महर्षि च्यवन की अद्भुत गौ भक्ति और गौ माता का श्रेष्ठत्व ।

श्री च्यवन ऋषि महर्षि भृगु एवं देवी पुलोमा के पुत्र थे । उन्होंने अपने जीवन का बहुत बडा भाग नैष्ठिक ब्रह्मचर्य के साथ उग्र तपमें बिताया था । परम पावनी वितस्ता नदी के सुरम्य तटपर आहार विहार छोड़कर एक आसन से बैठकर उन्होंने बहुत बर्षोंतक कठिन तपस्या की थी । उनके शरीरपर वामी जम गयी और उसके ऊपर घास उग गयी थी । बहुत समय व्यतीत होने के कारण वह मिट्टीके टीले के समान प्रतीत होने लगा । दैववश उनकी चमकती हुई आंखो के आगे चीटेयों ने छेद का दिया था । 

एक बार परम धर्मात्मा राजा शर्याति अपनी रानियों तथा अपनी सुकन्या को अपने साथ लेकर सेना के साथ उसी जनमें विहार करने लगे । सुकन्या अपनी सखियों के साथ इधर उधर घूमती हुई उसी वामी के संनिकट जा पहुंची । वह बड़े कुतूहल के साथ उसे देखने लगी । देखते देखते उसकी दृष्टि महर्षि च्यवन की आंखोपर जा पडी जो कि चीटियो के बनाये छिद्रो से चमक रही थीं । सुकन्या ने परीक्षा के लियएक कांटे से उन नेत्रोंमे छेद कर दिया । छेद करते ही वहां से रक्त की धारा बह निकली । सब भयभीत होकर यह से चल दिए।

इस महान् अपराध के कारण शर्यातिके सैन्य बल तथा अन्य सभी का मल मूत्रावरोध, मल मूत्र बंद होने के कारण सब बीमार से हो गए और समस्त सेना में हलचल मच गयी । राजा इम बातसे बहुत दुखित हुए ।राजा ने सोचा, यहाँ श्री च्यवन ऋषि का आश्रम है,कही कुछ अपराध तो नहीं हो गया? उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से पूछा कि किसीने कोई अपराध तो नहीं किया है तब सुकन्या ने अपने पिता को दुखित देखकर वामी से रक्त निकल ने की घटना सुनायी ।

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श्री गणेश द्वारा चंद्र देव को श्राप ।

श्री गणेष द्वारा चंद्र को श्राप देने की कथा गणेशपुराण की यह कथा संक्षेप में इस प्रकार है –

एक बारकी बात है, कैंलास के शिव सदन में लोक पितामह ब्रह्मा करपुरगौर शिव के समीप बैठे थे । उसी समय वहां देवर्षि नारद पहुंचे । उनके पास एक अतिशय सुन्दर और स्वादिष्ट अपूर्व फल था । उस फल को देवर्षि ने करुणामय उमानाथ शंकर के कर कमलों में अर्पित कर दिया । 

उस अदभुत और सुन्दर फल को पिता के हाथमें देखकर गणेश और कुमार दोनों बालक उसे आग्रहपूर्वक माँगने लगे । तब शिव ने ब्रह्मासे पूछा-  ब्रह्मन्! देवर्षि प्रदत्त यह अपूर्व फल एक ही है और इसे गणेश एवं कुमार दोनों चाहते हैं अब आप बतायें, इसे किसको दूं? 

ब्रह्मा ने उत्तर दिया- प्रभो ! गणेश छोटे होने के कारण इस एकमात्र फल के अधिकारी तो षडानन (कार्तिकेय) ही हैं । शंकर जी ने फल कुमार(कार्तिकेय) को दे दिया । किंतु पार्वती नन्दन गणेश सृष्टिकर्ता ब्रह्मापर कुपित हो गये । 
लोक पितामह ने अपने भवन पहुंचकर सृष्टि रचना का प्रयत्न किया तो गणेश ने अदभुत विघ्न उत्पन्न कर दिया ।

वे अत्यन्त उग्ररूप में विधाता के सम्मुख प्रकट हुए । विघ्नेश्वर के भयानकतम स्वरूप को देखकर विधाता भयभीत होकर कांपने लगे । गजानन की विकट मूर्ति ,विचित्र रूप एवं ब्रह्माका भय और कम्प देखकर चन्द्र देव अपने गणों के साथ हँस पड़े ।

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भगवान् श्री गणेश के हाथ में मोदक(लड्डू) का रहस्य ।

एक बार की बात है अत्यन्त सुन्दर, अदभुत,  अलौकिक एवं तेजस्वी गजानन और षडानन के दर्शन  करके देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए । माता पार्वती के चरणो में उनकी अगाध श्रद्धा हुई । उन्होंने सुधासिंचित एक दिव्य मोदक माता पार्वती के हाथमें दिया । उस दिव्य मोदक को माता के हाथ में देखकर दोनों बालक उसे माँगने लगे ।

