सहस्त्रमुख रावण की कथा । Sahastramukh Raavan

लंका विज़यके बाद श्रीरामका राज्याभिषेक हो गया था । इस अवसरपर इनके अभिनन्दनके लिये सभी ऋषि मुनि  राजदरबार में, उपस्थित हए । उन्होंने एक स्वर से कहा – राबणके मारे जानेसे अब विश्वमे शान्ति स्थापित हो गयी है । सब लोग सुख और शान्ति की श्वास ले रहे है । उस समय मुनियोद्वारा श्रीरामके पराक्रम और रावणके विनाश की बात सुनकर देवी सीताको हँसी आ गयी । इस समयमे उनकी हंसी देखकर सबका ध्यान उनकी तरफ गया और मुनियोंने देवी सीतासे हसीका कारण पूछा ।

इसपर सीताने रामजी तथा मुनियोंकी आज्ञा लेकर एक अद्भुत वृत्तान्त बतलाते हुए कहा :
जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता महाराज जनकने अपने घरमे एक ब्राह्मणक्रो आदरपूर्वक चातुर्मास्य व्रत करवाया। मैं भलीभांति ब्राह्मण देवताकी सेवा करती थी । अवकाशके समय ब्राह्मण देवता तरह तरहकी कथा मुझे सुनाया करते थे । एक दिन उन्होंने सहस्त्रमुख रावणका वृत्तान्त सुनाया, जो इस प्रकार है- पढना जारी रखे

भगवान् श्री राम जानकी के श्री चरणों के चिन्ह । Symbols on Lotus feet of Sri Sita Ram

भगवान् के चरणारविन्द की महिमा उनके चिन्हों की
कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है । ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक हैं रक्षक है । भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है –

सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका ।
चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका ।।

भगवान् श्रीराम के चरण चिन्हों का वर्णन महारामायण के ४८ वें अध्यायमें महर्षि अगस्त्यकृत श्री रघुनाथचरण चिन्ह स्तोत्र मे आचार्य यामुनकृत आलवन्दार स्तोंत्र में, नाभाजी कृत भक्तमाल में, श्री गोस्वामी जी के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में , गीतावली के उत्तरकाण्ड के पंद्रहवें पद में और रामचरण चिन्हावली नामक पुस्तक में मिलता है ।

महारामायण में श्री राम के चरणचिन्हों की संख्या ४८ बतायी गयी है – २४ चिह्न दक्षिणपद में और २४ चिह्न वामपद मे है ।

**जो चिन्ह श्रीराम के दक्षिणपद में है वे भगवती सीता के वमपद में है और जो उनके वामपदमें हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिणपद में है ।

श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं – पढना जारी रखे

तीन बार ‘राम’ नाम लेने का परामर्श देनेपर वामदेव को महर्षि वशिष्ठ का शाप

एक बार महाराज दशरथ राम आदी के साथ गंगा स्नान के लिये जा रहे थे । मार्गमें देवर्षि नारदजी से उनकी भेंट हो गयी । महाराज दशरथ आदि सेभीने देवर्षि को प्रणाम किया ।
तदनन्तर नारदजी ने उनसे कहा – महाराज ! अपने पुत्रों तथा सेना आदि के साथ आप कहां जा रहे हैं ? इसपर बड़े ही विनम्रभाव से राजा दशरथ ने बताया- भगवन ! हम सभी गंगा स्नान की अभिलाषा से जा रहे है ।

इसपर मुनि ने उनसे कहा -महाराज ! निस्संदेह आप बड़े अज्ञानी प्रतीत होते है क्योकि पतितपावनी भगवती गंगा जिनके चरणकमलों से प्रकट हुई है, वे ही नारायण श्री राम आपके पुत्ररूप में अवतरित होकर आपके साथमें रह रहे है उनके चरणोंकी सेवा और उनका दर्शन ही दान, पुण्य और गंगा स्नान है, फिर हे राजन् ! आप उनकी सेवा न करके अन्यत्र कहाँ जा रहे है । पुत्र भावसे अपने भगवान् का ही दर्शन करे । श्री राम के मुखकमल के दर्शन के बाद कौन कर्म करना शेष बच जाता है ?
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श्री रामचंद्र भगवान् की आदर्श दिनचर्या और आदर्श रामराज्य

भगवान् श्रीराम अनन्त क्रोटि ब्रह्माण्ड नायक परम पिता परमेश्वर के अवतार थे और उन्होंने धर्मकी मर्यादा रखने के लिये भारत भूमि अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में अवतार लिया था । उस समय राक्षसो का नग्न बीभत्स रूप इतना प्रचण्ड हो गया कि ऋषि मुनियो एवं गौ ब्राह्मणों का जीवन खतरे में पड़ गया था । जहां जहां कोई शास्त्र विहित यज्ञ कर्म आदि किये जाते थे, राक्षस गण उन्हें विध्वंस करने के लिये सदा तत्पर रहते थे ।

राक्षसों का राजा रावण भारत भूमिपर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिये चारों ओर जाल फैला रहा था ,ऐसी स्थिति में देवताओ के आग्रह एवं अनुनय विनय के फल स्वरूप भगवान् स्वयं अपने अंशोंसहित राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूपमें अवतीर्ण हुए ।

भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र का विवरण हम भिन्न भिन्न रामायणों में पाते हैं जिनमें वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण तथा पूज्य श्री गोस्वामी जी का रामचरितमानस प्रमुख है ।

साधारण बालकों की तरह बालकपन में अपने छोटे  भाइयों एवं बाल सखाओ के साथ भगवान् श्रीराम सरयूके तटपर कंदुक क्रीडा एवं अन्य खेलो में ऐसे मस्त हो जाते थे कि उन्हें अपने खाने पीने की भी सुध नहीं रहती थी ।

प्रजापालन के लिये भगवान् विशेष सचेष्ट एवं सतर्क रहते है । राज़सभा में सनकादि तथा नारद अष्ट ऋषि प्रतिदिन जाते है और उनसे वेद पुराण तथा इतिहास की चर्चा करते है । प्रजा को मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका यह पहला आदेश था कि यदि भूल से मैं कुछ अनीतिपूर्ण वचन कहूँ जो शासन विरुद्ध, न्याय विरुद्ध या द्वेषयुक्त हो तो भय छोड़कर मुझे यह कहकर तुरंत रोक देना कि – राम ! तुम्हारा यह कार्य अनुचित है ।

भगवान् श्रीराम जी की दिनचर्या का आनन्दरामायण के राज्यकाण्ड के १९ वें सर्ग में बड़े विस्तार से वर्णन है । श्रीरामदास के द्वारा महर्षि वाल्मीकि जी अपने शिष्य को उपदेश करते हैं –

श्रृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञ: शुभावहा ।
दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ।।
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दन: ।
नववाद्यनिनादांश्च सुखं शुश्राव सीतया ।।
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दृशरथं सुरान् ।
पुण्यतीर्थानि  मातृश्च देवतायतनानि च ।।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १-३ ) 
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क्या श्रीराम ने बाली को अधर्म से मारा था? नहीं । 

पूज्य श्री अंजना नंदन शरण , श्री शत्रुघ्न दास बाबा सरकार , श्रीसंप्रदायाचार्य श्री ब्रह्मचारी जी का कृपाप्रसाद , संतो के स्वयं के भाव एवं अवध के महान् संतो के प्रवचनों / लेखो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।

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संत ब्राह्मण गौ माताओ की कृपा से कुछ पुराने संत महात्माओ के रामायण पर लिखे विचार पढ़ने का अवसर दास को मिला। उसमे कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण भाग जो दास ने पढ़ा वही आगे लिखने जा रहा हूं।

बाली ने श्री रामचंद्र जी पर आरोप लगाये थे की प्रभु ने उसे छिप कर अधर्म से मारा है। प्रायः बहुत से लोग बिना सोचे समझे भगवान् के इस चरित्र को दोषयुक्त दृष्टि से देखते है और कुछ तो कह देते है की प्रभु ने बाली का वध अधर्म से किया । निचे कुछ पूज्य संत महात्माओ के आशीर्वचन दिए गए है जिस से प्रभु की यह लीला संतो किं कृपा से हम मंदबुद्धियो को कुछ समझ सके।

बाली वध के कारण –
१ .श्रीरामजी सत्य-प्रतिज्ञ हैं । यह त्रैलोक्य जानता है कि श्रीराम दो वचन कभी नहीं कहते, जो वचन उनके मुखसे एक बर निकला, वह कदापि असत्य नहीं किया जा सकता। वे मित्र सुग्रीव का दु:ख सुनकर प्रतिज्ञा कर चुके हैं कि – सुनु सुग्रीव मारिहौं एकहि बान। ध्यान देने की बात है की व्याध भय से नहीं छिपता। मुख्य कारण यह होता है कि कहीं शिकार उसे देखकर हाथसे जाता न रहे । यहॉ विटप ओट(वृक्ष की ओट) से इसलिये मारा कि यदि कहीं बाली हमको देखकर भाग गया अथवा छिप गया, अथवा शरणमें आ पडा तो प्रतिज्ञा भंग हो जायगी (एक ही बाणसे मारने की प्रतिज्ञा है) । 

सुग्रीव को स्त्री और राज्य केसे मिलेगा ?पुनः यदि सामने आकर खड़े होते तो सम्भव था कि बाली सेना आदी को सहायता के लिये लाता । यह आपत्ति आती कि मारना तो एक बाली को ही था, पर उसके साथ मारी जाती सारी सेना भी ।यदि सामने आके लड़ते तो सुग्रीव की वानर सेना के वानर भी मारे जाते अतः सुग्रीव को उजड़ी हुई नागरी मिलती। प्रभु भक्त को उजड़ी नागरी कैसे देते? स्मरण रहे कि यहाँ छिपने में कपट का लेश भी नहीं है, यहाँ युद्ध नहीं किया गया है वरन दंड दिया गया है। राजा यदि यथार्थ दंड न दे,तो राजा उस दोष का भागी होता है।

२ -बाली चाहता था कि मेरा वध भगवान् के हाथो से हो, वाल्मीकि रामायण (१८ । ५७ )में बाली प्रभु से कहता है – आपके द्वारा अपने वध की इच्छा से ही ताराद्वारा रोके जानेपर भी सुग्रीव से युद्ध करने के लिये मैं आया था । यही बात मानस के – ” जौ कदाचि मोहि मारिहिं तौ पुनि होउँ सनाथ “ से भी लक्षित होती है । भगवान् अन्तर्यामी हैं, उन्होंने उसकी हार्दिक अभिलाषा (जिसका बाली को छोड़कर और किसीको पता भी न था) इस प्रकार पूर्ण की ।

