सुंदर कथा १११ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath Das Goswami ji

संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे । नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था । भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते । एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ? ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है , बढ़िया खीर बना । बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई । ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है , तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है । इतनी अच्छी खीर तो हमने आजतक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख । बाबा बोले – हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही , आप ही पीओ ।

ठाकुर जी बोले – बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या? बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया । भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए । मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड गए ज्वर (बुखार) से बीमार। ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है । बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है । वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है ।

ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे – २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है । बाबा कही आता जाता तो है नही , खीर खाने काहाँ चला गया? ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो – तुम्हें तो कुछ नही आता है ।
वैद्य जी बोले – मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा । यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा । ब्रजवासी बोले – ठीक है औषधि का प्रयोग करो । बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली । ब्रजवासी पूछने लगे – बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है , खीर कहां से पायी?

रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे । आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया, सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा । श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए । श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है । वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही । उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही , वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है ।

सुंदर कथा ११० (श्री भक्तमाल – श्री दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी जी) Sri Bhaktamal – Sri Durgaprasad ji

पूज्य श्री दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी जी (मोटेगणेश वाले संत जी) श्री वृंदावन के महान सिद्ध संत हुए है । वे सदा श्री भरतलाल जी के भाव से भगवान की सेवा मे लगे रहते थे और जिस प्रकार भरत जी १४ वर्ष रहे उसी प्रकार से वे भी रहते थे । एक दिन श्री मानस जी का पाठ करते करते उन्होंने पढ़ा –

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ।। जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ।।

अर्थात – यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में जीवों को पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं ।।

भाव मे भरकर वे मन से ही श्री अयोध्या पहुँच गए और श्री अयोध्या और सरयू जी को साष्टांग प्रणाम किया । सरयू जी मे गोता लगाया तो देखा कि चारो भाई जल में है और जैसे ही बाहर आये चारो उनपर जल उछालने लगे, श्री राम जी सहित तीनो भाइयो ने उन्हें हृदय से लगाया । श्री सीता जी ने आशीर्वाद दिया और जैसे ही नेत्र खोले तो स्वयं को आसान पर बैठे वृंदावन में अपने स्थान पर पाया । उनकी पत्नी कुछ देर में आयी और देखा कि उनका शरीर और वस्त्र जल से भीग रहे है , वस्त्रों और पैरों पर रज के कण लगे है । पत्नी के बहुत पूछने पर उन्होंने सारी बात बतायी और दोनों ने सरकार की कृपा का अनुभव करके भाव मे डूब गए ।

उन्होंने जीवन मे सभी को एक अमूल्य उपदेश दिया है – श्रीकृष्ण के बनकर, श्री कृष्ण के लिए , श्री कृष्ण का भजन करो ।

बाबा गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी की वाणी से दास ने जैसा सुना वैसा लिखा है ।

सुंदर कथा १०९ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ शरण जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath sharan ji

आज स्मृति मे एक अद्भुत संत की लीला आयी- हमारे नामजपक संत की वह लीला सुनता हूं । श्री रघुनाथ शरण बाबा एक बार संत मंडली के साथ कथा के निमित्त मुंबई आये थे । विचरण करते एक हॉस्पिटल (नाम नही लिखूंगा) सामने कोई संतप्रेमी मिला तो उससे बात कर रहे थे । हाल ही मे नया नया हॉस्पिटल बनाया था और अच्छा चलने भी लगा था ।

इतने में वहां का मालिक बडा डॉक्टर निकला और चिल्लाया – ए यहां क्या बात कर रहे हो, क्यो आये हो यहां, कामधाम होता नही बाबाजी लोगो को दिनभर राम राम करते डोलते है , राम राम करने से सब हो जाता है क्या ?
संत जी ने उसको प्रेम से राम नाम का महात्म्य बताया पर वह घमंड दिखाने लगा । संत ने कहा- डॉक्टर साहब, राम नाम की शक्ति देखनी है तो ठीक है । हाथ मे जल लिया और कहां सीताराम -जल छोड़ दिया । डॉक्टर से बोले अब कुछ दिन छुट्टी ले लो, कुछ दिन यहां कोई इलाज कराने नही आएगा -ऐसा बोलकर चले गए । डॉक्टर को समझ मे आया नही और वो घर चला गया ।