पहले इस मोदक (लइडू) का गुण सुनो । माताने दोनों पुत्रो से कहा- इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है । निस्सन्देह इसे सूंघने या खानेवाला सम्पूर्ण शास्त्रो का मर्मज्ञ, सब तत्वोंमें प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान विज्ञान विशारद और सर्वज्ञ हो जाता है ।

पद्मपुराण के सृष्टिखंड में उल्लेख है की मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है । संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज ने मोदक को परम मधुर अद्वैत वेदांत का रूपक बताया है।

माता पार्वती ने आगे कहा- मेरे साथ तुम्हारे पिता की भी सहमति है कि तुम दोनो में जो धर्माचरण के द्वारा अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर देगा, वही इस मोदक का अधिकारी होगा ।

माता की आज्ञा प्राप्त होते ही चतुर कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयुर पर आरूढ हो त्रैलोक्य के तीर्थो की यात्रा के लिये चल पड़े और मुहूर्तभर में ही उन्होंने समस्त तीर्थो में स्नान कर लिया ।

इधर मूषकवाहन लंबोदर ने अत्यन्त श्रद्धा भक्तिपूर्वक माता पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गये । उसके कुछ ही देर बाद स्कन्द ने पिताके सम्मुख उपस्थित होकर निवेदन किया की मोदक मुझे दीजिये।

माता पार्वती ने उसी समय कहा की  समस्त तीर्थो में किया हुआ स्नान, सम्पूर्ण देवताओं को किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सब प्रकार के व्रत, मन्त्र, योग और संयमका पालन-ये सभी साधन माता -पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते । 

माता पार्वती ने दोनों पुत्रो की ओर देखकर कहा- अतएव यह गजानन सैकडों पुत्रों और सैकडों गणो से भी बढ़कर है । इस कारण यह देव निर्मित अमृतमय मोदक मैं गणेश को ही देती हूं । माता पिता की भक्तिके कारण यह यज्ञादि में सर्वत्र अग्रपूज्य होगा । इस गणेशकी अम्रपूजा से ही समस्त देवगण प्रसन्न होंगे। 

पिता कर्पूरगौर शिव ने भी कह दिया । माता पार्वती ने सर्वगुण दायक पवित्र मोदक गणेशजी को ही दिया और अत्यन्त प्रसन्नता से उन्होंने समस्त देवताओ के सम्मुख ही उन्हें गणोंके अध्यक्ष पदपर प्रतिष्ठित कर दिया ।

सहस्त्रमुख रावण की कथा । Sahastramukh Raavan

​लंका विज़यके बाद श्रीरामका राज्याभिषेक हो गया था । इस अवसरपर इनके अभिनन्दनके लिये सभी ऋषि मुनि  राजदरबार में, उपस्थित हए । उन्होंने एक स्वर से कहा – राबणके मारे जानेसे अब विश्वमे शान्ति स्थापित हो गयी है । सब लोग सुख और शान्ति की श्वास ले रहे है । उस समय मुनियोद्वारा श्रीरामके पराक्रम और रावणके विनाश की बात सुनकर देवी सीताको हँसी आ गयी । इस समयमे उनकी हंसी देखकर सबका ध्यान उनकी तरफ गया और मुनियोंने देवी सीतासे हसीका कारण पूछा ।

इसपर सीताने रामजी तथा मुनियोंकी आज्ञा लेकर एक अद्भुत वृत्तान्त बतलाते हुए कहा :
जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता महाराज जनकने अपने घरमे एक ब्राह्मणक्रो आदरपूर्वक चातुर्मास्य व्रत करवाया। मैं भलीभांति ब्राह्मण देवताकी सेवा करती थी । अवकाशके समय ब्राह्मण देवता तरह तरहकी कथा मुझे सुनाया करते थे । एक दिन उन्होंने सहस्त्रमुख रावणका वृत्तान्त सुनाया, जो इस प्रकार है-

विश्रवा मुनिकी पत्नीका नाम कैकसी था । कैकसी ने दो पुत्रों को जन्म दिया । बड़ेका नाम सहस्त्रमुख रावण था और छोटेका नाम दशमुख रावण । दशमुख रावण ब्रह्मा के वरदानसे तीनों लोको को जीतकर लंकामे निवास करता है और बड़ा पुत्र पुष्करद्विपमें अपने नाना सुमालिके पास रहता है । 

वह बडा बलवान है। मेरु को सरसोंके समान, समुद्रको गायके खुर और तीनों लोकों को तृणके समान समझता है । सबको सताना उसका काम है । जब सारा संसार उससे त्रस्त हो गया, तब ब्रह्माने उसे “वत्स ! पुत्र !  आदि प्यारभरे सम्बोधनोंसे प्रसन्न किया और किसी तरह इस कुकृत्यसे रोका । उसका उत्पात तो कम हो गया, परंतु समूल गया नहीं । 

