सहस्त्रमुख रावण की कथा । Sahastramukh Raavan

​लंका विज़यके बाद श्रीरामका राज्याभिषेक हो गया था । इस अवसरपर इनके अभिनन्दनके लिये सभी ऋषि मुनि  राजदरबार में, उपस्थित हए । उन्होंने एक स्वर से कहा – राबणके मारे जानेसे अब विश्वमे शान्ति स्थापित हो गयी है । सब लोग सुख और शान्ति की श्वास ले रहे है । उस समय मुनियोद्वारा श्रीरामके पराक्रम और रावणके विनाश की बात सुनकर देवी सीताको हँसी आ गयी । इस समयमे उनकी हंसी देखकर सबका ध्यान उनकी तरफ गया और मुनियोंने देवी सीतासे हसीका कारण पूछा ।

इसपर सीताने रामजी तथा मुनियोंकी आज्ञा लेकर एक अद्भुत वृत्तान्त बतलाते हुए कहा :
जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता महाराज जनकने अपने घरमे एक ब्राह्मणक्रो आदरपूर्वक चातुर्मास्य व्रत करवाया। मैं भलीभांति ब्राह्मण देवताकी सेवा करती थी । अवकाशके समय ब्राह्मण देवता तरह तरहकी कथा मुझे सुनाया करते थे । एक दिन उन्होंने सहस्त्रमुख रावणका वृत्तान्त सुनाया, जो इस प्रकार है-

विश्रवा मुनिकी पत्नीका नाम कैकसी था । कैकसी ने दो पुत्रों को जन्म दिया । बड़ेका नाम सहस्त्रमुख रावण था और छोटेका नाम दशमुख रावण । दशमुख रावण ब्रह्मा के वरदानसे तीनों लोको को जीतकर लंकामे निवास करता है और बड़ा पुत्र पुष्करद्विपमें अपने नाना सुमालिके पास रहता है । 

वह बडा बलवान है। मेरु को सरसोंके समान, समुद्रको गायके खुर और तीनों लोकों को तृणके समान समझता है । सबको सताना उसका काम है । जब सारा संसार उससे त्रस्त हो गया, तब ब्रह्माने उसे “वत्स ! पुत्र !  आदि प्यारभरे सम्बोधनोंसे प्रसन्न किया और किसी तरह इस कुकृत्यसे रोका । उसका उत्पात तो कम हो गया, परंतु समूल गया नहीं । 

उस सहस्त्र मुख रावणकी कथा सुनाकर वे ब्राह्मण यथासमय वापस लौट गये किंतु आज भी वह घटना वैसी ही याद है । आज आपलोग दशमुरव रावणके मारे जाने से ही सर्वत्र सुख शांति की बात कैसे कर रहे हैं जबकि पुष्करद्विपमें सहस्त्रमुख रावणका अत्याचार अभी भी कम नहीं हुआ है, यही सुनकर मुझे हंसी आ गयी, इसके लिये आप सभी मुझे क्षमा करे । 

मेरे स्वामीने दशमुख रावणका विनाशकर महान् पराक्रम का परिचय अवश्य दिया है; किंतु जबतक वह सहस्त्रमुख रावण नहीं मारा जाता, जगत्में पुर्ण आनन्द कैसेहो सकता है ? इस हितकारिणी और प्रेरणादायक वाणी को सुनकर श्रीरामने उसी क्षण पुष्पक विमानका स्मरण किया और इस  शुभकार्य को शीघ्र सम्पन्न करना चाहा । वानरराज़ सुग्रीव और राक्षस राज विभीषणको दलबलके साथ बुला लिया गया । 

इसके बाद बडी सेनाके साथ श्रीरामने पुष्पक विमानसे पुष्कर क्षेत्रके लिये प्रस्थान किया । देवी सीता, सभी भाई और मंत्रीगण साथ थे । पुष्पककी तो अबाध गति थी, वह शीघ्र पुष्कर पहुंच गया । जब सहस्त्रमुख रावणने सुना कि उससे युद्ध करनेके लिये कोई आया है तो उसके गर्व को बहुत ठेस पहुंची । वह तुरत संग्राममें आ पहुचा । वहाँ मनुष्यों, वानरों और भालुओं की लंबी कतार देखकर वह हँस पड़। 

उसने सोचा, इन क्षुद्र ज़न्तुओ से क्या लड़ना है । क्यों न इनको इनके देश भेज दिया जाय  ऐसा सोचकर उसने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया । जैसे  केई बलवान् व्यक्ति बच्चों को गलबहियाँ देकर बाहर निकाल देता है, वैसे वायव्यास्त्रने सभी प्राणियों को बाहर निकाल दिया । केवल चारों भाई, सीताजी, हनुमान, नल, मील,जाम्बवान, विभीषण पर इसका प्रभाव नहीं पड़। अपनी सेना की यह स्थिति देखकर श्रीराम सहस्त्रमुखपर टूट पड़े । 

श्री राम के अमोघ बाणोंसे राक्षस तिल-तिल कटने लगे । यह देख सहस्त्रमुख रावण क्षुब्ध हो गया । वह गरजकर बोला – आज मैं अकेले ही सारे संसारको मनुष्यों और देबताओं से रहित कर दूँगा । यह कहकर वह जोर शोर से रामपर बाण चलने लगा । श्रीरामने भी इसका जबरदस्त जवाब दिया है धीरे धीरे युद्धने लोमहर्षक रूप धारण कर लिया।

सहस्त्रमुख ने पन्नगास्त्र का प्रयोग किया । फलत: विषधर सर्पो से समस्त दिशाएँ एबं विदिशा व्याप्त हो गयी । रामने सौपर्णेयास्त्रसे उसे काट दिया । इसके बाद श्रीरामने उस बाण का संधान किया जिससे इन्होंने रावण को मारा था, किंतु सहस्त्रमुख राबणने इसे हाथसे पकड़कर तोड़ दिया और एक बाण मारकर श्रीराम को मूर्छित कर दिया ।

श्री राम को मूर्छित देखकर सहस्त्रमुख अतीव प्रसत्र हुआ । यह दो हजार हाथोको उठाकर नाचने लगा । सती स्वरूपिणी सीता यह सब सह न सकीं । उन्होंने महाकाली का विकराल रूप धारण का लिया और एक ही निमेषमे सहस्त्रमुख रावणका सिर काट लिया । सेना को तहस नहस कर दिया । यह सब क्षणभरमे हो गया । सहस्त्रमुख रावण ससैन्य मारा गया, किंतु महाकाली का  क्रोध शान्त नहीं हुआ ।

उनके रोम-रोमसे सहस्त्रों मातृका: उत्पन्न हो गयी, जो घोर रूप धारण किये हुए थीं । महाकालीके रोषसे सारा ब्रह्माण्ड भयभीत हो गया । पृथिवी काँपने लगी । देवता भयभीत हो गये । तब ब्रह्मादि देवगण उनके क्रोधक्रो शान्त करनेके लिये उनकी स्तुति करने लगे । उनकी स्तुतियों से किसी तरह देवी का क्रोध शान्त हुआ । श्रीराम भी चैतन्यता को प्राप्त हो गये । देवीने अपना विराठ रूप दिखाकर सभीको आश्वस्त कर दिया । सभीने मिलकर उस आदिशक्ति की आराधना की । 

स्वयं भगवान् श्री राम ने सहस्त्रनाम स्तोत्रसे देवीकी आराधना की।

भगवान् श्री राम जानकी के श्री चरणों के चिन्ह । Symbols on Lotus feet of Sri Sita Ram

भगवान् के चरणारविन्द की महिमा उनके चिन्हों की
कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है । ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक हैं रक्षक है । भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है –

सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका ।
चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका ।।

भगवान् श्रीराम के चरण चिन्हों का वर्णन महारामायण के ४८ वें अध्यायमें महर्षि अगस्त्यकृत श्री रघुनाथचरण चिन्ह स्तोत्र मे आचार्य यामुनकृत आलवन्दार स्तोंत्र में, नाभाजी कृत भक्तमाल में, श्री गोस्वामी जी के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में , गीतावली के उत्तरकाण्ड के पंद्रहवें पद में और रामचरण चिन्हावली नामक पुस्तक में मिलता है ।

महारामायण में श्री राम के चरणचिन्हों की संख्या ४८ बतायी गयी है – २४ चिह्न दक्षिणपद में और २४ चिह्न वामपद मे है ।

**जो चिन्ह श्रीराम के दक्षिणपद में है वे भगवती सीता के वमपद में है और जो उनके वामपदमें हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिणपद में है ।

श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं – पढना जारी रखे

तीन बार ‘राम’ नाम लेने का परामर्श देनेपर वामदेव को महर्षि वशिष्ठ का शाप

एक बार महाराज दशरथ राम आदी के साथ गंगा स्नान के लिये जा रहे थे । मार्गमें देवर्षि नारदजी से उनकी भेंट हो गयी । महाराज दशरथ आदि सेभीने देवर्षि को प्रणाम किया ।
तदनन्तर नारदजी ने उनसे कहा – महाराज ! अपने पुत्रों तथा सेना आदि के साथ आप कहां जा रहे हैं ? इसपर बड़े ही विनम्रभाव से राजा दशरथ ने बताया- भगवन ! हम सभी गंगा स्नान की अभिलाषा से जा रहे है ।

इसपर मुनि ने उनसे कहा -महाराज ! निस्संदेह आप बड़े अज्ञानी प्रतीत होते है क्योकि पतितपावनी भगवती गंगा जिनके चरणकमलों से प्रकट हुई है, वे ही नारायण श्री राम आपके पुत्ररूप में अवतरित होकर आपके साथमें रह रहे है उनके चरणोंकी सेवा और उनका दर्शन ही दान, पुण्य और गंगा स्नान है, फिर हे राजन् ! आप उनकी सेवा न करके अन्यत्र कहाँ जा रहे है । पुत्र भावसे अपने भगवान् का ही दर्शन करे । श्री राम के मुखकमल के दर्शन के बाद कौन कर्म करना शेष बच जाता है ?

