सुंदर कथा ३३(श्री भक्तमाल – गौ भक्त राजर्षि दिलीप) Sri Bhaktamal -Gau bhakt Sri Dileep ji

गौ उपासक पूज्यपाद​ श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,गोऋषि श्री दत्तशरणानंद जी महाराज के कृपाप्रसाद ,प्रवचनों एवं रघुवंशम् से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ। 

महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी । देवराज के बुलाने पर दिलीप एक बार स्वर्ग गये । देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देव असुर युद्ध हुआ । युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्ग में कामधेनु मिली; किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं । कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की।  इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया- मेरी संतान (नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा । पढना जारी रखे

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग ३

5. विदुरने धुतराष्ट्र को, दुर्योधन को बहुत समझाया,परंतु उनकी कोई बात उन लोगो ने नहीं सुनी । अन्तमें पाण्डवो का सन्धि सन्देश लेकर श्री कृष्ण के आनेकी बात सुनी गयी । धृतराष्ट्र ने विदुरसे कहा – श्रीकृष्ण आनेवाले हैं, उनके स्वागत के लिये मै बहुत से रथ, घोड़े, हाथी, रत्न, सोनेके रथ आदि दूंगा। सब लोग उनका स्वागत करेंगेऔर नगर की सब प्रजा उनका सम्मान करेगी। उनके ठहरनेके लिये सबसे सुन्दर स्थान दिया जायगा और हमारे पास जो सर्वोत्तम सामग्री है वही उन्हें भेट की जायगी । विदुरने कहा – महाराज ! आप बड़े बुद्धिमान् हैं । आप सभी बाते जानते हैं । आपसे क्या कहूँ? अब आप चालाकी छोड़ दीजिये । सरल हो जाइये । आप श्रीकृष्ण का सम्मान करना चाहते हैं यह बडा सुन्दर है । इन सामयियो की तो बात क्या, श्रीकृष्ण समग्र पृथ्वी के स्वामी हैं और वास्तवमें वही उसके पात्र हैं । परंतु मैं शपथपूर्वक कहता हूं कि आप धर्मकी दृष्टिसे अथवा प्रेमकी दृष्टि से यह सब उन्हें नहीं देना चाहते हैं । आप उन पर अपना मायाजाल फैलाना चाहते हैं और उन्हें इन बाहरी सामग्रियो से ठगना चाहते हैं । आप पाण्डवों को पांच गांव नहीं दे सकते, आप धन के बलपर श्रीकृष्ण को अपने वशमें करना चाहते हैं । पढना जारी रखे

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग २

3. धर्ममें कपटके लिये तनिक भी स्थान नहीं है । बाहर भीतर की स्पष्टता ही धर्मका प्रधान लक्षण है । जो भीतर से दूसरे प्रकार का है, बाहर से दूसरे प्रकार का है, इम उसे धर्मात्मा नहीं कह सकते । सब प्राणियों का समान सुहृद् धर्म अपने अंदर किसी प्रकारका कपट भला कैसे रख सकता है ? विदुर धर्मराज युधिष्टिर के लिये जैसे कुछ हैं, वैसे ही कोरवों के लिये भी हैं । वे पाण्डवो से जितना प्रेम करते हैं उतना ही कौरवों के साथ भी स्पष्ट ही रखते हैं । वे हितकी बात नि:संकोच कह देते हैं । इस बात की परवा नहीं करते कि उसे कोई मानेगा या नहीं । उनको स्पष्ट कहनेमें कहीं कोई भय नहीं है, भय तो अधर्म में ही है, धर्ममे नहीं । विदुरके जीवनमे हम इस बातको पूर्णता पाते हैं कि वे जैसे कुछ हैं, स्पष्ट हैं, उन्हें दुर्योधन भी जानता है, युधिष्ठिर भी जानते हैं और कोई भी उनसे अपना सम्बन्ध तोड़ नहीं सकता। पढना जारी रखे

