भगवान् शंकर का आकाश भैरव (शरभ )अवतार लेकर नृसिंह भगवान् को परास्त करना ।

​लिंगपुराण के १६ वे अध्याय में शरभरूप शिव का नृसिंह रूप विष्णु को परास्त करने की कथा बड़ी विचित्र है। हिरण्यकश्यपु का वध करके विष्णुरूप नरसिंह भयंकर गर्जना करने लगे ।उनकी भयंकर गर्जना के घोर शब्द से ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक कांप उठे । लिब सिद्ध, साध्य, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवता भी अपने अपने प्राण बचाने के लिये भयभीत हो भागे । वे लोकालोक पर्वत के  शिखरपर से अति विनम्र भाव से नृसिंह जी की स्तुति करने लगे । परंतु नृसिंह जी इसपर भी शान्त न हुए । तब तो सब देवता अपनी रक्षाके लिये भगवान् शिव जी के समीप गये । देबताओ की दीन दशा देखकर शिवजी ने प्रसन्नवदन होकर कहा कि हम शीघ्र ही नृसिंह रूप अग्नि को शान्त करेंगे । 

देवताओ  की स्तुति सुनकर नृसिंहरूप तेज को शान्त करने के लिये महादेवजी ने भैरवरूप अपने अंश वीरभद्र का स्मरण किया । वीरभद्र उसी क्षण उपस्थित हुए । महादेवजी ने वीरभद्रसे कहा- इस समय देवताओ को बडा भय हो रहा है । इस कारण नृसिंहरूप अग्नि को शीघ्र जाकर शान्त करो । पहले तो मीठे वचनों से समझाओ, यदि न समझे तो भैरवरूप दिखलाओ ।

शिव जी की यह आज्ञा पाकर शांतरूप से वीरभद्र नृसिंह के समीप जाकर उनको समझाने लगे । इस समय का वीरभद्र विष्णु संवाद बडा मार्मिक है ।
वीरभद्र ने कहा – हे नृसिंहजी ! आपने जगत् के कल्याण के लिये अवतार लिया है और परमेश्वर ने भी जगत् की रक्षा का अधिकार अपको दे रखा है । मत्स्यरूप धरकर उपने इस जगत् की रक्षा की । कूर्म और वराहरूप से पृथ्वी को धारण किया, इस नृसिंहरूप से हिरण्यकशिपु का संहार किया, वामन रूप धारण कर राजा बलि को बाँधा । इस प्रकार जब जब लोको में दुख उत्पन्न होता है, तब तब आप अवतार लेकर सब दुख दूर करते है । आप सब जीवोंके उत्पन्न  करनेवाले और प्रभु है । आपसे अधिक कोई शिवभक्त नहीं ।

वीरभद्र ने शान्तिमय वचनोंसे नृसिंहजी की क्रोधाग्नि शांत न हुई।उन्होंने उत्तर दिया- वीरभद्र ! तू जहा से आया हैं वहीं चला जा । इसपर नृसिंहजी से वीरभद्र का बहुत विवाद हुआ । अन्त में शिववृपसे बीरभद्रका अति दुर्धर्ष, आकाशतक व्यापक, बडा विस्तृत एवं भयंकर रूप हो गया । उस समय शिवजी के उस भयंकर तेजस्वी स्वरूप में सब तेज विलीन हो गये । इस रूपका आधा शरीर मृगका और आधा शरभ पक्षीका था । शरभरूप शिव अपनी पुच्छ में नृसिंह को लपेटकर छाती में चोंच का प्रहार करते हुए जैसे सर्प को गरुड़ ले उड़े, ऐसे ले उड़े । फिर तो नृसिंहजीने शिवजी से क्षमा याचना की और अति विनम्रभाव से स्तुति की । 

भगवान् श्री गौरी शंकर एवं श्री लक्ष्मी नारायण एक स्वरुप है -धर्म शास्त्रो में अनेक प्रमाण ।

भगवान् श्री गौरी शंकर और श्री लक्ष्मी नारायण एक ही है इसके बहुत से प्रमाण शास्त्रो में उपलब्ध है। प्रमुख कुछ कथाये और श्लोक यहाँ दीये जा रही है जिस कारण से इनका एक स्वरुप होना स्पष्ट है –

shiv vishnu one form

(१)एक बार भगवान् नारायण अपने वैकुण्ठ लोक में सोये हुए थे । उन्हीने एक स्वप्न देखा , स्वप्न में वे क्या देखते है कि करोडो चन्द्रमाओं की कान्तिवाले, त्रिशूल डमरू धारी, स्वर्णाभरण भूषित, सुरेन्द्र वन्दित, अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान् शिव प्रेम और आनन्दातिरेक़ से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है । उन्हें देखकर भगवान् श्री हरि हर्ष गदगद हो सहसा  शय्यापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे । उन्हें इम प्रकार बैठेे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि -भगवन्! अपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है ?