उस सहस्त्र मुख रावणकी कथा सुनाकर वे ब्राह्मण यथासमय वापस लौट गये किंतु आज भी वह घटना वैसी ही याद है । आज आपलोग दशमुरव रावणके मारे जाने से ही सर्वत्र सुख शांति की बात कैसे कर रहे हैं जबकि पुष्करद्विपमें सहस्त्रमुख रावणका अत्याचार अभी भी कम नहीं हुआ है, यही सुनकर मुझे हंसी आ गयी, इसके लिये आप सभी मुझे क्षमा करे । 

मेरे स्वामीने दशमुख रावणका विनाशकर महान् पराक्रम का परिचय अवश्य दिया है; किंतु जबतक वह सहस्त्रमुख रावण नहीं मारा जाता, जगत्में पुर्ण आनन्द कैसेहो सकता है ? इस हितकारिणी और प्रेरणादायक वाणी को सुनकर श्रीरामने उसी क्षण पुष्पक विमानका स्मरण किया और इस  शुभकार्य को शीघ्र सम्पन्न करना चाहा । वानरराज़ सुग्रीव और राक्षस राज विभीषणको दलबलके साथ बुला लिया गया । 

इसके बाद बडी सेनाके साथ श्रीरामने पुष्पक विमानसे पुष्कर क्षेत्रके लिये प्रस्थान किया । देवी सीता, सभी भाई और मंत्रीगण साथ थे । पुष्पककी तो अबाध गति थी, वह शीघ्र पुष्कर पहुंच गया । जब सहस्त्रमुख रावणने सुना कि उससे युद्ध करनेके लिये कोई आया है तो उसके गर्व को बहुत ठेस पहुंची । वह तुरत संग्राममें आ पहुचा । वहाँ मनुष्यों, वानरों और भालुओं की लंबी कतार देखकर वह हँस पड़। 

उसने सोचा, इन क्षुद्र ज़न्तुओ से क्या लड़ना है । क्यों न इनको इनके देश भेज दिया जाय  ऐसा सोचकर उसने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया । जैसे  केई बलवान् व्यक्ति बच्चों को गलबहियाँ देकर बाहर निकाल देता है, वैसे वायव्यास्त्रने सभी प्राणियों को बाहर निकाल दिया । केवल चारों भाई, सीताजी, हनुमान, नल, मील,जाम्बवान, विभीषण पर इसका प्रभाव नहीं पड़। अपनी सेना की यह स्थिति देखकर श्रीराम सहस्त्रमुखपर टूट पड़े । 

श्री राम के अमोघ बाणोंसे राक्षस तिल-तिल कटने लगे । यह देख सहस्त्रमुख रावण क्षुब्ध हो गया । वह गरजकर बोला – आज मैं अकेले ही सारे संसारको मनुष्यों और देबताओं से रहित कर दूँगा । यह कहकर वह जोर शोर से रामपर बाण चलने लगा । श्रीरामने भी इसका जबरदस्त जवाब दिया है धीरे धीरे युद्धने लोमहर्षक रूप धारण कर लिया।

सहस्त्रमुख ने पन्नगास्त्र का प्रयोग किया । फलत: विषधर सर्पो से समस्त दिशाएँ एबं विदिशा व्याप्त हो गयी । रामने सौपर्णेयास्त्रसे उसे काट दिया । इसके बाद श्रीरामने उस बाण का संधान किया जिससे इन्होंने रावण को मारा था, किंतु सहस्त्रमुख राबणने इसे हाथसे पकड़कर तोड़ दिया और एक बाण मारकर श्रीराम को मूर्छित कर दिया ।

श्री राम को मूर्छित देखकर सहस्त्रमुख अतीव प्रसत्र हुआ । यह दो हजार हाथोको उठाकर नाचने लगा । सती स्वरूपिणी सीता यह सब सह न सकीं । उन्होंने महाकाली का विकराल रूप धारण का लिया और एक ही निमेषमे सहस्त्रमुख रावणका सिर काट लिया । सेना को तहस नहस कर दिया । यह सब क्षणभरमे हो गया । सहस्त्रमुख रावण ससैन्य मारा गया, किंतु महाकाली का  क्रोध शान्त नहीं हुआ ।

उनके रोम-रोमसे सहस्त्रों मातृका: उत्पन्न हो गयी, जो घोर रूप धारण किये हुए थीं । महाकालीके रोषसे सारा ब्रह्माण्ड भयभीत हो गया । पृथिवी काँपने लगी । देवता भयभीत हो गये । तब ब्रह्मादि देवगण उनके क्रोधक्रो शान्त करनेके लिये उनकी स्तुति करने लगे । उनकी स्तुतियों से किसी तरह देवी का क्रोध शान्त हुआ । श्रीराम भी चैतन्यता को प्राप्त हो गये । देवीने अपना विराठ रूप दिखाकर सभीको आश्वस्त कर दिया । सभीने मिलकर उस आदिशक्ति की आराधना की । 