सुंदर कथा २६ (श्री भक्तमाल – श्री विदुर जी) Sri Bhaktamal- Sri Vidur ji भाग १

पृथ्वी के नैऋत्य कोणपर धर्मराज की संयमनीपुरी है । उसमें अनेकों योजनों के बहुत से सुन्दर-सुन्दर महल है। उसमें धर्मराज अपने मंत्रियो और धार्मिक सभासदो के साथ निवास करते हैं । उनके सभासदों में ऋषि, महर्षि, देवता सभी प्रकार के लोग हैं । मनुष्यों के पाप-पुण्यका हिसाब रखनेवाले चित्रगुप्तजी महाराज हैं । काल, दिशा, आकाश, वायु ,अग्नि ,सूर्य आदि बहुत से उनके दूत हैं, जो मनुष्योंसे एकान्तमें होनेवाले कर्मोंको भी देखा करते हैं और तुरंत उनके पास समाचार पहुंचा देते हैं । उनकी सभामे चार दरवाजे हैं । जिनमें तीनसे पुण्यात्मा लोगोका प्रवेश होता है और दक्षिण द्वारसे पापी लोग आते हैं । उस मार्गसे आनेमें पापियों को महान् कष्ट उठाना पड़ता है और वैतरणी भी लांघनी पड़ती है । उधरके मार्गसे ले आनेवाले दूत भी बड़े ही भयंकर हैं और कुम्भीपाक, रौरव, असिपत्रवन आदि नाम के  नर्क भी उसी दिशामें पड़ते हैं । उस द्वार की सबसे बडी विशेषता यह है कि जो उस मार्गसे जाता है, उसे धर्मराज का स्वरूप बड़ा ही भयंकर दीखता है और यों तो वे बड़े ही सौम्य हैं । पढना जारी रखे

पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार – भाग २ ।

® यह सब चरित्रा और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी , पंडित बाबा, श्री माधवदास बाबा जी एवं कुछ महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com

१. पूज्य श्री वंशीदास ब्रह्मचारी के नियम की परीक्षा :

श्री नर्मदा किनारे एक उच्च कोटि के संत विराजते थे जिनका नाम श्री वंशीदास ब्रह्मचारी जी था । उनका नित्य का नियम था की वे भगवान् को तो भोग लगते और साथ में एक अतिथि को भी भोजन प्रसाद खिलाते । ऐसा कारण के बाद ही वो स्वयं प्रसाद पाते थे । नित्य प्रति बे भगवान् को भोग लगते और इंतजार करते की कोई अतिथि आये । कोई न कोई अतिथि मिल ही जाता, कोई नहीं आया तो नर्मदा जी में मछली कछुआ को खिलाते। एक दिन कोई अतिथि नहीं आया और ना ही कोई कछुआ मछली कुछ दिखाई पड़ रहे थे । ब्रह्मचारी जी सोचने लगे की क्या आज का अन्न & ऐसे ही चला जायेगा।

बहुत समय बीत गया पर कोई दिखाई नहीं पड रहा था , अचानक संत के पास एक कुत्ता आया । कुत्ते को देखकर उसे डराकर भगा दिया  । जैसे ही भगाया ,तुरंत उसके बाद संत जी को ख्याल आया की कही अतिथि नारायण के रूप में कुत्ता ही न आया हो। उन्होंने सोचा की यही तो होगा वह, कितनी दूर गया होगा परंतु दूर दूर तक खली जमीन दिखाई पद रही थी । पश्चाताप करने लगे की इतनी देर बाद आखिर कोई अतिथि आया था पर हमने उसे भगा दिया । शाम बीत चुकी है ,अब तो मेरा नियम भंग हो गया । उस कुत्ते को बहुत ढूंधा पर कही दिखा नहीं । फिर आँख बंद करके नदी किनारे रोने लग गए , अब भगवान को दया आयी और प्रभु अचानक सामने उसी रूप में प्रकट हुए।