भगवान् ने कुछ देरतक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनन्द मे निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे । अन्त मे कुछ स्वस्थ होनेपर वे गदगद कंठ से इस प्रकार बोले – देवि ! मैंने अभी स्वप्न में भगवान् श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनन्दमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी । मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है । अहोभाग्य ! चलो, कैंलास में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करे । यह कहकर दोनों कैलास की ओर चल दिये ।

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सुंदर कथा ३३(श्री भक्तमाल – गौ भक्त राजर्षि दिलीप) Sri Bhaktamal -Gau bhakt Sri Dileep ji

गौ उपासक पूज्यपाद​ श्री गणेशदास भक्तमाली जी महाराज , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,गोऋषि श्री दत्तशरणानंद जी महाराज के कृपाप्रसाद ,प्रवचनों एवं रघुवंशम् से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ। 

महाराज दिलीप और देवराज इन्द्र में मित्रता थी । देवराज के बुलाने पर दिलीप एक बार स्वर्ग गये । देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। राजा दिलीप ने सहायता करने के लिए हाँ कर दी और देव असुर युद्ध हुआ । युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्ग में कामधेनु मिली; किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं । कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की।  इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया- मेरी संतान (नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा । पढना जारी रखे

सभी पूज्य सिख गुरु श्रीराम कृष्ण के अनन्य उपासक ,सनातन धर्मी थे एवं गौ ब्राह्मणों को पूज्य मानते थे

® पूज्य संत श्री धर्मसिंह से सुनी और एक भक्त द्वारा बताई गयी जानकारी के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । Copyrights : http://www.bhaktamal.com ® 

एक बडे ही उच्चकोटि के सुप्रसिद्ध संत हुए पूज्य संत श्री धर्मसिंह जी महाराज और बड़े ही विद्वान् महापुरुष माने गये है । एक जिज्ञासु ने उनके श्रीचरणों में बैठकर जो सदुपदेश लिखे थे, वे यहां पर दिये जा रहे है ।

सिख गुरुओं का जीवनाधार श्रीरामनाम

१.प्रश्न -महाराज़ ! हमे क्या करना चाहिये ?
उत्तर- मनुष्य जीवन का उद्देश्य एकमात्र ईश्वर-प्राप्ति करना है, सो तुम्हें भी ईश्वर-प्राप्ति का साधन करना चाहिये ।

२.प्रश्न-ईंश्वर प्राप्तिका साधन क्या है ?
उत्तर -ईंश्वर प्राप्ति का साधन है श्रीरामनाम जपना ,श्रीराम भक्ति करना ।

३.प्रश्न-क्या ईश्वर और राममे कुछ अंतर है ?
उत्तर- उसे ही ईश्वर कहते है और उसे ही श्रीराम कहते है और उसे ही श्रीकृष्ण कहते है इनमें कोई अन्तर नहीं है ।

४.प्रश्न- सिख मत में और गुरुग्रन्थसाहब में कल्याण का साधन क्या बताया गया है ?
उत्तर- हमारे सिख धर्म मे और श्री गुरुग्रन्थ साहब में सनातन धर्मकी सभी बातो को मान्यता दी गयी है । वेद-शास्त्रपुराणों की बात ही श्री गुरुग्रन्थसाहब में भरी पडी है और श्रीगुरुग्रन्थ साहब श्रीराम, कृष्ण, हरि, गोविन्द, नारायण आदि श्रीभगवन्नामो से भरा पडा है ।

५.प्रश्र- आजकल के बहुत से सिख यह कहते है कि हम हिन्दू नहीं है और हमारा हिन्दुओं से कोई संबंध नहीं है और हम दशरथनन्दन श्रीराम को नहीं मानते हम तो निराकार राम को मानते हैं और श्री गुरुग्रन्थसाहब में निराकार रामकी उपासना बतायी गयी है, इस संबंध में आपका बया मत है ?
उत्तर- जो सिख होकर ऐसा कहते है कि हम हिन्दू नहीं है और हम श्रीदशरथनन्दन राम को नहीं मानते और हमारा राम निराकार राम है तो वे महामूर्ख है ,कोरे अज्ञानी है । उन्हें न तो सिखधर्म का ज्ञान है और न उन्हें श्री गुरुग्रन्थसाहब का ज्ञान है । हमरे पूज्य प्रात:स्मरणीय श्री गुरुगोविन्द सिंह जी महप्राजने श्रीभगवती नैना देवी को प्रसन्न कर प्रकट किया तो उन्होंने ,उनसे गौ रक्षा एवं हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना की