३ -यद्यपि भगवान् सब कुछ करने मे समर्थ हैं, उनकी इच्छा में कोई वर या शाप बाधक नहीं हो सकता, तथापि यह उनका मर्यादापुरुषोत्तम अवतार है । यद्यपि एक बात कही वर्णन नहीं मिलता परंतु कुछ सज्जनों का मत है कि बाली को देवताओ का वरदान था कि जो तेरे सम्मुख लड़ने के लिये आवेगा उसका आधा बल तुमको मिल जायगा। प्रभु सबकी मर्यादा रखते हैं इसीसे रावणवध के लिये नरशरीर धारण किया; नहीं तो जो कालका भी काल है क्या वह बिना अवतार लिये ही रावण को मार न सकता था ?

जिसके एक सीकास्त्र से देवराज इंद्र के पुत्र को त्रैलोक्य में शरण देनेवाला कोई न मिला, क्या वह सीता जी के उद्धार के लिये वानर कटक एकत्र करता ? सुग्रीव से मित्रता करता? नागपाश मे अपने को बंधवाता इत्यादि। प्रभु तो रावण को अवश्य साकेत वैकुण्ठ धाम में बैठे ही मार सकते थे, पर देवताओं की मर्यादा, उनकी प्रतिष्ठा जाती रहती । प्रभु यदि बाली को सामने से मारते तो उनके वर और शापका कोई महत्त्व नहीं रह जाता । इसीलिये तो श्रीरामदूत हनुमान जी ने भी ब्रह्मदेव का मान रखा और अपने को नागपाश से बंधवा लिया (सुन्दरकाण्ड देखे) ।

कुछ अधिक बुद्धिजीवी लोग एवं आजकल के युवा तर्क करते है की बाली को प्रभु सामने से कभी नहीं मार पाते क्योंकि प्रभु का आधा बल देवताओ के वरदान अनुसार बाली के पास आ जाता। ध्यान रखे प्रभु का बल अतुलित है अनंत है जिसे आप infinite कहते है और infinite का आधा नहीं होता है। प्रभु का समुद्र रुपी बल जीव रुपी घट में आधा भी नहीं समा सकता।

४ -शास्त्र अनुसार छोटा भाई, पुत्र, गुणवान् शिष्य ये पुत्र के समान हैं । कन्या, बहिन और छोटे भाईकी स्त्री के साथ जो कामका व्यवहार करता है उसका दण्ड वध है ।जो मूढ़बुद्धि इनमें रमण करता है, उसे पापी जानना चाहिये। वह सदा राजाद्वारा वधयोग्य है ।

यद्यपि ऐसा पापी वध योग्य है फिर भी प्रभु ने सोचा की बाली हमारे सुग्रीव का भाई है, बाली पत्नी तारा भी प्रभु की भक्ता है अतः श्रीराम जी ने बाली को सुधार का अवसर देना चाहा । प्रभुने बाली को पहली बार नहीं मारा । उसको बहुत मौका दिया कि वह संभल जाय, सुग्रीव से शत्रुभाव छोड़ दे और उससे मेल कर ले, पर वह नहीं मानता । दूसरी बार अपना फूलो का हार चिह्न के रूप में देकर सुग्रीव को प्रभु ने बाली से युद्ध करने भेजा ।अकारणकृपालु भगवान् ने बाली को होशियार किया कि सुग्रीव मेरे आश्रित हो चुका है; यह जानकर भी मम भुजबल आश्रित तोहें जानी उसने श्रीरामचन्द्रजी के पुरुषार्थ की अवहेलना की, उनका अत्यन्त अपमान किया, उनके मित्रके प्राण लेनेपर तुल गया तब उन्होंने मित्र को मृत्युपाश से बचाने के लिये उसे मारा ।

यदि इसमें अन्याय होता हो रामजी कदापि यह न कह सकते कि छिपकर मारने के विषय में न मुझे पश्चाताप है न किसी प्रकार का दु:ख ।ध्यान दे की अंत में बाली ने प्रभु का उत्तर सुनकर श्रीराम से कहा है-

न दोषं राघवे दध्यो धर्मेsधिगतनिश्चय: ।।
प्रत्युवाच ततो रामं प्रांजलिर्वानरेश्वर: ।
यत्त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत्तथैव न संशय: ।।
(वाल्मीकि रामायण ४४-४५ )

अर्थात् उत्तर सुनकर उसने धर्म का निश्चय जानकर राघव जी को दोष नहीं दिया और हाथ छोड़कर बोला कि आपने जो कहा यह ठीक है, इसमें संदेह नहीं । जब स्वयं बाली ही यों कह रहा है तब हमको आज़ श्री रामजी के चरित्र पर दोषारोपण करनेका क्या हक है ?