कुछ देर मे उसके हॉस्पिटल के बाबू (सेवक) ने घर जाकर बताया कि साहब आज पता नही क्या हो गया , सारे मरीज एकदम स्वस्थ हो गए -बड़े बड़े गंभीर बीमारी में पड़े मरीज भी अचानक उठ खड़े हुए और जांच करने पर शरीर पूरा अच्छा रोगमुक्त मिला । कई दिनों से बेहोश पड़े लोग भी पता नही कैसे उठ खड़े हुए । कुछ दिन तक वहां जो आता, उसकी जांच कराने पर कुछ नही मिलता । अंत मे वो डॉक्टर समझ गया की मै तो संतो को दरिद्री-भिक्षुक- बेकार सनाझता था पर मै तो मूर्ख और अपराधी हूं, उसने भगवान से क्षमा मांगी । कुछ दिन बाद बाबा अपने आश्रम वापस जाने को थे उस दिन हॉस्पिटल गए, डॉक्टर अपने कक्ष के बाहर परेशान हुए बैठा था।

बाबा सरकार को देखते ही चरण पकड़ लिया। बाबा बोले एक राम नाम मे कितनी शक्ति है यह तुम देख चुके, अब भजन खूब करो – संत कभी चमत्कार नही दिखाते पर कुछ लोगो को मार्ग पर लाने के लिए ठाकुर जी लीला करते है । नाम का महात्म्य जानकर वह सब छोड़कर कही भजन करने निकल गया और पुनः नही आया ।

सुंदर कथा १०८ (श्री भक्तमाल – श्री राममंगल दस जी और एक भक्ता ) Sri Bhaktamal – Sri Rammangal das ji aur Ek premi Bhakta

पूज्यपाद श्री जानकीदास बाबा सरकार ने कृपा कर के कई वर्षो पूर्व इस लीला को सुनाया था, वही लीला यहां संतो की कृपा से लिखने का प्रयास कर रहा हूं –

श्री अयोध्या मे एक सिद्ध कोटि के संत हुए है श्री राममंगल दास जी महाराज । वही महाराज जी के निवास स्थान के पास में एक मिथिला क्षेत्र की स्त्री रहती थी । उसके पास किसी वस्तु का संग्रह नही था , बस एक गाय के दूध से भरा लोटा और एक कपड़े में श्री रामचरित मानस जी की पोथी । पूरे दिन उसका यही काम था कि जहां भी जाती – प्रभु को रामायण की कथा सुनाती । कनक भवन जाती तो वहां चौपाइयों के रस का आस्वादन करती , कही अन्यत्र जाती तो वहां भी यही नियम था । वह स्त्री ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी बस हिंदी पढ़ और समझ लेती थी । श्री मानस जी मे उसका दृढ़ विश्वास था । एक दिन महाराज जी रेल गाड़ी में बैठकर प्रयाग (इलाहाबाद) के माघ मेला में जा रहे थे ।

वह भक्ता भी उसी डिब्बे में बैठ गयी । संत महाराज जी को देखकर उसने चरणों मे प्रणाम किया और दोनों मे कुछ संवाद हुआ । महाराज जी ने पूछा – बेटी ! तुम्हारे गुरुदेव कहा विराजते हैं , गुरुद्वार (गुरुस्थान) कहां पर है तुम्हारा ? उस भक्ता ने श्री रामचरितमानस की पोथी मस्तक से लगाकर अश्रुपात करते हुए एक चौपाई कही –

गुरु यही, गुरुद्वार यही । इन्ही की सेवा मे मन लाऊं ।।
जहां जहां जाऊ ,वहां तुलसीकृत रामायण ही गाऊं ।।

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सुंदर कथा १०७ (श्री भक्तमाल – श्री टीला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Teela ji

बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी ने दास को जैसा सुनाया वैसा लिख रहा हूं :

नाभादास जी वर्णन करते है – संसार में भरतखंड रुपी सुमेरुपर्वत के शिखर से समान श्री टीलाजी एवं उनके विरक्त शिष्य श्री लाहा जी की परंपरा बहुत प्रसिद्ध हुई ।ब्रह्माण्ड में सबसे ऊँचा पर्वत सुमेरु पर्वत कहा जाता है । पर्वतो का राजा सुमेरु जम्बुद्वीप के मध्य में इलावृत देश में स्थित है ।यह पूरा पर्वत स्वर्णमयी है । इसके शिखर पर २१ स्वर्ग है जहां देवता विराजते है । सभी देवताओ के लोक और ब्रह्मा जी का लोक भी सुमेरु पर्वत पर स्थित है । जैसे सभी देशो में भारत और सभी पर्वतो में सुमेरु ऊँचा है उसी प्रकार श्री कृष्णदास पयहारी जी के शिष्य टीला जी के भजन की पद्धति सुमेरु के सामान है अर्थात सर्वोपरि पद्धति है । यह भजन की पद्धति कौनसी है ? वह है संतो और गौ माता की सेवा।