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भगवान् शिव एवं नारायण का विलक्षण प्रेम

​प्राचीन कालमे सुरमुनिसेवित कैलास शिखरपर महर्षि गौतम का एक आश्रम था । वहाँ एक बर पताल लोक से जगद्विजयी बाणासुर अपने कुलगुरु शुक्राचार्य तथा अपने पूर्वज भगवत शिरोमणि प्रह्वाद,दानवीर बलि एवं दैत्यराज बृषपर्वा के साथ आया और महर्षि गौतम के सम्मान्य अतिथिके रूपये रहने लगा । एक दिन प्रात:काल वृषपर्वा शौच स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर भगवान् शंकर की पूजा कर रहा था । इतनेमें ही महर्षि गौतमका एक प्रिय शिष्य, जिसका अन्वर्थ नाम शंकरात्मा था और जो अवधूत के देशमें उन्मत्त की भाँति विचरता था, विकराल रूप बनाये वहाँ आ पहुंचा और वृषपर्वा तथा उनके सामने रखी हुई शंकर की मूर्तिके बीचमे आकर खड़ा हो गया ।

वृषपर्वा को उसका इस प्रकार का उद्धत सा व्यवहार देखकर बडा क्रोध आया । उसने जब देखा कि वह किसी प्रकार नहीं मानता तो चुपके से तलवार निकालकर उसका सिर धड़से अलग कर दिया । जब महर्षि गौतम को यह संवाद मिला तो उनको बडा दुख हुआ, क्योकि शंकरात्मा उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय था । उन्होंने उसके बिना जीवन व्यर्थ समझा और देखते-देखते वृषपर्वा की आँखोंके सामने योगबलसे अपने प्राण त्याग दिये ।

महर्षि गौतम को इस प्रकार देहत्याग करते देखकर शुक्राचार्य से भी नहीं रहा गया, उन्होंने भी उसी प्रकार अपने प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया और उनकी देखादेखी प्रहृलाद आदि अन्य दैत्योंने भी वैसा ही किया । बात-की-बातमें ऋषिके आश्रममें शिव भक्तो की लाशों का ढेर लग गया । यह करुणापूर्ण दृश्य देखकर ऋषिपत्नी अहल्या हृदयभेदी स्वर से आर्तनाद करने लगी।

उनकी क्रन्दन ध्वनि भक्तभयहारी भगवान् भूतभावन शिव के कानो तक पहुंची और उनकी समाधि टूट गयी । वे वायुवेगसे महर्षि गौतमके आश्रमपर पहुँचे । इसी प्रकार गज की करुण पुकार सुनकर एक बार भगवान् श्री हरि भी वैकुण्ठ से आतुर होकर दौड़े आये थे । धन्य भक्तवत्सलता ! दैवयोग से ब्रह्माजी तथा विष्णु भगवान् भी उस समय कैलाश में ही उपस्थित थे । उन्हें भी कौतूहलवश शंकरजी अपने साथ लिवा लाये ।
भगवान् शिव ने आश्रम में पहुँचकर अपने कृपाकटाक्ष से ही सबको बात ही बात में जीवित कर दिया तब वे सब खड़े होकर भगवत् मृत्युञ्जय की स्तुति करने लगे । भगवान् शंकर ने महर्षि गौतमसे कहा – हम तुम्हारे इस अलौकिक साहस एवं आदर्श त्याग पर अत्यंत प्रसन्न है वर माँगो । महर्षि बोले – प्रभो ! उपने यहाँ पधारकर मुझे सदाके लिये कृतार्थ कर दिया । इससे बढकर मेरे लिये और कौन सी वस्तु प्रार्थनीय हो सकती है ? मैंने आज़ सब कुछ या लिया । मेरे भाग्यकी आज़ देवतालोग भी सराहना करते है । यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये । मै चाहता हूँ आज आप मेरे यहाँ प्रसाद ग्रहण करें । 

