदुरने धुतराष्ट्र को, दुर्योधन को बहुत समझाया,परंतु उनकी कोई बात उन लोगो ने नहीं सुनी । अन्तमें पाण्डवो का सन्धि सन्देश लेकर श्री कृष्ण के आनेकी बात सुनी गयी । धृतराष्ट्र ने विदुरसे कहा – श्रीकृष्ण आनेवाले हैं, उनके स्वागत के लिये मै बहुत से रथ, घोड़े, हाथी, रत्न, सोनेके रथ आदि दूंगा। सब लोग उनका स्वागत करेंगेऔर नगर की सब प्रजा उनका सम्मान करेगी। उनके ठहरनेके लिये सबसे सुन्दर स्थान दिया जायगा और हमारे पास जो सर्वोत्तम सामग्री है वही उन्हें भेट की जायगी । विदुरने कहा – महाराज ! आप बड़े बुद्धिमान् हैं । आप सभी बाते जानते हैं । आपसे क्या कहूँ? अब आप चालाकी छोड़ दीजिये । सरल हो जाइये । आप श्रीकृष्ण का सम्मान करना चाहते हैं यह बडा सुन्दर है । इन सामयियो की तो बात क्या, श्रीकृष्ण समग्र पृथ्वी के स्वामी हैं और वास्तवमें वही उसके पात्र हैं । परंतु मैं शपथपूर्वक कहता हूं कि आप धर्मकी दृष्टिसे अथवा प्रेमकी दृष्टि से यह सब उन्हें नहीं देना चाहते हैं । आप उन पर अपना मायाजाल फैलाना चाहते हैं और उन्हें इन बाहरी सामग्रियो से ठगना चाहते हैं । आप पाण्डवों को पांच गांव नहीं दे सकते, आप धन के बलपर श्रीकृष्ण को अपने वशमें करना चाहते हैं ।

छल, कपट अथवा माया करके श्रीकृष्ण को पाण्डवो से अलग नहीं कर सकते । मैं श्रीकृष्ण की महिमा जानता हूं। मैं उनका प्रेम जानता हूं और वे धनंजय अर्जुन से कितना प्रेम करते हैं, यह भी जानता हूं । वे जलके घड़े, पाद- प्रक्षालन और कुशल प्रश्नके अतिरिक्त आपकी कोई बात स्वीकार नहीं करेंगे । यदि आप श्रीकृष्ण को प्रसन्न करना चाहते हैं तो वह काम कर दीजिये, जिसके लिये वे आते हैं । वे कौरव और पाण्डवो का कल्याण करना चाहते हैं । आप उनका यह आतिथ्य कीजिये । आप पिता हैं पाण्डव और कौरव आपके पुत्र हैं । श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और प्रेमके लिये पाण्डवो के साथ अपने पुत्रो का सा व्यवहार करे।

दुर्योधन ने श्रीकृष्ण के सवागत का विरोध किया और धृत्तराष्ट्र जैसा स्वागत चाहते थे, नहीं हो सका ।

श्रीकृष्ण आये, दुर्योधन के अतिरिक्त सबने उनकी अगवानी की । सबसे मिल-जुल लेने के बाद श्रीकृष्ण विदुरके घर गये । विदुरने मांगलिक सामग्रियो के साथ श्रीकृष्णका स्वागत किया और जो कुछ सामग्री उनके घर उपस्थित थी, उससे श्रीकृष्ण की पूजा की । उस समय विदुर को कितनी प्रसन्नता हुई थी, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता । उन्होंने स्वयं श्रीकृष्णसे कहा है –  कमलनयन ! तुम्हारे दर्शन से मुझे जो प्रसन्नता प्राप्त हुई है, उसका वर्णन तुमसे क्या करूं है तुम तो सब प्राणियोंके अन्तर्यामी ही हो । तुमसे कुछ छिपा नहीं, तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आश्रय हो, संत तुम्हारी ही उपासना करते हैं । श्रीकृष्णने विस्तार के साथ पाण्डवों का कुशल मंगल विदुर को सुनाया और फिर कुंती के पास गये । कुन्ती को समझाने के बद वे दुर्योधन

के महलमें गये । वहाँ सामान्य स्वागत-सत्कार होनेके पश्चात् दुर्योधन ने भोजन के लिये श्रीकृष्ण को निमंत्रित किया ।

श्रीकृष्णने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि – कोई प्रेमसे खिलावे तो उसके यहाँ खाना चाहिये और नहीं तो जब वहीं भोजन न मिलता हो, आपत्तिका समय हो तब किसीके यहां खाना चाहिये । न तुम प्रेम से खिला रहे हो और न मैं आपत्ति में हूँ , फिर तुम्हारे यहाँ मैं केसे भोजन कर सकता हूँ ।पांडव धार्मिक हैं, धार्मिक पुरुष मेरी आत्मा ही हैं, जो उनसे द्वेष करता है, वह मुझसे ही देष करता है । दुर्योधन से श्रीकृष्ण ने साफ – साफ कह दिया कि तुमलोग दुष्ट हो, तुम्हारा अन्न मैँ नहीं खा सकता। मेरे विचारमें तो यहां केवल विदुर का ही अन्न पवित्र है । मैं उन्ही के यहाँ भोजन करूंगा । इतना कहकर श्रीकृष्ण विदुर के घर चले गये ।

भक्तमाल में ऐसी कथा आती है कि जब श्रीकृष्ण विदुरजी के घर पहुँचे, उस समय विदुरजी घरपर नहीं थे । विदुरजी की पत्नी वस्त्र उतारकर स्नान कर रही थीं । जब श्रीकृष्ण की आवाज उनके कानोंमें पडी, तब वे प्रेमविहृल हो गयी और जिस अवस्थामे थीं उसी अवस्थामे दौड़ आयीं । वे श्रीकृष्ण को एक पीड़ेपर बैठाकर उन्हें केला छील -छील उनके छिलके खिलाने लगी । प्रेममे ऐसी बेसुध हो गयी कि उन्हें यह ध्यान ही न रहा कि मैं श्रीकृष्ण को केलेके छिलके खिला रही हूँ। श्रीकृष्ण भी उनका प्रेम देखकर बेसुध से हो रहे थे । उन्हें उन छिलको में बडा रस आ रहा था । जब विदुर ने कहीं बाहर से आकर यह देखा और अपनी धर्मपत्नी को डाँटकर भगवान् को

केला खिलाना शुरू किया और फिर उत्तम भोजन बनवाकर उन्हें परोसा, तब भगवान् ने स्पष्ट कह दिया कि ‘छिलकेमें जितना रस था, जो स्वाद था, वह इनमें नहीं है ।’ भगवान् तो प्रेमके भूखे हैं उनके सामने वस्तुका कोई महत्त्व नहीं है । इसी प्रकार कई स्थानोंपर विदुरके शाक की, विदुर के कणकी भी बात आती है ।

महाभारत्तमें लिखा है कि श्रीकृष्ण जब विदुरके घर जाने लगे, तब भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि उनके पीछे आये और उन्हें अपने घर चलने की प्रार्थना करने लगे । परन्तु भगवान् ने यह कहकर कि मेरा सम्मान हो गया, उन लोगो को वापस कर दिया । उन लोगोंके चले जानेपर विदुर ने प्रेम और उत्साहके साथ विविध सामग्रियों से श्रीकृष्णका सत्कार किया । उन्होंने अपवित्र और गुणयुक्त अनेकों प्रकार की खाने पीनेकी सामग्री श्रीकृष्णक्रो निवेदित की । भगवान् श्रीकृष्णने उन सामग्रियो से पहले वेदवेत्ता ब्राह्मणोंक्रो भोजन कराया और उन्हें दक्षिणा दी । उनके भोजनके पश्चात् देवताओंके साथ इन्द्रक्री भांति अपने अनुयायियों-सहित श्रीकृष्णने विदुर की पवित्र और गुणयुक्त भोजन सामग्री ग्रहण की ।

रातमें श्रीकृष्ण विदुरके ही घर रहे । विदुर ने श्रीकृष्णसे कहा – भगवन् ! दुर्योधन बड़ा अभिमानी और अधर्मी है । उसकी लालच और झुठाईं बहुत बढ़ गयी है । वह भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, जयद्रथ की सेवा में लगा रहता है । उन्हें खूब धन देता है और सोचता है कि मैं इन्हीं के भरोसे पाण्डवो को जीत लूंगा । उसके मनमें यह बात बैठ गयी है कि अकेला कर्ण ही सारे संसार को जीत सकता है । उसके मनमें सन्धि करने की तनिक भी इच्छा नहीं है । उसने पाण्डवों को कुछ न देनेका निश्चय कर लिया है । मुझे इस बातकी बडी चिन्ता है कि

आपका आना व्यर्थ हुआ । उनसे कहना, न कहना बराबर है । बहरो के सामने गायन करने के समान उन्हें उपदेश देना व्यर्थ है । वे सब बहुत से पापी इकट्ठे रहेंगे, उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता । उन्होंने वृद्धों की उपासना नहीं की है । बल और लक्ष्मी के घमण्ड से वे पागल हो गये हैं । मेरे विचार से उनके बीचमें आपका अकेले जाना अच्छा नहीं है । यह मैं प्रेम के वश होकर कह रहा हूं। यों तो मैं जानता हूं कि आपके भ्रूभंगमात्र से त्रिलोकी का संहार हो सकता है । मेरा पाण्डवो पर जितना प्रेम है, उससे भी अधिक आप पर है । प्रेम बहुमान और सौहार्द की दृष्टिसे ही मैं यह कह रहा हूं । और क्या कहूं आप तो अंतरात्मा ही हैं ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा – तुम्हारे जैसे प्रेमी मित्र को मुझ से जैसी बात कहनी चाहिये, वैसी ही तुमने कही है । मैं दुर्योधन को जानता हूं । परन्तु यह जो समस्त क्षत्रियोंका संहार होनेवाला है, उसमें अपनी ओरसे, सच्चे हृदय से यही चेष्टा होनी चाहिये कि यह महासंहार किसी प्रकार रुक जाय । इस विपत्तिका सबसे बुरा परिणाम कौरवों को ही भोगना पड़ेगा । वे इस बात को जानकर भी अभिमानसे नहीं मानते । उन्हें समझाने के लिये मैं आया हूँ । नीतिशास्त्र का ऐसा सिद्धान्त है कि यदि अपना मित्र कोई अकार्य करने जा रहा हो तो जहांतक हो सके, उसकी चोटी पकड़ कर भी अकार्यसे लौटाना चाहिये । मैं सच्चे हृदयसे कहता हूं विदुर ! मेरी हार्दिक अभिलाषा यही है कि कौरव और पाण्डव दोनोंका ही कल्याण हो । मैं समान रूप दोनोंका ही हित चाहता हूं। दुर्योधन के हित की बात कहते समय यदि वह मुझपर अविश्वास करेगा, मुझपर आशंका करवग तो क्या करे। मै अपना कर्तव्य पूरा करने के कारण पसन्न होऊंगा और उऋण भी हो जाऊंगा।

कोई भी मुझपर लांछन नहीं लगा सकेगा कि कृष्ण ने सन्धि की चेष्टा नहीं की । यदि वे मेरा अनिष्ट करना चाहेंगे तो तुम निश्चय समझो कि संसार की कोई भी शक्ति मेरे सामने ठहर नहीं सकती । बात करते करते ही वह रात बीत गयी । नित्यकृत्य के पश्चात् दुर्योधन आदि सब भगवान् श्रीकृष्ण के पास विदुरके घर आये । उन्होंने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि सभामें चलिये । भगवान्  श्रीकृष्ण सभामें गये । वहां उन्होंने सन्धिका प्रस्ताव किया । परशुराम, नारद, भीष्मपितामह सबने उसका समर्थन, अनुमोदन किया । सबने अलग अलग दुर्योधन को समझाया भी, पर उसने किसीको बात नहीं सुनी । उलटे श्रीकृष्ण को कैद करने का विचार किया । जब वह धृतराष्ट्र के समझानेपर भी न माना तब विदुरने बड़े जोर से दुर्योधन को डांटा । विदुरने कहा – दुर्योधन ! तुम श्रीकृष्ण की महिमा नहीं जानते । तुम्हारी ही भाँती वानरेंद्र द्विविद भी श्रीकृष्ण को पकड़ना चाहता था, वह तुमसे कम बली भी नहीं था, परंतु उसके किये कुछ न हो सका । वह मारा गया । नरकासुर अपनी सम्पूर्ण सेनाके साथ श्रीकृष्ण को पकड़ नहीं सका, बल्कि श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया और उसे मारकर श्रीकृष्णने हजारों कन्याओ का उद्धार किया । निर्मोचन नामके नगर में श्रीकृष्णने छ: हजार दैत्यों को कैद कर लिया । वे इन्हें नहीं पकड़ सके । बचपन में ही इन्होंने पूतना, बकासुर, अरिष्टासुर, धेनुकासुर को मार डाला और गौओं की रक्षाके लिये सात दिनोंतक गोवर्धन पर्वत को अपनी अँगुलीपर उठा रखा । केशी, चाणूर, कंस, जरासंध, दन्तवक्त्र, शिशुपाल और बाण इनके सामने ठहर न सके । वरुण, अग्नि और इन्द्र इनसे पराजित हो गये । ये साक्षात् विष्णु हैं । जब ये समुद्र में शयन कर रहे थे, तब इन्हों ने मधु और कैटभ देंत्यो को मारा था; दुष्टो को मारने के लिये अवतार लेकर इन्होंने कई बार

हयग्रीव अगदिका वध किया है । ये कारण, करण और कार्यसे परे हैं । कर्ता और अकर्ता दोनों ही इनके रूप हैं । ये सत्य-संकल्प हैं । ये जो चाहेंगे वही होगा । दुर्योधना तुम श्रीकृष्ण का अपमान करना चाहते हो, जैसे फतिंगा आगमें कूदकर अपनी जान दे देता है, वैसे ही तुम अपने सलाहकारों के साथ भस्म हो जाओगे ।

जब विदुर ने इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा गयी, तब सब लोग थर्रा गये । श्रीकृष्ण ने भी हंसकर अपना विराट रूप दिखा दिया । सब ऋषि महर्षि वहाँ से चले आये और भगवान् भी अपने रथपर सवार होकर पाण्डवो के पास पहुंच गये ।

विदुर ने कुन्ती के पास जाकर बडी चिन्ता प्रकट की और कहा कि अब युद्ध हुए बिना नहीं रह सकता। इन अधर्मियों ने धर्मराज युधिष्ठिर को युद्धमें लगा ही दिया । धर्मके साथ लड़कर ये अधर्मी कभी भी विजय नहीं पा सकेंगे । अब कुरुवंशियों का विनाश हो जायगा। इस चिन्ता से न तो मुझे रात में नींद आती है और न दिनमें चैन मिलता है । भगवान् की यही लीला है, जो होगा अच्छा ही होगा । कुन्ती ने युद्ध होनेका निश्चय जानकर कर्ण को अपने पक्षमे लाने की चेष्टा की; परंतु सफलता नहीं मिली । अन्तमें युद्ध हुआ । युद्धमें विदुर सर्वथा तटस्थ रहे, उन्होंने कभी किसी के पक्ष से कोई काम नहीं किया ।