इस बार संत जी ने पहचान ने में भूल नहीं की और उस कुत्ते के चरण पकड़ कर कहने लगे की प्रभु ! मैं पहचान गया हूँ । आप भक्तवत्सल है ,मेरे अतिथि सत्कार के नियम की परीक्षा करने ही आप आये थे । कृपा कर के आप अपने रूप में आकर दर्शन प्रदान करो । भगवान् श्री रामचंद्र जी ने अपने निज स्वरुप का दर्शन कराया और संत जो को आनंद प्रदान किया । भगवान् श्री राम ने संत जी से कहा की जब जीवन में कोई नियम ले लेता है तो समय आनेपर उसके नियम निष्ठा की परीक्षा अवश्य होती है । यदि वह व्यक्ति नियम में दृढ़ विश्वास रखे तो भगवान् उस नियम को भंग नहीं होने देते । इस तरह श्रीराम जी ने संत जी के नियम की रक्षा की और ब्रह्मचारी जी को आशीर्वाद् देकर अंतर्धान हो गए ।

२. महाभाव की अवस्था :

श्री गौरांग महाप्रभु के विशेष कृपापात्र श्री कवी कर्णपूर एक उच्च कोटि के भक्त थे । उन्होंने बचपन से ही श्रीमन् महाप्रभु की लीलाओं का आस्वादन किया था । श्रीमन् महाप्रभु के प्रभाव से हिंस्रक पशु भी नाम संकीर्तन करते हुए नृत्य करने लगते थे , राधा कृष्ण का नाम सुनकर श्रीमन् महाप्रभु के शरीर में अष्टसत्त्विक भाव जागृत हो जाते थे , नृत्य करना , रूदन करना ,तड़पना , शरीर कांपना यह सब भाव कवी कर्णपूर ने महाप्रभु में देखे थे । श्रीमन् महाप्रभु ने अपने छः प्रमुख गोस्वामी गणो को गौड़ीय संप्रदाय और हरिनाम प्रचार हेतु वृंदावन मे भेजा हुआ था ।

एक दिन श्रीपाद रूप गोस्वामी जो षड् गोस्वामियों में से एक थे , एक वृक्ष के निचे श्री गोपी गीत पर प्रवचन रहे थे । अत्यंत मधुर प्रसंग कथा में चल रहे थे ,श्रोता मंत्रमुग्ध होकर कथा का आस्वादन कर रहे थे । श्रीपाद रूप गोस्वामी बड़ी गंभीर मुद्रा में कथा कह रहे थे । कवी कर्णपूर ने देखा की इनके शरीर पर भक्त के कोई भाव , लक्षण दिखाई नहीं पड़ते । न अश्रु है , न मुख पर कोई भाव , न विरह । वे सोचने लगे की रूप गोस्वामी महाप्रभु जी के विशेष कृपा पात्र होने पर भी उनके चित्त में प्रेम ,भक्ति , विरह के कोई भाव है ही नहीं । क्या कारण है ? यह सोचना ठीक नही है , यदि इनके हृदय मे प्रेम न होता तो इतने श्रोताओ के भीतर प्रेम जागता कैसे ।

इतने में वृक्ष का एक चिड़िया की चोंच से पेड़ का एक पत्ता पत्ता निचे गिरता हुआ आया और जैसे ही वह रूप गोस्वामी जी के नासिका के निकट आया , वह पत्ता एक क्षण में जलकर राख हो गया । कवी कर्णपूर बस एकटक देखते ही रह गए । प्रवचन प्रकट होने पर् प्रणाम करने निकट पहुंचे तब श्रीपाद रूप गोस्वामी जी की गरम श्वासों से कवि कर्णपूर के कपोल पर छाले निकल आये। उन्हें ज्ञात हो गया की रूप गोस्वामी अपने भीतर का भाव बहुत गुप्त रखते है ।उनके अंदर भगवान् के विरह का ताप इतना अधिक तीव्र है कि एक क्षण में यह पत्ता राख बन गया । यह महात्मा अपने अंदर का भाव प्रकट नहीं होने देते और किसी तरह अपना भाव अंदर छुपा कर कथा कहते है ।

अनंतश्री समपान श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज के चरित्र में ऐसा ही एक प्रसंग है । एक दिन श्री भक्तमाली जी बरसाना धाम में गहमर वन के पास श्रीमद भागवत कथा कहने पधारे । उन्होंने बड़ा ही मधुुर प्रसंग सुनना आरम्भ किया , श्री रानी बरसाने से लाल जी का दर्शन करने चली और नंदगांव से श्रीकृष्ण प्रिया जी का दर्शन करने चले थे । बिच मार्ग में प्रेम सरोवर के निकट दोनों की आँखें मिली – बस इतना प्रसंग कहा की महाराज जी का शरीर थरथर कांपने लग गया । आँखों से अश्रुपात होने लगा , बहुत देर तक यही अवस्था रही ।