भगवान् तो भावके भूखे है । भावके वशीभूत होकर उन्होंने एक दिन श्रीरामरूपमे शबरी के बेर और श्रीकृष्ण रूपमें सुदामाके चावल का भोग लगाया था । उन्होंने महर्षि की अविचल एवं निश्छल प्रीति देखकर उनका निमन्त्रण तुरंत स्वीकार कर लिया और साथ ही ब्रह्मा विष्णु को भी महर्षि का आतिथ्य स्वीकार करने को राजी कर लिया । जबतक इधर भोजन की तैयारी हो रही थी, तबतक शंकर विष्णु को साथ लेकर आश्रम के एक सुन्दर भबनमे गये और वहाँ एक सुकोमल शय्यापर लेटकर बहुत देरतक प्रेमालाप करते रहे । इसके अनन्तर वे आश्रमभूतिमें स्थित एक सुरम्य सरोवर में जाकर वहाँ जलक्रीडा करने लगे । 

रंगीले भोलेबाबा भगवान् श्रीहरिके पद्मदलायत लेचनोपर कमलकिञ्जल्कमिश्रित जल अंजलिके द्वारा फेंको लगे । भगवान ने उनके प्रहार को न सह सकने के कारण अपने दोनों नेत्र मूँद लिये । इतनेमें ही भोलेबाबा अवसर पाकर तत्काल उछलकर भगवान् के  कंधो पर आरूढ हो गये । वृषभारोहणका तो उन्हें प्रवास ही ठहरा, ऊपरसे जौरसे दबाकर उन्हें कभी तो पानीके अंदर ले जाये और कभी फिर ऊपर ले आवे । इस प्रकार जब उन्हें बहुत तंग किया तो विष्णुभगवान् ने भी एक चाल खेली । उन्होंने तत्क्षण शिबजी को पानीमें दे मारा । शिवजीने भी नीचेसे ही भगवान् की दोनों टाँगे पकडकर उन्हें गिरा दिया । 
इस प्रकार कुछ देरतक दोनोंमे पैंतरेबाजी और दाँव पेच चलते रहे । विमानस्थित देवगण अन्तरिक्ष से इस अपूर्व आनन्द को लूटने लगे । धन्य है वे आँखे जिन्होंने उस अन्दुत छटाका निरीक्षण किया । 

दैवयोग से नारदजी उधर आ निकले । वे इस अलौकिक दृश्य को देखकर मस्त हो गये और लगे बीणाके स्वरके साथ गाने । भगवान् शिव उनके सुमधुर संगीत को सुनकर, खेल छोड़कर जलसे बाहर निकल आये और ओदे वस्त्र पहने ही नारदके सुर-मे-सुर मिलाकर स्वयं राग अलापने लगे । अब तो भगवान् विष्णु से भी नहीं रहा गया । वे भी बाहर आकर मृदङ्ग बजाने लगे । उस समय वह समाँ बंधा जो देखते ही बनता था ।
सहस्त्रो शेष और शारदा भी उस समय के आनन्दका वर्णन नहीं कर सकते । बूढे ब्रह्माजी भी उस अनोखी मस्तीमे शामिल हो गये । उस अपूर्व समाज मे यदि किसी बात की कमी थी तो वह प्रसिद्ध संगीत-कोविद पवनसुत हनुमान् जी के आनेसे पूरी हो गयी । उन्होंने जहाँ अपनी हृदयहारिणी तान छेडी वहाँ सबको चुप हो जाना पड़। । अब तो सब के सब निस्तब्ध होकर लगे हनुमान् जी के गयायनको सुनने । सब के सब ऐसे मस्त हुए कि खाने पिने तक की सुधि भूल गये । उन्हें यह भी होश नहीं रहा कि हमलोग महर्षि गौतमके यहाँ निमंत्रित है । 