पतितपावनी गंगा अवनीमण्डले ।
सेइ गंगा जन्मिलेन यार पदतले ।।
सेइ दान सेइ पुण्य सेइ गंगास्नान ।
पुत्रभावे देख तुमि प्रभु भगवान् ।।
(मानस ,बालकाण्ड)

नारदजी के कहने पर महाराज दशरथ ने वापस घर लौटने का निश्चय किया किंतु भगवान् श्रीराम ने गंगा जी की महिमा का प्रतिपादन करके गंगा स्नान के लिए ही पिताजी को सलाह दी । तदनुसार महाराज दशरथ पुन: गंगा स्नान के लिये आगे बढे । मार्ग में तीन करोड सैनिकों के द्वारा गुहराज ने उनका मार्ग रोक लिया । गुहराज़ ने कहा – मेरे मार्ग को छोड़कर यात्रा करे , यदि इसी मार्ग से यात्रा करना हो तो आप अपने पुत्र का मुझे दर्शन करायें । इसपर दशरथ की सेनाका गुह की सेना के साथ घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो गया ।

गुह बंदी बना लिये गये । कौतुकी भगवान् श्री राम ज्यों ही युद्ध देखने की इच्छा से गुहराज के सामने पड़े, गुहने दण्डवत प्रणामकर हाथ जोड़ प्रणाम् किया । प्रभु के पूछने पर उसने बताया – प्रभो ! मेरे पूर्वजन्म की कथा आप सुनें – मैं पूर्व जन्म में महर्षि वसिष्ट का पुत्र वामदेव था ।

एक बार राजा दशरथ अन्धक मुनि के पुत्र की हत्या का प्रायश्चित्त पूछने हमारे आश्रम मे पिता वसिष्ठ के पास आये, पर उस समय मेरे पिताजी आश्रम में नहीं थे । तब महाराज दशरथ ने बडे ही कातर स्वर में हत्या का प्रायश्चित्त बताने के लिये मुझसे प्रार्थना की। उस समय मैंने राम नाम के प्रताप को समझते हुए तीन बार ‘राम राम राम’ इस प्रकार जपने से हत्याका प्रायश्चित्त हो जायगा परामर्श राजाको बतलाया था । तब प्रसन्न होकर राजा वापस चले गये ।

पिताजी के आश्रम में आने पर मैने सारी घटना उन्हें बतला दी। मैंने सोचा था कि आज पिताजी बड़े प्रसन्न होंगे, किंतु परिणाम बिलकुल ही विपरीत हुआ । पिताजी क्रुद्ध होते हुए बोले – वत्स ! तुमने यह क्या किया, लगता है तुम श्री राम नामकी महिमा को ठीकसे जानते नहीं हो, यदि जानते होते तो ऐसा नहीं कहते, क्योकि राम इस नामका केवल एक बार नाम लेनेमात्र से कोई पातक उप-पातकों तथा ब्रह्महत्यादि महापातको से भी मुक्ति हो जाती है फिर तीन बार राम नाम जपने का तुमने राजाको उपदेश क्यों दिया ?

जाओ, तुम नीच योनि में जन्म ग्रहण करोगे और जब राजा दशरथ के घरमे साक्षात् नारायण श्री राम अवतीर्ण होंगे तब उन के दर्शने से तुम्हारी मुक्ति होगी ।

प्रभो ! आज मैं करुणासागर पक्तिपावन आपका दर्शन पाकर कृतार्थ हुआ । इतना कहकर गुहरांज प्रेम विह्नल हो रोने लगा । तब दयस्थागर श्रीराम ने उसे बन्धन मुक्त किया और अग्नि को साक्षी मानकर उससे मैत्री कर ली । भगवान् के मात्र एक नाम का प्रताप कितना है यह इस प्रसंग से ज्ञात होता है ।

श्री रामचंद्र भगवान् की आदर्श दिनचर्या और आदर्श रामराज्य

भगवान् श्रीराम अनन्त क्रोटि ब्रह्माण्ड नायक परम पिता परमेश्वर के अवतार थे और उन्होंने धर्मकी मर्यादा रखने के लिये भारत भूमि अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में अवतार लिया था । उस समय राक्षसो का नग्न बीभत्स रूप इतना प्रचण्ड हो गया कि ऋषि मुनियो एवं गौ ब्राह्मणों का जीवन खतरे में पड़ गया था । जहां जहां कोई शास्त्र विहित यज्ञ कर्म आदि किये जाते थे, राक्षस गण उन्हें विध्वंस करने के लिये सदा तत्पर रहते थे ।

राक्षसों का राजा रावण भारत भूमिपर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिये चारों ओर जाल फैला रहा था ,ऐसी स्थिति में देवताओ के आग्रह एवं अनुनय विनय के फल स्वरूप भगवान् स्वयं अपने अंशोंसहित राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूपमें अवतीर्ण हुए ।

भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र का विवरण हम भिन्न भिन्न रामायणों में पाते हैं जिनमें वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण तथा पूज्य श्री गोस्वामी जी का रामचरितमानस प्रमुख है ।

साधारण बालकों की तरह बालकपन में अपने छोटे  भाइयों एवं बाल सखाओ के साथ भगवान् श्रीराम सरयूके तटपर कंदुक क्रीडा एवं अन्य खेलो में ऐसे मस्त हो जाते थे कि उन्हें अपने खाने पीने की भी सुध नहीं रहती थी ।

प्रजापालन के लिये भगवान् विशेष सचेष्ट एवं सतर्क रहते है । राज़सभा में सनकादि तथा नारद अष्ट ऋषि प्रतिदिन जाते है और उनसे वेद पुराण तथा इतिहास की चर्चा करते है । प्रजा को मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका यह पहला आदेश था कि यदि भूल से मैं कुछ अनीतिपूर्ण वचन कहूँ जो शासन विरुद्ध, न्याय विरुद्ध या द्वेषयुक्त हो तो भय छोड़कर मुझे यह कहकर तुरंत रोक देना कि – राम ! तुम्हारा यह कार्य अनुचित है ।

भगवान् श्रीराम जी की दिनचर्या का आनन्दरामायण के राज्यकाण्ड के १९ वें सर्ग में बड़े विस्तार से वर्णन है । श्रीरामदास के द्वारा महर्षि वाल्मीकि जी अपने शिष्य को उपदेश करते हैं –

श्रृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञ: शुभावहा ।
दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ।।
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दन: ।
नववाद्यनिनादांश्च सुखं शुश्राव सीतया ।।
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दृशरथं सुरान् ।
पुण्यतीर्थानि  मातृश्च देवतायतनानि च ।।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १-३ ) 
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क्या श्रीराम ने बाली को अधर्म से मारा था? नहीं । 

पूज्य श्री अंजना नंदन शरण , श्री शत्रुघ्न दास बाबा सरकार , श्रीसंप्रदायाचार्य श्री ब्रह्मचारी जी का कृपाप्रसाद , संतो के स्वयं के भाव एवं अवध के महान् संतो के प्रवचनों / लेखो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।

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संत ब्राह्मण गौ माताओ की कृपा से कुछ पुराने संत महात्माओ के रामायण पर लिखे विचार पढ़ने का अवसर दास को मिला। उसमे कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण भाग जो दास ने पढ़ा वही आगे लिखने जा रहा हूं।

बाली ने श्री रामचंद्र जी पर आरोप लगाये थे की प्रभु ने उसे छिप कर अधर्म से मारा है। प्रायः बहुत से लोग बिना सोचे समझे भगवान् के इस चरित्र को दोषयुक्त दृष्टि से देखते है और कुछ तो कह देते है की प्रभु ने बाली का वध अधर्म से किया । निचे कुछ पूज्य संत महात्माओ के आशीर्वचन दिए गए है जिस से प्रभु की यह लीला संतो किं कृपा से हम मंदबुद्धियो को कुछ समझ सके।

बाली वध के कारण –
१ .श्रीरामजी सत्य-प्रतिज्ञ हैं । यह त्रैलोक्य जानता है कि श्रीराम दो वचन कभी नहीं कहते, जो वचन उनके मुखसे एक बर निकला, वह कदापि असत्य नहीं किया जा सकता। वे मित्र सुग्रीव का दु:ख सुनकर प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि – सुनु सुग्रीव मारिहौं एकहि बान। ध्यान देने की बात है की व्याध भय से नहीं छिपता। मुख्य कारण यह होता है कि कहीं शिकार उसे देखकर हाथसे जाता न रहे । यहॉ विटप ओट(वृक्ष की ओट) से इसलिये मारा कि यदि कहीं बाली हमको देखकर भाग गया अथवा छिप गया, अथवा शरणमें आ पडा तो प्रतिज्ञा भंग हो जायगी (एक ही बाणसे मारने की प्रतिज्ञा है) । 