अब देखना चाहिये कि सरकार ने अपने संक्षिप्त उत्तर मे ऐसी कौन बात कही कि जिससे बाली का समाधान हो गया । उनके उत्तरों से स्पष्ट मालूम होता है कि उन्होंने अपराधका दण्ड दिया । युद्ध करना और दण्ड देना दो पृथक वस्तु हैं । युद्ध शत्रुसे  किया जाता है । और दण्ड अपराधी को दिया जाता है । युद्धके नियम दण्ड देने में लागू नहीं हैं । अपराधी न्यायाधीश से नहीं कह सकता कि तुम मुझ बँधे हुए को फांसी की आज्ञा देकर अधर्म कर रहे हो । मेरे हाथमें तलवार दो, और स्वयं भी तलवार लेकर लड़ो , और मुझे मार सको तो धर्म है नहीं तो फांसी दिलवाना पाप है । न्यायाधीश कहेगा कि मैं लड़ने नहीं आया हूँ तुमने अपराध किया है, उसीका यह दण्ड है।

सरकार का यहीं कहना है कि तुम हमारे शत्रु नहीं हो । यदि तुमसे शत्रुता होती और मैं लड़ने आया होता, पर मैं तो दण्ड देने आया हूँ । तुम अपराधी हो । बन्धु के पत्नी को कुदृष्टि से देखनेवाला वध्य है, पर तुम्हारा अपराध तो और भी बढा-चढा है, तुम दण्डके योग्य हो, और वह दण्ड व्याधकी भाँती वध करना है । वधके दण्डमें तीव्रता लानेके लिये ही तुम्हारा वध व्याध की भाँति करना पड़ा । बस सरकार के उत्तर को ठीक तरह से बाली समझा अत: निरुत्तर हो गया ।

५- श्री रामचंद्र जी को सुग्रीव जब दुंदुभी नामक असुर की अस्तिनिचय और सात ताल वृक्षों को भगवान् श्रीराम जी को दिखाता है । वह कहता की जो भी इन अस्थिपंजर को उठाने में समर्थ होगा और जो एक बाण से इन वृक्षों को काट देगा , वही युद्ध में बाली का वध कर सकता है । इस से भी स्पष्ट है की श्रीराघव जी अपने बल से युद्ध में बाली का वध करने में समर्थ है । परंतु सरकार युद्ध करने आये ही नहीं है ,वे तो बाली के पाप का दंड देने आए है ।

६. बालकाण्ड के इस श्लोक देखा जाए तो भी कारण स्पष्ट होता है – ततः सुग्रीववचनाद्धात्वा वालीनमाहवे ।सुग्रीवमेव तंद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत्  ।।  –  अर्थात श्रीरामने बाली को युद्ध में मारकर सुग्रीव को राज्य दिलाया था ।

७ -एक संत का मत है की बाली ने भगवान् से कहा था – मुझे आपने व्याध की भाँती क्यों मारा? यहाँ संत जी के अनुसार व्याध का मतलब छुप कर नहीं है यहाँ व्याध की भाँती मारना मतलब निर्दयता से मारना है। बाली ने कहा प्रभु अपने मुझे निर्दयता से क्यों मारा? तब प्रभु ने कहा था की तुमने अपने अनुज के पत्नी हा हरण कर लिया था, बुरी दृष्टी डाली तुम्हे ऐसा ही दंड मिलना चाहिए। उन संत जी ने ‘विटप ओट’ का अर्थ वृक्ष की आड़ नहीं माना है, ‘विटप ओट ‘ का अर्थ उन्होंने किया है वृक्ष का सहारा लेकर ।

८ – श्री हनुमान जी लंका में श्री सीता जी से और संजीवनी बूटी लाते समय श्री भारत जी से बाली का श्रीराम के हाथो युद्ध में मारे जाने का वर्णन करते है –वालीनं समरे हत्वा महाकायं महाबलम् (६। १२६। ३८)

९ – एतदस्यासमं वीर्यं मया राम प्रकाशितम् । कथं तं वालीनं हन्तुं समरे शक्ष्यसे नृप ।। ( वाल्मीकिरामायण किष्किन्धा काण्ड ११ । ६८) इसमें वालीनां हन्तुं समरे  का अर्थ हुआ युद्ध में ।
पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी एवं अन्य संत महात्माओ की हम सब पर कृपा है की उन्होंने सरल भाषा में हम मंदबुद्धियो को रामायण जी की कथा को समझाया है। समस्त हरि हर भक्तो की जय।

सुंदर कथा २८ (श्री भक्तमाल – श्री राम भक्ता त्रिजटा जी) Sri Bhaktamal- Sri Trijata ji

आदरणीयया श्री गणेशदास भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदास जी ,श्री शुकदेवराय जी एवं श्री श्रीधर स्वामी जी की टीका / व्याख्यान पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।

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 श्री रामचरित मानस के छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है। इसके स्त्री पात्रों में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, महिमा में उतना की गौरावमण्डित है । सम्पूर्ण ‘मानस’ में केवल सुन्दरकाण्ड और लंका काण्डमें सीता-त्रिजटा संवाद के रूपमें त्रिजटा का वर्णन आया है, परंतु इन लघु संवादो में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ निखर उठी हैं । छोटेसे वार्ताप्रसङ्गमें भी सम्पूर्ण चरित्र को समासरूप से उद्भासित करने की क्षमता पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी की विशेषता है । मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है :
त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।
राम चरन रति निपुन बिबेका ।।
(रा.च.मा ५। ११ । १)

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सुंदर कथा २७ (श्री भक्तमाल – श्री शबरी जी) Sri Bhaktamal- Sri Shabri ji