उधर जब महर्षि ने देखा कि उनका पूज्य अतिथिवर्ग स्नान करके सरोवर से नहीं लौटा और मध्याह्न बीता जा रहा है तो वे बेचारे दौडे आये और किसी प्रकार अनुनय विनय करके बडी मुश्किल से सबको अपने यहॉ लिवा लाये । तुरंत भोजन परोसा गया और लोग लगे आनन्दपूर्वक गौतमजी का आतिथ्य स्वीकार करने । इसके अनन्तर हनुमान्जी का गायन प्रारम्भ हुआ ।
भोलेबाबा उनके मनोहर संगीत को सुनकर ऐसे मस्त हो गये कि उन्हें तन मनकी सुधि न रही । उन्होंने धीरे से एक चरण हनुमान् कीअञ्जलिमे रख दिया और दूसरे चरण को उनके कंधे, मुख,कंठ , वक्षस्थल, हृदयके मध्यभाग, उदरदेश तथा नाभि मण्डलसे स्पर्श कराते हुए मौजसे लेट गये । यह लीला देखकर विष्णु कहने लगे- आज हनुमान के समान सुकृती विश्वमें कोई नहीं है । जो चरण देवताओ को दुर्लभ है तथा वेदो के द्वारा अगम्य हैं उपनिषद भी जिन्हें प्रकाश नहीं कर सकते, जिन्हें योगिज़न चिरकाल तक विविध प्रकार के साधन करके तथा व्रत उपवासादि से शरीर को सुखाकर क्षणभरके लिये भी अपने हृदयदेश में स्थापित नहीं कर सकते, प्रधान प्रधान मुनीश्वर सहस्त्रक्रोटि संवत्सरपर्यन्त तप करके भी जिन्हें प्राप्त नहीं कर सकते, उन चरणों को अपने समस्त अंगोपर धारण करने का अनुपम सौभाग्य आज हनुमान् को अनायास ही प्राप्त हो रहा है । मैंने भी हजार वर्ष तक प्रतिदिन सहस्त्र पद्मो से आपका भक्तिभावपूर्वक अर्चन किया, परंतु यह सौभाग्य आपने मुझे कभी प्रदान नहीं किया । 

मया वर्षसहस्त्रं तु सहस्त्राब्जै स्तथान्वहम् ।
भक्त्या सम्पूजितोsपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ।
लोके वादो हि सुमहान् शम्भुर्नारायणप्रिय: ।
हरि: प्रियस्तथा शम्भोर्न तादृग् भाग्यमस्ति मे ।।(पद्म .पा.११४ । १९०-१९१)

लोकमे यह वार्ता प्रसिद्ध है कि नारायण शंकर के परम प्रीतिभाजन हैं परंतु अनाज हनुमान् को देखकर मुझे इस बातपर संदेह सा होने लगा है और हनुमान के प्रति ईर्ष्या भी हो रही है । भगवान् विष्णुके इन प्रेम लपेटे अटपटे वचन सुनकर शंकर मन ही मन मुसकराने लगे और बोले नारायण ! यह आप जया कह रहे है ?आपसे बढकर मुझे और क्रोईं प्रिय हो सकता है ?औरो की  तो बात ही क्या, पार्वती भी मुझे आपके समान प्रिय नहीं हैं 
न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोsस्ति भगवन् हरे । 

पार्वती वा त्वया तुल्या न चान्यो  विद्यते मम ।।
(पद्म. पा .११४ । १९२)

इतने में ही माता पार्वती भी वहाँ उग पहुँची । शंकर को बहुत देरतक लौटते न देखकर उनके मनमें स्त्रीसुलभ शंका हुईं कि कहीं स्वामी नाराज तो नहीं हो गये । दौडी हुई महर्षि गौतम के आश्रम में पहुंची । गौतम की मेहमानी में जो कमी थी वह उनके आगमन से पूरी हो गयी । उन्होंने भी अपने पति की अनुमति लेकर महर्षि का आतिथ्य स्वीकार किया और फिर शंकरजी के समीप आकर उनकी और विष्णुभगवान की प्रणयगोष्ठी में सम्मिलित हो गयी । बातों हो बातोंमे उन्होंने विनोद तथा प्रणयकोप में शंकर जी के प्रति कुछ अवज्ञात्मक शब्द कहे और उनकी मुण्डमाला, पन्नगभूषण, दिग्वस्त्रधारण, भस्माङ्गलेपन और बृषभारोहण आदिका परिहास किया । तब तो विष्णु: भगवान् से नहीं रहा गया । श्रीहरि भगवान् शंकर की अबज्ञा को नहीं सह सके और बोल उठे -देवि ! आप ज़गत्पति शंकर के प्रति यह क्या का रही है ? मुझसे आपके ये शब्द सहे नहीं जाते । जहां शिवनिन्दा होती हो वहां हम प्राण धारण नहीं कर सकते, यह हमारा व्रत है । यह कहकर वे शिव गिरिजाके सम्मुख ही नखके द्वारा अपना शिरच्छेदन करने को उद्यत हो गये । शंकरजी ने बडी कठिनतासे उन्हें इस कार्यसे रोका । 

किमर्थं निन्दसे देवि देवदेवं ज़गत्पतिम् । 

सुंदर कथा ३०(श्री भक्तमाल – श्री धर्मराज युधिष्टिर जी) Sri Bhaktamal – Sri Yudhisthir ji