सुग्रीव को स्त्री और राज्य केसे मिलेगा ?पुनः यदि सामने आकर खड़े होते तो सम्भव था कि बाली सेना आदी को सहायता के लिये लाता । यह आपत्ति आती कि मारना तो एक बाली को ही था, पर उसके साथ मारी जाती सारी सेना भी ।यदि सामने आके लड़ते तो सुग्रीव की वानर सेना के वानर भी मारे जाते अतः सुग्रीव को उजड़ी हुई नागरी मिलती। प्रभु भक्त को उजड़ी नागरी कैसे देते? स्मरण रहे कि यहाँ छिपने में कपट का लेश भी नहीं है, यहाँ युद्ध नहीं किया गया है वरन दंड दिया गया है। राजा यदि यथार्थ दंड न दे,तो राजा उस दोष का भागी होता है।

२ -बाली चाहता था कि मेरा वध भगवान् के हाथो से हो, वाल्मीकि रामायण (१८ । ५७ )में बाली प्रभु से कहता है – आपके द्वारा अपने वध की इच्छा से ही ताराद्वारा रोके जानेपर भी सुग्रीव से युद्ध करने के लिये मैं आया था । यही बात मानस के – ” जौ कदाचि मोहि मारिहिं तौ पुनि होउँ सनाथ “ से भी लक्षित होती है । भगवान् अन्तर्यामी हैं, उन्होंने उसकी हार्दिक अभिलाषा (जिसका बाली को छोड़कर और किसीको पता भी न था) इस प्रकार पूर्ण की ।

३ -यद्यपि भगवान् सब कुछ करने मे समर्थ हैं, उनकी इच्छा में कोई वर या शाप बाधक नहीं हो सकता, तथापि यह उनका मर्यादापुरुषोत्तम अवतार है । यद्यपि एक बात कही वर्णन नहीं मिलता परंतु कुछ सज्जनों का मत है कि बाली को देवताओ का वरदान था कि जो तेरे सम्मुख लड़ने के लिये आवेगा उसका आधा बल तुमको मिल जायगा। प्रभु सबकी मर्यादा रखते हैं इसीसे रावणवध के लिये नरशरीर धारण किया; नहीं तो जो कालका भी काल है क्या वह बिना अवतार लिये ही रावण को मार न सकता था ?

जिसके एक सीकास्त्र से देवराज इंद्र के पुत्र को त्रैलोक्य में शरण देनेवाला कोई न मिला, क्या वह सीता जी के उद्धार के लिये वानर कटक एकत्र करता ? सुग्रीव से मित्रता करता? नागपाश मे अपने को बंधवाता इत्यादि। प्रभु तो रावण को अवश्य साकेत वैकुण्ठ धाम में बैठे ही मार सकते थे, पर देवताओं की मर्यादा, उनकी प्रतिष्ठा जाती रहती । प्रभु यदि बाली को सामने से मारते तो उनके वर और शापका कोई महत्त्व नहीं रह जाता । इसीलिये तो श्रीरामदूत हनुमान जी ने भी ब्रह्मदेव का मान रखा और अपने को नागपाश से बंधवा लिया (सुन्दरकाण्ड देखे) ।

कुछ अधिक बुद्धिजीवी लोग एवं आजकल के युवा तर्क करते है की बाली को प्रभु सामने से कभी नहीं मार पाते क्योंकि प्रभु का आधा बल देवताओ के वरदान अनुसार बाली के पास आ जाता। ध्यान रखे प्रभु का बल अतुलित है अनंत है जिसे आप infinite कहते है और infinite का आधा नहीं होता है। प्रभु का समुद्र रुपी बल जीव रुपी घट में आधा भी नहीं समा सकता।

४ -शास्त्र अनुसार छोटा भाई, पुत्र, गुणवान् शिष्य ये पुत्र के समान हैं । कन्या, बहिन और छोटे भाईकी स्त्री के साथ जो कामका व्यवहार करता है उसका दण्ड वध है ।जो मूढ़बुद्धि इनमें रमण करता है, उसे पापी जानना चाहिये। वह सदा राजाद्वारा वधयोग्य है ।

यद्यपि ऐसा पापी वध योग्य है फिर भी प्रभु ने सोचा की बाली हमारे सुग्रीव का भाई है, बाली पत्नी तारा भी प्रभु की भक्ता है अतः श्रीराम जी ने बाली को सुधार का अवसर देना चाहा । प्रभुने बाली को पहली बार नहीं मारा । उसको बहुत मौका दिया कि वह संभल जाय, सुग्रीव से शत्रुभाव छोड़ दे और उससे मेल कर ले, पर वह नहीं मानता । दूसरी बार अपना फूलो का हार चिह्न के रूप में देकर सुग्रीव को प्रभु ने बाली से युद्ध करने भेजा ।अकारणकृपालु भगवान् ने बाली को होशियार किया कि सुग्रीव मेरे आश्रित हो चुका है; यह जानकर भी मम भुजबल आश्रित तोहें जानी उसने श्रीरामचन्द्रजी के पुरुषार्थ की अवहेलना की, उनका अत्यन्त अपमान किया, उनके मित्रके प्राण लेनेपर तुल गया तब उन्होंने मित्र को मृत्युपाश से बचाने के लिये उसे मारा ।

यदि इसमें अन्याय होता हो रामजी कदापि यह न कह सकते कि छिपकर मारने के विषय में न मुझे पश्चाताप है न किसी प्रकार का दु:ख ।ध्यान दे की अंत में बाली ने प्रभु का उत्तर सुनकर श्रीराम से कहा है-

न दोषं राघवे दध्यो धर्मेsधिगतनिश्चय: ।।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रांजलिर्वानरेश्वर: ।
यत्त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत्तथैव न संशय: ।।
(वाल्मीकि रामायण ४४-४५ )

अर्थात् उत्तर सुनकर उसने धर्म का निश्चय जानकर राघव जी को दोष नहीं दिया और हाथ छोड़कर बोला कि आपने जो कहा यह ठीक है, इसमें संदेह नहीं । जब स्वयं बाली ही यों कह रहा है तब हमको आज़ श्री रामजी के चरित्र पर दोषारोपण करनेका क्या हक है ?

अब देखना चाहिये कि सरकार ने अपने संक्षिप्त उत्तर मे ऐसी कौन बात कही कि जिससे बाली का समाधान हो गया । उनके उत्तरों से स्पष्ट मालूम होता है कि उन्होंने अपराधका दण्ड दिया । युद्ध करना और दण्ड देना दो पृथक वस्तु हैं । युद्ध शत्रुसे  किया जाता है । और दण्ड अपराधी को दिया जाता है । युद्धके नियम दण्ड देने में लागू नहीं हैं । अपराधी न्यायाधीश से नहीं कह सकता कि तुम मुझ बँधे हुए को फांसी की आज्ञा देकर अधर्म कर रहे हो । मेरे हाथमें तलवार दो, और स्वयं भी तलवार लेकर लड़ो , और मुझे मार सको तो धर्म है नहीं तो फांसी दिलवाना पाप है । न्यायाधीश कहेगा कि मैं लड़ने नहीं आया हूँ तुमने अपराध किया है, उसीका यह दण्ड है।

सरकार का यहीं कहना है कि तुम हमारे शत्रु नहीं हो । यदि तुमसे शत्रुता होती और मैं लड़ने आया होता, पर मैं तो दण्ड देने आया हूँ । तुम अपराधी हो । बन्धु के पत्नी को कुदृष्टि से देखनेवाला वध्य है, पर तुम्हारा अपराध तो और भी बढा-चढा है, तुम दण्डके योग्य हो, और वह दण्ड व्याधकी भाँती वध करना है । वधके दण्डमें तीव्रता लानेके लिये ही तुम्हारा वध व्याध की भाँति करना पड़ा । बस सरकार के उत्तर को ठीक तरह से बाली समझा अत: निरुत्तर हो गया ।

५- श्री रामचंद्र जी को सुग्रीव जब दुंदुभी नामक असुर की अस्तिनिचय और सात ताल वृक्षों को भगवान् श्रीराम जी को दिखाता है । वह कहता की जो भी इन अस्थिपंजर को उठाने में समर्थ होगा और जो एक बाण से इन वृक्षों को काट देगा , वही युद्ध में बाली का वध कर सकता है । इस से भी स्पष्ट है की श्रीराघव जी अपने बल से युद्ध में बाली का वध करने में समर्थ है । परंतु सरकार युद्ध करने आये ही नहीं है ,वे तो बाली के पाप का दंड देने आए है ।

६. बालकाण्ड के इस श्लोक देखा जाए तो भी कारण स्पष्ट होता है – ततः सुग्रीववचनाद्धात्वा वालीनमाहवे ।सुग्रीवमेव तंद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्  ।।  –  अर्थात श्रीरामने बाली को युद्ध में मारकर सुग्रीव को राज्य दिलाया था ।

७ -एक संत का मत है की बाली ने भगवान् से कहा था – मुझे आपने व्याध की भाँती क्यों मारा? यहाँ संत जी के अनुसार व्याध का मतलब छुप कर नहीं है यहाँ व्याध की भाँती मारना मतलब निर्दयता से मारना है। बाली ने कहा प्रभु अपने मुझे निर्दयता से क्यों मारा? तब प्रभु ने कहा था की तुमने अपने अनुज के पत्नी हा हरण कर लिया था, बुरी दृष्टी डाली तुम्हे ऐसा ही दंड मिलना चाहिए। उन संत जी ने ‘विटप ओट’ का अर्थ वृक्ष की आड़ नहीं माना है, ‘विटप ओट ‘ का अर्थ उन्होंने किया है वृक्ष का सहारा लेकर ।