6.श्रीमद्भागवत के अनुसार महाभारत युद्धके समय विदुर वहां उपस्थित नहीं थे । जब युद्ध होनेका निश्चय हो गया, सन्धिकी सब चर्चाएं विफल हो गयी और श्रीकृष्ण लौट गये, तब विदुर ने सोचा कि अब अपनी आंखोंसे कुरुकुल का संहार देखना उचित नहीं है । वे सर्वस्व का त्याग करके घर सेे निकल पड़े और अनेक तीर्थो में भ्रमण करते रहे । उन्होंने किसी आश्रमका चिह्न धारण नहीं किया था । कभी किसी वेषमें रहते; तो कभी किसी वेषमें । नदियो में त्रिकाल स्नान करते, निरन्तर भगवान् का स्मरण करते
और भगवान् को प्रसन्न करनेवाले व्रत करते । इस प्रकार तीर्थों में भ्रमण करते करते उन्हें बहुत दिन बीत गये और वे प्रभासक्षेत्रमें पहुंचे । वहां उन्हें भारतीय युद्धका परिणाम मालूम हुआ । उन्होंने उसी ओर यात्रा प्रारम्भ कर दी ।

जब वे यमुनाके किनारे पहुंचे, तब उन्हें वहां महाभागवत उद्धवके दर्शन हुए । उद्धव से उन्होंने बहुत से प्रश्न किये और उद्धव ने प्रेमगद्गद होकर भगवान् श्रीकृष्ण की लीला सुनायी । जन्म से लेकर मथुरायात्रा , द्वारका गमन, भारतीय युद्ध, युधिष्टिरका राज्य और उनके अश्वमेध यज्ञतक का वृत्तान्त सुनाया । जब उद्धवने भगवान् के स्वधाम गमन की बात कही, तब विदुर व्याकुल हो गये । उन्होंने सोचा, हमारे बीच में श्रीकृष्ण आये, हमसे मिले,

हमसे मित्रता की और हम उनकी सन्निधि, उनके आलाप और उनकी कृपा से उतना लाभ नहीं उठा लिके, जितना उठाना चाहिये था और वे चले भी गये, यह कितने दुख की बात है ।

उद्धवने भगवान् के ज्ञानोपदेश की चर्चा की । विदुरने वह ज्ञान श्रवण करने की इच्छा प्रकट की । तब उद्धवने कहा- भगवान् ने उपदेश के समय आपका स्मरण किया था । उस समय मैत्रेय ऋषि भी वहाँ उपस्थित थे । भगवान् ने कहा – जिस गुह्यतम ज्ञानका उपदेश मैं तुम्हें कर रहा हूं वह मैत्रेय विदुर को सुनायेंगे। इसलिये जाप भगवान के उपदेश किये हुए ज्ञान को मैत्रेय ऋषि के द्वारा ही सुनें । विदुर भगवान् के स्मरण और उपदेश के लिये मैत्रेय को आज्ञा देनेकी बात सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुए ,उनका हृदय प्रेम, श्रद्धा और आनन्द से भर गया । वहांसेे उन्होंने मैत्रेय ऋषिक्रे पास जानेके लिये हरिद्वार की यात्रा कर दी।

हरिद्वार पहुंचकर विदुर मैत्रेय ऋषि के पास गये और प्रणाम, सेवा करते हुए वे मैत्रेय से भगवद् तत्त्व के सम्बन्ध में भगवान् के बताये हुए ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने लगे । भागवत के तीसरे और चौथे स्कन्ध की कथा मैत्रेयने विदुर से कही है । देवहूति और कपिल का संवाद भी विदुरसे ही कहा गया है ।

जब मैत्रेय ऋषिने विदुरके बहुत से प्रश्नो का समाधान किया तब विदुर ने यह सोचा कि इन प्रश्नोंमें क्या रखा है । इनका अन्त कभी नहीं हो सकता, सबका सार है भगवान् का भजन ।

भजन में लग गये और मैत्रेय से अनुमति लेकर उन्होंने हस्तिनापुर की यात्रा की । वे तो धर्मके, ज्ञानके स्वरूप ही थे । उन्हें जिज्ञासा की क्या आवश्यकता थी, फिर भी उन्होंने मैत्रेय से जो आत्माका ज्ञान प्राप्त किया, प्रश्नोंका समाधान कराया, वह लोक संग्रह के लिये एक लीलामात्र थी । हस्तिनापुर में विदुर के पहुंचनेपर पाण्डवों को और प्रजा को बडी ही प्रसन्नता हुई । उन्होंने विदुर से तीर्थयात्रा का समाचार पूछा । विदुर ने बहुत सी बातें बतायी भी, परन्तु श्री कृष्ण के स्वधाम यधारनेकी बात उनसे नहीं कही । अभी अर्जुन द्वारकासे लोटे नहीं थे, युधिष्ठिर को द्वारका का समाचार अभी कुछ भी मालूम नहीं था । विदुर ने देखा श्रीकृष्ण चले गये । समाचार पाते ही पाण्डव भी चले जायंगे । अब घृतराष्ट्र की रक्षा करनी चाहिये । इन्होंने अपना सारा जीवन सांसारिकतामें ही बिताया । अब अन्त समयमे तो इनके द्वारा कुछ तपस्या, कुछ भगवान् का भजन होना चाहिये। विदुर ने धृत्तराष्ट्र को सब बाते समझायी । घृतराष्ट्र ने उनकी बात मान ली और वे विदुर के साथ घर से निकल पड़े । गांधारी ने भी उनका अनुसरण किया । जेठ जेठानी की सेवा करनेके लिये धर्मशीला कुन्ती भी पुत्रों को छोड़कर उनके साथ गयी । वे सप्तसरोवर ( हिमालय) पर जाकर भगवान् का भजन करने लगे और हस्तिनापुर में युधिष्ठिर उनकी खीज करवाने लगे । महाभारत में लिखा है कि युधिष्ठिरने अपने भाइयों के साथ धृतराष्ट्र के पास वनमें जाकर विदुर का कुशल पूछा, तब धृतराष्ट्र ने कहा –  बेटा ! परम ज्ञानी विदुर इसी तपोवन में कहीं रहते हैं । वे अन्न नहीं खाते, केवल हवा पीकर रहते हैं । घोर तपसे वे दुर्बल हो गये हैं । बड़े बड़े विद्वान् उनका दर्शन पाने के लिये इस जंगल में आते हैं । ये बातें हो रही थीं कि उस

आश्रम से थोडी दूरपर विदुर के दर्शन हुए । उनके शरीरमें धुल लगी हुई थी । आश्रम देखकर विदुर एकाएक पीछे की ओर लौट पड़े । विदुर को जति देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उनका अनुसरण किया । विदुरजी कभी युधिष्ठिर को दीखते थे, कभी अदृश्य हो जाते थे । युधिष्ठिर पुकारते जाते थे – महात्मन्! मैं आपका प्यारा युधिष्ठिर हूं। आप मुझे दर्शन दीजिये ! परंतु विदुर बढते ही चले जा रहे थे।

निर्जन वनमें जाकर विदुर जी एक पेड़के सहारे खड़े हो गये । युधिष्टिर ने उनके पास जाकर कहा – महाराज ! मैं आपका प्रेमपात्र युधिष्ठिर हूं। आपके दर्शन के लिये यहाँ आया हूं । विदुर कुछ बोले नहीं । उन्होंने धर्मंराज की दृष्टि मे अपनी दृष्टि, इंद्रियों में इंद्रियां , प्राणोंमें प्राण और आत्मामें आत्मा मिलाकर उनसे एकता प्राप्त कर ली । वे अपने स्वरूपमें लीन हो गये । केवल धर्म ही धर्म युधिष्ठिर ही युधिष्ठिर रह गये । विदुरका शरीर वृक्ष के सहारे खड़ा रह गया और धर्मराज युधिष्टिर को अपनेमें विशेष शक्तिका अनुभव हुआ । वे विदुरका शरीर दाह करने जा रहे थे, उसी समय आकाशवाणी हुई- विदुर जी यति धर्मको प्राप्त हो गये थे, उनका शरीर मत जलाइये और उनके लिये शोक मत कीजिये । युधिष्ठिर आश्रमपर चले आये । विदुर तो धर्म थे ही, वे धर्मके रूप में (धर्मराज युधिष्ठिर में)ही लय हो गये । इस प्रकार उन्होंने अपनी लीला संवरण कर ली ।

धर्म भगवान् की जय।

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग २

3. धर्ममें कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है । बाहर भीतर की स्पष्टता ही धर्मका प्रधान लक्षण है । जो भीतर से दूसरे प्रकार का है, बाहर से दूसरे प्रकार का है, इम उसे धर्मात्मा नहीं कह सकते । सब प्राणियों का समान सुहृद् धर्म अपने अंदर किसी प्रकारका कपट भला कैसे रख सकता है ? विदुर धर्मराज युधिष्टिर के लिये जैसे कुछ हैं, वैसे ही कोरवों के लिये भी हैं । वे पाण्डवो से जितना प्रेम करते हैं उतना ही कौरवों के साथ भी स्पष्ट ही रखते हैं । वे हितकी बात नि:संकोच कह देते हैं । इस बात की परवा नहीं करते कि उसे कोई मानेगा या नहीं । उनको स्पष्ट कहनेमें कहीं कोई भय नहीं है, भय तो अधर्म में ही है, धर्ममे नहीं । विदुरके जीवनमे हम इस बातको पूर्णता पाते हैं कि वे जैसे कुछ हैं, स्पष्ट हैं, उन्हें दुर्योधन भी जानता है, युधिष्ठिर भी जानते हैं और कोई भी उनसे अपना सम्बन्ध तोड़ नहीं सकता।

पाण्डवो की समृद्धि और उनके राजसूय – यज्ञकी सफलता , देखकर दुर्योधन के हृदयमें ईर्ष्या की आग धधकने लगी । विदुर की अनुपस्थिति में उसने धृतराष्ट्र को उलटा सीधा समझाकर और दबाव डालकर उनसे जूआ खेलने की आज्ञा प्राप्त कर ली। परंतु धृतराष्ट्र इस बातको विदुरसे छिपा नहीं सके । उनके जीवनमे इसके पूर्व ऐसा कोई अवसर नही आया था, जब उन्होंने विदुरको सलाहके बिना किसीको कोई आज्ञा दे दी हो । आज जूएको आज्ञा देकर वे पछताने लगे और तुरंत दूत को भेजकर विदुरको बुलवाया । विदुर ने आकर धृतराष्ट्र से स्पष्ट कह दिया कि मैं कदापि जूएका अनुमोदन नहीं कर सकता । आपने यह काम बडा ही अनुचित किया है । इससे पारस्परिक

विरोध बढ जायगा और वंशका सत्यानाश हो जायगा। धृतराष्ट्र ने विदुर की बात से प्रभावित होकर दुर्योधन को बुलवाया और जूआ न खेलने के लिये कहा । परंतु उसने धृतराष्ट्र की एक न मानी, जूआ हुआ और पाण्डव हारने लगे ।

जूएके बीचमें ही विदुरने धृतराष्ट्र को बहुत समझाया, अनेकों आख्यायिकाएँ सुनायी और कहा कि जैसे मरने वाले को दवा नहीं रुचती, वैसे ही आपको भी नीति की बात पसंद नहीं आती। दुर्योधन लोभके कारण अधर्म और अन्याय कर रहा है । यह जूए केनशेमें मतवाला हो गया है। आप अर्जुन को आज्ञा दीजिये, वह इस दुष्टका दमन कर दे। यह सारे कौरव कुलका संहार करना चाहता है । यह जूआ सब प्रकारके झगडों की जड़ है । अभी जो दुर्योधन युधिष्ठिर को हराकर प्रसन्न हो रहा है, यह कुछ ही क्षणोंके बाद रोयेगा । मैं अपको पुन: चेताये देता हूँ कि अगर आपने जूए को नहीं रोका तो आपका सर्वनाश हो जायगा ।

दुर्योधन विदुर की सब बात सुन रहा था । उसने विदुरसे कहा – मैं तुम्हें खूब जानता है । तुम मेरे नमक से पलकर मेरी ही बुराई करते हो, मेरी ही निन्दा करते हो । तुम अपने स्वामी के साथ द्रोह करते हो, तुम्हें इसका पाप लगेगा। मेरे आश्रित होकर भी तुम शत्रुओं का काम बना रहे हो, यह तुम्हारी निर्लज्जता है । अपने से मित्रता रखनेवालों का विरोध करना मूर्खो का काम है । शत्रुपक्षसे मिले हुए आदमी को अपने यहां नहीं रखना चाहिये । इसलिये तुम्हारी जहाँ इच्छा हो चले जाओ । विदुरने कहा- दुर्योधन ! तुम अभी बच्चे हो । सुननेमें कठोर किंतु परिणाममें सुख देनेवाली बात सेे तुम्हें नाराज नहीं होना चाहिये । देखो, मूढ़ता मत करो । अपना हित अनहित समझो । ठकुरसुहाती करनेवाले बहुत से मिल जाएंगे, परंतु संसार में सच्चे हितैषी बहुत ही कम मिलते हैं । क्रोध बड़ा भारी शत्रु है ।

लोभ धधकती हुई आग है । मैं चाहता हूँ कि कौरवोंका यश बढे। वे शान्तिसे सुख से धर्मके मार्गपर चलें । मैं हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना करता हूँ, भगवान् तुम्हारा कल्याण करें । तुम पाण्डवो के साथ यह अन्याय मत करो, नहीं तो तुम्हारा नाश अब दूर नहीं है । दुर्योधन ने विदुरकी बात नहीं मानी, जूआ चलता रहा। युधिष्ठिर चारों भाइयों-सहित अपनेको हार गये । द्रोपदी को भी दावँपर लगाकर हार गये ।

दुर्योधन की हिम्मत बढ़ गयी थी । उसने विदुर से कहा- तुम जाकर द्रोपदी को सभामें ले आओ । वह अभागिनी है, आकर मेरे घरमें दासी की तरह रहे, झाडू लगावे । जब दुर्योधन ने विदुर को भला-बुरा कहा था, तब विदूर पर उसका असर नहीं पडा था । परंतु द्रोपदी के बारेमें ऐसी बात सुनकर उन्होंने यह बात कह डाली जो द्रोपदीके बार बार रोने गिड़गिड़ाने पर भी भीष्म और द्रोणके मुँह से नहीं निकली । उन्होंने दुर्योधनसे कहा –  मूढ दुर्योधन तू किसके बारेमें ये बातें कह रहा है । किसी भी स्त्री का अपमान करना मनुष्यता के विरुद्ध है । फिर द्रोपदी तो यज्ञवेदी से निकली हुई साक्षात् देवी है । तू सांपो से छेड़खानी कर रहा है । अब तू शीघ्र ही यमपुर जायेगा। देख, द्रोपदी कभी तेरी दासी नहीं हो सकती । युधिष्ठिर को द्रोपदी के हारनेका कोई हक ही नहीं था । अपन ेको हार जानेके बाद द्रोपदीपर उनका क्या स्वत्व था कि उन्होंने उसको दावँपर लगाया। अपने मुँह से कभी किसीके लिये दुर्वचन नहीं निकालना चाहिये। द्रोपदी के प्रति दुर्वचनका प्रयोग करके तूने अपने पुण्य नष्ट कर दिये हैं, अब भी सँभल जा, नहीं तो अनर्थ हो जायगा । दुर्योधन ने विदुर की बात नहीं मानी । द्रोपदी लायी गयी और उसके बाद उसकी साडी उतार कर निर्वस्त्र करने का प्रयास किया गया परंतु भगवान् कृष्ण ने वस्त्रावतार धारण कर द्रौपदी की लाज बचाई,यह बात प्रसिद्ध ही है। विदुरने भरसक उस दुर्घटना को रोकनेकी चेष्टा की, परंतु वह होनेवाली थी, होकर ही रही !