जन्म और बाल्यकाल :

श्रीटीला जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल १०, सं १५१५ वि.को राजस्थान के किशनगढ़ राज्यान्तर्गत सलेमाबाद मे हुआ था । कुछ संतो का मत है की जन्म खाटू खण्डेला के पास कालूड़ा गाँव में हुआ था । इनकेे पिता श्री हरिराम जी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पण्डित और माता श्रीमती शीलादेवी साधु-सन्त सेवी सद्गृहिणी थी । पिता परम प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध जोशी गोत्रीय ब्राह्मण थे । इनके माता-पिता को बहुत समयतक कोई संतान नहीं थी, बादमे आबूराज निवासी एक सिद्ध संत के आशीर्वाद से इनका जन्म हुआ था । सन्तकृपा, तीर्थक्षेत्र का प्रभाव, पूर्वजन्म के संस्कारो और और माता – पिता की भक्ति के सम्मिलित प्रभाव से बालक टीलाजी मे बचपन से ही भक्ति के दिव्य संस्कार उत्पन्न हो गये थे, जो आयु और शस्त्रानुशीलन के साथ-साथ बढते ही रहे ।

श्री गायत्री महामंत्र जप के प्रभाव सेे टीला जी को श्री गायत्री और सरस्वती जी का साक्षात् दर्शन हुआ । ४ वेद ६ शास्त्र १८ पुराण उनके अंतःकरण में प्रकट हो गए । बचपन मे ही यह बालक किसी ऊँचे टीलेपर (ऊँची जगह अथवा रेत के पहाड़ के ऊपर )चढकर बैठ जाता और किसी सिद्ध सन्त की भाँति समाधिस्थ हो जाता, इस प्रवृत्ति को देखकर ही लोगो ने इनका नाम टीलाजी रख दिया ।

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सभी कल्पो की श्रीराम लीला सत्य है ।

पूज्य बाबा श्री रामदास जी (करहवाले महाराज जी) के श्रीमुख से निकली कथा श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज द्वारा सुनाया प्रसंग

एक दिन श्री रघुनाथ जी ने हनुमान जी से कहाँ – हनुमान ! तुम निरंतर हमारी सेवा मे रहते हो और नाम जप भी करते हो परंतु सत्संग और कथा श्रवण करने नही जाते – यह तुम्हारे अंदर थोडी सी कमी है । हनुमान जी बोले – प्रभु ! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु जिन भगवान की कथा है वे तो निरंतर मिले हुए है और आपकी सेवा भी मिली हुई है । आपकी जो प्रत्यक्ष अवतार लीलाएं है – जो चरित्र है वे प्रायःसभी हमने देखे है अतः मै सोचता हूं की कथा श्रवण से क्या लाभ ? श्री रघुनाथ जी बोले – यह सब तप ठीक है परंतु कथा तो श्रवण करनी ही चाहिए । श्री हनुमान जी ने पूछा कि आप ही कृपापूर्वक बताएं की किसके पास जाकर कथा श्रवण करें ?

रघुनाथ जी बोले – नीलगिरीपर्वत पर श्री काग भुशुण्डि जी नित्य कथा कहते है , वे बड़े उच्च कोटी के महात्मा है । शंकर जी, देवी देवता, तीर्थ आदि सभी उनके पास जाकर सतसंग करते है , आप उन्ही के पास जाकर कथा श्रवण करो । हनुमाम जी ने बटुक रूप धारण किया और नीलगिरी पर्वतपर कथा मे पहुँच गए । वहां श्री कागभुशुण्डि जी हनुमान जी की ही कथा कह रहे थे । उन्होंने कहां की जब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को अपनी शक्ति का स्मरण कराया तब हनुमान जी ने विराट शरीर धारण किया , एक पैर तो था महेंद्रगिरि पर्वत पर भारत के दक्षिणी समुद्र तटपर और दूसरा रखा सीधे लंका के सुबेल पर्वत पर । एक ही बार मे समुद्र लांघ गए ।