कथा कुछ हो नहीं पायी और जब श्री भक्तमाली जी महाराज पुनः सामान्य स्तिथि में लौट आये तब वे अपने विश्राम कक्ष में चले गए । उस समय उनके शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज ने पूछा – महाराज श्री ! आज कथा में ऐसा क्या हो गया था जो आप कथा नहीं कह पाये और शरिर कांपने लगा । यह बात सुनते ही श्री भक्तमाली जी की वही अवस्था हो गयी । बहुत देर बाद सामान्य स्तिथि में आनेपर उन्होंने शिष्य से कहा कि हमे बहुत सोच समझकर कथा कहना पड़ता है , कही भूल से भी भाव रस का स्पर्श हो गया तो फिर हम आगे कुछ कह नहीं पाते । इस अवस्था में जाने पर संसार की सुध बुध नहीं रह जाती , भूल से भी इस अवस्था अंदर का भाव बहार निकल न जाए इस दर से बहुत सिच समझकर कथा कहानी पड़ती है ।

ऐसी ही अवस्था श्री गौड़ीय संप्रदाय के महान् सिद्ध संत श्री जगद्बंधु सुंदर जी में दिखाई देती थी । उनके सामने जाते समय भक्तो को विशेष ध्यान रखना पड़ता कि कही धोखे से भी राधा नाम न निकल जाए । श्री राधा नाम सुनते ही वे ऐसी अवस्था में चले जाते की कई दिनों तक शरीर की सुध बुध नहीं होती और कभी कभी समाधि लग जाती । श्री राधा नाम तो क्या , कोई केवल रा अक्षर ही कह देता तो महाराज जी महाभाव के समुद्र में डूब जाते ।

३.सिद्ध नाम जापक संत पूज्यपाद श्री चतुर्दास जी महाराज के शब्दो का प्रभाव :

मुरैना क्षेत्र मध्य प्रदेश में एक निम्बार्क सम्प्रदाय के संत रहते थे जिनका नाम था श्री चतुर्दास जी । बाबा बड़े सिद्ध नाम जापक संत थे । अपना अधिकतम समय भगवान् के नाम् का जप करने में लगाते थे । निम्बार्क सम्प्रदाय मे यद्यपि श्री राधा कृष्ण नाम जपने की साधना परंपरा है परंतु बाबा की श्री राम नाम मे भी अद्भुत श्राद्धा थी । बाबा अधिक पढ़े लिखे भी नही थे , केवल हिंदी भाषांतर वाली गीता जी और श्री रामचरित मानस पढ़ लेते थे । वही पास मे एक गुफा थी जहां बाबा साधना करते थे । एक दिन उन्होंने एक अरब रामनाम करने का निश्चय किया । पूरा समय श्री राम नाम लेने में व्यस्त रहते थे , स्नान भोजन आदि बहुत शीघ्रता से कर लेते और शेष समय गुफा में बैठकर श्रीराम नाम करते रहते थे ।

रात्रि में बहुत कम समय विश्राम करते थे । विश्राम करने समय भी उनका कंठ हिलता रहता था । एक अरब राम नाम का जप पूरा होने पर बाबा बाहर आये । अब तो उनका एक एक क्षण श्रीराम नाम मे बीतने लाग ,चलते फिरते ,खाते पीते , विश्राम के समय भी राम नाम् चलता ही रहता । वाणी में अद्भुत सिद्धि प्रकट हो गयी । एक दिन बाबा बैठ कर नामजप कर रहे थे कि वहां से एक भेड़ बकरी चराने वाला गुजर रहा था । बाबा ने उससे कहा – सुनो ! ये भेड बकरी चराना तो तुम्हारा काम है परंतु कभी राम राम भी किया करो । बस इतना कहा कि वह बकरी चराने वाला राम नाम जप मे लग गया । वह संख्या पूर्वक लाखो की संख्या में राम नाम जपने लग गया ।