जब पांचों पाण्डव कुन्ती और दौपदी के साथ बारह वर्षके वनवास और एक वर्षके अज्ञातवास के लिये जाने लगे, तब उन्होंने सभामे जाकर सबको प्रणाम किया और सबसे अनुमति ली । उस समय उनके कल्याण की कामना तो सब ने की, परंतु यह बात केवल विदुरके ही मनमें आथी कि कुन्ती बूढी हो गयी हैं, इन्हें वनमें नहीं जाना चाहिये । उन्होंने पाण्डवों से कहा –  कुन्ती सर्वथा पूजनीय हैं । इनकी अवस्था वनमें जाने योग्य नहीं है । ये सदा सुखमे ही रही है । ये वनका दुख नहीं सह सकेंगी । आर्या कुन्ती मेरे घरमे अन्दर सत्कारके साथ रहें । तुमलोग मेरी यह बात भात लो । जाओ, भगवान् सर्वत्र तुम्हारा भला करे । युधिष्ठिरने कहा – निष्पाप ! आप हमारे गुरु हैं, आदरणीय चाचा हैं, इम सब आपके अनुगामी हैं, आपकी आज्ञा हमें स्वीकार है, माता कुन्ती यहीं रहेंगी । अब आप हमलोगो को कुछ उपदेश कीजिये ।

विदुरने कहा – तुमलोग सब तरहसे योग्य हो, तुम्हारे  पुरोहित धौम्य ब्रह्मज्ञानी हैं और वे तुम्हारे साथ हैं । तुमलोग संतोषी हो, इसलिये फूट पड़नेकी संभावना नहीं । तुमलोगों ने मेरु, सावर्णी, परशुराम, कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास)और भगवान् शंकर से ज्ञान तथा धर्मकी शिक्षा प्राप्त की है । असितने तुम्हें उपदेश किया है और भृगुने दीक्षा दी है । देवर्षि नारद सर्वदा तुम्हारी देख रेख किया करते हैं । तुम लोगो में सब सदगुण निवास करतें हैं । तुम्हें आत्मसंपत्ति प्राप्त है । अधर्म के द्वारा ठगे जानेपर व्यथित होने की तो कोई बात ही नहीं है । जो वस्तु तुमसे ठग ली गयी है; वह तुम्हारे पास कई गुना होकर लौटेगी । जाओ, तुम्हारा कल्याण हो । माता कुन्ती विदुरजीके पास रह गयी तथा द्रोपदी और पुरोहित धौम्य के साथ पाण्डवो ने वन को प्रस्थान किया ।

धुतराष्ट्र के पूछने पर विदुरने उन्हें बतलाया कि युधिष्टिर अपनी आंखें बंद किये जा रहे हैं । इसका यह अर्थ है कि

युधिष्ठिर दुर्योधनादिपर बडा ही स्नेह रखते हैं । यदि इस समय वे आँखें खोलकर देख लें तो तुम्हारे बेटे भस्म हो सकते हैं । इसीसे वे आँखें बंद किये जा रहे हैं । भीमसेन अपने विशाल बाहुओ की ओर देखते जा रहे हैं । वे सोच रहे हैं कि बाहुबल में मेरे समान कौन है । वे मन ही मन युद्धमें घोर कर्म करनेका संकल्प कर रहे हैं । अर्जुन पैरो से बालू (धूल)उड़ते हुए जा रहे हैं, इसका अभिप्राय यह है कि युद्धके समय वे शत्रुओ पर इसी प्रकार बाण वर्षा करेंगे और शत्रुओ को धूल में मिला देंगे। नकुलने अपने शरीरपर मिट्टी पोत ली है कि मेरा शरीर बहुत सुंदर है, कहीं मुझे देखकर स्त्रिया मोहित न हो जाये । सहदेवने अपने मुंहमें मिट्टी लगा ली है कि कोई उन्हें पहचान न सके। वे वन जाने से कुछ लज्जित से हो रहे हैं ।द्रोपदी दु:शासनके पकड़े हुए बालो को खोलकर यह कहती जा रही है कि आजके चौदहवें वर्ष कौंरवकुल की स्त्रिया भी यहीं दुर्गति भोगेगी । धौम्य भयंकर याम्य – मंत्रो का उच्चारण करते हुए जा रहे हैं कि कौरवों के पुरोहित भी उनके मारे जानेपर इसी प्रकार का मन्त्रपाठ करेंगे ।

विदुर ने आगे कहा – महाराज ! सारी प्रजा विक्षुब्ध हो ठी है । सब लोग कौरवो को कोस रहे हैं, उनके अन्याय की निन्दा कर रहे हैं और पाण्डवो के साथ सहानुभूति प्रकट कर रहे हैं । महाराज आज प्रकृति बडी ही क्षुब्ध है । आजके अपशकुनों को देखकर बडी आशंका हो रही है । संसार में न जाने क्या होनेवाला है । विदुर इस प्रकार कह ही रहे थे कि ब्राह्मी कान्ति धारण किये हुए देवर्षिश्रेष्ठ नारद जी उसी समय सभामें उतर आये और उन्होंने सबके सामने ऊँचे स्वरसे कहा – लोगो ! सुन लो। कान खेलकर सुन लो । आजके चौदहवें वर्ष दुर्योधनके अपराध से और भीमसेन तथा अर्जुनके बल से सम्पूर्ण कौरव-कुलका नाश हो जायगा । इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गये और सभी

सभासद्  दुर्योधन, कर्ण और शकुनि के सहित सन्न रह गये । एक दिन धृतराष्ट्र ने विदुर को बुलाकर पूछा – क्या करनेसे हमारा उपकार हो सकता है ? जो हो गया, सो हो गया । अब जो हमारा कर्तव्य है, उसे बताओ । प्रजा हमसे विरुद्ध हो रही है, उसका प्रेम किस प्रकार प्राप्त किया जाय ? विदुरने कहा – महाराज ! धर्म ही अर्थ, काम और मोक्ष तीनों की जड़ है । आपके पुत्रोंने बडा ही अन्याय किया है । उन्होंने धर्मात्मा युधिष्ठिरको छल से जीता है, इस कुकर्म का आप प्रायश्चित्त कर डालिये, पाण्डवो की सम्पत्ति उन्हें फिर दे दीजिये। शकुनि का तिरस्कार कीजिये । पाण्डवों को कोई जीत नहीं सकता। आप यदि कौरव और पाण्डव दोनों वंशोंका मंगल चाहते हैं तो दुर्योधन को बाध्य कीजिये कि वह पाण्डवो के साथ निष्कपट मेल कर ले नहीं तो उसे कैद कर लीजिये । दुर्योधन को कैद कर लेने से पाण्डव संतुष्ट हो जायंगे और वे फिर धर्म के अनुसार पृथ्वीका शासन करेंगे तथा शरणमें जानेपर दुर्योधन को  छोड़ भी देंगे । दुशासन अपने पाप के लिये पश्चात्ताप करे और भरी सभा में द्रोपदी तथा भीमसेन से क्षमा मांगे । कर्ण अपने मनसे दुर्भावना निकाल दे और शकुनि यहां से निकाल दिया जाय । आप सांत्वना देकर युधिष्ठिर का राज्याभिषेक कीजिये । बस, यही प्रजाप्रेम प्राप्त करनेका उपाय है । इसीसे आपको शान्ति प्राप्ति होगी और अपका मनोरथ सिद्ध होगा । विदुर की स्पष्ट वाणी सुनकर धृतराष्ट्र जल उठे । उन्होंने कहा –  विदुर ! तुम पाण्डवो का पक्षपात करते हो । तुम मेरा भला करना नहीं चाहते । धर्मके अनुसार पाण्डव मेरे पुत्र हैं सही, किंतु दुर्योधन तो मेरे शरीर से पैदा हुआ है, भला मैं अपने सगे बेटे को किस तरह कैद कर सकता हूं? दूसरों के लिये शरीर त्याग का उपदेश करना समदर्शीका काम नहीं । तुम मुझे बुरी सालाह देकर स्पष्टरूप से मेरी हानि करना चाहते हो । अब तुम चाहे यहाँ रहो या मत रहो । मुझे तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं । इतना कहकर धृतराष्ट्र रनिवास में

चले गये और विदुरने यह सोचकर कि अब यह घराना चौपट होनेवाला है, पाण्डवोंके पास जानेके लिये फुर्तीले घोडोंके रथपर सवार होकर यात्रा शुरू कर दी ।

पाण्डवो ने खड़े होकर विदुरका स्वागत किया और उन्हें एक सुन्दर आसनपर बैठाकर यथोचित सम्मान किया । युधिष्टिर के पूछनेपर विदुरने धृतराष्ट्र की बात कही और यह भी बताया कि अब धृतराष्ट्र को मेरी आवश्यकता नहीं रही, इसलिये मैं यहाँ चला आया । उनका हृदय मोह ममता से कलुषित हो गया है । वे धर्मकी बात, हित की कात सुनना तक नहीं चाहते हैं । ऐसा मालूम होता है कि अब कौरवो का नाश निकट है ।  युधिष्ठिर ! इस आपत्ति से घबड़ाने की कोई कात नहीं है । जो पुरुष शत्रुओंके दिये हुए क्लेशों को धीरता के साथ सह लेता है और क्षमा का सहारा लेकर अपने अनुकूल समय की बाट देखता रहता है, उसे आगे चलकर अवश्य सुख प्राप्त होता है । जो सम्पत्तिके समय, भोगके समय अकेले ही सुख नहीं भोगता, अपने सहयोगीयो को भी समानरूप से हिस्सा देता है, उसे विपत्तिके समय भी, दुखके समय भी अकेले ही उनका भार नहीं उठाना पड़ता । उनमें भाग लेनेवाले भी मिल जाते हैं, सहायक पानेका यही सबसे अच्छा उपाय है । सहायक मिल जानेपर सब कुछ मिला हुआ ही समझना चाहिये। अपने को सबसे छोटा और नम्र बनाकर रखनेमें ही कल्याण है । राजाओं की इसीसे अभिवृद्धि होती है । इसी प्रकार विदुर पाण्डवो को उपदेश करते रहे ।

ऐसा देखा गया है कि स्वार्थी पुरुष भी नि:स्वार्थ व्यक्तिपर ही अधिक विश्वास करता है । शराबी को यदि अपनी स्त्री किसीके पास रखनी होती है तो वह शराबी का नहीं, शराब न पीनेवाले का ही विश्वास करता है । बेईमान भी अपनी धरोहर ईंमानदार के पास ही रखता है । धृतराष्ट्र भी विदुरपर सबसे

अधिक विस्वास रखते थे । इसका कारण था, उनके लड़के उन्हें धोखा दे सकते थे । परंतु विदुर से धोखे की कभी सम्भावना नहीं थी । विदुर के चले जानेपर वे पछताने लगे । उन्होंने सोचा कि विदुर की सहायतासे पाण्डवो की बडी उन्नति होगी । मेरे लड़कोंका बडा अनिष्ट होगा । सन्धि और विग्रह की नीति का जानकार कोई भी हमारे पक्षमें नहीं रह जायगा । वे सभाके द्वापर आते-आते अचेत हो गये । संजय आकर उन्हें सँभालने लगे । थोडी देरमें धृतराष्ट्र को चेतना हुई ।

धृतराष्ट्र ने संजय से कहा – संजय ! विदुर मूर्तिमान् धर्म हैं । वे मेरे प्यारे भाई हैं । उनके बिना मेरा कलेजा छटपटा रहा है । मेरी छाती फटी जा रही है ।  करुण स्वर से विलाप करते हुए धृत्तराष्ट्र ने फिर कहा –  विदुर कहाँ चले गये ?उनकी अनिष्ट शंका से मैं बहुत ही व्याकुल हो रहा हूँ ।वे जीवित तो हैं न ? मैं बडा पापी हूँ । क्रोध के अधीन होकर मैंने अपने प्यारे भाई का त्याग कर दिया । उन्होंने सर्वदा मेरा उपकार किया है, किन्तु मैं इतना नीच हूँ कि मैंने उन्हें बिना किसी अपराधके ही निकाल दिया । संजय! तुम शीघ्र जाकर विदुर को ले आओ । नहीं तो मैं अपने प्राण दे दूँगा । जो आज्ञा है कहकर संजय ने उसी समय प्रस्थान कर दिया ।

संजय ने काम्यक वन में जाकर विदुर से घृतराष्ट्र की  अवस्था का वर्णन किया और आग्रह किया कि आप शीघ्र चलकर उनके प्राणों की रक्षा कीजिये । विदुरके मनमें कोई दुर्भाव तो था ही नहीं । वे पाण्डवो से अनुमति लेकर शीघ्र ही वहाँसे चल पड़े । उनके आनेपर धुतराष्ट्र ने बडी प्रसन्नता प्रकट की और कहा –  विदुर ! तुम्हारा हृदय शुद्ध है, यह मेरा सौभाग्य है कि तुम मेरे पास रहते हो । मैंने तुम्हारा अपराध किया है, तुम्हें बहुत कटु वचन कहे हैं, उन्हें भूल जाओं और मुझे क्षमा करो । धृतराष्ट्र ने  विदुर को अपनी गोदीमें उठा लिया और सिर सूंघ कर बड़ा प्रेम

जताया । विदुरने कहा – राजन्! आप कैसी बात कहते हैं। मेरे नाते भी क्या आपका छाई अपराध होता है ? आप मेरे परम गुरु हैं । आपके लिये ही मै शीघ्र यहाँ आ गया हूँ। पाण्डव और कौरव दोनों ही मेरे लिये समान हैं तथापि पाण्डवो की अवस्था इस समय अच्छी नहीं है । इसलिये बार-बार मेरी दृष्टि उनपर पड़ जती है और पड़नी ही चाहिये। यदि आप उनके साथ प्रेमका भाव रख सके तो कितना अच्छा हो । धृतराष्ट्र प्रसन्न हो गये और विदुर हस्तिनापुर में रहने लगे ।

4. पाण्डवों का बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास समाप्त हो चुका था । वे विराटनगर में प्रकट हो चुके थे और दोनों ओर से युद्ध की भीषण तैयारी हो रही थी । धृतराष्ट्र ने संजय को युधिधिरिके पास यह समझाने के लिये भेजा था कि युद्ध करना अधर्म है, वे किसी प्रकार युद्धसे विरत हो जायें । उस दिन संजय युधिष्टिर के पास से लौटकर धृतराष्ट्र के पास आया था और उसने युधिष्ठिर को निर्दोष बतलाते हुए यह कहा था कि अब युद्ध हुए बिना नहीं रह सकता । यदि उन्हें कुछ दिया नहीं जायगा तो वे युद्ध करनेके लिये मजबूर हैं और इसमें उनका कोई दोष नहीं । उन्होंने आपके लिये और सब लोगोंके लिये जो सन्देश कहे हैं उन्हें मैं कल सभामें सुनाऊँगा, क्योंकि आज मैं थक गया हूँ । धृतराष्ट्र की अनुमति लेकर संजय चला गया ।

संजय के चले जानेपर धृतराष्ट्र बड़ी चिन्तामें पड़ गये । उन्होंने द्वारपाल को भेजकर विदुरको बुलवाया । विदुर तुरंत धृतराष्ट्र के पास उपस्थित हुए और उन्होंने बडी नम्रता से कहा – महाराज ! मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? मेरे योग्य सेवा बतलाइये । धृतराष्ट्र ने कहा – विदुर ! अभी संजय मुझे वहुत कुछ कह सुनाकर घर गया है । सुबह सभामे युधिष्ठिर के संदेश खुनायेगा । अभी मुझे मालूम नहीं कि युधिष्ठिरने क्या सन्देश भेजा है । उसी चिन्ता से मुझे नींद नहीं आ रही और मेरा शरीर जल रहा है । धर्म और अर्थका तुम्हरे जैसा जानकार और कोई नहीं है । तुम मेरे भले की बात कहो । मेरी इंद्रियां विकल हो रही हैं । मुझे चिन्ता सता रही है । कोई ऐसा उपाय करो कि मेरा चित्त शान्त हो ।