स्वयं भगवान् श्री राम ने सहस्त्रनाम स्तोत्रसे देवीकी आराधना की।

भगवान् श्री राम जानकी के श्री चरणों के चिन्ह । Symbols on Lotus feet of Sri Sita Ram

भगवान् के चरणारविन्द की महिमा उनके चिन्हों की
कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है । ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक हैं रक्षक है । भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है –

सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका ।
चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका ।।

भगवान् श्रीराम के चरण चिन्हों का वर्णन महारामायण के ४८ वें अध्यायमें महर्षि अगस्त्यकृत श्री रघुनाथचरण चिन्ह स्तोत्र मे आचार्य यामुनकृत आलवन्दार स्तोंत्र में, नाभाजी कृत भक्तमाल में, श्री गोस्वामी जी के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में , गीतावली के उत्तरकाण्ड के पंद्रहवें पद में और रामचरण चिन्हावली नामक पुस्तक में मिलता है ।

महारामायण में श्री राम के चरणचिन्हों की संख्या ४८ बतायी गयी है – २४ चिह्न दक्षिणपद में और २४ चिह्न वामपद मे है ।

**जो चिन्ह श्रीराम के दक्षिणपद में है वे भगवती सीता के वमपद में है और जो उनके वामपदमें हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिणपद में है ।

श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं – पढना जारी रखे

​तीन बार ‘राम’ नाम लेने का परामर्श देनेपर वामदेव को महर्षि वशिष्ठ का शाप

एक बार महाराज दशरथ राम आदी के साथ गंगा स्नान के लिये जा रहे थे । मार्गमें देवर्षि नारदजी से उनकी भेंट हो गयी । महाराज  दशरथ आदि सेभीने देवर्षि को प्रणाम किया । 
तदनन्तर नारदजी ने उनसे कहा – महाराज ! अपने पुत्रों तथा सेना आदि के साथ आप कहां जा रहे हैं ? इसपर बड़े ही विनम्रभाव से राजा दशरथ ने बताया- भगवन ! हम सभी गंगा स्नान की अभिलाषा से जा रहे है ।

इसपर मुनि ने उनसे कहा -महाराज ! निस्संदेह आप बड़े अज्ञानी प्रतीत होते है क्योकि पतितपावनी भगवती गंगा जिनके चरणकमलों से प्रकट हुई है, वे ही नारायण श्री राम आपके पुत्ररूप में अवतरित होकर आपके साथमें रह रहे है उनके चरणोंकी सेवा और उनका दर्शन ही दान, पुण्य और गंगा स्नान है, फिर हे राजन् ! आप उनकी सेवा न करके अन्यत्र कहाँ जा रहे है । पुत्र भावसे अपने भगवान् का ही दर्शन करे । श्री राम के मुखकमल के दर्शन के बाद कौन कर्म करना शेष बच जाता है ?

पतितपावनी गंगा अवनीमण्डले ।
सेइ गंगा जन्मिलेन यार पदतले ।। 
सेइ दान सेइ पुण्य सेइ गंगास्नान । 
पुत्रभावे देख तुमि प्रभु भगवान् ।। 
(मानस ,बालकाण्ड) 

नारदजी के कहने पर महाराज दशरथ ने वापस घर लौटने का निश्चय किया किंतु भगवान् श्रीराम ने गंगा जी की महिमा का प्रतिपादन करके गंगा स्नान के लिए ही पिताजी को सलाह दी । तदनुसार महाराज दशरथ पुन: गंगा स्नान के लिये आगे बढे । मार्ग में तीन करोड सैनिकों के द्वारा गुहराज ने उनका मार्ग रोक लिया । गुहराज़ ने कहा – मेरे मार्ग को छोड़कर यात्रा करे , यदि इसी मार्ग से यात्रा करना हो तो आप अपने पुत्र का मुझे दर्शन करायें । इसपर दशरथ की सेनाका गुह की सेना के साथ घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो गया । 

गुह बंदी बना लिये गये । कौतुकी भगवान् श्री राम ज्यों ही युद्ध देखने की इच्छा से गुहराज के सामने पड़े, गुहने दण्डवत प्रणामकर हाथ जोड़ प्रणाम् किया । प्रभु के पूछने पर उसने बताया – प्रभो ! मेरे पूर्वजन्म की कथा आप सुनें – मैं पूर्व जन्म में महर्षि वसिष्ट का पुत्र वामदेव था ।