त्रेतायुगका समय है, वर्णाश्रम धर्मकी पूर्ण प्रतिष्ठा है, वनों-में स्थान-स्थानपर ऋषियो के पवित्र आश्रम बने हुए हैं । तपोधन ऋषियो के यज्ञधूमसे दिशाएँ आच्छादित और वेदध्वनिसे आकाश मुखरित हो रहा है । ऐसे समय दण्डकारण्यमे एक पति-पुत्र-विहीना भक्ति श्रद्धा-सपन्ना भीलनी रहती थी; जिसका नाम था शबरी ।

शबरीने एक बार मतंग ऋषिके दर्शन किये । संत दर्शनसे उसे परम हर्ष हुआ और उसने विचार किया कि यदि मुझसे ऐसे महात्माओ की सेवा बन सके तो मेरा कल्याण होना कोई बडी बात नहीं है । परंतु साथ ही उसे इस बातका भी ध्यान आया कि मुझ नीच कुल में उत्पन्न अधम नारी की सेवा ये स्वीकार कैसे करेंगे ? अन्तमें उसने यह निश्चय किया कि यदि प्रकट रूपसे मेरी सेवा स्वीकार नहीं होती तो न सही, मैं इनकी सेवा अप्रकट रूपसे अवश्य करूँगी । पढना जारी रखे

श्री राम नाम का अद्भुत माहात्म्य ।

भगवन्नाम का महत्व भगवान् से भी अधिक होता है । यहां तक कि भगवान् को भी अपने ‘नाम’के आगे झुकना ही पड़ता है । यही कारण है भक्त ‘नाम’के प्रभावसे भगवान् को वश में कर लेते है ।  निम्नलिखित कथासे ‘राम’ नामकी महिमापर प्रकाश पड़ता है ।

१. समर्थ श्री रामदास स्वामी उच्च कोटि के संत हुए है जिन्हें श्री हनुमान जी का अवतार माना जाता है । धर्म रक्षा ,संत सेवा और भक्ति की स्थापना जैसे उत्तर भारत मे श्रीराम ही स्वामी श्री रामानंदाचार्य के रूप में प्रकट हुए वैसे ही रघुपति के प्रिय भक्त श्री हनुमान जी पश्चिम भारत मे श्री रामदास के रूप में प्रकट हुए । इनके सम्प्रदाय को रामदासी सम्प्रदाय कहा जाता है और इनका जप मंत्र है श्री राम विजय मंत्र – श्रीराम जयराम जय जय राम। एक दिन एक मनुष्य श्री रामदास स्वामी के पास आया और बोला – महाराज मुझे किस मंत्र का जप करना चाहिए ? मुझे मंत्र दीक्षा दीजिये । रामदास स्वामी ने कहा -श्री राम नाम  सबसे सरल साधन है , इसकी  महिमा शास्त्रो में भरी पड़ी है । भगवान महाकाल भी श्रीराम नाम का ही जप करते है ।

उस मनुष्य ने फिर भी मंत्र दीक्षा देने का हठ किया । उसने कहा -महाराज हमे तो कोई शक्तिशाली मंत्र चाहिए ।आप कृपा करके कोई मंत्र दे दीजिए ।बहुत समझाने पर भी वह नही माना तब रामदास स्वामी ने इसके कान में कह दिया – श्री राम । अब यह राम नाम का बीज तेरे अंदर मैने स्थापित कर दिया है । वह मनुष्य बोला – महाराज , मुझे तो लगा कोई शक्तिशाली मंत्र मिलेगा परंतु आपने कहा श्रीराम । यह नाम तो हर कोई जानता है इसमें नया क्या है ? स्वामी बोले – यही नाम मनमंत्र है । इसकी शक्ति बड़ी प्रचंड है , इसीके बल पर श्री शंकर विष पान कर गए और हनुमान ने समुद्र लांघ कर लंका दहन कर दिया । इतने पर भी वह व्यक्ति तर्क करने लगा तब रामदास स्वामी ने कहा – देखो तुम्हे यदि इस राम नाम पर संदेह है तो तुम मुख में जल भरकर इस राम नाम को बाहर थूक दो । उसने मुह में जल भरा और सामने एक बहुत विशाल पत्थर शिला पर उसे थूका। 

जैसे ही वह जल मुख से बाहर आकर पत्थर शिला को स्पर्श हुआ वैसे ही उस विशाल पत्थर शिला को भेदते हुए वह जल आर पार निकल गया और पृथ्वी के भीतर एक गड्ढा करते हुए चला गया । वह व्यक्ति देखता रह गया कि यह की आश्चर्य हो गया । उसने स्वामी जी से क्षमा याचना की और बहुत दुखी हुआ। स्वामी जी बोले – राम नाम की शक्ति अनंत है , ये महामंत्र है -पर कलयुग के लोग चमत्कार देखे बिना बात मानते नही इसीलिए प्रभु लीला करते है ।

२. राम राज्य का समय था । मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अश्वमेध नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे । ब्रह्मर्षि वसिष्ठ और विश्वामित्र सदृश ब्रह्मवेत्ताओ के सानिध्य में यज्ञका अनुमान चल रहा था । उस पावन अव्सरका लाभ उठानेके लिये देश-विदेशो से अनेक राजा महाराजा अयोध्या पधारे हुए थे ।
एक सामन्त राजा, जो आरवेटके लिये वनमें गया हुआ था, सम्राट श्रीरामद्वारा यज्ञकी खुलना पाकर संधि अयोध्या लौट आया तथा यज्ञमण्डपके बाहरसे ही उसने ‘वसिष्ठ आदि महर्षियोंक्रो मेरा प्रणाम’ कहकर नमस्कार किया और नित्य कर्मके लिये अपने स्थान को चला गया ।

