सुंदर कथा १०४ (श्री भक्तमाल – श्री हरेराम बाबा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Hareram Baba ji

श्री जगदगुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज के श्रीमुख से दास ने श्री हरेराम बाबा का चरित्र सुना वह लिख रहा हूँ – संतो की चरण रज मस्तक पर धारण करके और आप सभी भक्तों की चरण वंदना करके, श्री हरेराम बाबा जी का चरित्र लिख रहा हूं। हो सकता है मेरे सुनने में कुछ कम ज्यादा हुआ हो, कोई त्रुटि हो तो क्षमा चाहता हूँ ।

श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्षमण मंदिर में विराजते थे । वहां के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी गिरिराज की परिक्रमा करने नित्य जाते । एक दिन परिक्रमा करते करते आन्योर ग्राम में लुकलुक दाऊजी नामक स्थान के पास कुंज लताओं में उन्हें एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई पड़े । उनके नेत्रों से अविरल जल बह रहा था , उनके सम्पूर्ण शरीर पर ब्रज रज लगी हुई थी और मुख से झाग निकल रहा था । थोड़ी देर पुजारी रामचन्द्रदास जी वही ठहर गए । कुछ देर में उनका शरीर पुनः सामान्य स्तिथि पर आने लगा । वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।

पुजारी जी समझ गए की यह कोई महान सिद्ध संत है । उन्होंने उनका नाम पूछा तो कह दिया की प्रेम से सब उन्हें हरेराम बाबा ही कहते है । पुजारी जी उनको लक्ष्मण मंदिर में , श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले गए । धीरे धीरे दोनों संतो में हरिचर्चा बढ़ने लगी और स्नेह हो गया । श्री हरिराम बाबा भी साथ ही रहने लगे । श्री हरेराम बाबा ने १२ वर्ष केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की । उनके पास ४ लकड़ी के टुकड़े थे जिन्हें वो करताल की तरह उपयोग में लाते थे। उसी को बजा बजा कर महामंत्र का अहर्निश १२ वर्षो तक जप करते करते श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते रहे । जब नींद लगती वही सो जाते, जब नींद खुलती तब पुनः परिक्रमा में लग जाते थे । नित्य वृन्दावन की परिक्रमा और यमुना जल पान , यमुना जी स्नान उनका नियम था । बाद में बाबा श्री सुदामाकुटी मे विराजमान हुए ।

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सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री कीताचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kitacharya ji

श्री रामचन्द्र जी द्वारा श्रीकीताजी के कन्या की रक्षा और संत हृदय कीता जी का राजा को क्षमा करना

श्री कीता जी महाराज का जन्म जंगल मे आखेट(शिकार) करनेवाली जाति मे हुआ था, परंतु पूर्वजन्म के संस्कारों से आपकी चित्तवृत्ति अनिमेषरूप से भगवत्स्वरूप मे लगी रहती थी । आप सर्वदा भगवान् श्री राम की कीर्ति का गान किया करते थे । साथ ही आपकी सन्तसेवा मे बडी प्रीति थी, यहां तक कि जब धन नही होता तब आप सन्तसेवा के लिये भगवद्भक्ति विमुख जनों (अधर्मी और नास्तिक) को जंगल मे लूट भी लिया करते थे और उससे सन्त सेवा करते थे । एक बार की बात है, आपके यहां एक सन्तमण्डली आ गयी, परंतु आपके पास धन की कोई स्थायी व्यवस्था तो थी नही, लूटने को कोई नास्तिक भक्ति विमुख भी मिला नही ,अत: आपने अपनी एक युवती कन्या को ही राजाके यहां गिरवी रख दिया और उस प्राप्त धनसे सन्तसेवा की। आपको आशा थी कि बाद मे धन प्राप्त होनेपर कन्या को छुड़ा लूंगा ।