विदुर ने कहा – महाराज ! साधारण पुरुषों को नींद न आने के बहुत से कारण हैं । जिसके ऊपर बलबान् पुरुष आक्रमण करनेवाला हो, जिसका सर्वस्व छिन गया हो, जो कामी है, चोर है, उसे नींद नहीं आती । जो किसी की सम्पत्ति हड़पना चाहता है, उसे भी नींद नहीं आती । इनमें से कोई दोष आपमें तो नहीं आ गया है ? महाराज ! यदि ये दोष आपमें न हों तो आप सुखपूर्वक सो सकते हैं । धृतराष्ट्र ने कहा – विदुर ! तुम बड़े विमा, बुद्धिमान और सम्मान के पात्र हो । मैं तुम्हारी कल्याणकारी बातें सुनना चाहता है । तुम मुझे नीति की बातें सुनाओ ।

विदुर ने कहा – राजन्! आपने नीति-विरुद्ध आचरण किया है । युधिष्ठिर सर्वथा राज्य के योग्य हैं । उन्हें आपने निकाल दिया है और आपमें राजा होनेके लक्षण बिलकुल नहीं हैं फिर भी आप राजा बन बैठे हैं । आप राज्य का शासन क्या कर सकते हैं ? दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुशासन के भरोसे शासनका कार्य छोड़कर आप कैंसे भलाई की आशा कर सकते हैं । आपमें और उनमें बुद्धिमानों के लक्षण नहीं हैं । जिसे आत्मज्ञान है, जो अपनी शक्तिके अनुसार काम करता है, जिममें विषयों से विरक्ति है, सहनशीलता है और जो श्रद्धाके साथ धर्मका अनुष्ठान करता है, जो सर्वदा लोक ऊपकारी काम करता है, लोकविरोधी काम कभी नहीं करता, भगवान् और परलोक पर जिसकी श्रद्धा है । जो क्रोध, हर्ष, अभिमान, उद्दण्डता आदिके द्वारा दबा नहीं दिया जाता, काम हो जानेके पहले जिसके विचारों को और लोग जान नहीं सकते । बड़े से बड़े विघ्न जिसके निश्चयको बदल नहीं सकते, जो व्यवहार में सर्वदा धर्मका पालन करता है । जो बहुत देंर तक सुनता है और थोडी ही देर में समझ जाता है । जो असंभव की इच्छा नहीं करता, नष्ट हुए का शोक नहीं करता, आपत्तिमें मोहित नहीं होता । जो निश्चय करके ही पराक्रम प्रकट करता है, अपने समय को व्यर्थ नहीं बिताता । जो कटुभाषी हितैषी का अनादर नहीं करता, सम्मान पाने पर फूलकर कुप्पा नहीं हो जाता और अपमान होनेपर दुखी नहीं होता, सबका रहस्य जानता है, वह बुद्धिमान कहलाने योग्य है ।

जिसका अध्ययन दृद्धिके अनुसार है और जिसकी बुद्धि विद्या विरुद्ध नहीं है । जो प्राचीन पुरुषोंद्वारा निश्चित मर्यादाका उलंघन नहीं करता, सर्वदा सनातन धर्मपर हृदय से आरूढ़ रहता है, वह बुद्धिमान् है । विदुरने आगे कहा – राजन्! यह तो मैंने पंडितो के लक्षण कहे, अब आप मूर्खो के लक्षण सुनें । जिसने शास्त्र और लोक की बातें नहीं सुनीं । जो अपने आपे का बडा घमण्ड रखता है। जो असमर्थ होनेपर भी मनोरथ के पुलाव पकाता रहता है, जो पाप से धन कमाना चाहता है, जो मित्रसे दगा करता है, शत्रुओ से मित्रता जोड़ने वाला है, अपने करनेयोग्य कामों को नौकर चाकरों से कराता है, सबपर संदेह करता है, काममें जल्दबाजी करता है और जल्दी के काममें देर लगा देता है, उसे मूर्ख कहना चाहिये ।

राजन्! पितरोंका श्राद्ध नहीं करता, देवताओं की पूजा नहीं करता, सज्जनोंको मित्र नहीं बनाता, बिना बुलाये ही किसीके भी यहाँ चला जाता है, बिना पूछे ही बहुत कुछ कह डालता है । विश्वास के योग्य पर अविश्वास करता है, अपना दोष दूसरे पर लगाता है । जो परस्त्रियो पर आंख उठाता है और जो कंजूसों की सेवा करता है, वह मूर्ख है । राजन्! मैं आपसे सत्य कहता हूं । यही प्राचीन काल की मर्यादा है । जो सम्पत्तिशाली होकर अकेले ही बढिया माल खाता है, बढिया बढिया कपडे पहनता है और दूसरो को नहीं देता, उससे बढकर निष्ठुर और नीच कोई नहीं है। आप स्थिर बुद्धिसे कार्य और अकार्य- इन दोनोंका निश्चय करके मित्र, शत्रु, उदासीन तीनों को साम, दाम, दण्ड, भेद इन चारोंसे वशमें कीजिये । पांचों इंद्रियों को जीतकर सन्धि, मान, विग्रह आदि छहों को जानकर वेश्या, जूआ, शराब, शिकार, कठोर वचन, दण्डवत कठोरता और अन्याय से धनोपार्जन –  सात बातों को छोड़ दीजिये । फिर आपके

लिये सुख ही सुख है । विष और शस्त्र से केवल एक की हत्या होती है, किन्तु कुविचारसे बहुतोंका नाश हो जाता है। किसी कामके बारेमें अकेले नहीं सोचना चलिये, अकेले ही राह नहीं चलना चाहिये और सोते हुए लोगो को छोड़कर अकेले ही नहीं उठना चाहिये ।

क्षमा मनुष्यका परम बल है । क्षमा अशक्तों के लिये गुण है समर्थो के लिये आभूषण है । जिसके हाथमे क्षमाका खड्ग है, दुर्जन उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। धास-फूस से खाली जगहपर गिरकर आग आप ही आप बुझ जाती है । धर्म ही परम कल्याण है । क्षमा ही परम शान्ति है । ज्ञान ही परम तृप्ति है और एक अहिंसा ही सम्पूर्ण सुखों को देनेवाली है । जो राजा होकर युद्धसे डरता है, ब्राह्मण होकर घर छोड़ने में भयभीत होता है, उसे भूमि निगल जाती है । बेकार गृहस्थ और रोजगारी भिखमं गे दोनों ही अपने धर्मसे च्युत हैं । समर्थको क्षमा और दरिद्र को दानशीलता यह दोनों मोक्ष की जननी हैं । जो धनी होकर दान न करे और जो गरीब होकर तपस्या न करे, उसे गलेमे पत्थर बाँधकर नदीमे डूब जाना चाहिये। धनके दो अपव्यय हैं – एक तो अपात्र को देना और दूसरे सुपात्र को न देना । योगी सन्यासी और युद्धमें सम्मुख मारा जानेवाला क्षत्रिय – दोनों ब्रह्मलोकमें जाते हैं ।

उपाय तीन प्रकार के होते हैं- उतम, मध्यम और अधम । पुरुष और कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं-पराये धनका हरण करना, परस्त्री का सेवन करना और संबंधियो का त्याग करना – ये तीनों लोभ, काम और क्रोध से होते हैं, अतएव तीनों ही निन्दनीय होते हैं । वरदान मिलना, राज्य मिलना और पुत्र होना – तीनों एक से हैं परंतु इन तीनो से श्रेष्ठ है शत्रु को

आपत्ति से बचा लेना । जो अपना भक्त हो, अपनी सेवा करता हो और ” मैं तुम्हारा भक्त हूं ” इस प्रकार कहे उसका त्याग कभी नहीं करना चाहिये । सम्पन्न के घरपर चार प्रकार के लोगों को रहना चाहिये-अपनी बिरादरीका बूढा, दुखी, कुलीन, दरिद्र सखा और बिना पुत्र की बहिन ।चार बातें तुरंत फल देनेवाली हैं – देवताओं-का ध्यान मनोरथ पूर्ण कर देता है । बुद्धिमानी के प्रतापसे गूढ बात भी मालूम हो जाती है । विद्वान के विनयकी लोग पूजा करते हैं और पापके त्यागसे अन्त करणमे शान्ति आ जाती है । अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ यदि मानके लिये किये जाते हैं तो इनका फल विपरीत होता है ।

पिता, माता, अग्नि ,आत्मा और गुरु -इन पांचो की सेवा प्रतिदिन करनी चाहिये । जो देवता, पितर, मनुष्य, भिक्षुक और अतिथि इन पाँचों की नित्य पूजा करता है, वह पूजनीय होता है । जहाँ-जहाँ तुम जाओगे, वहाँ वहाँ पाँच प्रकार के लोग तुम्हारे साथ जायेंगे- मित्र, शत्रु, मध्यस्थ, सेव्य और सेवक । मनुष्योंको पाँच इंद्रियां है, यदि एकमें भी कोई दोष है तो उसके रास्ते से ज्ञान बह जाता है । छ: दोषों को अवश्य छोड़ देना चाहिये-अधिक निद्रा, तन्द्रित रहना, भय, क्रोध, आलस्य और फिर कभी कर लूँगा यह भाव । इन छ: गुणों को कभी नहीं छोड़ना चाहिये – सत्य,दान, सावधानी, प्रेम, क्षमा और धैर्य । जिसके वशमें काम, क्रोध, शोक, मोह, मद और मान -यह छहों रहते हैं वह जितेन्द्रिय है । गौ, नौकरी, खेती, स्त्री, विद्या और शूद्र के साथ संगति – छहोंके ऊपर बराबर दृष्टि न रखी जाय तो ये नष्ट हो जाते हैं । नीरोगता, ऋणहीनता, स्वदेशमें रहना, सत्संग, अनुकूल जीविका, भयरहित स्थानमें रहना – ये छ: बातें संसारमें सुख मानी जाती हैं । जो दूसरे की उन्नति नहीं देख सकते, सन्तोष

नहीं करते, क्रोध करते हैं, किसीका विश्वास नहीं रखते और दूसरो के प्रारब्धपर जीते हैं तथा दूसरों से घृणा करते हैं, वे दुखी ही रहते हैं ।

स्त्री, जूआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी, भयंकर दण्ड और काम – इन सात दोषो को सर्वथा त्याग देना चाहिये । ब्राह्मणों से द्वेष, लडाई, उनका धन छीनना, उनको मारने की इच्छा, निन्दा, उनकी प्रसंशा को अस्वीकार करना, उनको भूल जाना और जब वे माँगने आवें तब उनमें अवगुण निकलना – ये आठो भावी नाशके सूचक हैं । यह शरीर एक घर है । इसमें नौ द्वार हैं, तीन खंभे हैं, पाँच साक्षी हैं और जीव निवास करता है । जो इनको पहचान लेता है, वह तत्त्व को जान लेता है । इस प्रकार के लोगो को धर्मका ज्ञान नहीं होता – जो शराब पीते हैं, विषयो के लिये व्याकुल रहते हैं, धातुओ से दोष से पागल हुए रहते हैं ,जो थके हुए हैं, क्रोध में भरे हुए हैं ,भूखे हैं, उतावले हैं, लोभी हैं, भीरु हैं और कामी हैं, इनकी संगति कभी नहीं करनी चाहिये । जो आपत्तिमें व्यथित नहीं होता, सावधानी के साथ उद्योग करता रहता है, समय आनेपर दुःख भी सह लेता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं । जो बिना काम के विदेशमें नहीं जाता, यात्रियों से मेल नहीं करता, परस्त्रियो पर दृष्टि नहीं डालता, दम्भ, चोरी, चुगलखोरी और शराबखोरी नहीं करता, वह सर्वदा सुखी रहता है । जो बराबरीवालो से विवाह, मैत्री, व्यवहार और बातचीत करता है, गुणियो को आगे बैठाता है, वह नीति-से च्युत नहीं होता । जो परिमित भोजन करता है और अपनेसे पहले आश्रितों को भोजन करा देता है, थोडा सोता है तथा काम बहुत करता है, मांगने पर पर शत्रुओ को भी देता है, उसकी हानि कोई नहीं कर सकता । जो अपने दुष्कर्म पर किसीके न जानने पर भी अपने आप ही लज्जित होता है, उसके दुष्कर्म छूट जाते हैं, उसे शान्ति मिलती है

और वह अत्यन्त तेजस्वी हो जाता है ।

विदुर ने आगे कहा – राजन्! पाण्डव आपके ही बालक हैं । आपने ही उनका पालन पोषण किया है । आपकी ही गोदमें खेलकर वे बड़े हुए हैं । आपने ही उन्हें सिखाया पढाया है और वे आपकी आज्ञाका पालन भी करते हैं । उनका हक उन्हें दे दें । आपका हृदय शान्त हो जायगा। तीनों लोको में अपकी प्रशंसा होगी । सब आपका सम्मान करेंगे । विदुरने धृतराष्ट्र को धर्मकी दृष्टिसे, शासन की दृष्टि से और हर प्रकार से समझाते हुए कहा है आप पाण्डवों के साथ न्याय कीजिये । अपने पुत्रों का पक्षपात करना ठीक नहीं है । मैं आपको एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूं। आप देखेंगे कि न्याय करने से हर तरहसे कल्याण ही होता है ।

पुराने जमाने में एक केशिनी नामकी कन्या थी । भक्तराज प्रह्लाद के पुत्र विरोचन ने उससे कहा कि तुम मुझे वरण कर लो । उसने पूछा विरोचन ! ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा दैत्य । विरोचनने कहा – दैत्य ही श्रेष्ठ हैं । केशिनीने कहा – कल प्रात:काल सुधन्वा आयेंगे, उन्हें देखकर मैं निश्चय करूंगी । दूसरे दिन सुधन्वा आये, विरोचन ने उन्हें बैठने के लिये अपने आसन की और इशारा किया, उन्होंने केवल स्पर्श कर लिया । बात ही बातमें दोनो में विवाद छिड़ गया कि ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं या दैत्य । प्राणों की बाजी लगी और निर्णायक चुने गये विरोचन के पिता प्रह्लाद। जब दोनों प्रह्लाद के पास पहुंचे और प्रह्लाद ने सुधन्वा से पूछा कि अनुचित न्याय करने वाले को क्या दण्ड मिलता है, तब सुधन्वा कहा – सौतवाली स्त्री को जो वेदना होती है, जुए में हारे हुए और बोझ से पीडित पुरुष को जो पीडा होती है, निकलने के लिए छटपटाते हुए कैदी और द्वार के बाहर पड़े हुए भूखे को जो दुख मिलता है, वही दुःख झूठे गवाह और अन्यायपूर्ण निर्णय

करनेवाले को मिलता है । स्वार्थवश झूठ बोलने वाले स्वयं तो नार्को में जाते ही हैं, उनकी पीढियां भी नरकगामिनी होती हैं । झूठ बोलने वालो का सर्वनाश हो जाता है ।