देवलोकसे देवर्षि नारद भी भगवान् श्रीरामके यज्ञ वैभव को देखनेके लिये अयोध्या आये हुए थे । सामन्त राजाके ‘वसिष्ठ आदि महर्पियोक्रो प्रणाम’ इन शब्दों को सुनकर देवर्षि नारदके मनमें एक युक्ति सूझी । उन्होंने सोचा कि इसी बहाने ‘राम’ नामकी महिमा को क्यों न लोगोंमें प्रकट किया जाय । वे तुरंत महर्षि विश्वामित्रके पास गये और बोले-

महर्षिवर देखीये आपने इस सामन्त की धृष्टता , वास्तवमें महर्षि बसिष्ठ की अपेक्षा आप महाराज श्रीरामके अत्यन्त उपकारी है । श्रीराम आपसे ही समस्त अस्त्र शस्त्रो का ज्ञान प्राप्त का सका है । आपकी ही कृपा से श्रीरामक को जनक नन्दिनी सीताजी मिली है । श्रीरामके द्वारा रावण जैसे क्रूर महाबलशाली राक्षसका समूल नाश करना आपके ही अनुग्रहका फल है । फिर इस मूर्ख सामन्तने जान बूझकर आपकी महत्ताका अपमान करनेके लिये महर्षि वसिष्टके नाम को प्रथम स्थान दिया है ।

फिर क्या था महर्षि विश्वामित्र क्रोध से पागल से हो गये । वे तुरंत श्रीराम के सामने जाकर बोले- राजन् ! आपके दरबार में एक सामन्तने मुझे अपमानित करने की चेष्टा कर अक्षम्य अपराध किया है । इसके दण्डके रूपमें आपक्रो आज़ सूर्यास्तसे पहलेे उस सामन्त के सिर को मेरे चरणों में समर्पित करना होगा अन्यथा मै शाप दे दूँगा ।

भगवान् राम महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर तुरंत उस सामन्त की खेज मे लग गये । उधर देवर्षि नारद सीधे उस सामन्त राजाके पास पहुंचे और उसे संकट की सूचना दी । सामन्त उनके चरणोंपर गिर पडा और बोला – भगवन् ! कृपया इस संकट से मुझे बचाइये । अनजाने मे मै श्रीराम के प्रति अपराधी बन गया हूँ । तीनों लोको में मुझे शरण देनेवाला कोई नही दीखता । अब तो आप ही किसी उपाय से बचा सकते है ।

नारदजी कुछ सोचकर बोले – तब एक उपाय है । तुम इसी समय रामभक्त हनुमान जी की माता अञ्जना देवी की शरणमे जाओ । हनुमान जी माताके प्रति प्रगाढ़ भक्ति रखते है । वे माता की आज्ञा टाल नहीं सकते । माताकी आज्ञा होनेपर वे ही तुम्हे बचा सकते है ।

सामन्त तुरंत उस स्थानपर गया, जहां अञ्जना देवी पूजा कर रही थी । उसने उनके चरण पकड़कर अभय दान देने की प्रार्थना की । पूछनेपर सारा वृत्तांत सुनाकर रक्षा करने के प्रार्थना की । अञ्जना देवी ने अपने पुत्र हनुमान जी को बुलाया और उनसे राजा की रक्षा करने की बात कही । माता की आज्ञा सुनकर हनुमान जी क्षणभर के लिये विचलित हो गये । राजाकी रक्षा करने का अर्थ था अपने आराध्य प्रभु के नाते द्रोह । फिर भी उन्होंने माता की आज्ञा मान ली और राजा को अभयदान किया । हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढायी, उसे लपेटकर एक दुर्ग बनाया और उसीके भीतर बैठकर राजाके साथ ध्यानमग्न होकर ‘राम’ नाम का अनवरत जप करने लगे ।

इधर श्रीराम सामन्त को खोजते खोजते उसी स्थलपर आ पहुंचे । नारदजीने उन्हें दुर्ग को दिखाकर उस मे सामन्तके छिपे रहने की बात बतायी । तब श्रीरामने दुर्ग को लक्ष्यकर अपने अमोघ बाणो का प्रयोग करना प्रारम्भ किया । आकाश गूँजने लगा । बाणो की सर्र-सर्र की आवाज दिशाओं का प्रतिध्वनित करने लगी । लेकिन जिस वेग से श्रीराम के बाण धनुषसे छूटते थे, उसी वेगसे दुर्ग को प्रदक्षिणा कर श्रीरामके चरणो मे वापस लौटकर आ गिरते थे । अब बाणों के स्थान को अस्र प्रयोग किये गए लेकिन सफलता नहीं मिली । श्रीराम के क्रोध का पारावार उमड़ पड़।  स्थिति को बिगड़ते देख देवर्षि नारद श्रीराम के समीप आये और बोले – महाराज ! कृपाकर अरत्रों का प्रयोग बंद को । फिर ध्यान से इस ध्वनि को सुने ।

भगवान् श्रीरामने अस्त्रो का प्रयोग बंद किया । शान्त वस्तावरण मे ‘राम राम’ की ध्वनि स्पष्ट सुनायी देने लगी, जो दुर्गसे निकल रही थी । श्रीराम ने पास जाकर देखा । दुर्ग के भीतर राम नाम जप रहे ध्यान मग्न मारुति और भयभीत राजा दिखायी पड़े । श्रीराम बोले – हनुमान् ! यह क्या मैने जिस व्यक्ति का सिर महर्षि विश्वामित्र को भेट देनेका वचन दिया है, तुम उसकी रक्षा कर रहे हो ,क्या मुझे अनृतवादी बनाना तुम्हारे लिये न्यायसंगत है ?