महाराज युधिष्ठिर साक्षात् धर्मके अंशसे उत्पन्न हुए थे । ये धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप थे । इसीसे लोग इन्हें धर्मराज के नामसे पुकारते हैं । इनमें धैर्य ,स्थिरता, सहिष्णुता, नम्रता, दयालुता और अविचल प्रेम आदि अनेक लोकोत्तर गुण थे । ये अपने शील, सदाचार तथा विचारशीलता के कारण बचपन में ही अत्यधिक लोकप्रिय हो गये थे । जब ये बहुत छोटे थे, तभी इनके पिता महात्मा पाण्डु स्वर्गवासी हो गये ।

तभीसे यह अपने ताऊ धृतराष्ट्र को ही पिताके तुल्य मानकर उनका बड़ा आदर करते थे और उनकी किसी भी आज्ञा को टालते न थे । परंतु धृतराष्ट्र अपने कुटिल स्वभावके कारण इनके गुणोंकी प्रशंसा सुन सूनकर मन ही मन इनसे कुढने लगे ।  धृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन चाहता था कि किसी तरह पाण्डव कुछ दिनके लिये हस्तिनापुर से हट जायं तो उनकी अनुपस्थिति में उनके पैतृक अधिकार को छीनकर स्वयं राजा वन बैठू। उसने अपने अंधे एवं प्रज्ञाहीन पिता को पट्टी पढाकर इसके लिये राजी कर लिया ।

धृतराष्ट्र ने पण्डवो को बुलाकर उन्हें मेला देखने के बहाने वारणावत भेजने का प्रस्ताव रखा । उन्होंने उनकी आज्ञा समझकर उसपर कोई आपत्ति नहीं की और चुपचाप अपनी माता कुन्ती के साथ पांचों भाई वारणावत चले गये । इन्हें जला डालनेके लिये वहां दुर्योधन ने एक लाक्षाभवन तैयार कराया था । उसीमें उन्हें रहने की आज्ञा हुई । चाचा विदुरकी सहायतासे ये लोग वहाँ से किसी प्रकार प्राण बचाकर भागे और जंगल की शरण ली । पीछे से धृतराष्ट्र के पुत्रोंने पाण्डवो को मरा समझकर हस्तिनापुर के राज्यपर चुपचाप अधिकार कर लिया ।

कुछ दिनों के बाद द्रोपदी के स्वयंवर के समय जब पण्डवो का रहस्य खुला, तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को यह पता लगा कि पाण्डव अभी जीवित है । तब तो धृतराष्ट्र ने विदुर को भेजकर पाण्डवों को हस्तिनापुर बुलवा लिया और अपने पुत्रों के साथ उनका झगडा मिटा देने के लिये आधा राज्य लेकर खांडवप्रस्थ में रहने का प्रस्ताव उनके सामने रखा । युधिष्ठिर ने उनकी यह आज्ञा भी स्वीकार कर ली और वे अपने भाइयो के साथ खाण्डवप्रस्थ मे रहने लगे । वहाँ इन्होंने अपनी एक अलग राजधानी बसा ली, जिसका नाम इन्द्रप्रस्थ रखा गया । वहां इन्होंने एक राजसूय यज्ञ किया, जिसमें बड़े बड़े शज्ञाअंनि आकर इन्हें बहुमूल्य उपहार दिये और इन्हें अपना सम्राट स्वीकार किया ।

परंतु घृतराष्ट्र के पुत्रोंने वहाँ भी इन्हें नहीं रहने दिया । दुर्योधन इनके वैभव को देखकर जलने लगा । उसने एक विशाल सभाभवन तैयार करके पाण्डवों को जुए के लिये आमंत्रित किया । जुए को बुरा समझते हुए भी धुतराष्ट्र की आज्ञा मानकर युधिष्टिर ने उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और यहाँ दुर्योधन के मामा शकुनि की कपटभरी चालो से अपना सर्वस्व हार बैठे । यहांतक कि भरी सभामे राजरानी द्रोपदी की बडी भारी फजीहत की गयी । फिर भी धृतराष्ट्र के प्रति युधिष्ठिर का यही भाव बना रहा। धृतराष्ट्र ने भी उन्हें उनका सारा धन और राज्य लौटा दिया और उन्हें वापस इन्द्रप्रस्थ भेज दिया । परंतु दुर्योधन को यह सहन नहीं हुआ ।

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सुंदर कथा २९ (श्री भक्तमाल – गौ ब्राह्मण प्रतिपालक भगवान् श्री परशुराम) Sri Bhaktamal – Sri Parshuram ji