सुधन्वा की शास्त्र सम्मत बात सुनकर प्रह्लाद कहा- विशेचन ! सुधन्वा के पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, सुधन्वा की माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ हैं और सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ हैं । इस विवादमें तुम सुधन्वा से हार गये । तुम्हारे प्राण सुधन्वा के हाथमें हैं । विरोचन से यों कहकर प्रह्लाद ने सुधन्वा से कहा – ब्रह्मन्! मैं चाहता हूँ कि आप मेरे पुत्रको प्राणदान करें । सुधन्वा ने कहा – दैत्यराज ! तुमने धर्मका पक्ष लेकर सत्य बात कही है । पुत्रका पक्ष लेकर झूठ नहीं कहा है, इससे प्रस्रन्न होकर मैं तुम्हें तुम्हारा पुत्र दान करता हूँ , मैंने विरोचन को छोड़ दिया । अब केशिनी के साथ विवाह भी यहीं करें ।

विदुरने कहा – महाराज ! आप भी प्रह्लाद की भाँति ही उचित न्याय की और भूमि के लालच से झूठ न बोलें । यदि आप पक्षपात करेंगे तो आपका सर्वनाश हो जायगा । विदुरने और भी बहुत प्रकार से समझाया । धृतराष्ट्र पूछते रहे और विदुर उनको उत्तर देते रहे । घृतराष्ट्र ने अन्तमें कहा – विदुर ! तुम मुझे सर्वदा यही उपदेश दिया करते हो और ठीक ही देते हो । मैं भी तो यही कहता हूँ और करना भी यही चाहता हूँ। पाण्डवो के बारे में धर्मसंगत निश्चय भी करता हूँ, परंतु दुर्योधन के सामने आने पर सभी बातें बदल जाती हैं । अब जो होनेवाला है सो होकर रहेगा । मुझे अपने उद्योग से कोई आशा नहीं है । यदि कुछ और उपदेश करना बाकी हो तो यह भी मुझे सुनाओ। तुम्हारी बातें बडी विचित्र हैं, उनसे मुझे तृप्ति नहीं होती है ।

विदुरने कहा – राजन्! इसके बाद ब्रह्मब्रिद्याका विषय है ।

मै शूद्र योनिमें पैदा हुआ हूँ, इससे वह बाते नहीं कहनी चाहिये। महर्षि सनत्सुजात ही उस सिद्धान्त को कह सकते हैं इसलिये आप उन्ही के मुखसे सुनिये । धृतराष्ट्र ने  कहा – क्या मेरे ऐसे भाग्य हैं कि मैं इसी शरीर से उनके दर्शन कर सकूँ ? विदुरने सनत्सुजात का ध्यान किया और वे उसी समय वहाँ उपस्थित हो गये । विदुरने उन्हें ऊँचे आसनपर बैठाकर उनको विधिपूर्वक पूजा की और प्रार्थना की कि धृतराष्ट्र के मनमें एक ऐसी शंका है, जिसका समाधान करने का मुझे अधिकार नहीं है । ये सम्पूर्ण दुखो से ,सम्पूर्ण द्वंदों से सर्वदा के लिये छुटकारा पा जाये ऐसा उपदेश कीजिये। धृतराष्ट्र ने भी महर्षि सनत्सुजात से विदुर की बातों का समर्थन करते हुए मृत्यु का रहस्य पूछा । सनत्सुजात ने विदुर की प्रार्थना से धृतराष्ट्र को सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया और मृत्यु का रहस्य बतलाया । महाभारत उद्योगपर्व का वह अंश बडा ही महत्त्वपूर्ण है । अध्यात्म जिज्ञासुओंके लिये उसका स्वाध्याय बहुत ही उपयोगी है । बात करते करते वह रात बीत गयी और प्रात:काल होनेपर सब लोग नित्यकृत्य से निवृत्त होकर संजय केे द्वारा युधिष्ठिर का सन्देश सुनने के लिये सभामें गये ।

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग १

पृथ्वी के नैऋत्य कोणपर धर्मराज की संयमनीपुरी है । उसमें अनेकों योजनों के बहुत से सुन्दर-सुन्दर महल है। उसमें धर्मराज अपने मंत्रियो और धार्मिक सभासदो के साथ निवास करते हैं । उनके सभासदों में ऋषि, महर्षि, देवता सभी प्रकार के लोग हैं । मनुष्यों के पाप-पुण्यका हिसाब रखनेवाले चित्रगुप्तजी महाराज हैं । काल, दिशा, आकाश, वायु ,अग्नि ,सूर्य आदि बहुत से उनके दूत हैं, जो मनुष्योंसे एकान्तमें होनेवाले कर्मोंको भी देखा करते हैं और तुरंत उनके पास समाचार पहुंचा देते हैं । उनकी सभामे चार दरवाजे हैं । जिनमें तीनसे पुण्यात्मा लोगोका प्रवेश होता है और दक्षिण द्वारसे पापी लोग आते हैं । उस मार्गसे आनेमें पापियों को महान् कष्ट उठाना पड़ता है और वैतरणी भी लांघनी पड़ती है । उधरके मार्गसे ले आनेवाले दूत भी बड़े ही भयंकर हैं और कुम्भीपाक, रौरव, असिपत्रवन आदि नाम के  नर्क भी उसी दिशामें पड़ते हैं । उस द्वार की सबसे बडी विशेषता यह है कि जो उस मार्गसे जाता है, उसे धर्मराज का स्वरूप बड़ा ही भयंकर दीखता है और यों तो वे बड़े ही सौम्य हैं ।

यों तो धर्मराज भगवान् के ही एक स्वरूप हैं, परंतु भागवत धर्मको जाननेवाले बारह महात्माओ में वे प्रमुख गिने जाते हैं । अर्थात् वे भगवान् के बहुत ही बड़े भक्त और उनके रहस्य को जाननेवाले ऊँचे ज्ञानी हैं । उन्होंने अपने दूतों को भागवत धर्मका रहस्य समझाया है और बार- बार समझाते रहते हैं कि किनको किस मार्ग से ले आना चाहिये और किनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये । वे कर्म, मन और वाणी से भगवान् के भक्त हैं तथा अपने दूतों को भी इस  आत की शिक्षा दिया करते हैं । उन्होंने एक खार कहा था कि ‘ मेरे भयंकर दूतो ! जिनकी जीभ भगवान् के पवित्र गुण, लीला और नामोंका गायन नहीं करती, जिनका चित भगवान् के चरण कमलो का स्मरण नहीं करता, जिनका सिर

भगवान् और उनके भक्तो के सामने एक बार भी नहीं झुकता, जिन्होंने अपने कर्तव्य पालन द्वारा उनकी आराधना नहीं की है और जो उनके सत्स्वरूप से विमुख हैं, उन्हें ही तुम भयंकर नरकके रास्ते ले आना ।

धर्मराज केवल वहाँ जानेपर ही पाप- पुण्यका फल नहीं देते, बल्कि इसी लोकमें, इसी जीवनमे, यहींके लोगो को निमित्त बनाकर भी उनके फल दिया करते हैं । प्राचीन कलमें माण्डव्य नामके एक बड़े ही तपस्वी ऋषि रहते थे। वे बड़े ही धर्मज्ञ, प्रभावशाली और मौनी थे । वे अपने हाथों को ऊपर उठाये तपस्या में संलग्न रहते थे । एक दिन कुछ डाकू धन लूटकर ऋषि माण्डव्यके आश्रमके पास से निकले। उसी समय राजा के सिपाहियोंने उनका पीछा किया और वे ऋषिके आश्रमके पास ही धन गाड़कर चलते बने । सिपाहियोंने जाकर ऋषि से पूछा कि ‘ महाराज ! वे डाकू किधर गये ?  परंतु अपने मौनव्रत के कारण ऋषिने क्रोईं उत्तर न दिया । सिपाहियोंने आश्रम के आस पास ही दूंढ़कर डाकुओ को पकड़ लिया । धन भी वहां मिल गया । उन्हें संदेह हुआ कि यह तपस्वी नहीं कोई डाकू है, इसने जान बूझकर हमारे पूछनेपर ज़वाब नहीं दिया । इसलिये इसे भी पकड़ ले चलें । उन्होंने माण्डव्य ऋषि को पकड़ लिया और डाकुओ के साथ ही उन्हें भी राजाके सामने पेश किया । राजाने भी उनके जवाब न देनेपर उन्हें डाकू समझ लिया और डाकुओ के साथ सूलीकी सजा दे दी । ऋषि माण्डव्य सूलीपर चढा दिये गये, परंतु सूली उनके शरीर को छेद न सकी । वे बहुत दिनोंतक सूली पर बैठकर तपस्या करते रहे । जब दूसरे

ऋषियों को यह समाचार मिला तब वे पक्षियो का रूप धारण करके माण्डव्य ऋषि के पास आने लगे और पूछने लगे कि तुम्हें किस पापका यह फल मिला है । माण्डव्य भी सोचने लगे कि मुझे किस पापका यह फल मिला है । थोड़े ही दिनोंके बाद राजाको यह मालूम हुआ कि सूलीपर चढाये जानेपर भी एक डाकू की मृत्यु नहीं हुई, यह अभी जीवित है । उन्होंने जान लिया कि वह तो कोई ऋषि है । राजाने जाकर बडी प्रार्थना की, उन्हें सूलीपर से उतारा, परंतु सूली की छोटी सी अणि उनके शरीरमें लगी ही रह गयी, वह न छूट सकी । इसीसे उनका नाम अणिमाण्डव्य पडा । माण्डव्य ऋषि एक दिन धर्मराज की सभा में उपस्थित हुए । उन्होंने कहा कि मैंने कौन सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलस्वरूप मुझें सुली पर चढ़ना पडा ?धर्मराज! यदि तुम इसका ठीक – ठीक उत्तर नहीं दोगेे तो तुम्हें अपने इस कर्मका फल भोगना पडेगा । धर्मराजने कहा- तपोधन ! अपने वचपनमें एक सींकमें कई टिड्डीयों को छेदकर उडाया था, उस पापका फल आपको भोगना पड़ा है । छोटा सा भी पाप छोटा सा नहीं होता । पाप हमेशा बड़ा ही होता है । माण्डव्य ने कहा – धर्मराज ! उस समय मैं नन्हा सा बालक था, मुझे पाप पुण्यका कुछ ज्ञान नहीं था । उस छोटे से यापका इतना बड़ा दण्ड कि ब्राह्मण सूती-पर चढाया जाय ! यह कदापि उचित नहीं हो सकता। इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम मृत्युलोक में सौ वर्षतक शूद्र होकर रहो । धर्मराजने प्रसन्नतापूर्वक ऋषिका शाप स्वीकार किया । उन दिनों पृथ्वीपर दैत्योंकी संख्या बढ गयी थी । क्षत्रियो के रूपमें पैदा होकर उन्होंन पृथ्वी को व्याकुल कर दिया था । उनका दमन करने के लिये प्राय: सभी देवता अपने अपने अंशसे अवतीर्ण हो रहे थे । स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी धरातल पर अवतार ग्रहण करनेवाले थे । ऐसे अवसरपर धर्मके अवतार की आवश्यकता तो थी ही,माण्डव्य ऋषि का शाप एक निमित्त बन गया।

देवताओं में शरीर निर्माण की शक्ति होती है । वे एक ही साथ अनेक स्थानोंपर अनेक रूपो में प्रकट हो सकते हैं और अनेक यज्ञों में भाग ले सकते हैं । धर्मने भी अपने को दो रूपोंमें प्रकट किया । एक तो विदुर और दूसरे युधिष्ठिर ।

सत्यवतीने श्री वेदव्यास से प्रार्थना की कि बेटा ! तुम्हारे जैसे तपस्वी महात्माके रहते हुए हमारा कुरुवंश डूबनेपर आ गया है । भीष्म ब्रह्मचारी हैं, विचित्रवीर्य मर गये, अब हमारा वंश कैसे चले ? तुम अपनी तपस्याके प्रभाव से हमारा वंश चला दो । व्यासने अपनी माताका आग्रह स्वीकार किया और कहा कि है अम्बिका तथा अम्बालिका यदि मेरे सामने से वस्त्रहीन होकर निकल जाये तो मेरी दृष्टि शक्ति से उन्हें संतान प्राप्त हो सकती है । सत्यवतीने उन दोनों को बारी बारी से व्यासदेवके सामने भेजा, परंतु वे दोनों बड़े ही संकोच से उनके सामने गयीं । एकने अपनी आंखें बंद कर लीं, दूसरी मारे भयसे पीली पड़ गयी । व्यासने उन्हें देखा और बतलाया कि पहली से जो पुत्र होगा, वह अंधा होगा और दूसरी से जो पुत्र होगा वह पाण्डु वर्णका होगा । वही धृत्तराष्ट्र और पाण्डु हुए । जिनके वंशज दुर्योधन और युधिष्ठिर आदि थे ।

सत्यवती को इतन से संतोष नहीं हुआ । उसने फिर अम्बिका से आग्रह किया कि एक सर्वगुण संपन्न पुत्र पैदा करो । अम्बिकाने उनके सामने  हां कह दिया , परंतु उसकी हिम्मत व्यासके सामने जाने को नहीं पडी । अपनी परम सुन्दरी दासी को उसने व्यासदेव के सामने भेज दिया । वह दासी संकोच रहित होकर व्यासके सामने गयी और उनकी कृपादृष्टि से उसे गर्भ रह पाया । व्यासने उसी दिन से उसका दासीभाव छूट जानेका वर दिया और कहा कि

तुम्हरे गर्भ से एक बडा ही धार्मिक पुत्र उत्पन्न होगा । भगवान् व्यासकी वाणी भला कभी व्यर्थ हो सकती है ? समय आनेपर धर्मराज ने इसी दासीके गर्भसे विदुर के रूपमें जन्म ग्रहण किया ।

धर्मावतार विदुर मनुष्य होनेपर भी अपने देवत्व के ज्ञान को भूले नहीं थे । परंतु वे अपने को कभी देवता के रूपमें प्रकट भी नहीं करने थे । सदा मनुष्यधर्मका ही पालन करते थे । बचपनसे ही वे बड़े गम्भीर थे । व्यासदेव, भीष्मपितामह आदि गुरुजनों की सेवामें ही प्राय: वे लगे रहते थे । इतने चुप रहते थे, मानो कुछ जानते ही न हों । वे निरन्तर भगवद् भजन में लगे रहते थे और अवकाश पाते ही ध्यानस्थ हो जाते थे । उनके जीवनमे कभी बहिर्मुखता आयी ही नहीं । उनकी सेवा सेे, उनके सदाचारसे और उनके भगवद् प्रेमसे सभी प्रसन्न थे । बड़े भाई धृतराष्ट्र की तो वे आँख ही थे । धृतराष्ट्र कोई भी काम बिना विदुरकी सलाहके नहीं करते थे । भीष्मपितामहने पाण्डु और धृतराष्टक्रो बहुत बडी सम्पत्ति दी । जब उन्होंने विदुरसे धन लेने को कहा तब उन्होंने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया । उनके मन में धनका कोई मूल्य ही नहीं था । संसार की झूठी वस्तुएं जो इस क्षण हैं और अगले क्षण नहीं रह सकती हैं उन्हें लेकर, उनके चिन्तन में अपना समय कौन बिताये  । इनके लिये भगवान् के चिन्तनसे विमुख कौन हो, यह सब सोचकर वे धनसे अलग ही रहते थे ।

जब भीष्मपितामह ने पाण्डु और धृतराष्ट्र का विवाह कर दिया, तब विदुरके विबाह की भी बारी आयी । उन दिनों मथुरामें देवकका बड़ा प्रभाव था । उनके यहाँ एक पारशवी दासी थी । उसीकी सर्वगुण सम्पन्न कन्या के साथ भीष्मपितामह ने विदुर का विवाह करा दिया । विदुर अपनी धर्मपत्नी के साथ गार्हस्थ्य धर्मका पालन करते हुए भगवान् का भजन करने लगे।

एक प्रकार से वे धृतराष्ट्र के मंत्री ही थे और उनके मंत्रित्वमें तबतक राज काज चलता रहा, जबतक दुर्योधन, दुशासन, कर्ण आदिकी प्रधानता नहीं हो गयी । स्वयं धर्मके मंत्रित्वमें राज काज़का संचालन किस प्रकार होता था, यह कहनेकी अनावश्यकता नहीं । उन दिनों वहाँ बडा सुख था, बडी शान्ति थी, पाण्डु जहाँ रहते, वहीं उनके लिये आवश्यक सामग्री उपस्थित रहती और किसी भी प्रजाको किसी प्रकार का कष्ट नहीं था । क्यों न हो, धर्मके हाथो में जो प्रबन्थ था !