एक बार राजा दशरथ अन्धक मुनि के पुत्र की हत्या का प्रायश्चित्त पूछने हमारे आश्रम मे पिता वसिष्ठ के पास आये, पर उस समय मेरे पिताजी आश्रम में नहीं थे । तब महाराज दशरथ ने बडे ही कातर स्वर में हत्या का प्रायश्चित्त बताने के लिये मुझसे प्रार्थना की। उस समय मैंने राम नाम के प्रताप को समझते हुए तीन बार ‘राम राम राम’ इस प्रकार जपने से हत्याका प्रायश्चित्त हो जायगा परामर्श राजाको बतलाया था । तब प्रसन्न होकर राजा वापस चले गये ।

पिताजी के आश्रम में आने पर मैने सारी घटना उन्हें बतला दी। मैंने सोचा था कि आज पिताजी बड़े प्रसन्न होंगे, किंतु परिणाम बिलकुल ही विपरीत हुआ । पिताजी क्रुद्ध होते हुए बोले – वत्स ! तुमने यह क्या किया, लगता है तुम श्री राम नामकी महिमा को ठीकसे जानते नहीं हो, यदि जानते होते तो ऐसा नहीं कहते, क्योकि राम इस नामका केवल एक बार नाम लेनेमात्र से कोई पातक उप-पातकों तथा ब्रह्महत्यादि महापातको से भी मुक्ति हो जाती है फिर तीन बार राम नाम जपने का तुमने राजाको उपदेश क्यों दिया ? 

जाओ, तुम नीच योनि में जन्म ग्रहण करोगे और जब राजा दशरथ के घरमे साक्षात् नारायण श्री राम अवतीर्ण होंगे तब उन के दर्शने से तुम्हारी मुक्ति होगी । 

प्रभो ! आज मैं करुणासागर पक्तिपावन आपका दर्शन पाकर कृतार्थ हुआ । इतना कहकर गुहरांज प्रेम विह्नल हो रोने लगा । तब दयस्थागर श्रीराम ने उसे बन्धन मुक्त किया और अग्नि को साक्षी मानकर उससे मैत्री कर ली । भगवान् के मात्र एक नाम का प्रताप कितना है यह इस प्रसंग से ज्ञात होता है ।

श्री रामचंद्र भगवान् की आदर्श दिनचर्या और आदर्श रामराज्य

भगवान् श्रीराम अनन्त क्रोटि ब्रह्माण्ड नायक परम पिता परमेश्वर के अवतार थे और उन्होंने धर्मकी मर्यादा रखने के लिये भारत भूमि अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में अवतार लिया था । उस समय राक्षसो का नग्न बीभत्स रूप इतना प्रचण्ड हो गया कि ऋषि मुनियो एवं गौ ब्राह्मणों का जीवन खतरे में पड़ गया था । जहां जहां कोई शास्त्र विहित यज्ञ कर्म आदि किये जाते थे, राक्षस गण उन्हें विध्वंस करने के लिये सदा तत्पर रहते थे ।

राक्षसों का राजा रावण भारत भूमिपर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिये चारों ओर जाल फैला रहा था ,ऐसी स्थिति में देवताओ के आग्रह एवं अनुनय विनय के फल स्वरूप भगवान् स्वयं अपने अंशोंसहित राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूपमें अवतीर्ण हुए ।

भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र का विवरण हम भिन्न भिन्न रामायणों में पाते हैं जिनमें वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण तथा पूज्य श्री गोस्वामी जी का रामचरितमानस प्रमुख है ।

साधारण बालकों की तरह बालकपन में अपने छोटे  भाइयों एवं बाल सखाओ के साथ भगवान् श्रीराम सरयूके तटपर कंदुक क्रीडा एवं अन्य खेलो में ऐसे मस्त हो जाते थे कि उन्हें अपने खाने पीने की भी सुध नहीं रहती थी ।

प्रजापालन के लिये भगवान् विशेष सचेष्ट एवं सतर्क रहते है । राज़सभा में सनकादि तथा नारद अष्ट ऋषि प्रतिदिन जाते है और उनसे वेद पुराण तथा इतिहास की चर्चा करते है । प्रजा को मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका यह पहला आदेश था कि यदि भूल से मैं कुछ अनीतिपूर्ण वचन कहूँ जो शासन विरुद्ध, न्याय विरुद्ध या द्वेषयुक्त हो तो भय छोड़कर मुझे यह कहकर तुरंत रोक देना कि – राम ! तुम्हारा यह कार्य अनुचित है ।

भगवान् श्रीराम जी की दिनचर्या का आनन्दरामायण के राज्यकाण्ड के १९ वें सर्ग में बड़े विस्तार से वर्णन है । श्रीरामदास के द्वारा महर्षि वाल्मीकि जी अपने शिष्य को उपदेश करते हैं –

श्रृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञ: शुभावहा ।
दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ।।
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दन: ।
नववाद्यनिनादांश्च सुखं शुश्राव सीतया ।।
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दृशरथं सुरान् ।
पुण्यतीर्थानि  मातृश्च देवतायतनानि च ।।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १-३ ) 
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विविध पुराणों में श्री गणेश भगवान् की प्राकट्य कथाएं 