८ – श्री हनुमान जी लंका में श्री सीता जी से और संजीवनी बूटी लाते समय श्री भारत जी से बाली का श्रीराम के हाथो युद्ध में मारे जाने का वर्णन करते है –वालीनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम् (६। १२६। ३८)

९ – एतदस्यासमं वीर्यं मया राम प्रकाशितम् । कथं तं वालीनं हन्तुं समरे शक्ष्यसे नृप ।। ( वाल्मीकिरामायण किष्किन्धा काण्ड ११ । ६८) इसमें वालीनां हन्तुं समरे  का अर्थ हुआ युद्ध में ।
पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी एवं अन्य संत महात्माओ की हम सब पर कृपा है की उन्होंने सरल भाषा में हम मंदबुद्धियो को रामायण जी की कथा को समझाया है। समस्त हरि हर भक्तो की जय।

सुंदर कथा २८ (श्री भक्तमाल – श्री राम भक्ता त्रिजटा जी) Sri Bhaktamal- Sri Trijata ji

आदरणीयया श्री गणेशदास भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदास जी ,श्री शुकदेवराय जी एवं श्री श्रीधर स्वामी जी की टीका / व्याख्यान पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।

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 श्री रामचरित मानस के छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है। इसके स्त्री पात्रों में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, महिमा में उतना की गौरावमण्डित है । सम्पूर्ण ‘मानस’ में केवल सुन्दरकाण्ड और लंका काण्डमें सीता-त्रिजटा संवाद के रूपमें त्रिजटा का वर्णन आया है, परंतु इन लघु संवादो में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ निखर उठी हैं । छोटेसे वार्ताप्रसङ्गमें भी सम्पूर्ण चरित्र को समासरूप से उद्भासित करने की क्षमता पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी की विशेषता है । मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है :
त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।
राम चरन रति निपुन बिबेका ।।
(रा.च.मा ५। ११ । १)

प्रस्तुत पंक्ति त्रिजटाके चार गुणोंको स्पष्ट करती है-
१- वह राक्षसी है । २-श्री रामचरण में उसकी रति है ।
३ -वह व्यवहार-निपुण और ४ -विवेकशीला है ।
राक्षसी होते हुए भी श्री रामचरणानुराग, व्यवहार कुशलता एवं विवेकशीलता जैसे दिव्य देवोपम गुणों की अवतारणा चरित्र में अलौकिकता को समाविष्ट करती है । सम्भवत: इन्ही तीन गुणों के समाहार के कारण उसका नाम त्रिजटा रखा गया हो । संत कहते है इनके सिर पर ज्ञान,भक्ति और वैराग्य रुपी तीन जटाएं है अतः इनका नाम त्रिजटा है।

त्रिजटा रामभक्त  बिभीषणजी की पुत्री है। इनकी माता का नाम शरमा है। वह राबण की भ्रातृजा है। राक्षसी उसका वंशगुण है और रामभक्ति उसका पैतृक गुण । लंका की अशोक वाटिका में सीताजी के पहरेपर अथवा सहचरी के रूपमें रावणद्वारा जिस स्त्री-दल की नियुक्ति होती है, त्रिजटा उसमें से एक है । अपने सम्पूर्ण चरित्र में सीताके लिये इसने परामर्शदात्री एवं प्राणरक्षिका का काम किया है । यही कारण है कि विरहाकुला और त्रासिता सीताने त्रिज़टा के सम्बोधन में माता शब्द का प्रयोग किया है।

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी ।
मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।
(रा.च.मा. ५। १२ । १)

ऐसी शुभेच्छुका के लिये मा शब्द कितना समीचीन है ।

त्रिज़टा की रति राम-चरण में है । रामभक्त पिताकी पुत्री होनेके कारण इसका यह अनुराग पैतृक सम्पत्ति है और स्वाभाविक है । त्रिजटा के घर में निरंतर रामकथा होती है । अभी माता सीता से मिलने के थोडी देर पहले वह घरसे आयी है, जहाँ हनुमान जी जैसे परम संत श्री बिभीषणजी से रामकथा कह रहे थे ।

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।। (रा.च.मा ५।६)

राक्षसी होते हुए भी त्रिजटा को मानव-मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है । वह सीताजी के स्वभाव और मनोभाव को अच्छी तरह समझती है । वह यह भलीभांति जानती है कि सीताजी को सांत्वना के लिये और उनके दुखों को दूर करने के लिये रामकथा से बढकर दूसरा कोई उपाय नहीं है । सीता जी का विरह जब असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से  कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीताजी के प्रबोधके लिये वह राम यश गुणगान का सहारा लेती है ।

ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीटा जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं । वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनोंही से अपरिचित थे । उन्होंने त्रिजटा प्रयुक्त विधिका ही अनुसरण किया । रावण त्रासिता सीताजी को राम सुयश सुनने से ही सांत्वना मिली थी, यह हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे । त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।

दानवी होनेके कारण त्रिजटा में दानव मनोविज्ञान का ज्ञान तो था ही । दानवोंका अधिक विश्वास दैहिक शक्तिमे है और इसीलिये उन्हें कार्यविरत करनेमें भय अधिक कारगर होता है । सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया था और तदनुसार राक्षसियों को ऐसा ही अनुदेश करके यह चला गया था । सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बह्यंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी ।

व्यवहार-विशारद त्रिजटा के लिये यह असह्य हो गया । वर्जन के लिये उस पण्डिता ने विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक भयानक स्वप्न कथा की सृष्टि की ।उसने सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। त्रिजटा ने उन राक्षसियों से कहा की मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी  । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।

इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका बिभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी । तब प्रभुने सीताजीको बुलावा भेजा । पुकारकर (निश्चय के साथ ) कहती हू कि यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और  जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी।

इस स्वप्न वार्तासे एक ओर जहाँ त्रिज़टा का भविष्य दर्शिनी होना सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यवहार-निपुणा और विवेकिनी होना भी उद्धाटित होता है।भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डलि को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी । उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया । यही तो भक्तो संतो का स्वभाव है।

लंका काण्डके युद्ध- प्रसंग में त्रिज़टा की चातुरीका एक और विलक्षण उदाहरण मिलता है । राम रावण युद्ध चरम सीमापर है । रावण छोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुट जाते हैं । भुजाओ को खोकर

भी वह नवीन भुजावाला बन जाता है और श्रीराम के मारे भी नहीं मरता । अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी व्याकुल हो जाती हैं । श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरनेवाले रावणके बन्धनसे वह अब मुक्त होनेकी आशा त्याग देनेको हो जाती हैं । त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है । वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है ।
त्रिजटाने कहा-  राजकुमारी ! सुनो, देवताओ का। शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा ।परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं ।

श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदयमे मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भूवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजी के मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा-  सुन्दरी ! महान सन्देह का त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बर कटि जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।

(रावण हर क्षण जानकी जी को प्राप्त करने के बारे में ,उन्हें अपना बनाने के बारे में ही सोचता रहता अतः ह्रदय से जानकी जी का ही विचार करता रहता । संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है?भक्ति तो संतो के संग से, प्रभु लीला चिंतन एवं जानकी जी की कृपा दृष्टी से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टी तक नहीं डालीं । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी। )

जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने अखंड भक्ति का दान दिया है ।सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है। संतो ने कहा है लगभग २ वर्ष तक सीताजी लंका में रही(कोई ४३५ दिन मानते है) और त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही की राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।

संत कहते है भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति। भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वास्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की अविचल भक्ति नहीं देते ।नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता त्रिजटा है ऐसा संतो का मत है।

इस प्रकार त्रिजटाचरित्र भक्ति, विवेक और व्यवहारकुशलता का एक मणिकाञ्चन योग है ।

सुंदर कथा २७ (श्री भक्तमाल – श्री शबरी जी) Sri Bhaktamal- Sri Shabri ji

त्रेतायुगका समय है, वर्णाश्रम धर्मकी पूर्ण प्रतिष्ठा है, वनों-में स्थान-स्थानपर ऋषियो के पवित्र आश्रम बने हुए हैं । तपोधन ऋषियो के यज्ञधूमसे दिशाएँ आच्छादित और वेदध्वनिसे आकाश मुखरित हो रहा है । ऐसे समय दण्डकारण्यमे एक पति-पुत्र-विहीना भक्ति श्रद्धा-सपन्ना भीलनी रहती थी; जिसका नाम था शबरी ।

शबरीने एक बार मतंग ऋषिके दर्शन किये । संत दर्शनसे उसे परम हर्ष हुआ और उसने विचार किया कि यदि मुझसे ऐसे महात्माओ की सेवा बन सके तो मेरा कल्याण होना कोई बडी बात नहीं है । परंतु साथ ही उसे इस बातका भी ध्यान आया कि मुझ नीच कुल में उत्पन्न अधम नारी की सेवा ये स्वीकार कैसे करेंगे ? अन्तमें उसने यह निश्चय किया कि यदि प्रकट रूपसे मेरी सेवा स्वीकार नहीं होती तो न सही, मैं इनकी सेवा अप्रकट रूपसे अवश्य करूँगी । 

यह सोचकर उसने ऋषियोंके आश्रमों से थोडी दूरपर अपनी छोटी सी कुटिया बना ली और कंद-मूल-फलसे अपना उदर पोषण करती हुई वह अप्रकट रूपसे सेवा करने लगी । जिस मार्ग से मुनिगण स्नान करने जाया करते, उषाकालके पूर्व ही उसको झाड़-बुहारकर साफ कर देती, कहीं भी कंकड़ या काँटा नहीं रहने पाता । इसके सिवा वह आश्रमों के समीप ही प्रातः कालके पहले-पहले ईंधन के सूखे ढेर लगा देती ।