2. धर्मका सरल से सरल और गहन से गहन अर्थ है सबका कल्याणा ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिसके मूलमें धर्म न रहता हो और अवसर आनेपर जिससे सबका कल्याण हो, ऐसे कामके लिये प्रेरणा न करता हो । पाण्डवोंमें तो युधिष्टिरके रूपमें धर्मराज थे ही, कौरवो में भी विदुरके रूपमें धर्मराज थे । अंतर इतना ही था कि पाण्डवो में धर्म राजा थे । उनके आज्ञानुसार सब कार्य होते थे और कौरवो में वे केवल एक सलाहकार के रूपमें थे । जैसे पाप की प्रवृत्ति होनेके समय अन्तरात्मा कह देती है कि यह पाप है, मत करो, परन्तु पापी लोग उस आवाज को नहीं सुनते या सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं, वैसे ही कौरवों की अन्याय की ओर प्रवृत्त देखकर विदुर स्पष्ट कह देते थे कि – यह अन्याय है इसे मत करो । परंतु वे विदुरकी बातपर ध्यान नहीं देते थे, उनकी उपेक्षा कर देते थे । विदुरके सबका कल्याण चाहते हैं ।

विदुर कौरवों को तो सलाह देते ही थे, समय आनेपर पण्डवो को भी उचित सलाह देते थे और उनपर किसी

आपत्तिकी, विपत्तिकी सम्भावना होती तो पहलेसे ही सूचित कर देते, यदि वे व्याकुल हो जाते तो उन्हें समझाते, उन्हें धैर्य बँधाते ।

दुर्योधन पाण्डवो से बड़ा ही बैर रखता था । वह दिन-रात सोचता था कि किस प्रकार इन्हें नष्ट कर दें । इसके लिये उसने बहुत से उपाय किये । एक बार जल विहारके लिये पाण्डवों को बुलाया गया । दुर्योधन ने पहलेसे ही विष की मिठाइयाँ बनवा रखी थीं । उसने बडा प्रेम प्रकट करके भीमसेन को अपने हाथोंरने वह मिठाई खिलायी । उसके बाद भीमसेन के बेहोश होनेपर उन्हें लताओ से बाँधकर गंगा नदी में फेंक दिया । जल विहारके रथान से चलनेपर युधिष्टिरने सोचा कि भीम पहले ही चला गया होगा । इस बात की तो उनके मनमें कल्पना ही नहीं हुई कि दुर्योधन ने भीमसेन का कुछ अनिष्ट किया होगा । जब वे लौटकर कुन्तीके पास आये और उसने भीम को पूछा, तब उन्होंने कहा कि मैं तो समझता था कि भीम तुम्हारे पास आ गये होंगे । क्या उनका कुछ अनिष्ट तो नहीं हो गया ? अनिष्ट की आशंका से कुन्तीका हृदय काँप उठा और क्या करती उसने विदुर को बुलवाना सही समझा ।

कुन्तीने विदुर से कहा – देवर ! पता नहीं भीमसेन कहाँ गया ? सब भाई तो जल-विहार करके लौट आये, परंतु भीम नहीं आया । मुझे डर इस बातका है कि कहीं दुर्योधन उसे धोखा देकर मार न डाले। वह बडा ही क्रूर, दुर्बुद्धि और लोभी है । मेरा कलेजा धड़क रहा है, मुझे कुछ सूझता नहीं, क्या करूँ ?विदुरने बडी दृढ़ता से कहा- रानी ! ऐसी बात मनमें नहीं लानी चाहिये । अपने पुत्रके संबंध में ऐसा सोचना तुम्हारी जैसी वीर रमणी को शोभा नहीं देता । जो पुत्र तुम्हारे पास हैं उनकी रक्षा करो, इस समय दुर्योधन पर लांछन मत लगाओ। कुछ कहने–

सुनने से वह और भी अनिष्ट करनेकी चेष्टा कर सकता है। भीमसेनके संबंध में निश्चिन्त रहो । उसका अनिष्ट तो कोई कर ही नहीं सकता । महामुनि व्यासने तुम्हें जो आशीर्वाद दिया है कि तुम्हरे सब पुत्र चिरंजीवी होंगे, वह कभी झूठा नहीं हो सकता । भीम तुम्हारे पास शीघ्र ही आयेगा और तुम्हें प्रसन्न करेगा।

विदुर की बातोंसे कुन्ती की घबराहट मिट गयी और कुछ ही समय बाद नागलोक से पारे का रस पीकर दस हजार हाथियों के बल से युक्त होकर भीमसेन लौट आये । युधिष्ठिरने भीमसेन को समझा दिया कि यह बात किसीपर प्रकट नहीं होनी चाहिये। विदुर चाचा ऐसा ही कहते हैं और इसीमें हमलीगोंका कल्याण है । विदुर की सत् – शिक्षासे पाण्डव दुर्योधन की  इस दुष्टता को पी गये। उन्होंने कहीं चर्चा ही नहीं की ।

दुर्योधन अपनी कुचाल को विफल हुई देखकर मन-ही-मन जल उठा । द्रोणाचार्यके यहाँ शिक्षा प्राप्त करते समय भी उसने पाण्डवो को नीचा दिखाना चाहा; लेकिन उसके किये कुछ न हो सका । बादमे उसने धृतराष्ट्र के कान भरने शुरू किये और यह बात उसने तय करा ली कि अब पाण्डव चारणावत वारणावत नगरमें रहे । उनके लिये नया महल बनने का प्रबंध हुआ । दुर्योधनने पुरोचन नामके व्यक्ति से एकान्तमें कहा कि – भाई ! अब तो सारी पृथ्वीके राजा हम और तुम दो ही रहेंगे । तुम मेरे बड़े विश्वासपात्र हो, शत्रुओंका नाश करनेमें मेरी सहायता करो । तुम वारणावत में  ऐसा महल बनाओ, जिसमें सन, तेल, घी, लाख, लकडीका व्यवहार अधिक हो और ऊपर से ऐसा लेप लगवा दो कि कोई उसको भाँप न लिके । ऐसी ही वस्तुएं उसमें रथान-स्थान पर रखवा दो और किसीको रत्तीभर भी इसका पता न चले । तुम युधिष्ठिरके जानेपर उनकी खूब सेवा करना और जब वे तुम्हारा खूब विश्वास कर लें तब उस महल के दरवाजे पर आग लगा देना ।

बस, उनके मर जानेपर तो तुम्हारा ही सब अधिकार होगा। पुरोचनने जाकर बैसा ही महल तैयार करा दिया और धुतराष्ट्र ने कुन्ती सहित याण्डवो को वहाँ जाने की आज्ञा दे दी ।

जब पाण्डव कुंती के साथ वारणावत जाने लगे तब उन्होंने सब गुरुजनों को प्रणाम करके आज्ञा ली । प्रजाने बहुत विरोध किया, परंतु युधिष्ठिर ने सबको समझा दिया । जब सब लोग चले गये, तब विदुरने मलेच्छ भाषा (गुप्त अथवा सांकेतिक भाषा )में युधिष्ठिर को समझाया। उन्होंने कहा – युधिष्ठिर ! बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रुओ का गुप्त रहस्य समझकर पहलेसे ही उससे बचावका उपाय करना चाहिये । एक प्रकारका अस्त्र है, वह लोहे का बना तो नहीं है, परंतु उससे मृत्यु हो सकती है । उसे जो जान लेता है, वह बच जाता है । (अर्थात् तुमलोगो को जलाने के लिये शत्रुओ ने शीघ्र जलनेवाले पदार्थोंका भवन बनवाया है । ) देखो आग जंगल को जला सकती है, परंतु बिलमें रहनेवाले जीवों को नहीं जला सकती । आपत्ति आनेपर इसी प्रकार अपनेको सुरक्षित रखना चाहिये । (अर्थात् तुमलोग सुरंग सेे निकल जाना) अंधे को रास्ता नहीं मिलता, उसे दिशा भ्रम भी हो सकता है । धर्महीन को सम्पत्ति नहीं मिलती । मेरी बात खूब समझ लो । (अर्थात् तुम पहलेसे ही मार्गो और दिशाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेना और इस बातको इतना गुप्त रखना कि किसीको पता न चले ।) दुष्ट पुरुषो के दिये हुए बिना लोहेके शस्त्र को स्वीकार कर लेना ही ठीक है । उनके ही स्थान की शरण लेकर आग की आंच से बच जाना चाहिये । (अर्थात् पुरोचनके बनाये घरमें प्रसन्नता से रहना। मौका पाकर निकल जाना । ) घूमने सेे मार्गोंका ज्ञान हो जाता है । नक्षत्रोंसे दिशाओ का पता चल जाता है । बुद्धिमानी के साथ पांचों इन्द्रियों को अपने वशमें रखने से किसी पक्रार की पीडा नहीं होती । काम क्रोध आदि शत्रु उसकी हानि नहीं कर सकते।

विदुरके उपदेश सुनकर युधिष्ठिरने कहा : मैंने आपका उपदेश समझ लिया । ऐसा ही होगा । विदुर वहां सेै अपने घर लौट आये और पाण्डव वारणावत गये । वहां प्रजाने उनका स्वागत किया । पुरोचन ने उन्हें लाक्षागृहमें रहनेकी व्यवस्था कर दी । वह बड़े प्रेमसे इन लोगों की सेवा करके विश्वासपात्र बनने का दुष्प्रयत्न करने लगा ।

विदुरका एक मित्र बडा चतुर, विश्वासपात्र और सुरंग छोदनेमें निपुण था । विदुरने उसे एकान्तमें बुराकर सब बातें समझा दीं और कहा – तुम जाकर पाण्डवोंकी भलाई करो । उसे पाण्डवोंका विश्वास पानेके लिये कुछ गुप्त बातें भी बता दीं । वह युधिष्टिर के पास गया और उसने विदुरके बताये हुए संकेतो से युधिष्ठिरका विस्वास प्राप्त कर लिया । उसने युधिष्ठिर से कहा – मैं खुदाई का काम करनेवाला कारीगर हूं। आगामी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को रातको पुरोचन इस घरमे आग लगाने वाला है । दुर्योधन ने कुंती के साथ आपलोगो को जला डालनेका निश्चय कर लिया है । मुझे सुरंग खोदने की आज्ञा दीजिये । युधिष्टिरने कहा – विदुर हमारे हितचिन्तक हैं । तुम भी मेरे लिये विदुर जैसे ही हो । जैसे वे हमारा हित करते हैं, वैसे ही तुम भी , हमारा हित करो । दुर्योधनके पास इस समय सम्पत्ति है, उसके सहायक भी बहुत से हैं, यदि उसको पता चल जायगा तो हमारा बहुत अनिष्ट हो सकता है । विदुर की बात सच उतरी । अब तुम हमलोगों को इस आपत्ति से बचाओ । सुरंग खोदी गयी और आग लगनेके समय पाण्डव उसके रास्ते से निकल गये । किसीको इसकी खबर नहीं लगी । विदुर की कृपासे पाण्डव इस महान् विपत्ति से बच गये ।

बहुत दिनों के बाद जब मालूम हुआ कि पाण्डव जीवित हैं और राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी से उनका विवाह भी हो गया है तब दुर्योधन, कर्ण आदि को बड़ा कष्ट हुआ । वे पुन: पाण्डवों के नाशका उपाय सोचने लगे । विदुरको बडी प्रसन्नता हुई और उन्होंने जाकर

धृतराष्ट्र से कहा – बडा अच्छा हुआ, बड़ा अच्छा हुआ । विदुरने उन्हें समझाया कि अब द्रुपदसे हमारी मित्रता हो जायगी, वे हमारे संबंधी हो गये, अब पाण्डवो को आदरपूर्वक बुला लेना चाहिये । विदुरके चले जानेपर दुर्योधनने धृतराष्ट्र से कहा – उन्हें बुलाना ठीक नहीं है । हमलोग बहुत दिनोंसे उन्हें नष्ट करनेका षडयन्त्र कर रहे हैं, परन्तु सफल नहीं हुए । इस पर ऐसा उपाय करना चाहिये कि हमारा राज्य निष्कणटक हो जाय । कर्णने कहा – मुझे धोखा देने की नीति पसंद नहीं है । इस तरह उनका कोई अनिष्ट कर भी नहीं सकता । उनपर चढाई कर दी जाय । द्रुपद उनके सहायक हैं तो क्या हुआ ? वे सब मिलकर हमारा मुकाबला नहीं कर सकते । मैं अकेले ही सबको जीत लूंगा । दुर्योधनने भी कहा – हां यही ठोक है । कर्णने कहा – पराक्रम करना ही क्षत्रियोंका धर्म है । साम, दान या भेदके द्वारा पाण्डव नहीं जीते जा सकते । उन्हें प्रकटरूप से ही जीता जा सकता है । परन्तु एक बातका ध्यान रहे । यह काम बहुत ही शीघ्र और एकाएक कर डालना चाहिये । नहीं तो यदि श्रीकृष्ण को पता चल जायगा और वे यादवों की रोना लेकर आ धमकेंगे तब उन्हें जीतना कठिन हो जायगा । श्रीकृष्णके नीतिकौशल के सामने हमलोगो का टिकना आसान नहीं है ।

धृतराष्ट्र ने कहा – कर्ण ! तुम्हारी बात वीरोंके योग्य है । तुम्हारी इस स्पष्ट नीति की मैं प्रशंसा करता हूँ । किंतु मेरी यह इच्छा है कि तुम और दुर्योधन दोनों ही भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और विदुर से सलाह करके तब कुछ निश्चय करों । बिना उनकी सम्मति के कोई कम करना मुझे पसंद नहीं । भीष्म, द्रोण और विदुर बुलाये गये । इस विषयमें जब उन लॉगों की सम्मति पूछी गयी तब भीष्म और द्रोणने एक स्वर से पाण्डवों के द्रोहका विरोध किया । उन्होंने कहा – हमारे लिये कौरव और पाण्डव दोनों ही समान हैं । इन दोनों को एक सा ही प्यार करते हैं । ऐसी दशामें

पण्डवो से वैर या युद्ध करनेका अनुमोदन हम नहीं कर सकते । है उन त्गेगो९ने दुर्योधनक्रो भी बहुत समझाया, द्रोणाचार्य और केर्णमें तो कुछ कड्री-केडी बातें भी हो गयी ।