विभिन्न युगों में भगवान् के सगुण – साकार रूप में विभिन्न अवतारों का दिव्य दर्शन हमें प्राप्त होता है । भगवान् नारायण (विष्णु ) ,श्री शंकर , श्री महाशक्ति दुर्गा ,श्री गणेश और सूर्यदेव – ये पंचतत्व एक ही परमतत्व के पांच स्वरुप है  । अवतार इन पांच देवों में से ही किसी का होता है अथवा इनके माध्यम से होता है ।वैसे दिव्य धामो में इनके पृथक पृथक दिव्य धाम है ,किंतु साकार विग्रह पृथक पृथक होते हुए भी ये एक ही परमतत्व के अनेक रूप है । इनमे न समर्थ्यका कोई अंतर है और न अनुग्रह का ।

भगवान् साकार भी है और निराकार भी , भक्त जिस स्वरुप में उनको पूजता है उसी स्वरुप में वो दर्शन देते है । भक्तो के प्रेम में बांध कर ही निसाकार प्रभु साकार बनकर आते है । बहुत से निराकार उपासक कहते है की भगवान् साकार कैसे हो सकते है ? वे तो केवल निराकार है । ध्यान देने योग्य बात है की जब भगवान् मनुष्य के शरीर को आकार दे सकते है , पेड़ पौधो , पर्वतो, संसार की वस्तुओ को आकार दे सकते है तब क्या वे स्वयं साकार रूप धारण नहीं कर सकते ।

कोई कहता है की नारायण परम तत्व है ,कोई कहता है शिव और कोई कुछ । भागवत आदि वैष्णव पुराणो के अनुसार नारायण ही तत्व है और विश्व की उत्पत्ति उन्ही से हुई है । शिवपुराण के अनुसार शिव परम तत्व है और देवी पुराण के अनुसार देवी परम तत्त्व है । इसीलिए कहा जाता है की किसी एक सम्प्रदाय और उससे जुड़े ग्रंथो से ही जुड़े रहना चाहिए । उदहारण : यदि कोई व्यक्ति वैष्णव संप्रदाय से जुड़ जाए तो वो भागवत पुराण और वैष्णवो द्वारा लिखित ग्रंथो का अध्ययन करेगा जिसमे लिखा होगा की नारायण ही वरं तत्त्व है ,वे ही सर्वशतिमान है । वो यदि दूसरे ग्रन्थ पढ़ लेगा तो भ्रम में पड़ जायेगा । बात इनती ही याद रखनी है की भगवान् एक है और ऐनी इष्ट से अतिरिक्त अन्य किसी भी अवतार ,स्वरुप की निंदा नहीं करनी ।

घर की छत पर पहुँचने के बहुत से रास्ते है । सीढ़ी से चढ़ क्र , रस्सी से चढ़कर ,दीवार चढ़कर , पेड़ो के टहनियों से जाकर आदि आदि  परंतु अंततः पहुंचना तो छत पर ही है । भगवान् तक पहुँचने के मार्ग भी अलग अलग है पर सब उसी परमतत्व तक ले जाते है । अवतारों में अंतर केवल और केवल एक ही है । वह ये की जब श्रीकृष्ण शंकर रूप में होते है तब उनकी लीलाओं में इतना माधुर्य नहीं होता की वह जीव को आकर्षित कर सके ।श्री कृष्ण रूप में माधुर्य प्रेम रस भरा हुआ है ।

प्रायः वैष्णव पुराण श्रीमद् भागवत का प्रचार अधिक होने से और समर्थ आचार्यो की समाज में कमी से लोग भगवान् शंकर आदि को कम बताते फिरते है । कई चित्रो और प्रवचनों में दर्शाया जाता है की गोलोक धाम अन्य कैलाश, साकेत धाम से ऊपर है । कृष्ण से जुड़े ग्रंथो में गोलोक धाम श्रेष्ठ है, श्रीराम से जुड़े ग्रंथो अनुसार साकेत धाम ,शैव ग्रंथो के अनुसार कैलाश धाम । सत्य बात यही है की भक्त जिस रूप में भगवान् को पूजता है ,उसे वही रूप,धाम आदि की प्राप्ति होती ही ।

वेदों और पुराणों के अनुसार श्री गणेश का प्राकट्य
श्री गणेश जी आदि देवता हैं । उनकी अनादि काल से उपासना एवं महिमा के कई प्रमाण वेदों, पुराणों तथा अन्य ग्रंथो में उपलब्ध हैं, यथा-

गणानां त्वा गणपति ्ँ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ्ँ
हवामहे निधीनां त्वा निधिपति ्ँ हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्। 

(शुक्लयजुर्वेद २३ । १९ ) 