जिस किसी को बात बात मे भी बाबा यदि कह देते कि राम राम कह दिया करो । वे सभी लोग श्रीराम नाम के जप मे लग जाते । बैलगाड़ी वालो को , राह चलते लोगो को , बालको को – जिससे कह देते उसके जीवन मे नाम् जप प्रारम्भ हो जाता । चाहे कोई भक्त हो ,अभक्त हो , दुष्ट हो बाबा जिससे राम राम बोलने को कह देते वह निष्ठा पूर्वक राम नाम मे अपना जीवन व्यतीत करता । ऐसे महान सिद्ध नामजपक हुए श्री चतुर्दास बाबा ।

४. सेवा के प्रति निष्ठा :

श्री वृंदावन खाकचौक स्थान में पूज्य श्री देवदास पहाड़ी बाबा सरकार विराजते थे । वहां विचरण करते करते कई बार खाकचौक मे मंदसौर जिले के एक महंत आते थे । उनका नाम था भले बाबा क्योंकि वे बात बात मे भले शब्द का अधिक प्रयोग करते थे । अतः लोग उन्हें भले बाबा कहते थे । मंदसौर जिले में एक स्थान के महंत थे और हर साल वे एक यज्ञ करते थे । खाकचौक मे धुना घर म् अपना आसान लगाते थे । वहां प्रातः का भजन साधान समाप्त करके सेवा में लग जाते थे । संतो की सेवा और झाडू लगाने की सेवा भले बाबा करने लग जाते थे । कभी नीचे , कभी ऊपर ,कभी बाहर झाड़ू लगते रहते थे । कई घंटे झाड़ू लगते थे । आश्रम मे झाडू सेवा के लिए एक सेवक थे और एक ब्रजवासन बाई जी थी जिनका नाम सुमित्रा देवी था ।

एक दिन श्री पहाड़ी बाबा ने भले बाबा को अपने पास बुलाया और बहुत जोर की डांट लगते हुए कहा – ऐ भले ! तुमको एक जगह बैठकर चैन नही पड़ता । मै सफाई करने वालो को काम के पैसे देता हूँ ,दो दो सेवक है झाडू सेवा करने के लिए । तुम क्यों झाडू के लिए डोलते हो , जाओ बैठो अपने आसान पर और भजन करो । खबरदार अब झाडू लगाई तो । अब भले बाबा गए भीतर और अपना आसान ,कमंडल आदि लेकर महाराज जी के पास आकर साष्टांग दंडवत किया और बोले – महाराज ! इस बालक के अपराध क्षमा करना , अब मै यहां से जा रहा हूँ । लगता है दोबारा लौटकर नही आ पाएंगे । श्री पहाड़ी बाबा बोले – क्यो जा रहे हो भले । तुम तो पूरे सावन भादो ठहरते थे फिर इस बार क्यो जाना चाहते हो ?

भले बाबा बोले – जब जवानी थी तब इसी खाकचौक मे रसोई बनाते थे ,बर्तन मांजते थे । अब तो बुढापा है ,अब और कोई सेवा हमसे बनती नही है । केवल थोड़ा बहुत झाडू लगाने की सेवा हो सकती है ,वही कर लेता हूं । बिना सेवा के प्रसाद कैसे पाऊंगा ? और बिना प्रसाद पाये शरीर कैसे चलेगा ? आपने सेवा के लिए ही मना दिया । इसीलिए अब मै यहां नही आऊंगा और ऐसा कहते कहते रोने आग गया साधु । श्री पहाड़ी बाबा बोले – ऐसे कैसे चला जायेगा , बकबक करता है । जाएगा जाएगा कहता है । अब मैं मना नही करूँगा , खूब झाडू लगाओ । शिष्य को बुलाया और कहा – ये भले बाबा का आसन कमंडल उठाओ और अंदर रख दो ,ये कही नही जाएगा ।