शबरीको विश्वास था कि मेरे इस कार्य से दयालु महात्माओ की कृपा मुझपर अवश्य होगी । कँकरीले और कँटीले रास्तेको निष्कण्टक और कंकडो सेे रहित देखकर तथा द्वारपर समिधा का संग्रह देखकर ऋषियो को बडा आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने शिष्यों को यह पता लगानेकी आज्ञा दी कि प्रतिदिन इन कामों को कौन कर जाता है ?आज्ञाकारी शिष्य रातको पहरा देने लगे और उसी दिन रातके पिछले पहर शबरी ईंधनका बोझा रखती हुई पकडी गयी । शबरी बहुत ही डर गयी । शिष्यगण उसे मतंग मुनिके सामने ले  गए और उन्होंने मुनियों कहा -महाराज ! प्रतिदिन रास्ता साफ करने और ईधन रख जानेवाले चोरको आज हमने पकड़ लिया है ।  यह भीलनी ही प्रतिदिन ऐसा किया करती है ।

 शिष्यों की बातको सुनकर भयकातरा शबरी-से मुनिने पूछा ‘ तू कौन है और किसलिये प्रतिदिन मार्ग बुहारने और ईधन लानेका काम करती है ?भक्तिमती शबरीने कांपते हुए अत्यन्त विनय-पूर्वक प्रणाम करके कहा – नाथ ! मेरा नाम शबरी है, मन्द भाग्य से मेरा जन्म नीच कुलमें हुआ है, मैं इसी वनमें रहती हूं और आप जैसे तपोधन मुनियों के दर्शन से अपनेको पवित्र करती हूं ।

अन्य किसी प्रकारक्री सेवा में अपना अनधिकार समझकर मैंने इस प्रकार की सेवा में ही मन लगाया है । भगवन् ! मैं आपकी सेवाके योग्य नहीं । कृपापूर्वक मेरे अपराध को क्षमा करें । शबरी के इन दीन और यथार्थ वचनों को सुनकर मुनि मतंगने दयापरवश हो अपने शिष्यो सेे कहा कि -यह बडी भाग्यवती है, इसे अरश्रम के बाहर एक कुटियामें रहने दो और इसके लिये अन्नादिका उचित प्रबंध कर दो । ऋषि के दयापूर्ण वचन सुनकर शबरीने हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा – कृपानाथ ! मैं तो कंद मूलादि से ही अपना उदर पोषण कर लिया करती हूं ।

आपका अन्न प्रसाद तो मुझे इसीलिये इच्छित है कि इससे मुझपर आपकी अवास्तविक कृपा होगी जिससे मैं कृतार्थ हो सकुंगी । मुझे न तो वैभव की इच्छा है और न मुझे यह असार संसार ही प्रिय लगता है । दीनबन्धो ! मुझें तो आप ऐसा आशीर्वाद दें कि जिससे मेरी सद्गति हो । विनयावनत श्रद्धालु शबरीके ऐसे वचन सुनकर मुनि मतंगने कुछ देर सोच विचारकर प्रेमपूर्वक उससे कहा – हे कल्याणि ! तू निर्भय होकर यहाँ रह और भगवान् के नामका जप किया कर । ऋषिकी कृपासे शबरी जटा चीर धारिणी होकर भगवद्भजनमें निरत हो आश्रममें रहने लगी ।

अन्यान्य ऋषियों को यह बात अच्छी नहीं लगी । उन्होंने मतंग ऋषिसे कह दिया कि आपने नीच जाति की शबरी-को आश्रम में स्थान दिया है, इससे हमलोग आपके साथ भोजन करना तो दूर रहा, संभाषण भी करना नहीं चाहते । भक्तितत्व के मर्मज्ञ मतंगने इन शब्दोंपर कोई ध्यान नहीं दिया । वे इस बातको जानते थे कि ये सब भ्रममें हैं । शबरीके स्वरूपका इन्हें ज्ञान नहीं है, शबरी केवल नीच जाति की साधारण स्त्री ही नहीं है, वह एक भगवद्भक्ति परायण उच्च आत्मा है, ऐसा कौन बुद्धिमान है जो हीन वर्णमें उत्पन्न भगवत्परायण भक्तका आदर न करता हो ?जिस शबरी के हृदयमे: रामका रमण होने लगा था, उससे ऋषि मतंग केसे घृणा कर सकते थे । उन्होंने इस अवहेलना का कुछ भी विचार नहीं किया और वे अपने उपदेश से शबरी की भक्ति बढाते रहे ।

इस प्रकार भगवद् गुण स्मरण और गान करते करते बहुत समय बीत गया । मतंग ऋषिने शरीर छोड़नेकी इच्छा की , यह जानकर शिष्यों को बडा दुख हुआ, शबरी अत्यन्त क्लेशके कारण क्रन्दन करने लगी । गुरुदेव का परमधाममें पधारना उसके लिये असहनीय हो गया । वह बोली – नाथ ! आप अकेले ही न जायं, यह किंकरी भी आपके साथ जाने को तैयार है, विषष्णवदना कृताञ्जलिदीना शबरी को सम्मुख देखकर मतंग ऋषिने कहा- हे सुव्रते ! तू यह विषाद छोड़ दे, भगवान् श्री राम इस समय चित्रक्रूट में हैं । वे यहाँ अवश्य पधारेंगे । उन्हें तू इन्हीं चर्म-चक्षुओं से प्रत्यक्ष देख सकेगी, वे साक्षात् नारायण हैं । उनके दर्शन से तेरा कल्याण हो जायगा । भक्तवत्सल भगवान् जब तेरे आश्रममें पधारें, तब उनका भलीभांति आतिथ्य कर अपने जीवन को सफल करना, तबतक तू श्रीराम नामका जप करती हुई यहीं निवास कर । 

शबरी को इस प्रकार आश्वासन देकर मुनि दिव्य लोक को चले गये । इधर शबरीने श्रीराम नाम में ऐसा मन लगाया कि उसे दूसरी किसी बातका ध्यान ही नहीं रहा। शबरी कंद मूल फलोंपर अपना जीवन निर्वाह करती हुई भगवान् श्रीरामके शुभागमन की प्रतीक्षा करने लगी । ज्यो ज्यो दिन बीतते हैं त्यों त्यों शबरी की राम दर्शन लालसा प्रबल होती जाती है । जरा सा शब्द सुनते ही वह दौड़कर बाहर जाती है और बडी आतुरताके साथ प्रत्येक वृक्ष, लता-पत्र, पुष्प और फलो से तथा पशु पक्षीयों से पूछती है की अब श्रीराम कितनी दूर हैं, यहाँ कब पहुँचेंगे ?  प्रातःकाल कहती है कि भगवान् आज संध्या को आवेंगे । सायंकाल फिर कहती है, कल सबेरे तो अवश्य पधारेंगे । कभी घरके बाहर जाती है, कभी भीतर जाती है । कहीं मेरे

रामके पैरोंमे चोट न लग जाय, इसी चिन्तासे बारम्बार रास्ता साफ करती और कांटे-कंकडों को बुहारती है । घरको नित्य गोबर-गोमूत्र से लीप पोत ठोक कर लेती है । नित नयी मिट्टी गोबर की चौकी बनाती है । कभी चमककर उठती है, कभी बाहर जाती है और सोचती है, भगवान् बाहर आ ही गये होंगे । वनमें जो फल सबसे अधिक सुस्वादु और मीठा लगता है, वही अपने रामके लिये बड़े चावसे रख छोड़ती है । इस प्रकार शबरी उन राजीवलोचन रामके शुभ दर्शन की उत्कण्ठा से रामागमन आकांक्षा से पागल सी हो गयी है । सूखे पत्ते बृक्षों से उड़कर नीचे गिरते हैं तो उनके शब्द को शबरी अपने प्रिय रामके पैरों की आहट समझकर दौड़ती है ।

इस तरह आठों पहर उसका चित्त श्रीराममें रमा रहने लगा, परंतु राम नहीं आये । एक बार मुनिबालको ने कहा- शबरी ! तेरे राम आ रहे हैं ।  फिर क्या था बेर आदि फलो को आँगन में रखकर वह दौडी सरोवर से जल लानेके लिये । प्रेम के उन्मादमे उसे शरीर की सुधि नहीं थी, एक ऋषि स्नान करके लौट रहे थे । शबरीने उन्हें देखा नहीं और उनसे उसका स्पर्श हो गया । मुनि बड़े क्रुद्ध हुए । वे बोले-कैेसी दुष्टा है ! जान बूझकर हमलोगों का अपमान करती है । शबरी ने अपनी धुन में कुछ भी नहीं सुना और वह सरोवर पर चली गयी । ऋषि भी पुन: स्नान करने को उसके पीछे-पीछे गये । ऋषि ने ज्यों ही जलमे प्रवेश किया त्यों ही जलमे कीड़े पड़ गये और उसका वर्ण रुधिर(रक्त) सा हो गया । इत्तनेपर भी उनको यह ज्ञान नहीं हुआ कि यह भगवद्भक्तिपरायणा शबरीके तिरस्कार का फल है ।