उधर जब राजा की दृष्टि कन्यापर पडी तब उसके मन मे कुस्तित भाव आ गया । कन्या को भी राजा की बुरी नजर का पता चला तो उसने अपने पिता के घर गुप्त रूप से महल की एक दासी की सहायता से संदेश भेजा । बेचारे कीताजी क्या करते, राजसत्तासे टकराने से समस्या का हल नहीं होना था, अन्त मै उन्होने प्रभु श्री रामचन्द्र जी की शरण ली । उधर कन्या ने भी अपनी लज्जा-रक्षा के लिये प्रभुसे प्रार्थना की । भक्त की लज्जा भगवान् की लज्जा होती है, जिस भक्त ने संतो सेवा के लिये अपनी लज्जा दाँवपर रख दी हो, उसकी लज्जा का रक्षण तो उन परम प्रभु को करना ही होता है और उन्होंने किया भी । राजा जब कन्या की ओर वासना के भाव से आगे बढा तो उसको कन्या के स्थानपर भयंकर सिंहिनी दिखायी दी । अब तो उसके प्राणों पर संकट आ गये और काममद समाप्त हो गया ।

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सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री खड्गसेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Khadgasen ji

पूजय बाबा श्री गणेशदास जी की टीका और गीता प्रेस भक्तमाल से प्रस्तुत चरित्र :

जन्म और रचनाएं –

श्री खड्गसेन जी का जन्म इ. स. १६०३ एवं रचनाकाल सं १६२८ माना जाता है । ये ग्वालियर में निवास करते थे और भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । श्री राधागोविन्द के गुणगनो को वर्णन करने मे श्री खड्गसेन जी की वाणी अति उज्वल थी । आपने व्रज गोपि और ग्वालो के माता -पिताओं के नामों का ठीक ठीक निर्णय किया । इसके अतिरिक्त ‘दानकेलिदीपक ‘आदि काव्यों का निर्माण किया, जिनसे यह मालूम होता है कि आपको साहित्य का प्रचुर ज्ञान था और आपकी बुद्धि प्रखर थी । श्री राधा गोपाल जी, उनकी सखियाँ और उनके सखाओं की लीलाओं को लिखने और गाने मे ही आपने अपना समय व्यतीत किया । कायस्थ वंश मे जन्म लेकर आपने उसका उद्धार किया । आपके हदयमें भक्ति दृढ थी, अत: सांसारिक विषयों की ओर कभी नही देखा।

राजा की भक्त भगवान में श्रद्धा प्रकट होना-

श्री खड्गसेन भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । एक दिन इनके यहाँ वृंदावन के एक रसिक सन्त पधारे । उन्होंने इनको श्री हितधर्म (श्री हरिवंश महाप्रभु का सम्प्रदाय सिद्धांत ) का उपदेश दिया । रसिक सन्त से इष्ट और धाम का रहस्य सुनकर इन्होंने श्री राधावल्लभ लाल के चरणों मे अपने को अर्पित कर दिया और वृन्दावन आकर श्रीहिताचार्य महाप्रभु से दीक्षा ले ली । श्री श्रीजी की शरण ग्रहण करते ही गृहस्थी एवं जगत के प्रति इनका दृष्टिकोण एकदम बदल गया । श्रीश्यामा-श्याम का अनुपम रूप-माधुर्य इनके नेत्रों मे झलक उठा एवं दसों दिशाएँ आनंद से पूरित हो गई । ये अधिक से अधिक समय नाम और संतवाणी के गान मे लगाने लगे । इनका यश चारों ओर फैल गया और दूर-दूर से साधु संत आकर इनका सत्संग प्राप्त करने लगे । उनकी सेवा सुश्रुषा मे मुक्त हस्त से धन खर्च करने लगे ।

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सुंदर कथा १०२ (श्री भक्तमाल – श्री कल्याणदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kalyandas ji

श्री कल्याण दास जी सन्त सेबी सदगृहस्थ थे । आप ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए थे और श्री राघवेन्द्र सरकार आपके इष्टदेव थे । एकबार आपके यहां कन्या का विवाह था । जाति बिरादरी के साथ साथ सन्तो को भी आपने आमंत्रित कर रखा था । जब भोजन का समय हुआ तो आपने संतो की पंगत पहले करा दी । इससे अन्य ब्राह्मण लोग बड़े असन्तुष्ट हुए और कहने लगे कि इन साधुओ की जाति-पाँति का कोई पता नही है, आपने इन्हे कैसे पहले खिला दिया ? इसपर आपने सबको समझाते हुए कहा कि संतों का “अच्युत” गोत्र होता है और ये समस्त विश्व का कल्याण करनेवाले होते है । सन्त धरा धामपर साक्षात् भगवान् श्री हरि के प्रतिनिधि होते है, अत: उनके पहले प्रसाद ग्रहण कर लेने से आप सब को असन्तुष्ट नही होना चाहिये ।