जैसे ही श्री पहाड़ी बाबा ने सेवा की आज्ञा दी वैसे भले बाबा प्रसन्न हो गए । जिस समय की यह घटना है , उस समय भले बाबा की आयु ९० वर्ष की थी । श्री पहाड़ी बाबा कहते थे कि यही है सच्चे साधु जो किसी भी अवस्था मे सेवा का त्याग नही करते । संत सेवा ,गौ सेवा ,स्थान सेवा जैसी बन सके करते रहते है । सच्चे साधु सेवा करने के लिए सदा तत्पर रहते है और कुछ ऐसे असाधु होते है कि उन्हें सेवा बात दो तो भाग जाते है ।

५. पूज्यपाद श्री रामचंद्र डिंगरे जी महाराज का साधू स्वभाव और ढन के प्रति निस्पृहता :

श्री रामचंद्र डोंगरे जी महाराज ने अपनी जीवन काल में जितनी कथाएँ की, उनमे जो धन आता वह सब दान में जाता । एक रूपया अपने और अपने परिवार के लिए उपयोग नहीं होने देते थे । जो थोडा बहुत अन्न और वस्त्र आजाता उसका उपयोग करते , अन्य सब वस्त्र आदि संतो को दे देते । मुम्बई चौपाटी में उनकी अंतिम कथा हुई । गोरखपुर कैंसर हस्पताल , संतो की सेवा , गौ सेवा , दिन दुखियो की सेवा आदि में अब तक एक अरब रूपए दान हो चुके थे उनकी कथाओ से ।

उनकी पत्नी राजस्थान आबू में रहती थी, जब उनको मृत्यु के पांचवे दिन उन्हे खबर लगी तब वे अस्थियाँ लेजाकर गोदावरी में विसर्जित करने गए , उस समय उनके साथ मुम्बई के सबसे बड़े व्यक्ति रातिभाई पटेल गये थे । नासिक मे श्री डोंगरे जी ने रातिभाई से कहा कि रति, हमारे पास तो कुछ हैं नही ,और इसका अस्थि विसर्जन करना है । कुछ धन तो लगेगा ही, क्या करे ? फिर कहा -हमारे पास इसका मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रुपये मिलें, उन्हे अस्थि विसर्जन में लगा देते है । यह बात जैसे ही रातिभाई ने सुनी , उन्हे बड़ा भारी धक्का लग गया । बस श्री डोंगरे जी की ओर देखते ही रह गए ।

पश्चात् रातिभाई ने कुछ परिचितों से यह बात कही – हम जीवित कैसे रह गये, आपसे कह नहीं सकते । बस हमारा हृदय रुक नहीं गया । जिन महाराजश्री के इशारेपर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, जिनके आस पास बड़े बड़े लोग रूपए लेकर खडे रहते थे , वह महापुरुष कह रहे कि पत्नी की अस्थियो के विसर्जन के लिये पैसा नहीं है और हम सामने खड़े सुन रहे है ? हम तो फुट फुट कर रो पड़े , धिक्कार है हमे ।असल में बादशाह तो संत जन ही है , हम तो व्यर्थ में अपने को बड़ा आदमी समझ बैठे थे । धन्य है भारतवर्ष जहाँ ऐसे परम संत जन्म लेते है ।

पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार -भाग १।

® यह सब चरित्र और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी, पंडित बाबा, श्री रामसुखदास जी एवं कुछ अवध के महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो  से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com ®

१. एक प्रेमि संत :

पूज्य श्री हरीबाबा जी महान् संत हुए है , उनके साथ नित्य कुछ न कुछ संत मंडली रहती ही थी । एक समय हरीबाबा के साथ कुछ प्रेमी संत यात्रा करने गए थे , उन संतो में एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ लिए रहते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को बगल में रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तो वे शालिग्राम जी वाही गाडी में रह गए । संत अपनी मस्ती में उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब हरीबाबा जी के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने देखा की हमारे शालिग्राम जी नहीं है ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगवान् मिले नहीं । उन्होंने भगवान् के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया  । हरीबाबा ने कहा – महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये शालिग्राम जी देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है । हरीबाबा बोले – आपने उन्हें कहा रखा था ,मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे और अब कई घंटे बीं गए है । गाडी से किसीने निकल लिए होंगे और गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी । संत बोले – मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।