अर्थात् हे गणों के बीच रहनेवाले सर्वश्रेष्ठ गणपति ! हम आपका आवाहन करते हैं । हे प्रियोंके बीच रहनेवाले प्रियपति ! हम आपका आवाहन करते हैं । हे निधियों के बीच सर्वश्रेष्ठ निधिपति ! इम आपका आवाहन करते हैं । हे ज़गत को बसानेवाले ! आप हमरे हों । आप समस्त जगत को गर्भमें धारण करते हैं, पैदा (प्रकट) करते हैं । आपकी इस क्षमता को हम भली प्रकार जाने ।

इसी प्रकारका उल्लेख ऋरवेद (२ । २३ । १) में भी मिलता है, जिसमें श्रीगणेश का आवाहन किया गया है ।

गणपति अथर्वशीर्षोपनिषद ( ६ ) -में वर्णित है कि श्रीगणेश सर्वदेवमय हैं । यथा-

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रूद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यंस्त्वं चन्द्रस्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ।।

अर्थात् तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, सगुण ब्रहा हो, तुम निर्मुण त्रिपाद भू:, भुवः, स्व: एवं प्रणव हो । 

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भगवान् विष्णु का १८ पुराणों के रूप में प्राकट्य

​ब्राह्मं मूर्धा हररेवे हृदयं पद्मसंज्ञकम्।। 
वैष्णवं दक्षिणो बाहु: शैव वामो महेशितु: ।
ऊरू भागवतं प्रोक्तं नाभि: स्यान्नारदीयकम्।। 
मार्कण्डेयं च दक्षांघ्रिर्वामो ह्याग्नेयमुच्यते । 
भविप्यं दक्षिणो जानुर्विष्णोेरेव महात्मन: ।।
ब्रह्मवैवर्तसंज्ञं तु वामाजानुरुदाहृतः । 
लैङ्गं तु गुल्फकं दक्षं वाराहं वामगुल्फकम्।। 
स्कान्दं पुराणं लोमानि त्वगस्य वामनं स्मृतम् । 
कौर्मं पृष्ठं समाख्यातं मात्स्यं मेद: प्रकीर्त्यते ।।
मज्जा तु गारुडं प्रोक्तं ब्रह्माण्डमस्थि गीयते । 
एवमेवाभवद्विष्णु: पुराणावयवो हरि: ।।

 (पद्मपुराण .स्व.ख.६२ । २-७) 

ब्रह्मपुराण भगवान् विष्णु का सिर, पद्मपुराण हृदय, विष्णुपुराण दक्षिणबाहु, शिवपुराण वामबाहु, भागवत पुराण जंघायुगल, नारदपुराण नाभि, मार्कण्डेयपुराण दक्षिण चरण और अग्निपुराण वाम चरण है । भविष्य उनका दक्षिण जानु ,ब्रह्मवैवर्त वाम जानु ,लिङ्गपुराण दक्षिण गुल्फ (टाँखना) , वराहपुराण वाम गुल्फ, स्कन्दपुराण रोम, वामनपुराण त्वचा, कूर्मंपुराण पीठ, मत्स्यपुराण मेद, गरुडपुराण मज्जा और ब्रह्माण्डपुराण अस्थि है । इस प्रकार भगवान् विष्णु पुराण विग्रह के रूपमें प्रकट हुए हैं । 

भस्म (विभूति) धारण का दिव्य माहात्म्य ।

​महर्षि दुर्वासा अत्रिमुनि के पुत्ररूप में भगवान् शंकर के अंशसे उत्पन्न हुए थे । अत: ये रुद्रावतार नामसे भी प्रसिद्ध है ।अपने परमाराध्य भगवान् शंकर में इनकी विशेष भक्ति थी । ये भस्म एवं रुद्राक्ष धारण किया करते थे । इनका स्वभाव अत्यन्त उग्र था । यद्यपि उग्र स्वभाव के कारण इनके शापसे सभी भयभीत रहते थे तथापि इनका क्रोध भी प्राणियो-के परम कल्याण के लिये ही होता रहा है । एक समय महर्षि दुर्वासा समस्त  भूमण्डल का भ्रमण करते हुए पितृलोक में जा पहुंचे । वे सर्वांग में भस्म रमाये एवं रुद्राक्ष धारण किये हुए थे । 

हृदय मे पराम्बा भगवती पार्वती का ध्यान और मुख से -‘ जय पार्वती हर’ का उच्चारण करते हुए कमण्डलु तथा त्रिशूल लिये दुर्वासा मुनि ने वहां अपने पितरों का दर्शन किया । इसी समय उनके कानो में करुण क्रन्दन सुनायी पडा । वे पापियों के हाहाकारमय भीषण रुदन को सुनकर कुम्भीपाक, रौरव नरक आदि स्थानों को देखने के लिये दौड़ पड़े । वहाँ पहुंचकर उन्होंने वहाँ के अधिकारियो से पूछा – रक्षको ! यह करुण क्रन्दन किनका है ? ये इतनी यातना क्यों सह रहे है ? 