इस प्रकार की इनकी सन्त निष्ठा देखकर अन्य ब्राह्मण भी प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हो गये । आपके यहा सन्त-सेवा चल रही है सुनकर और भी बहुत से आमंत्रित सन्त भी आ पहुंचे । यह देखकर बिरादरी के लोग कहने लगे-अभी आपके घराती और बराती बाकी ही है, अगर आप इन आमंत्रित सन्तो को भोजन करा देंगे तो उनके लिये क्या बचेगा ? इसपर आपने कहा-चिन्ता करने की बात नहीं है, संतो को  खिलाने से कम नही पड़ता, सारी पूर्ति रामजी करेंगे । यह कहकर आपने सब संतो को भोजन करा दिया, फिर जब घरातियों-बारातियों को खिलाने की बात आयी तो आपने पंगत मे सब को बैठवा दिया और परोसने वालों से परोसने को कहा । प्रभुकृपा से सभी ने पूर्ण तृप्ति का अनुभव किया और भोजन मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी । रसोइया कहने लगे इतना भोजन तो हमने बनाया ही नही था, फिर भी समाप्त नही हुआ । सन्त-कृपा का ऐसा चमत्कार देखकर सब लोग धन्यधन्य कह उठे ।

श्री कल्याणदास जी संतो और वैष्णव स्वरूप में भी बड़ी श्रद्धा रखते थे ।एक बार की बात है , श्री कल्याण जी अपने भाई के साथ उत्सव-दर्शनार्थ श्रीधाम वृन्दावन को जा रहे थे । मार्ग में आपने देखा कि एक दुष्ट धनी सरावगी एक दिन वैष्णव को कुछ पैसों के लिए डांट-फटकार लगा रहा है , दुख दे रहा है ।यह देखकर आपको बहुत दुख हुआ । आपने न केवल उन वैष्णव महाभाग का सारा कर्जा उतारकर उस दुष्ट सरावगी से मुक्ति दिला दी, बल्कि उन्हें पर्याप्त धन- धान्य देकर सुखी भी कर दिया। ऐसे उदार मन थे श्री कल्याणदास जी ।

सुंदर कथा १०१ (श्री भक्तमाल – श्री महर्षि वशिष्ठ जी ) Sri Bhaktamal – Sri Vashisht ji

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ विश्वस्त्रष्टा ब्रह्माजी के मानसपुत्र है । सृष्टि के प्रारम्भ में ही ब्रह्मा के प्राणो से उत्पन्न उन प्रारम्भिक दस मानसपुत्रो मे से वे एक हैं, जिनमें से देवर्षि नारदके अतिरिक्त शेष नौ प्रजापति हुए । 

१. मरीचि, २. अत्रि, ३. अंगिरा ४. पुलस्त्य ५. पुलह ६. क्रतु ७. भृगु ८. वसिष्ठ ९. दक्ष और १०. नारद  – ये ब्रह्मा के दस मानसपुत्र है । 

इनसे पहले- ब्रह्माजी के मनसे – संकल्प से कुमारचतुष्टय १. सनक २. सनन्दन ३. सनातन और ४. सनत्कुमार उत्पन्न हुए थे परंतु इन चारोने प्रजा सृष्टि अस्वीकार कर दी । सदा पांच वर्षकी अवस्थावाले बालक ही रहते हैं । इन चारोकी अस्वीकृति के कारण ब्रह्मा जी को क्रोध आया तो उनके भ्रूमध्य से भगवान् नीललोहित रूद्र (शिव ) उत्पन्न हुए । इस प्रकार सनकादि कुमार तथा शिव वसिष्ठजी के अग्रज हैं । 

भगवान् ब्रह्माने अपने नौ पुत्रो को प्रजापति नियुक्त किया । इन लोगो को प्रजाकी सृष्टि, संवर्घन तथा संरक्षण का दायित्व प्राप्त हुआ । केवल नारदजी नैष्ठिक ब्रह्मचारी बने रहे । इन नौ प्रजापतियो में से प्रथम मरीचि के पुत्र हुए कर्दम जी । कर्दम ने स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूतिका पाणिग्रहण किया । कर्दम जी की नौ पुत्रियां हुई और पुत्रके रूपमें भगवान् कपिल ने उनके यहां अवतार ग्रहण किया । कर्दम ने अपनी पुत्रियो का विवाह ब्रह्माजी के मानसपुत्र प्रजापतियो से किया । वसिष्ठजी की पत्नी अरुँधती जी महर्षि कर्दम की कन्या हैं ।