पढना जारी रखे

श्री राधा कौन है?

who is radha rani?narada asks shiva

भक्ति प्रधान आचार्य और भगवान के अवतार देवर्षि नारद जी ने भगवान भूतभावन सदाशिव के श्री चरणों में सादर प्रणाम कर पूछा: “हे
महाभाग ! मैं आपका दास हूँ ।

बतलाइए कि, श्रीराधादेवी लक्ष्मी हैं या देवपत्नी, महालक्ष्मी हैं या सरस्वती हैं ? क्या
वे अंतरंगा विद्या हैं, या वैष्णवी प्रकृति हैं? कहिए, वे वेदकन्या हैं, देवकन्या हैं अथवा मुनिकन्या हैं ?’’
सदाशिव बोले – “हे मुनिवर ! अन्य किसी लक्ष्मी की बात क्या कहें, कोटि-कोटि महालक्ष्मी भी उनके चरण कमल की शोभा के
सामने तुच्छ कही जाती हैं।
हे नारद जी ! एक मुंह से मैं अधिक क्या कहूं? मैं तो श्रीराधा के रूप, लावण्य और गुण आदि का वर्णन करने मे अपने को असमर्थ पाता हूं । उनके रूप आदि की महिमा कहने में भी
लज्जित हो रहा हूं।
तीनों लोकों में कोई भी ऐसा समर्थ नहीं है जो उनके रूपादि का वर्णन करके पारावार पा सके । उनकी रूपमाधुरी जगत को मोहने
वाले श्रीकृष्ण को भी सदा मोहित करने वाली है । यदि अनंत मुखो से चाहूं तो भी उनका वर्णन करने की मुझमें क्षमता नहीं है।”

जो मनुष्य निरंतर ‘राधा-राधा’ कहता है तथा राधारानी का स्मरण करता है, वह सब तीर्थों के संस्कारो से युक्त होकर सब प्रकार की विद्याओं में कुशल बनता है।
जो राधा-राधा कहता है, राधा-राधा कहकर पूजा करता है, श्रीराधा में जिसकी निष्ठा है, वह महाभाग श्रीधाम वृन्दावन में श्रीराधा की सहचरी होता है ।
कृष्णभक्त वैष्णव सर्वदा अनन्यशरण होकर जब श्रीराधा की भक्ति प्राप्त करता है तो सुखी, विवेकी और निष्काम हो जाता है । श्रीराधा पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान सदा इनके अधीन रहते हैं ।
यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्रीराधा कहा गया है।
भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं, कि
राधा उनकी आत्मा है, वह राधा में,
और राधा उनमें बसती है !

♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡
♡श्री राधा राधा♡

५६( छप्पन )भोग क्यों लगाते है…???

भगवान को लगाए जाने वाले भोग
की बड़ी महिमा है |
इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है |
यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है |
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान
को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे
कई रोचक कथाएं हैं |

ऐसा कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी | अर्थात् श्री बालकृष्ण लाल आठ बार भोजन करते थे |
जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया |

आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र
की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और
मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया |

गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग…
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों |
श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी |
व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया |

छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां…
ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान
श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं |
उस कमल की तीन परतें होती हैं…
प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह”
और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं |
प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में श्री भगवान विराजते हैं |
इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है । 56 संख्या का यही अर्थ है |
* छप्पन भोग इस प्रकार है *
1. भक्त (भात),
2. सूप (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (सिखरन),
7. अवलेह (शरबत),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शर्करा युक्त),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मठरी),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खजला),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चोला),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसू),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (पगी हुई),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा,
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (बिलसारू),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी),
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (सीरा),
43. लसिका (लस्सी),
44. सुवत,
45. संघाय (मोहन),
46. सुफला (सुपारी),
47. सिता (इलायची),
48. फल,
49. तांबूल,
50. मोहन भोग,
51. लवण,
52. कषाय,
53. मधुर,
54. तिक्त,
55. कटु,
56. अम्ल.