उन्होंने उत्तर दिया- यह संयमनीपुरी का कुम्भीपाक नामक नरक है । यहां वे ही लोग आकर कष्ट भोगते है, जो शिव, विष्णु, देवी, सूर्य तथा गणेश के निन्दक है और जो वेद पुराण की निन्दा करते है ब्राह्मणोंके द्रोही है और माता, पिता, गुरु तथा श्रेष्ट ज़नो का अनादर करते है, जो धर्मके दूषक है वे पतितजन यहां घोर कष्ट पाते है । उन्ही पतितो का यह महाघोर दारुण शब्द अपको सुनायी दे रहा है । 

यह सुनकर दुर्वासा ऋषि बहुत दुखी हुए और दुखियों को देखने के लिये वे उस कुण्डके पास गये । कुण्डके समीप जाकर ज्यों ही वे सिर नीचा करके देखने लगे त्यों ही वह कुण्ड स्वर्ग के समान सुन्दर हो गया । वहाँ के पापी जीव एकाएक प्रसन्न हो उठे और दु:ख से मुक्त होकर गद्गदस्वर से मधुर भाषण करने लगे । उस समय आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी और विविध समीर चलने लगे । वसन्त ऋतु के समान उस सुखदायी समय मे यमदूतो को भी विस्मय में डाल दिया । स्वयं मुनि भी यह आश्चर्य देखकर बड़े सोच में पड़ गये । 

चकित होकर यमदूतों ने धर्मराजके निकट जाकर इस आश्चर्यमय स्थिति परिवर्तन की सुचना दी और कहा – महाभाग ! बड़े आश्चर्य की बात है कि सभी पापियों को इस समय अपार आनन्द हो गया है, किसी को किसी प्रकार की यम यातना रह ही नहीं गयी । विभो ! यह क्या बात है ?दूतों की यह खात सुनते ही धर्मराज स्वयं वहाँ गये और वहांका दृश्य देखकर वे भी बहुत चकित हुए । उन्होंने सभी देवताओ को बुलाकर इसका कारण पूछा, परंतु किसी को इसका मूल कारण नहीं ज्ञात हो सका । जब किसी प्रकार इसका पता न चला, तब  ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से धर्मराज भगवान् शंकर के पास गये । पार्वती के साथ विराजमान भगवान् शंकर का दर्शन कर वे स्तुति प्रार्थना करते हुए कहने लगे-
हे देवदेव ! कुम्मीपाक का कुण्ड एकाएक स्वर्गके समान हो गया, इसका क्या कारण है ? प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं अत: अपकी सेवा में हम आये है । हमलोगोंके संदेह को आप दूर करने की कृपा करे ।

सर्वान्तर्यामी भगवान् ने गम्भीर स्वर से हंसते हुए कहा – देवगणो ! इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है, यह विभूति ( भस्म) का ही माहात्म्य है । जिस समय मेरे परम भक्त दुर्वास मुनि कुम्मीपाक नरक को देखने गये थे, उस समय वायुके वेगसे उनके ललाट से भस्म के कुछ कण उस कुण्डमें गिर पड़े थे । इसी कारण वह नरक स्वर्ग के समान हो गया है और अब वह स्वर्गीय ‘पितृतीर्थ’ के नामसे प्रसिद्ध होगा । 

कुम्भीपाकं गतो द्रष्टुं दुर्वासा: शैवसम्मतः।।
अवांगमुखो ददर्शाधस्तदा वायुवशाद्धरे ।
भाले भस्मकणास्तत्र पतिता दैवयोगतः ।।
तेन जातमिदं सर्वं भस्मनो महिमा त्वयम्।
इतः परं तु  तत्तीर्थं पितृलोकनिवासिनाम्।। 
भविष्यति न संदेहो यत्र स्नात्वा सुखी भवेत्। 
(देवीभागवत ११ । १५ ।६४-६७) 

भगवान् शंकर की बात सुनकर धर्मराजसहित सभी देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए । उसी समय उन्होंने उस कुण्ड के समीप शिवलिङ्ग तथा देवी पार्वती की स्थापना की और वहाँ के पापियों को मुक्त कर दिया । तभीसे पितृलोक में उस मूर्तिके दर्शन पूजन करके पितृलोग शिवधाम (मोक्ष) प्राप्त करने लगे । यह चमत्कार परम शैव रुद्रावतार महर्षि दुर्वासा मुनि की शिबभक्ति तथा उनके भालपर  विराजमान शिवविभूति(भस्म) का ही था ।
(देवीभागवत) 

जो नमः शिवाय इस मन्त्रका उच्चारण करता है, उसका मुख देरवनेसे निश्चय ही तीर्थ दर्शन का फल प्राप्त होता है। जिसके मुख में ‘शिव’ नाम तथा शरीरपर भस्म और रुद्राक्ष रहता है, उसके दर्शनेसे ही पाप नष्ट हो जाते है । (शिवपुराण. शा. सं.अ ३०)