हनुमान् जी ने भगवान् के चरण पकड़ लिये और बोले-प्रभो ! यह मेरे बसका काम नहीं है । फिर मैं माता की  आज्ञाका तिरस्कार नहीं कर सका । तब मुझे आपके नामके सिवाय कोई रक्षक नहीं दीख पडा।

अब श्रीराम को अनृतवादी होने से बचाने का भार नारदजी का था । वे स्वयं आगे आकर बोले –  महर्षि विश्वामित्र ने इस सामन्त के सिरको उनके चरणों में  समर्पित करने की बात कही है । इसका अर्थ यह नहीं कि इसके सिरको काटकर ही रखा जाय । अत: यह महर्षि विश्वामित्र के चरणोंपर सिर रखकर दण्डवत करे, जिमसे अपके वचनका भी पाला हो जायगा और  राजाकी रक्षा भी होगी ।

देवर्षि नारदजीके सुझावके अनुसार सामन्तने विश्वामित्रके चरणोंपर माथा टेककर साष्टांग प्रणाम किया । महर्षिका क्रोध भी शान्त हुआ । इस तरह राम से बड़ा राम का नाम है यह बात श्री नाराद जी ने सिद्ध की ।

गौमाता को चरने से रोकने पर राजा जनक को नर्क द्वार का दर्शन ।

प्राचीन कालकी बात है । राजा जनक ने ज्यों ही योग बल से शरीरका त्याग किया, त्यों ही एक सुन्दर सजा हुआ विमान आ गया और राजा दिव्य-देहधारी सेवको के साथ उसपर चढकर चले । विमान यमराजको संमनीपुरीके निकटवर्ती भाग से जा रहा था । ज्यों को विमान वहाँ से  आगे बढ़ने लगा, त्यों ही बड़े ऊँचे स्वंरसे राजाको हजारों मुखोंसे निकली हुई करुणध्वनि सुनायी पडी – पुण्यात्मा राजन्! आप यहांसे जाइये नहीं, आपके शरीरको छूकर आनेवाली वयुका स्पर्श पाकर हम यातनाओ से पीडित नरकके प्राणियोंको बड़ा ही सुख मिल रहा है ।

धार्मिक और दयालु राजाने दुखी जीवोंकी करुण पुकार सुनकर दया के वश निश्चय किया कि ,जब मेरे यहाँ रहनेसे इन्हें सुख मिलता है तो यम, मैं यहीं रहूंगा । मेरे लिये यही सुन्दर स्वर्ग है । राजा वहीं ठहर गये । तब यमराजने उनसे कहा- यह स्थान तो इष्ट, हत्यारे पापियोंके लिये है । हिंसक, दूसरो पर कलंक लगानेवाले, लुटेरे, पतिपरायणा पतीका त्याग करनेवाले, मित्रों को धोखा देनेवाले, दम्भी, द्वेष और उपहास करके मन-वाणी-शरीरों, कभी भगवान्का स्मरण न करनेवाले जीव यहाँ आते हैं और उन्हें नरकोंमे डालकर मैं भयंकर यातना दिया करता हूँ । तुम तो पुण्यात्मा हो, यहाँ से अपने प्राप्य दिव्य लोक में  जाओं । जनकने कहा-  मेरे शरीरसे स्पर्शं की हुई वायु इन्हें सुख पहुँचा रही है, तब मैं केसे जाऊं ? आप इन्हें इस दुखसे मुक्त कर दें तो में भी सुखपूर्वक स्वर्गमें चला जाऊंगा ।

यमराजने [पापियों की ओर संकेत करके] कहा – ये कैसे मुक्त हो सकते है ? इन्होंने बड़े बड़े पाप किये हैं ।इस पापीने अपनेपर बिश्वास करनेवाली मित्रपत्नी पर बलात्कार किया था, इसलिये इसको मैंनेे लोहशंकु नामक नरकमे डालकर दस हजार बर्षोंतक पकाया है ।अब इसे पहले सूअरकी और फिर मनुष्य की योनि प्राप्त होगी और वहाँ यह नपुंसक होगा । यह दूसरा बलपूर्वक व्यभिचारमें प्रवृत्त था ।

सौ वर्षोंतक रौरव नरकमें पीडा भोगेगा । इस तीसरेने पराया धन चुराकर भोगा था, इसलिये दोनों हाथ काटकर इसे पूयशोणित नामक नरकमें डाला जायगा । इस प्रकार ये सभी पापी नरकके अधिकारी हैं । तुम यदि इन्हें छुड़ाना चाहते हो तो अपना पुण्य अर्पण को । एक दिन प्रातः काल शुद्ध मनसे तुमने मर्यादापुरुषोत्तम भगवान्  श्रीरघुनाथजीका ध्यान किया था और अकस्मात् रामनामका उच्चारण किया था, बस वही पुण्य इन्हें दे दो । उससे इनका उद्धार हो जायगा ।