अन्तमें विदुरने कहा – स्वजनों का कर्तव्य है कि बेखटके हित की बात कह दे । आप सुनना नहीं चाहते, इसीसे लोग कहना चाहकर भी नहीं कहते । भीष्म और द्रोण दोनों ही आपके सच्चे हितैषी हैं और जो कुछ वे कह रहे हैं, आपके हितके लिये कह रहे हैं । आप सच समझिये पाण्डवो को परास्त करनेकी शक्ति किसीमें नहीं है । उनके पक्षमें धर्म है, वे सत्य की ओर हैं, संसारमें बड़े-से-बड़ा देवता भी उनका बाल बाँका नहीं कर सकता, क्या आप नहीं जानते कि उनके पक्षमें हैं- श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यकि । अनेकों राजा और राजकुमार भी उनके प्रेमी हैं । इस राज्यमें उनका हिस्सा है, यह बात सब जानते हैं । जबसे प्रजाको मलूम हुआ है कि पाण्डव जीवित हैं तबसे उन्हें देखनेके लिये सब लोग व्याकुल हो उठे हैं । उन्हें लाहके घेरमे जलाने की चेष्टा की गयी, यह जात भी अब छिपी नहीं है । उनका सम्मान करके आप अपनी कलंक-कालिमा धो डालिये । पाण्डवो से मेल करने में आपका लाभ ही लाभ है । द्रुपद आपके पक्षमें हो जायेंगे, श्रीकृष्ण आपके सहायक हो जायेंगे और सारे यदुवंशी आपकी आज्ञाका पालन करेंगे । श्रीकृष्ण साधारण पुरुष नहीं, साक्षात् भगवान् हैं । वे जिस पक्षमें रहेंगे, उसीकी जीत होगी । उनसे मेंल करके आप सारे संसार में अपने राज्य का विस्तार कर सकते हैं । राजन्! मैं आपसे स्पष्ट निवेदन करता हूं कि दुर्योधन, कर्ण और शकुनि आदि सब कच्ची बुद्धिके बच्चे हैं । आप इनकी बातो में मत आइये । यदि इनकी बुद्धिके अनुसार काम किया गया तो निश्चय समझिये कि आपके सब पुत्रोंका, क्षत्रियो का और प्रजाका नाश हो जायगा ।

धुतराष्टने बडी प्रसन्नतासे कहा -हां , हां, यही तो मैं भी

कहता हूं । भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य ये बड़े ही ऐशर्श्वशाली और ज्ञानी हैं । ये हमारे हितकी बात कहते हैं। तुम्हारी सम्मति भी हमारा कल्याण करनेवाली है । तुम्हारा कहना सच है। जैसे मेरे पुत्र दुर्योधन आदि हैं वैसे ही पाण्डव भी हैं । राज्यका जितना अधिकार इन्हें है, उतना ही उन्हें भी है । विदुर ! तुम जाओ, विशेष सत्कार के साथ कुन्ती और नववधू  द्रौपदी के साथ पाण्डवों को यहां ले आओ । पाण्डव कुशल से हैं, उनका विवाह हो गया, यह वडी प्रसन्नता की बात है । द्रोपदी के लिये अनेकों प्रकारके रत्न और वस्त्राभूषण ले जाओ । विदुरने उपहार की सामग्री लेकर रथपर सवार होकर पंचाल देश की यात्रा की।

पंजाब में जाकर वे पहले राजा द्रुपद से मिले । उनके यहां स्वागत सत्कार होनेके बाद वे श्रीकृष्ण के पास गये और उनके दर्शनसे बहुत ही आनन्दित हुए । विदुर बहुत दिनोंसे श्रीकृष्णका दर्शन चाहते थे, परंतु अबतक उन्हें अवसर नहीं मिला था । रास्ते में आते समय भी वे सोच रहे थे कि शायद वहां श्रीकृष्णके दर्शन हो जायं। अपनी बहुत दिनों की अभीलाषा पूर्ण होते देखकर वे सहसा उनके चरणों पर गिर पड़े । श्रीकृष्णने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया । युधिष्ठिर भी अपने भइयो के साथ उनसे मिले और कुन्ती से भी यथायोग्य हुआ ।

सभामें उपस्थित होनेपर विदुरने श्रीकृष्ण और पाण्डवोंके सामने ही महाराज द्रुपद से कहा – राजन्! राजा धृत्तराष्ट्र, वृद्ध भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और सब कौरवों ने आपको यथोचित अभिवादन कहकर कुशल मंगल पूछा है । आपके यहाँ सम्बन्ध होनेसे सभी को बडी प्रसन्नता हुई है । अब वहाँ के लोग पाण्डवोंको देखनेके लिये बहुत ही उत्कण्ठित हो रहे हैं । मेरा अनुमान है कि पाण्डव लोग भी अपना देश देखनेके लिये बहुत ही अत्कण्ठित होंगे , क्योंकि इन्हें अपना देश छोडे बहुत दिन हो गये । कुरुकुल की स्त्रीयाँ भी द्रोपदी को देखनेके लिये

बहुत ही उत्सुक हो रही हैं । इसलिये देर न करके पत्नी-सहित पाण्डवों को विदा कर दीजिये । आपकी अनुमति मिलते ही मैं वहां समाचार भेज दूंगा कि पाण्डव आ रहे हैं । द्रुपदने कहा – विदुरजी ! आपका कहना ठीक है । इस सम्बन्ध से मुझे भी बडी प्रसन्नता हुई है । पाण्डवोंका अपने राज्यमें जाना उचित और आवश्यक है तथापि मैं जाने के लिये कैसे कह सकता हूं? ये जितने दिनोंतक मेरे यहां रहें, अच्छा ही है । कुन्ती, पाण्डव, श्रीकृष्ण और बलराम की सम्मति हो तो मैं जाने में आपत्ति न करूँगा । युधिष्टिरने कहा – महाराज ! हम सब आपके अधीन हैं । आप हृदय से जो आज्ञा देंगे, हम उसीका पालन करेंगे । श्रीकृष्णने कहा – मेरे विचार से तो पाण्डवो को वहां जाना ही चाहिये । फिर भी महाराज द्रुपद की जैसी आज्ञा हो, वैसा ही करना ठीक है । द्रुपदने कहा – परम शक्तिशाली यदुवीर पुरुषोत्तम श्रीकष्ण जो कहते हैं, यही ठोक है । वासुदेव श्रीकृष्ण की पाण्डवो पर जितनी कृपा है, वे पाण्डवों की जितनी मंगलकामना करते हैं, उतनी मैं भी नहीं करता । स्वयं युधिष्ठिर भी नहीं करते । अन्तमें विदाई का ही निश्चय रहा ।

श्रीकृष्ण, कुन्ती, पाण्डव और दौपदी को साथ लेकर विदुर वारणावत नगरके लिये चल पड़े । विकर्ण, चित्रसेन, द्रोणाचार्य आदि ने आकर उनका स्वागत किया और धृतराष्ट्र की आज्ञासे वे लोग अपने महलो में रहने लगे । कुछ दिनों के बाद धुतराष्ट्र ने उन्हें खाण्डवप्रस्थ में राजधानी बनाकर रहनेकी आज्ञा दे दी और आधा राज्य भी दे दिया । पाण्डवोंने अपने बाहुबल से अपने राज्यका विस्तार कर लिया और वे वहां सुखपूर्वक रहने लगे । विदुर धृतराष्ट्र के  पास ही अपनी कुटीमें रहकर अपनी धर्मपत्नी के साथ प्रेमपूर्वक भगवान् का भजन करने लगे ।

पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार – भाग २ ।

® यह सब चरित्रा और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी , पंडित बाबा, श्री माधवदास बाबा जी एवं कुछ महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com

१. पूज्य श्री वंशीदास ब्रह्मचारी के नियम की परीक्षा :

श्री नर्मदा किनारे एक उच्च कोटि के संत विराजते थे जिनका नाम श्री वंशीदास ब्रह्मचारी जी था । उनका नित्य का नियम था की वे भगवान् को तो भोग लगते और साथ में एक अतिथि को भी भोजन प्रसाद खिलाते । ऐसा कारण के बाद ही वो स्वयं प्रसाद पाते थे । नित्य प्रति बे भगवान् को भोग लगते और इंतजार करते की कोई अतिथि आये । कोई न कोई अतिथि मिल ही जाता, कोई नहीं आया तो नर्मदा जी में मछली कछुआ को खिलाते। एक दिन कोई अतिथि नहीं आया और ना ही कोई कछुआ मछली कुछ दिखाई पड़ रहे थे । ब्रह्मचारी जी सोचने लगे की क्या आज का अन्न & ऐसे ही चला जायेगा।

बहुत समय बीत गया पर कोई दिखाई नहीं पड रहा था , अचानक संत के पास एक कुत्ता आया । कुत्ते को देखकर उसे डराकर भगा दिया  । जैसे ही भगाया ,तुरंत उसके बाद संत जी को ख्याल आया की कही अतिथि नारायण के रूप में कुत्ता ही न आया हो। उन्होंने सोचा की यही तो होगा वह, कितनी दूर गया होगा परंतु दूर दूर तक खली जमीन दिखाई पद रही थी । पश्चाताप करने लगे की इतनी देर बाद आखिर कोई अतिथि आया था पर हमने उसे भगा दिया । शाम बीत चुकी है ,अब तो मेरा नियम भंग हो गया । उस कुत्ते को बहुत ढूंधा पर कही दिखा नहीं । फिर आँख बंद करके नदी किनारे रोने लग गए , अब भगवान को दया आयी और प्रभु अचानक सामने उसी रूप में प्रकट हुए।

इस बार संत जी ने पहचान ने में भूल नहीं की और उस कुत्ते के चरण पकड़ कर कहने लगे की प्रभु ! मैं पहचान गया हूँ । आप भक्तवत्सल है ,मेरे अतिथि सत्कार के नियम की परीक्षा करने ही आप आये थे । कृपा कर के आप अपने रूप में आकर दर्शन प्रदान करो । भगवान् श्री रामचंद्र जी ने अपने निज स्वरुप का दर्शन कराया और संत जो को आनंद प्रदान किया । भगवान् श्री राम ने संत जी से कहा की जब जीवन में कोई नियम ले लेता है तो समय आनेपर उसके नियम निष्ठा की परीक्षा अवश्य होती है । यदि वह व्यक्ति नियम में दृढ़ विश्वास रखे तो भगवान् उस नियम को भंग नहीं होने देते । इस तरह श्रीराम जी ने संत जी के नियम की रक्षा की और ब्रह्मचारी जी को आशीर्वाद् देकर अंतर्धान हो गए ।

२. महाभाव की अवस्था :

श्री गौरांग महाप्रभु के विशेष कृपापात्र श्री कवी कर्णपूर एक उच्च कोटि के भक्त थे । उन्होंने बचपन से ही श्रीमन् महाप्रभु की लीलाओं का आस्वादन किया था । श्रीमन् महाप्रभु के प्रभाव से हिंस्रक पशु भी नाम संकीर्तन करते हुए नृत्य करने लगते थे , राधा कृष्ण का नाम सुनकर श्रीमन् महाप्रभु के शरीर में अष्टसत्त्विक भाव जागृत हो जाते थे , नृत्य करना , रूदन करना ,तड़पना , शरीर कांपना यह सब भाव कवी कर्णपूर ने महाप्रभु में देखे थे । श्रीमन् महाप्रभु ने अपने छः प्रमुख गोस्वामी गणो को गौड़ीय संप्रदाय और हरिनाम प्रचार हेतु वृंदावन मे भेजा हुआ था ।

एक दिन श्रीपाद रूप गोस्वामी जो षड् गोस्वामियों में से एक थे , एक वृक्ष के निचे श्री गोपी गीत पर प्रवचन रहे थे । अत्यंत मधुर प्रसंग कथा में चल रहे थे ,श्रोता मंत्रमुग्ध होकर कथा का आस्वादन कर रहे थे । श्रीपाद रूप गोस्वामी बड़ी गंभीर मुद्रा में कथा कह रहे थे । कवी कर्णपूर ने देखा की इनके शरीर पर भक्त के कोई भाव , लक्षण दिखाई नहीं पड़ते । न अश्रु है , न मुख पर कोई भाव , न विरह । वे सोचने लगे की रूप गोस्वामी महाप्रभु जी के विशेष कृपा पात्र होने पर भी उनके चित्त में प्रेम ,भक्ति , विरह के कोई भाव है ही नहीं । क्या कारण है ? यह सोचना ठीक नही है , यदि इनके हृदय मे प्रेम न होता तो इतने श्रोताओ के भीतर प्रेम जागता कैसे ।

इतने में वृक्ष का एक चिड़िया की चोंच से पेड़ का एक पत्ता पत्ता निचे गिरता हुआ आया और जैसे ही वह रूप गोस्वामी जी के नासिका के निकट आया , वह पत्ता एक क्षण में जलकर राख हो गया । कवी कर्णपूर बस एकटक देखते ही रह गए । प्रवचन प्रकट होने पर् प्रणाम करने निकट पहुंचे तब श्रीपाद रूप गोस्वामी जी की गरम श्वासों से कवि कर्णपूर के कपोल पर छाले निकल आये। उन्हें ज्ञात हो गया की रूप गोस्वामी अपने भीतर का भाव बहुत गुप्त रखते है ।उनके अंदर भगवान् के विरह का ताप इतना अधिक तीव्र है कि एक क्षण में यह पत्ता राख बन गया । यह महात्मा अपने अंदर का भाव प्रकट नहीं होने देते और किसी तरह अपना भाव अंदर छुपा कर कथा कहते है ।

अनंतश्री समपान श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज के चरित्र में ऐसा ही एक प्रसंग है । एक दिन श्री भक्तमाली जी बरसाना धाम में गहमर वन के पास श्रीमद भागवत कथा कहने पधारे । उन्होंने बड़ा ही मधुुर प्रसंग सुनना आरम्भ किया , श्री रानी बरसाने से लाल जी का दर्शन करने चली और नंदगांव से श्रीकृष्ण प्रिया जी का दर्शन करने चले थे । बिच मार्ग में प्रेम सरोवर के निकट दोनों की आँखें मिली – बस इतना प्रसंग कहा की महाराज जी का शरीर थरथर कांपने लग गया । आँखों से अश्रुपात होने लगा , बहुत देर तक यही अवस्था रही ।

कथा कुछ हो नहीं पायी और जब श्री भक्तमाली जी महाराज पुनः सामान्य स्तिथि में लौट आये तब वे अपने विश्राम कक्ष में चले गए । उस समय उनके शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज ने पूछा – महाराज श्री ! आज कथा में ऐसा क्या हो गया था जो आप कथा नहीं कह पाये और शरिर कांपने लगा । यह बात सुनते ही श्री भक्तमाली जी की वही अवस्था हो गयी । बहुत देर बाद सामान्य स्तिथि में आनेपर उन्होंने शिष्य से कहा कि हमे बहुत सोच समझकर कथा कहना पड़ता है , कही भूल से भी भाव रस का स्पर्श हो गया तो फिर हम आगे कुछ कह नहीं पाते । इस अवस्था में जाने पर संसार की सुध बुध नहीं रह जाती , भूल से भी इस अवस्था अंदर का भाव बहार निकल न जाए इस दर से बहुत सिच समझकर कथा कहानी पड़ती है ।

ऐसी ही अवस्था श्री गौड़ीय संप्रदाय के महान् सिद्ध संत श्री जगद्बंधु सुंदर जी में दिखाई देती थी । उनके सामने जाते समय भक्तो को विशेष ध्यान रखना पड़ता कि कही धोखे से भी राधा नाम न निकल जाए । श्री राधा नाम सुनते ही वे ऐसी अवस्था में चले जाते की कई दिनों तक शरीर की सुध बुध नहीं होती और कभी कभी समाधि लग जाती । श्री राधा नाम तो क्या , कोई केवल रा अक्षर ही कह देता तो महाराज जी महाभाव के समुद्र में डूब जाते ।

३.सिद्ध नाम जापक संत पूज्यपाद श्री चतुर्दास जी महाराज के शब्दो का प्रभाव :