 इधर जल लेकर शबरी पहुँच हीे नहीं पायी थी कि उसे भगवान् श्रीराम मेरी शबरी कहां है पूछते हुए दिखाई दिये । यद्यपि अन्यान्य मुनियोंको भी यह निश्चय था कि भगवान् अवश्य पधारेंगे परंतु उनकी ऐसी धारणा थी कि वे सर्वप्रथम हमारे ही यहाँ पदार्पण करेंगे । परंतु दीनवत्सल भगवान श्री रामचन्द्र जब पहले उनके यहाँ न जाकर शबरी की मडैया का पता पूछने लगे तो उन तपोबलके अभिमानी मुनियोंको बडा आश्चर्य हुआ । श्रीरामका अपने प्रति इतना अनुग्रह देखकर शबरी उनकी अगवानी के लिये मनमें अनेक उमंगें करती हुई सामने चली ।

आज शबरीके आनन्दका पार नहीं है । वह प्रेममें पगली
होकर नाचने लगी । हाथसे ताल दे देकर नृत्य करनेमें वह इतनी मग्न हुई कि उसे अपने उत्तरीय वस्त्र तक का ध्यान नहीं रहा, शरीरकी सारी सुध बुध जाती रही। इस तरह शबरी को आन्दसागरमें निमग्न देखकर भगवान् बड़े ही सुखी हुए और उन्होंने मुसकराते हुए लक्ष्मण की ओर देखा। तब लक्ष्मणजीने हंसते हुए गम्भीर स्वर से कहा कि – शबरी ! क्या तू नाचती ही रहेगी ? देख ! श्रीराम कितनी देरसे खड़े है। क्या इनको बैठाकर तू इनका आतिथ्य नहीं करेगी? इन शब्दोंसे शबरी को चेत हुआ और उस धर्मपरायण तापसी सिद्धा संन्यासिनी ने धीमान् श्रीराम लक्ष्मण को देखकर उनके चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम किया और पाद्य आचमन आदिसे उनका पूजन किया । (वाल्मीकि रामायण ३। ७४। ६-७)

भगवान् श्रीराम उस धर्मनिरता शबरीसे पूछने लगे-
हे तपोधने ! तुमने साधनके समस्त विघ्नों पर तो विजय पायी है तुम्हारा तप तो बढ़ रहा है?  तुमने कोप और आहारका संयम तो किया है ? है चारुभाषीणि ! तुम्हारे नियम तो सब बराबर पालन हो रहे हैं ? तुम्हारे मनमें शान्ति तो है ?तुम्हारी गुरुसेवा सफ़ल तो हो गयी ? अब तुम क्या चाहती हो ?

श्री रामके ये वचन सुनकर वह सिद्ध षुरुषोंमें मान्य वृद्धा तापसी बोली – भगवन् ! आप मुझे सिद्धा, सिद्धसम्मता, तापसी आदि कहकर लज्जित न कीजिये । मैंने तो आज़ आपके दर्शनसे ही जन्म सफल कर लिया है। (वाल्मीकि रामायण ३। ७४। ८-९)

हे भगवन् ! आज आपके दर्शन से मेरे सभी तप सिद्ध हो गये हैं, मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरी गुरूओं की पूजा सफल हो गयी, मेरा तप सफल हो गया, हे पुरुषोत्तम ! आप देवताओं में श्रेष्ठ रामकी कृपा से अब मुझे अपने स्वर्गापवर्गमें कोई संदेह नहीं रहा । (वाल्मीकि रामायण ३। ७४। ११ -१२)

शबरी अधिक नहीं बोल सकी । उसका गला प्रेमसे रुँध गया । थोडी देर चुप रहकर फिर बोली, है प्रभो ! आपके लिये संग्रह किये हुए कंद फलादि तो अभी रखे ही हैं । भगवन् ! मुझ अनाथिनी के फलोको ग्रहणकर मेरा मनोरथ सफ़ल कीजिये । यों कहकर शबरी चिरकाल से संग्रह किये हुए फलों को लाकर भगवान् को देने लगी और भगवान् प्रेमसे सने फलोंकी बारबार सराहना करते हुए उन्हें खाने लगे ।

शबरी वनके पके हुए मूल और फलो को स्वयं चख-चखकर परीक्षा कर भगवान् को देने लगी । उसमे अत्यन्त मधुर फल होते वही भगवान् को निवेदन करती । इस प्रकार भगवान् का आदर सत्कार कर शबरी हाथ जोड़कर आगे खडी हो गयी । प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ गया । उन्होंने कहा मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? मैं नीच जातिकी और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूं । जो अधमसे भी अधम हैं, स्त्रीयां उनमें भी अत्यन्त अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन ! मैं मन्दबुद्धि हूँ ।

श्री रघुनाथ जी ने कहा – हे भामिनि! तुम मेरी बात सुनो। मैं एकमात्र भक्तिका नाता मानता हूँ । जो मेरी भक्ति करता है वह मेरा है और मैं उसकी हूं। जाति पाँति, कुल ,बडाई, द्रव्य, बल, कुटुम्ब, गुण, चतुराई सब कुछ हो, पर यदि भक्ति न हो तो वह मनुष्य बिना जलके बादलोंके समान शोभाहीन और व्यर्थ है ।

इसीसे भगवान् श्रीराम कहते हैं –
पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद या जाति, नाम और आश्रम आदि मेरे भजनमे कारण नहीं हैं, केवल भक्ति ही एक कारण है। (अध्यात्म रामायण ३। १०। २०)

जो मेरी भक्ति से विमुख हैं, यज्ञ, दान, तप और वेदाध्ययन करके भी वे मुझे नहीं देख सकते । (अध्यात्म रामायण ३।१०।२१) यही घोषणा भगवान् ने गीता मे की है ।

इसके बाद भगवान् ने शबरी को नवधा भक्तिका स्वरूप
बतलाया। श्रीराम ने कहा – मेरी भक्ति नौ प्रकार की है( १ ) संतो की संगति अर्थात् सत्सङ्ग, (२) श्रीरामकथा में प्रेम (३) गुरुजनों की सेवा (४) निष्कपट भावसे हरिगुणगान, ( ५ ) पूर्ण विश्वाससे श्री रामनाम जप ( ६) इंद्रीय दमन तथा कर्मोंसे वैराग्य, (७) सबको श्री राममय जानना, (८) यथालाप में संतुष्टि तथा (९) छलरहित सरल स्वभाव से हृदय में प्रभु का विश्वास।

इनमें से किसी एक प्रकार की भक्तिवाला मुझे प्रिय होता है, फिर तुझमें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ है । अतएव जो गति रोगियों को भी दुर्लभ है, वह आज तेरे लिये खुलभ हो गयी है। उसीके फलस्वरूप तुम्हें मेरे दर्शन हुए, जिससे तुम साज स्वरूप को प्राप्त करोगी । इस प्रकार भक्ति का वर्णन करने के बाद भगवान् शबरी को अपना परम पद प्रदान करते हैं ।

उसी समय दण्डकारण्य वासी अनेक ऋषि मुनि शबरीजी के आश्रममें आ गये । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और लक्ष्मणने खड़े होकर मुनियों का स्वागत किया और उनसे कुशल प्रश्न किया । सबने उत्तरमे यही कहा हे रघुश्रेष्ठ आपके दर्शन से हम सब निर्भय हो गये हैं । हे प्रभो ! हम बड़े अपराधी हैं । इस परम भक्तिमती शबरीके कारण हमने मतंग जैसे महानुभावका तिरस्कार किया । योगिराजो के लिये भी जो परम दुर्लभ हैं ऐसे आप साक्षात् नारायण जिसके घरपर पधारे हैं वह भक्तिमती शबरी सर्वथा धन्य है । हमने बडी भूल की । इस प्रकार सब ऋषि मुनि पश्चात्ताप करते हुए भगावान् से विनय करने लगे । आज दण्डकारण्यवासी ज्ञानाभिमानियो की आंखे खुली ।

जब व्रजक्री ब्राह्मण वनिताओ ने अपने पतिदेवों की आज्ञाका उल्लंघन कर साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीकृष्ण की सेवामें पहुंचकर अनन्य भक्तिका परिचय दिया था, तब ब्राह्मणोंने एक बार तो वहुत बुरा माना परंतु अन्तमें जब उन्हें बोध हुआ, तब उन्होंने भी बड़े पश्चाताप के साथ इसी प्रसार अपनेको धिक्कार देते हुए कहा था

हमारी तीन जन्मों को (एक गर्भ से, दूसरे उपनयन से और तीसरे यज्ञदीक्षासे) विद्याको, ब्रह्मचर्यव्रत को, बहुत जानने को, उत्तम कुल को, यज्ञादि क्रियाओं में चतुर होने को बार बार धिवकार है क्योंकि इम श्रीहरिके विमुख हैं ।(श्रीमद्भागवद् १० । २३ । ३९ -४०)

ऋषि मुनियों को पश्चात्ताप करते देखकर श्री लक्ष्मणजी ने उनसे कहा महर्षिगण ! आपलोग धन्य है । आप बड़े ही तपव्रतपरायण हैं ।आप सांसारिक विषयज़न्य सुखों को त्यागकर निस्पृह होकर वनमें निवास करते हैं । आपलोगो के प्रभाव से यह चराचर जगत् धर्म को धारण कर रहा है । इस प्रकारके वाक्यो से ऋषियों को कुछ संतोष हुआ, इतनेमे एक ऋषिने कहा- हे शरणागतवत्सल ! यहांके सुंदर सरोवरके जलमें कीड़े क्यों पड़ रहे हैं तथा वह रुधिर(रक्त) सा क्यों हो गया है ?  लक्ष्मणजीने हँसते हुए कहा

मतंग मुनि के साथ द्वेष करने तथा शबरी जैसी रामभक्ता साध्वी का अपमान करनेके कारण आपके अभिमानरूपी दुर्गुण से ही यह सरोवर इस दशको प्राप्त हो गया है । इसके फिर पूर्ववत् होनेका एक यही उपाय है कि शबरी एक बार फिरसे उसका स्पर्श करे । भगवान् की आज्ञासे शबरी ने जलाशय में प्रवेश किया और तुरंत ही जल पूर्ववत् निर्मल हो गया । यह है भक्तों की महिमा !