वहां विभीषण से मिले, अशोके वाटिका मे जाकर सीधे ,बिना चोरी छिपे श्री सीता जी से मीले और वहां जब  उनपर राक्षसों ने प्रहार किया तब उन्होंने सब राक्षसों को मार गिराया । रावण के दरबार मे भी पहुंचे , वहां रावण ने श्री राम जी के बारे मे अपशब्द प्रयोग किये और राक्षसों से कहां कि इस वानर की पूंछ मे आग लगा दो । हनुमान जी ने यह सुनकर जोर से हूंकार किया और उनके मुख से भयंकर अग्नि प्रकट हुए । उस अग्नि ने लंका को जला दिया और हनुमान जी पुनः एक पग रखा तो इस पर रामजी के पास पहुँच गए। यह सुनते ही हनुमान जी ने सोचा की कागभुशुण्डि जी यह कैसी कथा सुना रहे है । मैन तो इस प्रकार न समुद्र लांघा और न इस प्रकर से लंका जली । लगता है कथा व्यास आजकल असत्य कथा कहने लगे है ।

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सुंदर कथा १०६ (श्री भक्तमाल – श्री भगवान नारायण दास जी : पिण्डोरी धाम ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagwan Narayan das ji

बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी के श्रीमुख से जैसा सुना वैसा लिख रहा हु , लेखन में भूल चूक के लिए क्षमा करे ।

श्री रामानंदी संप्रदाय के संतों का पंजाब में एक स्थान है – श्री पिण्डोरी धाम । वहां की परंपरा में एक संत हुए है श्री नारायण दास जी महाराज । श्री गुरु परंपरा इस प्रकार है श्री रामानंदाचार्य – श्री अनंतानंदचार्य – श्री कृष्णदास पयहारी – श्री भगवान दास जी – श्री नारायण दास जी । भजन जप साधना आदि के बल से श्री नारायण दास जी दिन दुखी पीड़ित व्यक्तियों को जो भी कहते वो सत्य हो जाता । धीरे धीरे उनके पास आने वालों की भीड़ बढ़ने लगी । यद्यपि नारायण दास जी किसी सिद्धि का प्रयोग नही करते परंतु भगवान के नाम जप के प्रभाव से जो भी उनके पास आता , उसका दुख दूर हो जाता । जब भीड़ बढ़ने लगी तब उनके गुरुदेव श्री भगवान दास जी ने कहा – अधिक भीड़ होने लगी है , यह सब साधु के लिए अच्छा नही है । इन चमत्कारों से भजन साधन मे बाधा उत्पन्न होती है । अब तुम पूर्ण अंतर्मुख हो जाओ, मौन हो जाओ और एकांत में भजन करो । किसी से न कुछ बोलना, न कुछ सुनना, न कोई इशारा करना, केवल रामनाम का मानसिक जप करो ।( इनका नाम भगवान नारायण दास जी प्रसिद्ध हुआ । )

१. बादशाह जहांगीर द्वारा नारायण दास जी को तीक्ष्ण विष पिलाना और श्रीराम नाम की महिमा प्रकट होना –

नारायण दास जी तत्काल जडवत हो गए और अंतर्मुख होकर साधना करने लगे । किससे कुछ भिक्षा भी नही मांगते , जो किसीने दे दिया वह प्रसाद समझ कर पा लेते । एक दिन नारायण दास जी बैठ कर साधना कर रहे थे , वहीं से जहांगीर बादशाह अपने सैनिकों के साथ जा रहा था । उसने सैनिको से पूछा कि इस हिंदु फकीर को रास्ते से हटाओ । सैनिको ने नारायण दास जी से हटने को कहा परंतु वे न कुछ बोले न वहां से हिले । बादशाह ने कहा – लगता है यह कोई जासूस है , इसको गिरफ्तार करके साथ ले चलो । बादशाह उनको अपने साथ लाहौर ले गया (वर्तमान पाकिस्तान) और उनसे बहुत पूछा कि तुम कौन हो? कहां से आये हो ? किसके लिए काम करते हो ? वहां क्यों बैठे थे ? बहुत देर तक पूछने पर भी वे कुछ बोले नही । बादशाह को बहुत क्रोध आया और उसने वैद्य को बुलाकर कहां – भयंकर तीक्ष्ण हालाहल विष (जहर) पिलाकर इसको मार दो ।

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सुंदर कथा १०५ (श्री भक्तमाल – श्री रुपरसिक देवाचार्य जी : रूपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Roop Rasik ji