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सुंदर कथा १०० (श्री भक्तमाल – श्री नरवाहन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Narvahan ji

बाबा श्री गणेशदास भक्तमाली जी की भक्तमाल टीका , परमभागवत श्री हितदास जी महाराज एवं श्री हित अम्बरीष जी के भाव पर आधारित चरित्र –

भगवान श्री कृष्ण के वंशी के अवतार श्री हितहरिवंश महाप्रभु जी को देवबंद मे स्वयं श्री राधाजी से निज मंत्र और उपासना पद्धति की प्राप्ति हुई । श्री राधा जी ने एक दिन महाप्रभु जी को स्वप्न मे वृन्दावन वास कीआज्ञा प्रदान की । उस समय श्री महाप्रभु जी की आयु ३२ वर्ष की थी । अपने पुत्रों और पत्नी से चलने के लिए पूछा परंतु उनकी रुचि किंचित संसार मे देखी । श्री महाप्रभु जी अकेले ही श्री वृन्दावन की ओर भजन करने के हेतु से चलने लगे । कुछ बाल्यकाल के संगी मित्र थे, उन्होंने कहा कि हमारी भी साथ चलने की इच्छा है – हम आपके बिना नही राह सकते । श्री महाप्रभु जी ने उनको भी साथ ले लिया । रास्ते मे चलते चलते सहारनपुर के निकट चिडथावल नामक एक गांव में विश्राम किया । स्वप्न में श्री राधारानी ने महाप्रभु जी से कहा – यहाँ आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण देवता विराजते है ।

उनके पास श्री राधावल्लभ लाल जी का बड़ा सुंदर श्रीविग्रह है – उस विग्रह को लेकर आपको श्री वृन्दावन पधारना है, परंतु उन ब्राह्मणदेव का प्रण है कि यह श्रीविग्रह वे उसी को प्रदान करेंगे जो उनकी २ कन्याओं से विवाह करेगा । उनकी कन्याओं से विवाह करने की आज्ञा श्री राधा रानी ने महाप्रभु जी को प्रदान की। महाप्रभु जी संसार छोड कर चले थे भजन करने परंतु श्री राधा जी ने विवाह करने की आज्ञा दी । महाप्रभु जी स्वामिनी जी की आज्ञा का कोई विरोध नही किया – वे सीधे आत्मदेव ब्राह्मण का घर ढूंढकर वहां पहुंचे । श्री राधारानी ने आत्मदेव ब्राह्मण को भी स्वप्न मे उनकी कन्याओं का विवाह श्री महाप्रभु जी से सम्पन्न करा देने की आज्ञा दी । आत्मदेव ब्राह्मण के पास यह श्री राधा वल्लभ जी का विग्रह कहा से आया इसपर संतो ने लिखा है –

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सुंदर कथा ९९ (श्री भक्तमाल – श्री पीपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Peepa ji

पूज्य श्री नारायणदास भक्तमाली मामाजी, श्री राजेंद्रदासाचार्य जी , बाबा गणेशदास जी द्वारा श्री रामानंद पुस्तकालय की भक्तमाल और गीता प्रेस भक्तमाल से श्री पीपानंदचार्य जी का चरित्र :

मनु: पीपाभिधो जात उत्तराफाल्गुनी युजी ।
पूर्णिमायां ध्रुवे चैत्र्यां धनवारे बुधस्य च ।।

श्री मनु जी महाराज कलियुग मे धर्मप्रचार के लिये राजस्थान प्रान्त के गांगरोनगढ़ के राजघराने मे वि.सं १४१६ की चैत्रीय पूर्णिमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, ध्रुवसंज्ञक योग मे बुधवार के दिन श्री पीपा जी के रूप मे अवतरित हुए ।