श्री राम ने शबरी को जानकी के विषय में पूछा, तब शबरी ने उन्हें पम्पासरोवर जाने को कहा ।उसने प्रभु से कहा की वह आपकी मित्रता सुग्रीव से होगी। वे सब हाल बताएँगे।
फिर शबरी ने प्रभु से कहा – हे धीरबुद्धि !आप अन्तर्यामी होते हुए भी ये सब मुझसे पूछते है? भगवान् ने प्रसन्न होकर फिर शबरी से कहा कि तू कुछ वर माँग । शबरी ने कहां मैं अत्यन्त नीच कुल में जन्म लेेनेपर भी आपका साक्षात् दर्शन कर रही हूँ यह क्या साधारण अनुग्रह का फल है? तथापि में यही चाहती हूँ कि आपमें मेरी दृढ़ भक्ति सदा बनी रहे । भगवान ने हँसते हुए कहा तथास्तु !

फिर कहने लगी जिनका यह आश्रम है,जिनके चरणों की मैं सदा दासी रही,उन्ही पवित्र आत्मा महर्षि के समीप अब मुझे जाना है। शबरी ने पार्थिव देह परित्याग करने के लिये भगवान् की आज्ञा चाही, भगवान ने उसे आज्ञा दे दी । ह्रदय में श्रीराम चरणों को धारण करके शबरी मुनिजनो के सामने ही देह छोडकर परम धाम को प्रयाण कर गयी और सब तरफ जयजयकार की ध्वनि होने लगी ।

समस्त हरी हर भक्तों की जय।
भक्तवत्सल भगवान की जय।।

श्री नारदजी की द्वारा श्रीराम नाम का माहात्म्य प्रकट

भगवन्नाम का महत्व भगवान् से भी अधिक होता है । यहां तक कि भगवान् को भी अपने ‘नाम’के आगे झुकना ही पड़ता है । यही कारण है भक्त ‘नाम’के प्रभावसे भगवान् को वश में कर लेते है ।  निम्नलिखित कथासे ‘राम’ नामकी महिमापर प्रकाश पड़ता है ।

रामराज्यका समय था । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अश्वमेध नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे । ब्रह्मर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र सदृश ब्रह्मवेत्ताओ के सानिध्य में यज्ञका अनुमान चल रहा था । उस पावन अव्सरका लाभ उठानेके लिये देश-विदेशो से अनेक राजा महाराजा अयोध्या पधारे हुए थे ।

एक सामन्त राजा, जो आरवेटके लिये वनमें गया हुआ था, सम्राट श्रीरामद्वारा यज्ञकी खुलना पाकर संधि अयोध्या लौट आया तथा यज्ञमण्डपके बाहरसे ही उसने ‘वसिष्ठ आदि महर्षियोंक्रो मेरा प्रणाम’ कहकर नमस्कार किया और नित्य कर्मके लिये अपने स्थान को चला गया ।

देवलोकसे देवर्षि नारद भी भगवान् श्रीरामके यज्ञ वैभव को देखनेके लिये अयोध्या आये हुए थे । सामन्त राजाके ‘वसिष्ठ आदि महर्पियोक्रो प्रणाम’ इन शब्दों को सुनकर देवर्षि नारदके मनमें एक युक्ति सूझी । उन्होंने सोचा कि इसी बहाने ‘राम’ नामकी महिमा को क्यों न लोगोंमें प्रकट किया जाय । वे तुरंत महर्षि विश्वामित्रके पास गये और बोले-

महर्षिवर देखीये आपने इस सामन्त की धृष्टता , वास्तवमें महर्षि बसिष्ठ की अपेक्षा आप महाराज श्रीरामके अत्यन्त उपकारी है । श्रीराम आपसे ही समस्त अस्त्र शस्त्रो का ज्ञान प्राप्त का सका है । आपकी ही कृपा से श्रीरामक को जनक नन्दिनी सीताजी मिली है । श्रीरामके द्वारा रावण जैसे क्रूर महाबलशाली राक्षसका समूल नाश करना आपके ही अनुग्रहका फल है । फिर इस मूर्ख सामन्तने जान बूझकर आपकी महत्ताका अपमान करनेके लिये महर्षि वसिष्टके नाम को प्रथम स्थान दिया है ।

फिर क्या था महर्षि विश्वामित्र क्रोधसे पागल से हो गये । वे तुरंत श्रीरामके सामने जाकर बोले- राजन् ! आपके दरबार में एक सामन्तने मुझे अपमानित करनेक्री चेष्टा कर अक्षम्य अपराध किया है । इसके दण्डके रूपमें आपक्रो आज़ सूर्यास्तसे पहलेे उस सामन्तके सिरको मेरे चरणों में समर्पित करना होगा अन्यथा मैं शाप दे दूँगा ।

भगवान् राम महर्षिकी आज्ञाको शिरोधार्य कर तुरंत उस सामन्त की खेजमें लग गये ।
उधर देवर्षि नारद सीधे उस सामन्त राजाके पास पहुंचे और उसे संकट की सूचना दी । सामन्त उनके चरणोंपर गिर पडा और बोला – भगवन् ! कृपया इस संकटसे मुझे बचाइये । अनजानेमें में महाराज श्रीरामके प्रति अपराधी बन गया हूँ । तीनों लोको में मुझे शरण देनेवाला कोईं नहीं दीखता । अब तो आप ही किसी उपायसे बचा सकते है ।

नारदजी कुछ सोचकर बोले – तब एक उपाय है । तुम इसी समय रामभक्त हनुमान जी की माता अञ्जना देवी की शरणमे जाओ । हनुमान जी माताके प्रति प्रगाढ़ भक्ति रखते है । वे माता की आज्ञा टाल नहीं सकते । माताकी आज्ञा होनेपर वे ही तुम्हें बचा सकते है ।

सामन्त तुरंत उस स्थानपर गया, जहां अञ्जनादेवी पूजा कर रही थीं । उसने उनके चरण पकड़कर अभय मान । पूछनेपर सारा वृत्तांत सुनाकर रक्षा करनेके प्रार्थना की । अञ्जनादेवी ने अपने पुत्र हनुमान जी को बुलाया और उनसे राजा की रक्षा करने की बात कही ।

माता की आज्ञा सुनकर हनुमान जी क्षणभरके लिये विचलित हो गये । राजाकी रक्षा करनेका अर्थ था अपने आराध्य प्रभुके नाते द्रोह । फिर भी उन्होंने माता की आज्ञा मान ली और राजा को अभयदान किया ।

हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढायी, उसे लपेटकर एक दुर्ग बनाया और उसीके भीतर बैठकर राजाके साथ ध्यानमग्न होकर ‘राम’ नामका अनवरत जप करने लगे ।

इधर श्रीराम सामन्त को खोजते खोजते उसी स्थलपर आ पहुंचे । नारदजीने उन्हें दुर्ग को दिखाकर उसमें सामन्तके छिपे रहने की बात बतायी ।

तब श्रीरामने दुर्ग को लक्ष्यकर अपने अमोघ बाणोंका प्रयोग करना प्रारम्भ किया । आकाश गूँजने लगा । बाणोंकी सर्र-सर्रकी आवाज दिशाओं का प्रतिध्वनित करने लगी । लेकिन जिस वेगसे श्रीरामके बाण धनुषसे छूटते थे, उसी वेगसे दुर्गको प्रदक्षिणा कर श्रीरामके चरणोंमें वापस लौटकर आ गिरते थे । क्रमश: बाणोंके स्थान को अस्रोने ग्रहण किया । लेकिन सफलता नहीं मिली । श्रीरामके क्रोधका पारावार उमड़ पड़।  स्थितिको बिगड़ते देख देवर्षि नारद श्रीरामके समीप आये और बोले – महाराज ! कृपाकर अरत्रोंका प्रयोग बंद को । फिर ध्यानसे इस ध्वनि को सुनें ।

भगवान् श्रीरामने अरचोंका प्रयोग छंद किया । शान्त वस्तावरणमें ‘राम राम’ की ध्वनि स्पष्ट सुनायी देने लगी, जो दुर्गसे निकल रही थी । श्रीरामने पास जाकर देखा । दुर्गके चीता राम नाम जप रहे ध्यानमग्न मारुति और भयभीत राजा दिखायी पड़े ।

श्रीराम बोले – हनुमान् ! यह क्या मैने जिस व्यक्तिका सिर महर्षि विश्वामित्र को भेट देनेका वचन दिया है, तुम उसकी रक्षा कर रहे हो ,क्या मुझे अनृतवादी बनाना तुम्हारे लिये न्यायसंगत है ?