राजाने तुरंत अपने जीवनभरका पुण्य दे दिया और इसके प्रभाव से वे सारे प्राणी नरक यन्त्रणासे तत्काल छूट गये तथा दयाके समुद्र महाराज जनकका गुण गाते हुए दिव्य लोक को चले गये ।

तब राजाने धर्मराजसे पूछा कि है जब धार्मिक पुरुषोंका यहां आना ही नहीं होता, तब फिर मुझे यहां क्यों लाया गया । है इसपर धर्मराजने कहा- राजन् तुम्हारा जीवन तो पुण्यो से भरा है, पर एक दिन तुमने छोटा सा पाप किया था ।

एकदा तु चरन्ती गां वारयामास वै भवान्।
तेन पापविपाकेन निरयद्वारदर्शनम्।।

तुमने चरती हुई गौ माता को रोक दिया था । उसी पापके कारण तुम्हें नरकका दरवाजा देखना पड़ा । अब तुम उस पापसे मुक्त हो गये और इस पुण्यदानसे तुम्हारा पुण्य और भी बढ़ गया । तुम यदि इस मार्गसे न आते तो इन बेचारोंका नरकसे कैसे उद्धार होता ? तुमजैसे दूसरोंके दुख से दुखी होनेवाले दया धाम महात्मा दुखी प्राणियोंका दुख हरनेमे ही लगे रहते हैं । भगवान्  कृपासागर हैं । पापका फल भुगतानेके बहाने इन दुखी जीवोंका दुख दूर करनेके लिये ही इस संयमनीके मार्ग सेउन्होंने तुमको यहां भेज दिया है । तदनन्तर राजा धर्मराजको प्रणाम करके परम धामको चले गये ।

(पद्मपुराण, पातालखण्ड, अध्याय १८-१९)

सुंदर कथा १० (श्री भक्तमाल – भगवान श्री शंकर ) Sri Bhaktamal -Sri Shankar ji

पूज्यपाद सिद्ध श्री पूर्णानंद तीर्थ उड़ियाबाबा सरकार , यतिचक्रचुडामणि पूज्य श्री करपात्री जी एवं श्री रामसुखदास जी के प्रवचन ,आशीर्वाद से प्रस्तुत श्री शिव चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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हस्तेऽक्षमाला हृदि कृष्ण तत्वं जिह्वाग्र भागे वरराम मन्त्रम् । यन्मस्तके केशवपादतीर्थम शिवं महाभागवतं नमामि ।।

जिनके हस्तकमल में रुद्राक्ष की माला है ,हृदयमे श्री कृष्ण तत्त्व विराजमान है,जिह्वके जिह्वाके अग्रभागमे निरंतर सुंदर राम मंत्र है,जिनके मस्तकपर भगवान् नारायण के चरण कमलो से निकली गंगा विराजमान है,ऐसे महाभागवत,परम भक्त,उपासक श्री शिवजीको नमस्कार है।

तीनों लोकोंमें यदि श्रीराम का कोई परम भक्त, परमोपसक है तो वह वैष्णवोंमें अग्रगण्य वैष्णवाचार्य आदि-अमर कथावक्ता , वैष्णव कुलभूषण,शशाङ्क-शेखर आदिदेव महादेव ही हैं।श्री शिवजी महा मन्त्र ‘श्रीराम ‘ का अहर्निश जप करते रहते है ।

भगवान् शंकर रामायण के आदि आचार्य हैं।उन्होंने राम-चरित्र का वर्णन सौ करोड़ श्लोकों में किया है।श्री शिवजी ने देवता ,दैत्य और ऋषि मुनियोंमें श्लोकों का समान बँटवारा किया तो हर एक के भागमें तैतीस करोड़, तैतीस लाख ,तैतीस हजार ,तीन सौ तैतीस श्लोक आये। कुल निन्यानबे करोड़, निन्यानबे लाख ,निन्यानबे हजार नौ सौ निन्यानबे श्लोक वितरित हुए। एक श्लोक शेष बचा ।देवता, दैत्य ,ऋषि- ये तीनों एक श्लोक के लिये लड़ने-झगड़ने लगे । यह श्लोक अनुष्टुप् छ्न्दमें था। अनुष्टुप् छ्न्दमें बत्तीस अक्षर होते हैं। श्रीशिवजी ने प्रत्येक को दस-दस अक्षर वितरित किये। तीस अक्षर बँट गए तथा दो अक्षर शेष बचे । तब शिवजीने कहा – ये दो अक्षर अब किसीको नही दूँगा । ये अक्षार मैं अपने कण्ठमे ही रखूँगा । ये दो अक्षर ही ‘रा’ और ‘म’ अर्थात् रामका नाम है,जो वेदोंका सार है।

राम-नाम अति सरल है ,अति मधुर है, इसमें अमृतसे भी अधिक मिठास है। यह अमर मन्त्र है,शिवजीके कण्ठ तथा जिह्वाग्रभाग में विराजमान है,इसीलिये जब सागर-मंथनके समय हालाहल -पान करते समय शिव-भाक्तोमें हाहाकार मच गया, तब भगवान् भूतभावन भवानीशंकर ने  सबको सान्त्वना-आश्वासन देते हुए कहा –

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