श्री देवदत्त जी महाराज ,रेणुकमाहात्म्य एवं श्री दत्तपादाचार्य जी की कृपा से प्रेरित चरित्र । कृपा अपने नाम से प्रकाशित ना करे । Copyrights : http://www.bhaktamal.com

एक बार महर्षि ऋचीक से उनकी पत्नी और सास दोनो ने ही पुत्र प्राप्ति के लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीक ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनो के लिये अलग अलग मंत्रो से चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये ।सत्यवती की मां ने यह समझकर कि ऋषिने अपनी पत्नी के लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा अतः उसने बेटी से वह चरु मांग लिया । इसपर सत्यवती ने अपना चरु माँ को दे दिया और माँ का चरु वह स्वयं खा गयी ।

जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती-से कहा कि तुमने बडा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगो को दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता । (सत्यवती-ने ऋचीक मुनि को प्रसन्न किया और प्रार्थना की कि  स्वामी ! ऐसा नहीं होना चाहिये । तब उन्होंने कहा – अच्छी बात है । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा घोर प्रकृतिका होगा । समयपर सत्यवतीके गर्भसै जमदग्निका जन्म हुआ ।(परंतु जमदग्नि की जगह उनके पुत्र परशुराम घोर प्रकृति के हुए) के  सत्यवती समस्त लोकों को पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी कौशिकी नदी बन गयी ।

महाभारत्तमें कहा गया है कि त्रेतायुग एवं द्वापरयुग के सन्धिकाल में वैशाख शुक्ल तृतीया ( अक्षय तृतीया) के शुभ दिन उत्तम नक्षत्र और उत्तम मुहूर्त में भृगुकुलोत्पन्न महर्षि जमदग्नि एवं काशिराज सुता भगवती रेणुका के माध्यमसे भगवान् विष्णुका भार्गवराम (परशुराम) के रूपमें पृथ्वीपर अवतार हुआ ।

महर्षि जमदग्नि का आश्रम रेवा-नर्मदानदी के तटपर था । वहांपर भगवान् परशुरामका आविर्भाव हुआ था । उनके पितामह महातपस्वी ऋचीक का विवाह क्षत्रिय गाधिराज की सुपुत्री (ऋषि विश्वामित्रकी बहिन) सत्यवती के साथ हुआ था । उन दिनों विशेष कारणों से कुछ ब्राह्मण ऋषियोंके विवाह क्षत्रिय राजकन्याओ के साथ हुए हैं । ऐसे विवाहोंमें संतति ब्राह्मण ही मानी जाती है । महर्षि जमदग्नि एवं भगवती रेणुका को पाँच पुत्र हुए

१ ) रुमण्वान् २) सुषेण ३ ) वसु ४) विश्वावसु तथा ५) भार्गवराम (परशुराम) । परशुराम सबसे छोटे थे तथापि सबसे वीर एवं वेदज्ञ थे । पाँच वर्षकी अवस्था में उनका सविधि यझोपवीत संस्काऱ हुआ, तत्पश्चात् माता पिता की सम्मति लेकर वे शालग्राम क्षेत्र मे जाकर गुरु महर्षि कश्यप के समक्ष उपस्थित हुए और शास्त्र तथा शस्त्रका ज्ञान प्रदान करनेके लिये उनसे प्रार्थना की ।

गुरु महर्षि कश्यपने परशुराम को सविधि दीक्षा दी और शास्त्र एवं शस्त्रविद्या सिखाना प्रारम्भ किया । क्रुशाग्रबुद्धि सम्पन्न एवं अदम्य उत्साही होनेसे परशुराम अल्प समयमें ही चारों वेद और धनुविद्यामें निपुण हो गये । गुरु की आज्ञा तथा आशीर्वाद लेकर परशुराम अपने माता पिताके पास आये और उनका भी आशीर्वाद प्राप्त किया ।

परशुराम अपने घरसे प्रस्थान कर गन्धमादन पर्वत पर गये और उत्कट तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शंकर को प्रसन्न कर उनसे उच्चकोटिकी धनुर्विद्या प्राप्त की- परशुराम ने भगवान् श्री शंकर से ४१ अस्त्र भी प्राप्त किये, जो भयंकर तथा महाविनाशक थे, जैसे कि ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, आग्नेयास्त्र, वायत्वास्त्र इत्यादि। इन महान् अस्त्रों के प्रताप से परशुराम महाधनुर्धर एवं मन्त्रविशारद हुए । परशुराम को निम्नलिखित अस्त्र-शस्त्रों की जानकारी प्राप्त थीः