मुरैना क्षेत्र मध्य प्रदेश में एक निम्बार्क सम्प्रदाय के संत रहते थे जिनका नाम था श्री चतुर्दास जी । बाबा बड़े सिद्ध नाम जापक संत थे । अपना अधिकतम समय भगवान् के नाम् का जप करने में लगाते थे । निम्बार्क सम्प्रदाय मे यद्यपि श्री राधा कृष्ण नाम जपने की साधना परंपरा है परंतु बाबा की श्री राम नाम मे भी अद्भुत श्राद्धा थी । बाबा अधिक पढ़े लिखे भी नही थे , केवल हिंदी भाषांतर वाली गीता जी और श्री रामचरित मानस पढ़ लेते थे । वही पास मे एक गुफा थी जहां बाबा साधना करते थे । एक दिन उन्होंने एक अरब रामनाम करने का निश्चय किया । पूरा समय श्री राम नाम लेने में व्यस्त रहते थे , स्नान भोजन आदि बहुत शीघ्रता से कर लेते और शेष समय गुफा में बैठकर श्रीराम नाम करते रहते थे ।

रात्रि में बहुत कम समय विश्राम करते थे । विश्राम करने समय भी उनका कंठ हिलता रहता था । एक अरब राम नाम का जप पूरा होने पर बाबा बाहर आये । अब तो उनका एक एक क्षण श्रीराम नाम मे बीतने लाग ,चलते फिरते ,खाते पीते , विश्राम के समय भी राम नाम् चलता ही रहता । वाणी में अद्भुत सिद्धि प्रकट हो गयी । एक दिन बाबा बैठ कर नामजप कर रहे थे कि वहां से एक भेड़ बकरी चराने वाला गुजर रहा था । बाबा ने उससे कहा – सुनो ! ये भेड बकरी चराना तो तुम्हारा काम है परंतु कभी राम राम भी किया करो । बस इतना कहा कि वह बकरी चराने वाला राम नाम जप मे लग गया । वह संख्या पूर्वक लाखो की संख्या में राम नाम जपने लग गया ।

जिस किसी को बात बात मे भी बाबा यदि कह देते कि राम राम कह दिया करो । वे सभी लोग श्रीराम नाम के जप मे लग जाते । बैलगाड़ी वालो को , राह चलते लोगो को , बालको को – जिससे कह देते उसके जीवन मे नाम् जप प्रारम्भ हो जाता । चाहे कोई भक्त हो ,अभक्त हो , दुष्ट हो बाबा जिससे राम राम बोलने को कह देते वह निष्ठा पूर्वक राम नाम मे अपना जीवन व्यतीत करता । ऐसे महान सिद्ध नामजपक हुए श्री चतुर्दास बाबा ।

४. सेवा के प्रति निष्ठा :

श्री वृंदावन खाकचौक स्थान में पूज्य श्री देवदास पहाड़ी बाबा सरकार विराजते थे । वहां विचरण करते करते कई बार खाकचौक मे मंदसौर जिले के एक महंत आते थे । उनका नाम था भले बाबा क्योंकि वे बात बात मे भले शब्द का अधिक प्रयोग करते थे । अतः लोग उन्हें भले बाबा कहते थे । मंदसौर जिले में एक स्थान के महंत थे और हर साल वे एक यज्ञ करते थे । खाकचौक मे धुना घर म् अपना आसान लगाते थे । वहां प्रातः का भजन साधान समाप्त करके सेवा में लग जाते थे । संतो की सेवा और झाडू लगाने की सेवा भले बाबा करने लग जाते थे । कभी नीचे , कभी ऊपर ,कभी बाहर झाड़ू लगते रहते थे । कई घंटे झाड़ू लगते थे । आश्रम मे झाडू सेवा के लिए एक सेवक थे और एक ब्रजवासन बाई जी थी जिनका नाम सुमित्रा देवी था ।

एक दिन श्री पहाड़ी बाबा ने भले बाबा को अपने पास बुलाया और बहुत जोर की डांट लगते हुए कहा – ऐ भले ! तुमको एक जगह बैठकर चैन नही पड़ता । मै सफाई करने वालो को काम के पैसे देता हूँ ,दो दो सेवक है झाडू सेवा करने के लिए । तुम क्यों झाडू के लिए डोलते हो , जाओ बैठो अपने आसान पर और भजन करो । खबरदार अब झाडू लगाई तो । अब भले बाबा गए भीतर और अपना आसान ,कमंडल आदि लेकर महाराज जी के पास आकर साष्टांग दंडवत किया और बोले – महाराज ! इस बालक के अपराध क्षमा करना , अब मै यहां से जा रहा हूँ । लगता है दोबारा लौटकर नही आ पाएंगे । श्री पहाड़ी बाबा बोले – क्यो जा रहे हो भले । तुम तो पूरे सावन भादो ठहरते थे फिर इस बार क्यो जाना चाहते हो ?

भले बाबा बोले – जब जवानी थी तब इसी खाकचौक मे रसोई बनाते थे ,बर्तन मांजते थे । अब तो बुढापा है ,अब और कोई सेवा हमसे बनती नही है । केवल थोड़ा बहुत झाडू लगाने की सेवा हो सकती है ,वही कर लेता हूं । बिना सेवा के प्रसाद कैसे पाऊंगा ? और बिना प्रसाद पाये शरीर कैसे चलेगा ? आपने सेवा के लिए ही मना दिया । इसीलिए अब मै यहां नही आऊंगा और ऐसा कहते कहते रोने आग गया साधु । श्री पहाड़ी बाबा बोले – ऐसे कैसे चला जायेगा , बकबक करता है । जाएगा जाएगा कहता है । अब मैं मना नही करूँगा , खूब झाडू लगाओ । शिष्य को बुलाया और कहा – ये भले बाबा का आसन कमंडल उठाओ और अंदर रख दो ,ये कही नही जाएगा ।

जैसे ही श्री पहाड़ी बाबा ने सेवा की आज्ञा दी वैसे भले बाबा प्रसन्न हो गए । जिस समय की यह घटना है , उस समय भले बाबा की आयु ९० वर्ष की थी । श्री पहाड़ी बाबा कहते थे कि यही है सच्चे साधु जो किसी भी अवस्था मे सेवा का त्याग नही करते । संत सेवा ,गौ सेवा ,स्थान सेवा जैसी बन सके करते रहते है । सच्चे साधु सेवा करने के लिए सदा तत्पर रहते है और कुछ ऐसे असाधु होते है कि उन्हें सेवा बात दो तो भाग जाते है ।

५. पूज्यपाद श्री रामचंद्र डिंगरे जी महाराज का साधू स्वभाव और ढन के प्रति निस्पृहता :

श्री रामचंद्र डोंगरे जी महाराज ने अपनी जीवन काल में जितनी कथाएँ की, उनमे जो धन आता वह सब दान में जाता । एक रूपया अपने और अपने परिवार के लिए उपयोग नहीं होने देते थे । जो थोडा बहुत अन्न और वस्त्र आजाता उसका उपयोग करते , अन्य सब वस्त्र आदि संतो को दे देते । मुम्बई चौपाटी में उनकी अंतिम कथा हुई । गोरखपुर कैंसर हस्पताल , संतो की सेवा , गौ सेवा , दिन दुखियो की सेवा आदि में अब तक एक अरब रूपए दान हो चुके थे उनकी कथाओ से ।

उनकी पत्नी राजस्थान आबू में रहती थी, जब उनको मृत्यु के पांचवे दिन उन्हे खबर लगी तब वे अस्थियाँ लेजाकर गोदावरी में विसर्जित करने गए , उस समय उनके साथ मुम्बई के सबसे बड़े व्यक्ति रातिभाई पटेल गये थे । नासिक मे श्री डोंगरे जी ने रातिभाई से कहा कि रति, हमारे पास तो कुछ हैं नही ,और इसका अस्थि विसर्जन करना है । कुछ धन तो लगेगा ही, क्या करे ? फिर कहा -हमारे पास इसका मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रुपये मिलें, उन्हे अस्थि विसर्जन में लगा देते है । यह बात जैसे ही रातिभाई ने सुनी , उन्हे बड़ा भारी धक्का लग गया । बस श्री डोंगरे जी की ओर देखते ही रह गए ।

पश्चात् रातिभाई ने कुछ परिचितों से यह बात कही – हम जीवित कैसे रह गये, आपसे कह नहीं सकते । बस हमारा हृदय रुक नहीं गया । जिन महाराजश्री के इशारेपर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, जिनके आस पास बड़े बड़े लोग रूपए लेकर खडे रहते थे , वह महापुरुष कह रहे कि पत्नी की अस्थियो के विसर्जन के लिये पैसा नहीं है और हम सामने खड़े सुन रहे है ? हम तो फुट फुट कर रो पड़े , धिक्कार है हमे ।असल में बादशाह तो संत जन ही है , हम तो व्यर्थ में अपने को बड़ा आदमी समझ बैठे थे । धन्य है भारतवर्ष जहाँ ऐसे परम संत जन्म लेते है ।

पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार -भाग १।

® यह सब चरित्र और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी, पंडित बाबा, श्री रामसुखदास जी एवं कुछ अवध के महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो  से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com ®

१. एक प्रेमि संत :

पूज्य श्री हरीबाबा जी महान् संत हुए है , उनके साथ नित्य कुछ न कुछ संत मंडली रहती ही थी । एक समय हरीबाबा के साथ कुछ प्रेमी संत यात्रा करने गए थे , उन संतो में एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ लिए रहते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को बगल में रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तो वे शालिग्राम जी वाही गाडी में रह गए । संत अपनी मस्ती में उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब हरीबाबा जी के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने देखा की हमारे शालिग्राम जी नहीं है ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगवान् मिले नहीं । उन्होंने भगवान् के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया  । हरीबाबा ने कहा – महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये शालिग्राम जी देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है । हरीबाबा बोले – आपने उन्हें कहा रखा था ,मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे और अब कई घंटे बीं गए है । गाडी से किसीने निकल लिए होंगे और गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी । संत बोले – मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।

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श्री राधा कौन है?

who is radha rani?narada asks shiva

भक्ति प्रधान आचार्य और भगवान के अवतार देवर्षि नारद जी ने भगवान भूतभावन सदाशिव के श्री चरणों में सादर प्रणाम कर पूछा: “हे
महाभाग ! मैं आपका दास हूँ ।

बतलाइए कि, श्रीराधादेवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी, महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं ? क्या
वे अंतरंगा विद्या हैं, या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं ?’’
सदाशिव बोले – “हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि महालक्ष्मी भी उनके चरण कमल की शोभा के
सामने तुच्छ कही जाती हैं।
हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्रीराधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं । उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी
लज्जित हो रहा हूं।
तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पारावार पा सके । उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने
वाले श्रीकृष्ण को भी सदा मोहित करने वाली है । यदि अनंत मुखो से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।”

जो मनुष्य निरंतर ‘राधा-राधा’ कहता है तथा राधारानी का स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कारो से युक्त होकर सब प्रकार की विद्याओं में कुशल बनता है।
जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है, श्रीराधा में जिसकी निष्ठा है, वह महाभाग श्रीधाम वृन्दावन में श्रीराधा की सहचरी होता है ।
कृष्णभक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यशरण होकर जब श्रीराधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी और निष्काम हो जाता है । श्रीराधा पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान सदा इनके अधीन रहते हैं ।
यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्रीराधा कहा गया है।
भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं, कि
राधा उनकी आत्मा है, वह राधा में,
और राधा उनमें बसती है !

♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡

५६( छप्पन )भोग क्यों लगाते है…???

भगवान को लगाए जाने वाले भोग
की बड़ी महिमा है |
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है |
यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है |
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान
को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे
कई रोचक कथाएं हैं |

ऐसा कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी | अर्थात् श्री बालकृष्ण लाल आठ बार भोजन करते थे |
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया |

आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और
मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया |

गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग…
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों |
श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी |
व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया |

छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां…
ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान
श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं |
उस कमल की तीन परतें होती हैं…
प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह”
और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं |
प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में श्री भगवान विराजते हैं |
इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है । 56 संख्या का यही अर्थ है |
* छप्पन भोग इस प्रकार है *
1. भक्त (भात),
2. सूप (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (सिखरन),
7. अवलेह (शरबत),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शर्करा युक्त),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मठरी),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खजला),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चोला),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसू),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (पगी हुई),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा,
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (बिलसारू),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी),
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (सीरा),
43. लसिका (लस्सी),
44. सुवत,
45. संघाय (मोहन),
46. सुफला (सुपारी),
47. सिता (इलायची),
48. फल,
49. तांबूल,
50. मोहन भोग,
51. लवण,
52. कषाय,
53. मधुर,
54. तिक्त,
55. कटु,
56. अम्ल.

64 कलाओं में महारत थे श्री कृष्ण

श्री कृष्ण अपनी शिक्षा ग्रहण करने आवंतिपुर
(उज्जैन) गुरु सांदीपनि के आश्रम में गए थे जहाँ वो मात्र 64 दिन रह थे। वहां पर उन्होंने ने मात्र 64 दिनों में ही अपने गुरु से 64 कलाओं की शिक्षा हासिल कर ली थी। हालांकि श्री कृष्ण भगवान के अवतार थे और यह कलाएं उन को पहले से ही आती
थी। पर चुकी उनका जन्म एक साधारण मनुष्य के रूप में हुआ था इसलिए उन्होंने गुरु के पास जाकर यह पुनः सीखी।

निम्न 64 कलाओं में पारंगत थे श्रीकृष्ण
1 – नृत्य – नाचना
2 – वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3 – गायन विद्या – गायकी।
4 – नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5 – इंद्रजाल- जादूगरी
6 – नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7 – सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8 – फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9 – बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10 – बच्चों के खेल
11 – विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12 – मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ
बतलाना
14 – रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15 – कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16 – सांकेतिक भाषा बनाना
17 – जल को बांधना।
18 – बेल-बूटे बनाना
19 – चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20 – फूलों की सेज बनाना।
21 – तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22 – वृक्षों की चिकित्सा
23 – भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24 – उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26 – गलीचे, दरी आदि बनाना
27 – बढ़ई की कारीगरी
28 – पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29 – तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30 – हाथ की फूर्ती के काम
31 – चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32 – तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33 – द्यूत क्रीड़ा
34 – समस्त छन्दों का ज्ञान
35 – वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36 – दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37 – कपड़े और गहने बनाना
38 – हार-माला आदि बनाना
39 – विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे
मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को
मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40 – कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना –
स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41 – कठपुतली बनाना, नाचना
42 – प्रतिमा आदि बनाना
43 – पहेलियां बूझना
44 – सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46 – मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47 – कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52 – खानों की पहचान
53 – चित्रकारी
54 – दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55 – शय्या-रचना
56 – मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57 – कूटनीति
58 – ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59 – नई-नई बातें निकालना
60 – समस्यापूर्ति करना
61 – समस्त कोशों का ज्ञान
62 – मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63 – छल से काम निकालना
64 – कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

श्री राधा गोविंद

Gopi Geet- गोपीगीत

krishna with gpois dancing

gopi geet krishna virah

जयति तेऽधिकं जन्मना ब्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां
विचिन्वते॥ (१) ।।

शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (२) ।।

विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद् वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद् विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥ (३)।।

न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥ (४) ।।

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥ (५) ।।

व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥ (६) ।।

प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्॥ (७) ।।

मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः॥ (८) ।।

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥ (९) ।।

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि॥ (१०) ।।

चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥ (११) ।।

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि॥ (१२) ।।

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्॥ (१३) ।।

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥ (१४) ।।

अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ (१५) ।।

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि॥ (१६) ।।

रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः॥ (१७) ।।

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां
यन्निषूदनम्॥ (१८) ।।

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (१९)

इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा।
रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसाः॥
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः॥

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