64 कलाओं में महारत थे श्री कृष्ण

श्री कृष्ण अपनी शिक्षा ग्रहण करने आवंतिपुर
(उज्जैन) गुरु सांदीपनि के आश्रम में गए थे जहाँ वो मात्र 64 दिन रह थे। वहां पर उन्होंने ने मात्र 64 दिनों में ही अपने गुरु से 64 कलाओं की शिक्षा हासिल कर ली थी। हालांकि श्री कृष्ण भगवान के अवतार थे और यह कलाएं उन को पहले से ही आती
थी। पर चुकी उनका जन्म एक साधारण मनुष्य के रूप में हुआ था इसलिए उन्होंने गुरु के पास जाकर यह पुनः सीखी।

निम्न 64 कलाओं में पारंगत थे श्रीकृष्ण
1 – नृत्य – नाचना
2 – वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना
3 – गायन विद्या – गायकी।
4 – नाट्य – तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय
5 – इंद्रजाल- जादूगरी
6 – नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना
7 – सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना
8 – फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना
9 – बेताल आदि को वश में रखने की विद्या
10 – बच्चों के खेल
11 – विजय प्राप्त कराने वाली विद्या
12 – मन्त्रविद्या
13- शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ
बतलाना
14 – रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना
15 – कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना
16 – सांकेतिक भाषा बनाना
17 – जल को बांधना।
18 – बेल-बूटे बनाना
19 – चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना)
20 – फूलों की सेज बनाना।
21 – तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना – इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं।
22 – वृक्षों की चिकित्सा
23 – भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति
24 – उच्चाटन की विधि
25- घर आदि बनाने की कारीगरी
26 – गलीचे, दरी आदि बनाना
27 – बढ़ई की कारीगरी
28 – पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।
29 – तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला।
30 – हाथ की फूर्ती के काम
31 – चाहे जैसा वेष धारण कर लेना
32 – तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना
33 – द्यूत क्रीड़ा
34 – समस्त छन्दों का ज्ञान
35 – वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या
36 – दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण
37 – कपड़े और गहने बनाना
38 – हार-माला आदि बनाना
39 – विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे
मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को
मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए।
40 – कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना –
स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना।
41 – कठपुतली बनाना, नाचना
42 – प्रतिमा आदि बनाना
43 – पहेलियां बूझना
44 – सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना।
45 – बालों की सफाई का कौशल
46 – मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना
47 – कई देशों की भाषा का ज्ञान
48 – मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना – ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके।
49 – सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा
50 – सोना-चांदी आदि बना लेना
51 – मणियों के रंग को पहचानना
52 – खानों की पहचान
53 – चित्रकारी
54 – दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना
55 – शय्या-रचना
56 – मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना।
57 – कूटनीति
58 – ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई
59 – नई-नई बातें निकालना
60 – समस्यापूर्ति करना
61 – समस्त कोशों का ज्ञान
62 – मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना।
63 – छल से काम निकालना
64 – कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।

श्री राधा गोविंद

Gopi Geet- गोपीगीत

krishna with gpois dancing

gopi geet krishna virah

जयति तेऽधिकं जन्मना ब्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां
विचिन्वते॥ (१) ।।

शरदुदाशये साधुजातसत् सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥ (२) ।।

विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद् वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद् विश्वतोभया दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥ (३)।।

न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥ (४) ।।

विरचिताभयं वृष्णिधुर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥ (५) ।।

व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किंकरीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥ (६) ।।

प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्।
फणिफणार्पितं ते पदांबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्॥ (७) ।।

मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यती रधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः॥ (८) ।।

तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥ (९) ।।

प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि॥ (१०) ।।

चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥ (११) ।।

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि॥ (१२) ।।

प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपङ्कजं शंतमं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन्॥ (१३) ।।

सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥ (१४) ।।

अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ (१५) ।।

पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि॥ (१६) ।।

रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतिस्पृहा मुह्यते मनः॥ (१७) ।।

व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां
यन्निषूदनम्॥ (१८) ।।

यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ (१९)

इति गोप्यः प्रगायन्त्यः प्रलपन्त्यश्च चित्रधा।
रुरुदुः सुस्वरं राजन् कृष्णदर्शनलालसाः॥
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः॥

Gopi geet in pdf format

click here