हनुमान् जी ने भगवान् के चरण पकड़ लिये और बोले-प्रभो ! यह मेरे बसका काम नहीं है । फिर मैं माता की  आज्ञाका तिरस्कार नहीं कर सका । तब मुझे आपके नामके सिवाय कोई रक्षक नहीं दीख पडा।

अब श्रीरामको अनृतवादी होनेसे बचाने का भार नारदजीका था । वे स्वयं आगे आकर बोले – महाराज महर्षि विश्वामित्रने इस सामन्तके सिरको उनके चरणों में  समर्पित करनेकी बात कही है । इसका अर्थ यह नहीं कि इसके सिरको काटकर ही रखा जाय । अत: यह महर्षि विश्वामित्र के चरणोंपर सिर रखकर दण्डवत करे, जिमसे अपके वचनका भी पाला हो जायगा और  राजाकी रक्षा भी होगी ।

देवर्षि नारदजीके सुझावके अनुसार सामन्तने विश्वामित्रके चरणोंपर माथा टेककर साष्टांग प्रणाम किया । महर्षिका क्रोध भी शान्त हुआ ।

धन्य है हनुमान् जी की रामभक्ति ।
धन्य है श्रीराम नाम की महिमा ।

गौमाता को चरने से रोकने पर राजा जनक को नर्क द्वार का दर्शन

प्राचीन कालकी बात है । राजा जनक ने ज्यों ही योग बल से शरीरका त्याग किया, त्यों ही एक सुन्दर सजा हुआ विमान आ गया और राजा दिव्य-देहधारी सेवको के साथ उसपर चढकर चले । विमान यमराजको संमनीपुरीके निकटवर्ती भाग से जा रहा था । ज्यों को विमान वहाँ से  आगे बढ़ने लगा, त्यों ही बड़े ऊँचे स्वंरसे राजाको हजारों मुखोंसे निकली हुई करुणध्वनि सुनायी पडी – पुण्यात्मा राजन्! आप यहांसे जाइये नहीं, आपके शरीरको छूकर आनेवाली वयुका स्पर्श पाकर हम यातनाओ से पीडित नरकके प्राणियोंको बड़ा ही सुख मिल रहा है ।

धार्मिक और दयालु राजाने दुखी जीवोंकी करुण पुकार सुनकर दया के वश निश्चय किया कि ,जब मेरे यहाँ रहनेसे इन्हें सुख मिलता है तो यम, मैं यहीं रहूंगा । मेरे लिये यही सुन्दर स्वर्ग है । राजा वहीं ठहर गये । तब यमराजने उनसे कहा- यह स्थान तो इष्ट, हत्यारे पापियोंके लिये है । हिंसक, दूसरो पर कलंक लगानेवाले, लुटेरे, पतिपरायणा पतीका त्याग करनेवाले, मित्रों को धोखा देनेवाले, दम्भी, द्वेष और उपहास करके मन-वाणी-शरीरों, कभी भगवान्का स्मरण न करनेवाले जीव यहाँ आते हैं और उन्हें नरकोंमे डालकर मैं भयंकर यातना दिया करता हूँ । तुम तो पुण्यात्मा हो, यहाँ से अपने प्राप्य दिव्य लोक में  जाओं । जनकने कहा-  मेरे शरीरसे स्पर्शं की हुई वायु इन्हें सुख पहुँचा रही है, तब मैं केसे जाऊं ? आप इन्हें इस दुखसे मुक्त कर दें तो में भी सुखपूर्वक स्वर्गमें चला जाऊंगा ।

यमराजने [पापियों की ओर संकेत करके] कहा – ये कैसे मुक्त हो सकते है ? इन्होंने बड़े बड़े पाप किये हैं ।इस पापीने अपनेपर बिश्वास करनेवाली मित्रपत्नी पर बलात्कार किया था, इसलिये इसको मैंनेे लोहशंकु नामक नरकमे डालकर दस हजार बर्षोंतक पकाया है ।अब इसे पहले सूअरकी और फिर मनुष्य की योनि प्राप्त होगी और वहाँ यह नपुंसक होगा । यह दूसरा बलपूर्वक व्यभिचारमें प्रवृत्त था ।

सौ वर्षोंतक रौरव नरकमें पीडा भोगेगा । इस तीसरेने पराया धन चुराकर भोगा था, इसलिये दोनों हाथ काटकर इसे पूयशोणित नामक नरकमें डाला जायगा । इस प्रकार ये सभी पापी नरकके अधिकारी हैं । तुम यदि इन्हें छुड़ाना चाहते हो तो अपना पुण्य अर्पण को । एक दिन प्रातः काल शुद्ध मनसे तुमने मर्यादापुरुषोत्तम भगवान्  श्रीरघुनाथजीका ध्यान किया था और अकस्मात् रामनामका उच्चारण किया था, बस वही पुण्य इन्हें दे दो । उससे इनका उद्धार हो जायगा ।

राजाने तुरंत अपने जीवनभरका पुण्य दे दिया और इसके प्रभाव से वे सारे प्राणी नरक यन्त्रणासे तत्काल छूट गये तथा दयाके समुद्र महाराज जनकका गुण गाते हुए दिव्य लोक को चले गये ।

तब राजाने धर्मराजसे पूछा कि है जब धार्मिक पुरुषोंका यहां आना ही नहीं होता, तब फिर मुझे यहां क्यों लाया गया । है इसपर धर्मराजने कहा- राजन् तुम्हारा जीवन तो पुण्यो से भरा है, पर एक दिन तुमने छोटा सा पाप किया था ।

एकदा तु चरन्ती गां वारयामास वै भवान्।
तेन पापविपाकेन निरयद्वारदर्शनम्।।

तुमने चरती हुई गौ माता को रोक दिया था । उसी पापके कारण तुम्हें नरकका दरवाजा देखना पड़ा । अब तुम उस पापसे मुक्त हो गये और इस पुण्यदानसे तुम्हारा पुण्य और भी बढ़ गया । तुम यदि इस मार्गसे न आते तो इन बेचारोंका नरकसे कैसे उद्धार होता ? तुमजैसे दूसरोंके दुख से दुखी होनेवाले दया धाम महात्मा दुखी प्राणियोंका दुख हरनेमे ही लगे रहते हैं । भगवान्  कृपासागर हैं । पापका फल भुगतानेके बहाने इन दुखी जीवोंका दुख दूर करनेके लिये ही इस संयमनीके मार्ग सेउन्होंने तुमको यहां भेज दिया है । तदनन्तर राजा धर्मराजको प्रणाम करके परम धामको चले गये ।

(पद्मपुराण, पातालखण्ड, अध्याय १८-१९)

सुंदर कथा १० (श्री भक्तमाल – भगवान श्री शंकर ) Sri Bhaktamal -Sri Shankar ji

पूज्यपाद सिद्ध श्री पूर्णानंद तीर्थ उड़ियाबाबा सरकार , यतिचक्रचुडामणि पूज्य श्री करपात्री जी एवं श्री रामसुखदास जी के प्रवचन ,आशीर्वाद से प्रस्तुत श्री शिव चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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हस्तेऽक्षमाला हृदि कृष्ण तत्वं जिह्वाग्र भागे वरराम मन्त्रम् । यन्मस्तके केशवपादतीर्थम शिवं महाभागवतं नमामि ।।

जिनके हस्तकमल में रुद्राक्ष की माला है ,हृदयमे श्री कृष्ण तत्त्व विराजमान है,जिह्वके जिह्वाके अग्रभागमे निरंतर सुंदर राम मंत्र है,जिनके मस्तकपर भगवान् नारायण के चरण कमलो से निकली गंगा विराजमान है,ऐसे महाभागवत,परम भक्त,उपासक श्री शिवजीको नमस्कार है।

तीनों लोकोंमें यदि श्रीराम का कोई परम भक्त, परमोपसक है तो वह वैष्णवोंमें अग्रगण्य वैष्णवाचार्य आदि-अमर कथावक्ता , वैष्णव कुलभूषण,शशाङ्क-शेखर आदिदेव महादेव ही हैं।श्री शिवजी महा मन्त्र ‘श्रीराम ‘ का अहर्निश जप करते रहते है ।

भगवान् शंकर रामायण के आदि आचार्य हैं।उन्होंने राम-चरित्र का वर्णन सौ करोड़ श्लोकों में किया है।श्री शिवजी ने देवता ,दैत्य और ऋषि मुनियोंमें श्लोकों का समान बँटवारा किया तो हर एक के भागमें तैतीस करोड़, तैतीस लाख ,तैतीस हजार ,तीन सौ तैतीस श्लोक आये। कुल निन्यानबे करोड़, निन्यानबे लाख ,निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे श्लोक वितरित हुए। एक श्लोक शेष बचा ।देवता, दैत्य ,ऋषि- ये तीनों एक श्लोक के लिये लड़ने-झगड़ने लगे । यह श्लोक अनुष्टुप् छ्न्दमें था। अनुष्टुप् छ्न्दमें बत्तीस अक्षर होते हैं। श्रीशिवजी ने प्रत्येक को दस-दस अक्षर वितरित किये। तीस अक्षर बँट गए तथा दो अक्षर शेष बचे । तब शिवजीने कहा – ये दो अक्षर अब किसीको नही दूँगा । ये अक्षार मैं अपने कण्ठमे ही रखूँगा । ये दो अक्षर ही ‘रा’ और ‘म’ अर्थात् रामका नाम है,जो वेदोंका सार है।

राम-नाम अति सरल है ,अति मधुर है, इसमें अमृतसे भी अधिक मिठास है। यह अमर मन्त्र है,शिवजीके कण्ठ तथा जिह्वाग्रभाग में विराजमान है,इसीलिये जब सागर-मंथनके समय हालाहल -पान करते समय शिव-भाक्तोमें हाहाकार मच गया, तब भगवान् भूतभावन भवानीशंकर ने  सबको सान्त्वना-आश्वासन देते हुए कहा –

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