परशुराम को जिन ४१ अस्त्र-शस्त्रों की जानकारी प्राप्त थी वह इस प्रकार है-

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गोवर्धन गिरिराज जी का प्राकट्य

धार्मिक दृष्टि से गिरिराज जी का प्रचीन काल से ही व्रजमे सर्वाधिक परिपूर्ण स्थान और महत्व रहा है । व्रजमें मान्यता है कि इनकी पूजन परिक्रमा के मन्त्र-

गोवर्धन गिरे तुभ्यं गोपानां सर्वरक्षकम्।
नमस्ते देवरूपाय देवानां सुखदायिने ।।

का दो सहस्त्र बार जप कर के चार बार प्रदक्षिणा करनेपर सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है । श्री गिरिराज जी की तलहटी एवं कन्दराओ में भगवान् श्रीकृष्ण तथा श्रीराधाजी के विहार स्थल रहे हैं । अतएव इस भूमि का विशेष महत्व है।

गिरिराज गोवर्धन के अवतरण के संबंध में गर्गसंहिता में उल्लेख है कि भारत के पश्चिमी भागमें स्थित शाल्मलि द्वीपमें पर्वतराज श्री द्रोणाचलके घरमें उनकी पत्नीके गर्भसे श्री गोवर्धननाथ जी का जन्य हुआ । देवताओं ने पुष्पवर्षा करके श्री गोवर्धनजीकी वन्दना की । एक समय पुलस्त्य ऋषि भ्रमण करते हुए वहाँ गये । वहाँ नाना प्रकारके हरे -भरे वृक्ष लताओंसे परिपूरित सुन्दर श्यामल गोवर्घन को देखकर उन्हें अपने स्थलपर स्थापित करनेकी प्रबल इच्छा जाग्रत् हो गयी; क्योंकि काशीके निकट कोई ऐसा पर्वत नहीं था, जहाँ शान्ति से बैठकर वे भजन कर सके । अत: आपने द्रोणाचलजी से गोवर्धनजी को देनेका अनुरोध किया । पढना जारी रखे

श्री नर्मदा नदी का प्राकट्य

इस ब्रह्मसृष्टिमें पृथ्वीपर नर्मदाका अवतरण तीन बार हुआ है । प्रथम बर पाद्मकल्पके प्रथम सतयुगमें, द्वितीय बार दक्षसावर्णि मन्वन्तर के प्रथम सतयुगमें और तृतीय बार वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के प्रथम सतयुगमें । तीनों बार की नर्मदा अवतरण की कथाएँ इस प्रकार है:

प्रथम कथा – इस सृष्टिसे पूर्व की सृष्टिमें समुद्रके अधिदेवतापर ब्रह्माजी किसी कारण रुष्ट को गये और उन्होंने समुद्र को मानवजन्म धारणका शाप दिया, फलत: पाद्मकल्पमें समुद्रके अधिदेवता राजा पुरुकुत्स के रूपमें पृथ्वीपर उत्पन्न हुए । पढना जारी रखे

सुंदर कथा २७ (श्री भक्तमाल – श्री शबरी जी) Sri Bhaktamal- Sri Shabri ji

त्रेतायुगका समय है, वर्णाश्रम धर्मकी पूर्ण प्रतिष्ठा है, वनों-में स्थान-स्थानपर ऋषियो के पवित्र आश्रम बने हुए हैं । तपोधन ऋषियो के यज्ञधूमसे दिशाएँ आच्छादित और वेदध्वनिसे आकाश मुखरित हो रहा है । ऐसे समय दण्डकारण्यमे एक पति-पुत्र-विहीना भक्ति श्रद्धा-सपन्ना भीलनी रहती थी; जिसका नाम था शबरी ।

शबरीने एक बार मतंग ऋषिके दर्शन किये । संत दर्शनसे उसे परम हर्ष हुआ और उसने विचार किया कि यदि मुझसे ऐसे महात्माओ की सेवा बन सके तो मेरा कल्याण होना कोई बडी बात नहीं है । परंतु साथ ही उसे इस बातका भी ध्यान आया कि मुझ नीच कुल में उत्पन्न अधम नारी की सेवा ये स्वीकार कैसे करेंगे ? अन्तमें उसने यह निश्चय किया कि यदि प्रकट रूपसे मेरी सेवा स्वीकार नहीं होती तो न सही, मैं इनकी सेवा अप्रकट रूपसे अवश्य करूँगी । पढना जारी रखे