भक्तवर श्री पीपा जी पहले भवानी देवी के भक्त थे । मुक्ति मांगने के लिये आपने देवी का ध्यान किया, देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर सत्य बात कही कि -मुक्ति देने की शक्ति मुझमे नहीं है, वह शक्ति तो भगवान मे है । उनकी शरण मे जाना ही सुदृढ साधन है । देवीजी केउपदेशानुसार आचार्य श्रीरामानन्द जी के चरणकमलों का आश्रय पाकर श्रीपीपाजी अति भक्तिकी अन्तिम सीमा हुए । गुरुकृपा एवं अतिभक्ति के प्रभाव से आपमे असंख्य अमूल्य सदूगुण थे, उन्हें सन्तजन सदा गाते रहते है । भक्त ,भगवन्त और गुरुदेव की आपने ऐसी आराधना की कि उसका स्पर्श करके अर्थात् देख-सुन और समझ करके सम्पूर्ण वैष्णवो की आराधना-प्रणाली अत्यन्त सरस हो गयी । आपने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण संसार का कल्याण किया । इसका प्रमाण यह है कि आपने परम हिंसक सिंह को उपदेश देकर अहिंसक और विनीत बना दिया ।

१. श्री स्वामी रामानंदाचार्य का शिष्य बनने की कथा :

गागरौनगढ़ नामक एक विशाल किला एवं नगर है, वहाँ पीपा नामक एक राजा हुए । वे देवी के बड़े भक्त थे । एक बार उस नगर मे साधुओं की जमात आयी । राजाने जमात का स्वागत करके कहा – देवीजी को चालीस मन अन्न का भोग लगता है, सभी लोग प्रसाद लेते है, आपलोग भी देवीजी का प्रसाद ग्रहण कीजिये । साधुओं ने कहा-हमारे साथ श्री ठाकुर जी हैं, हम उन्ही को भोग लगाकर प्रसाद लेते है, दूसरे देवी – देवताओं का नही । तब राजाने उन्हें सीधा-सामान दिया । साधुओं ने रसोई करके भगवान का भोग लगाया और मन ही मन प्रार्थना की -हे प्रभो ! इस राजा की बुद्धि को बदल दीजिये, इसे अपना भक्त बना लीजिये ।रात को जब राजा महल में सोया तो उसने एक बडा भयानक स्वप्न देखा कि एक विकराल देहधारी प्रेत ने उसे पटक दिया है और उस कारण राजा भयभीत होकर रोने लगा । जागते ही राजाने स्वप्न की घटनापर विचार किया, तब उसे वैराग्य हो गया । अब राजा के सोचने -विचारने की रीति दूसरी हो गयी । उसे भगवान की भक्ति विशेष प्रिय लगने लगी ।

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सुंदर कथा ९८ (श्री भक्तमाल – श्री सरस्वती जी ) Sri Bhaktamal – Sri Saraswati ji

श्रीपाद देवादास जी महाराज और अयोध्या के महात्म्या श्री सीतारामशरण जी के कृपाप्रसाद से सुनी सत्य घटना –

श्री महाराज जी ने इस चरित्र को कई बार सुनाया –
अयोध्या के बहुत निकट ही पौराणिक नदी कुटिला है – जिसे आज टेढ़ी कहते है, उसके तट के निकट ही एक भक्त परिवार रहता था । उनके घर एक सरस्वती नाम की बालिका थी । वे लोग नित्य श्री कनक बिहारिणी बिहारी जी का दर्शन करने अयोध्या आते थे । सरस्वती जी का कोई सगा भाई नही था , केवल एक मौसेरा भाई ही था । वह जब भी श्री रधुनाथ जी का दर्शन करने आती, उसमे मन मे यही भाव आता की सरकार मेरे अपने भाई ही है ।

उसकी आयु उस समय मात्र दो वर्ष की थी । रक्षाबंधन से कुछ समय पूर्व उसने सरकार से कहा की मै आपको राखी बांधने आऊंगी । उसने सुंदर राखी बनाई और रक्षाबंधन पूर्णिमा पर मंदिर लेकर गयी । पुजारी जी से कहा कि हमने भैया के लिए राखी लायी है । पुजारी जी ने छोटी सी सरस्वती को गोद मे उठा लिया और उससे कहा कि मै तुम्हे राखी सहित सरकार को स्पर्श कर देता हूं और राखी मै बांध दूंगा। पुजारी जी ने राखी बांध दी और उसको प्रसाद दिया । अब हर वर्ष राखी बांधने का उसका नियम बन गया । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९७ (श्री भक्तमाल – श्री भगवंतमुदित जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagvant mudit ji