१. श्री रूपा जी की संत निष्ठा –

श्री रूपरसिक देवाचार्य जी दक्षिण देश के रहनेवाले और जाति के ब्राह्मण थे । परिवार-पोषण के लिये आप खेती करते थे । सन्तसेवा मे आपकी बडी निष्ठा थी । बहुत कालतक आप के यहाँ सन्तसेवा सुचारु रूप से चलती रही । एक साल वर्षा के अभाव मे (वर्षा कम होने के कारण )खेती मे अन्न को उपज कुछ भी नही हुई । ऐसी स्थिति मे घर मे उपवास की स्थिति आ गयी । बाल-बच्चे भूखे मरने लगे । श्री रूपा जी अन्न की तलाश मे कही जा रहे थे । मार्ग मे सन्त जन मिल गये तो उन्हें अनुनय-विनयकर घर लिवा लाये । ये तो सन्तो के आने से बड़े प्रसन्न हो रहे थे, परंतु इनकी पत्नी घबड़ायी कि इतने सन्तो का सत्कार कैसे होगा ? घर मे तो कुछ अन्न धन ही नही है।

इन्होंने पत्नी से कहा कि- यदि कोई आभूषण हो तो दो, उसे बेचकर संतो की सेवा मे लगा दूँ । इन संतो के आशीर्वाद से ही दुखों की निवृत्ति होगीं । पत्नी के पास केवल एक नथ थी । उसने सोच रखा था कि कुछ दिन में यदि धन की व्यवस्था नही हो पायी तो यह नथ बेच कर अन्न खरीद लेंगे। परंतु वह नथ अब उसने लाकर पति को दे दी । श्री रूपाजी ने उसे ही बेचकर सन्तो की सेवा की । सन्तो के पीछे सबने सीथ-प्रसादी (संतो से विनती कर के मांगा हुआ उनका जूठा अथवा बचा हुआ प्रसाद) पायी । उसी रात को भगवान ने स्वप्न मे कहा कि घरमें अमुक जगह अपार सम्पत्ति गडी पडी है, उसे खोदकर आनन्द पूर्वक सन्त सेवा करो । श्रीरूपाजी ने वह स्थान खोदा तो सचमुच इन्हें बहुत सारा धन प्राप्त हुआ । फिर तो बड़े आनन्द से दिन बीतने लगे ।

२. श्री हरिव्यास देव जी द्वारा गोलोक से पधार कर रूपा जी को मंत्र दीक्षा प्रदान करना

सन्तो के श्रीमुख से श्री हरिव्यास देवाचार्य जी (निम्बार्क सम्प्रदाय के महान संत) की महिमा सुनकर आपने निश्चय किया कि मैं इन्हीं से मन्त्र दीक्षा लूंगा । अपने निश्चय के अनुसार आप अपने गांव से श्रीमथुरा – वृन्दावन के लिये चल पड़े । परंतु संयोग की बात, जब आप मथुरा पहुंचे तो पता चला कि श्री हरिव्यासजी तो नित्य निकुंज मे प्रवेश कर गये (शरीर शांत हो चुका) । इस दु:खद समाचार से आपको बहुत अधिक पीडा हुई । आप मथुरा के विश्रामघाटपर प्राण त्याग का संकल्प कर जा बैठे । अन्त मे निष्ठा की विजय हुई । श्री हरिव्यास देवाचार्य जी ने नित्य धाम (भगवान के धाम) से प्रकट होकर इन्हें दर्शन दिया । मंत्र दीक्षा देकर श्री महावाणी (श्री हरिव्यास देवाचार्य जी द्वारा रचित ग्रंथ) जी के अनुशीलन का आदेश दिया । श्रीगुरुदेव की यह अलौकिक कृपा देखकर आप आनन्द विभोर हो गये । तत्पश्वात् श्रीगुरुके आदेशानुसार आप आजीवन श्री महावाणी जी के मनन चिन्तन में रत रहते हुए श्री श्यामा श्याम की आराधना करते रहे ।

सुंदर कथा १०४ (श्री भक्तमाल – श्री हरेराम बाबा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Hareram Baba ji

श्री जगदगुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज के श्रीमुख से दास ने श्री हरेराम बाबा का चरित्र सुना वह लिख रहा हूँ – संतो की चरण रज मस्तक पर धारण करके और आप सभी भक्तों की चरण वंदना करके, श्री हरेराम बाबा जी का चरित्र लिख रहा हूं। हो सकता है मेरे सुनने में कुछ कम ज्यादा हुआ हो, कोई त्रुटि हो तो क्षमा चाहता हूँ ।

श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्षमण मंदिर में विराजते थे । वहां के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी गिरिराज की परिक्रमा करने नित्य जाते । एक दिन परिक्रमा करते करते आन्योर ग्राम में लुकलुक दाऊजी नामक स्थान के पास कुंज लताओं में उन्हें एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई पड़े । उनके नेत्रों से अविरल जल बह रहा था , उनके सम्पूर्ण शरीर पर ब्रज रज लगी हुई थी और मुख से झाग निकल रहा था । थोड़ी देर पुजारी रामचन्द्रदास जी वही ठहर गए । कुछ देर में उनका शरीर पुनः सामान्य स्तिथि पर आने लगा । वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।

पुजारी जी समझ गए की यह कोई महान सिद्ध संत है । उन्होंने उनका नाम पूछा तो कह दिया की प्रेम से सब उन्हें हरेराम बाबा ही कहते है । पुजारी जी उनको लक्ष्मण मंदिर में , श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले गए । धीरे धीरे दोनों संतो में हरिचर्चा बढ़ने लगी और स्नेह हो गया । श्री हरिराम बाबा भी साथ ही रहने लगे । श्री हरेराम बाबा ने १२ वर्ष केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की । उनके पास ४ लकड़ी के टुकड़े थे जिन्हें वो करताल की तरह उपयोग में लाते थे। उसी को बजा बजा कर महामंत्र का अहर्निश १२ वर्षो तक जप करते करते श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते रहे । जब नींद लगती वही सो जाते, जब नींद खुलती तब पुनः परिक्रमा में लग जाते थे । नित्य वृन्दावन की परिक्रमा और यमुना जल पान , यमुना जी स्नान उनका नियम था । बाद में बाबा श्री सुदामाकुटी मे विराजमान हुए ।

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सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री कीताचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kitacharya ji

श्री रामचन्द्र जी द्वारा श्रीकीताजी के कन्या की रक्षा और संत हृदय कीता जी का राजा को क्षमा करना

श्री कीता जी महाराज का जन्म जंगल मे आखेट(शिकार) करनेवाली जाति मे हुआ था, परंतु पूर्वजन्म के संस्कारों से आपकी चित्तवृत्ति अनिमेषरूप से भगवत्स्वरूप मे लगी रहती थी । आप सर्वदा भगवान् श्री राम की कीर्ति का गान किया करते थे । साथ ही आपकी सन्तसेवा मे बडी प्रीति थी, यहां तक कि जब धन नही होता तब आप सन्तसेवा के लिये भगवद्भक्ति विमुख जनों (अधर्मी और नास्तिक) को जंगल मे लूट भी लिया करते थे और उससे सन्त सेवा करते थे । एक बार की बात है, आपके यहां एक सन्तमण्डली आ गयी, परंतु आपके पास धन की कोई स्थायी व्यवस्था तो थी नही, लूटने को कोई नास्तिक भक्ति विमुख भी मिला नही ,अत: आपने अपनी एक युवती कन्या को ही राजाके यहां गिरवी रख दिया और उस प्राप्त धनसे सन्तसेवा की। आपको आशा थी कि बाद मे धन प्राप्त होनेपर कन्या को छुड़ा लूंगा ।

उधर जब राजा की दृष्टि कन्यापर पडी तब उसके मन मे कुस्तित भाव आ गया । कन्या को भी राजा की बुरी नजर का पता चला तो उसने अपने पिता के घर गुप्त रूप से महल की एक दासी की सहायता से संदेश भेजा । बेचारे कीताजी क्या करते, राजसत्तासे टकराने से समस्या का हल नहीं होना था, अन्त मै उन्होने प्रभु श्री रामचन्द्र जी की शरण ली । उधर कन्या ने भी अपनी लज्जा-रक्षा के लिये प्रभुसे प्रार्थना की । भक्त की लज्जा भगवान् की लज्जा होती है, जिस भक्त ने संतो सेवा के लिये अपनी लज्जा दाँवपर रख दी हो, उसकी लज्जा का रक्षण तो उन परम प्रभु को करना ही होता है और उन्होंने किया भी । राजा जब कन्या की ओर वासना के भाव से आगे बढा तो उसको कन्या के स्थानपर भयंकर सिंहिनी दिखायी दी । अब तो उसके प्राणों पर संकट आ गये और काममद समाप्त हो गया ।

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