श्री माधवदास जी के सुपुत्र श्री भगवन्तमुदित जी ने रसिक भक्तों से समर्थित तुलसीकंठी और तिलक धारणकर अपने इष्टदेव श्री राधाकृष्ण की नित्य नियम से सेवा की तथा उदार भगवान के परमोदार सुयश का अपनी वाणी से वर्णन करके उसके रस का आस्वादन किया । श्री कुंजबिहारिणी कुंजबिहारी की नित्य निकुंज लीला इनके हृदय मे सर्वदा प्रकाशित रहती थी । दम्पति श्री राधाकृष्ण का जो पारस्परिक सहज स्नेह और प्रीतिकी जो अन्तिम सीमा है, उससे आपका हृदय प्रकाशित था । अनन्य भाव से सेवा करने की जो रसमयी रीति है, उसीको आपने उत्तम से उत्तम मार्ग मानकर अपनाया, उसीपर चले । भक्ति से भिन्न लौकिक -वैदिक -विधि- निषेधों का सहारा छोड़कर आपका हृदय विशेषकर श्री राधाकृष्ण के परमानुराग मे सराबोर रहता था।

श्री भगवन्तमुदित जी परमरसिक सन्त थे । आप आगरा के सूबेदार नबाब शुजाउल्युल्क के दीवान थे । कोई भी ब्राह्मण, गोसाई, साधु या गृहस्थ ब्रजवासी जब आपके यहाँ पहुँच जाता तो आप अन्न, धन और वस्त्र आदि देकर उसे प्रसन्न करते थे; क्योंकि व्रजबासियों के प्रेम मे इनकी बुद्धि रम गयी थी । आपके गुरुदेव का नाम श्री हरिदासजी था । ये श्रीवृन्दावन के ठाकुर श्री गोविन्ददेव जी मन्दिर वे अधिकारी थे । इन्होंने व्रजवासियों के मुख से श्री भगवन्तमुदित जी की बडी प्रशंसा सुनी तो इनके मन मे आया कि हम भी आगरा जाकर (शिष्य) भक्त की भक्ति देखें । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९६ (श्री भक्तमाल – श्री कान्हार दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kanhardas ji

श्री कान्हरदास जी ने सन्तो की कृपा से यह महान् लाभ प्राप्त किया कि अपने हृदय मे भगवान को स्थापित किया । इन्होंने गुरुदेव की शरण मे आकर भक्तिमार्ग को सच्चा, सात्विक, सरल और श्रेष्ठ जाना । आपने संसार धर्म को त्यागकर क्या सत्य है और क्या झूठ है, इस बात को पहचाना और सत् ग्रहण तथा असत् का त्याग किया । भगवद्धर्म को स्वीकार किया । आप संसार से उसी प्रकार अलग रहे, जैसै पेड की शाखा से चन्द्रभा अलग और दूर रहता है, लेकिन दिखाने के लिये पेड़ के पास मे बताया जाता है । आप संसार के सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे । अनेक सद्गुणों से युक्त थे । अत: आप महान् थे । आपने अपने मुख से सदा सज्जनों – भक्तों क्री प्रशंसा की । मिथ्या, कटु और परनिन्दारूप कुवचन आपने कभी नहीं कहे ।

भक्तमाल में श्री कान्हरदास जी के विषय मे विवरण इस प्रकार है :

श्री कान्हरदास जी समदर्शी सन्त थे । किसी सन्त से कोई भूल भी हो जाय तो श्री कान्हरदास जी कटु शब्दों का प्रयोग नही करते थे । आप सन्तसेवी तो थे ही, अत: सन्तो का आवागमन आपके यहाँ बना ही रहता था । एक बार दो सन्त आये, वे कई दिनोंसे भूखे थे । जितना प्रसाद था वह आपने उन संतो को दे दिया । परंतु उसे पाकर भी तृप्त न हुए अत: उन्होने कान्हर दास जी के घरसे एक धातुपात्र(बर्तन) ले जाकर हलवाई के हाथ बेच दिया और दोनों ने भरपेट लड्डू-पेडा खाया । यह जानकर आपका शिष्य सन्तो को फटकारने लगा । उस अज्ञानी शिष्य को आपने समझाया, कि सन्त बर्तन बेचकर खा गये तो अपना ही खाये । हम संतो के दास है । यह सब सामग्री रामजी की है और ये संत भी रामजी के ही है । यह जो चाहे वह करने में समर्थ है ।संत भगवान से भी बढ़कर होते है। पढना जारी रखे