सुंदर कथा ८७ (श्री भक्तमाल – श्री मथुरादास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Mathuradas ji

श्री मथुरादास जी नामक एक संत हुए । श्री मथुरादास जी तिजारे ग्राम में निवास करते थे । सर्वदा भगवन्नाम का कीर्तन करते रहते थे । आप मे शुद्ध आचार, यथालाभ संतोष, मैत्रीभाव, सुन्दरशील आदि सभी सद्गुण विशेषरूप से प्रकाशित थे । जिस प्रकार हाथ के दीपक से अन्धकार मिट जाता है और वस्तुएं दिखायी पड़ती है उसी प्रकार भगवत्तत्त्व – ज्ञान के द्वारा आपका हृदय प्रकाशित था ।

आपके हृदय मे प्रभु का विश्वास था और उन्हीं का बल था । श्रीकृष्ण की सेवाके निमित्त जल का घडा आप अपने सिरपर रखकर बडे नेम और प्रेम से लाते थे । आपकी अपने गुरुदेव श्री वर्धमान जी के वचनों मे बडा प्रेम था । आप उनके उपदेशों का संग्रह एवं पालन करते थे । आपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं किया ।
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सुंदर कथा ८६ (श्री भक्तमाल – श्री उमापति शास्त्री जी ) Sri Bhaktamal – Sri Umapati Shastri ji

श्री स्वामी राजेंद्रदासाचार्य जी और अयोध्या के संतो से सुने भाव – लगभग सौ साल पुरानी बात है , श्री अयोध्या में एक वसिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण निवास करते थे । भगवान से भक्त जान किसी भी प्रकार का संबंध बनाते आये है । कोई पिता का, कोई भाई कान, कोई गुरु का तो कोई शिष्य का परंतु ऐसे महात्मा कम ही होते है जो श्री भगवान को अपना शिष्य मानते है । अयोध्या के पंडित श्री उमापति शास्त्री जी मानते थे कि मैं वशिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण राम जी के कुल का पुरोहित हूँ और वे मेरे यजमान है । श्री उमापति जी नित्य कनक भवन जाते और पुजारी को अपनी प्रसादी माला दे कर कहते हमारे यजमान को पहना देना । पुजारी भी सिद्ध थे अतः वे उमापति जी के भाव से अच्छी प्रकार परिचित थे । पुजारी जी ने कभी इस बार का विरोध नही किया । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८५ (श्री भक्तमाल – श्री सेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Sena ji

भीष्म: सेनाभिधो नाम तुलायां रविवासरे ।
द्वादश्यां माधवे कृष्णे पूर्वाभाद्रपदे शुभे ।
तदीयाराधने सक्तो ब्रह्मयोगे जनिष्यति ।।

श्री भीष्म जी ही स्वयं भक्त सेन के रूप में अवतरीत हुए। वघेलखण्ड मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ मे सेनभक्त का प्राकट्य हुआ । आपका जन्म विक्रम संवत १३५७ में वैशाख कृष्ण द्वादशी, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, तुला लग्न , शुभ योग रविवार को हुआ । आपने स्वामी श्री रामानंदाचार्य जी की आज्ञा से भक्तों की सेवा को प्रधानता दी । कुछ विद्वान मानते है कि इनका जन्म स्थान ग्राम सोहल थाठीयन जिला अमृतसर साहिब में १३९० ईस्वी में हुआ था  । परंतु भक्तमाल, अगस्त्य संहिता और महाराज श्री रघुराजसिंह जी द्वारा रचित श्री राम रसिकावली से इनका जन्म बांधवगढ़ ही निश्चित होता है । इनके पिता का नाम श्री मुकन्द राय जी, माता का नाम जीवनी जी एवं पत्नि का नाम श्रीमती सुलखनी जी था । इनके दो पुत्र और एक पुत्री थे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८४ (श्री भक्तमाल – अपने पुत्र को विष देने वाली दो भक्तिमती नारियाँ ) Sri Bhaktamal 

१. पहली कथा :एक राजा बड़ा भक्त था । उसके यहाँ बहुत से साधु-सन्त आते रहते थे । राजा उनकी प्रेम से सेवा करता था । एक बार एक महान संत अपने साथियों समेत पधारे । राजा का सत्संग के कारण संतो से बडा प्रेम हो गया । वे सन्त राजा के यहाँ से नित्य ही चलने के लिये तैयार होते, परंतु राजा एक-न-एक बात ( उत्सव आदि) कहकर प्रार्थना करके उन्हे रोक लेता और कहता क्रि प्रभो ! आज रुक जाइये, कल चले जाइयेगा । इस प्रकार उनको एक वर्ष और कुछ मास बीत गये । एक दिन उन सन्तो ने निश्चय कर लिया कि अब यहां रुके हुए बहुत समय बीत गया ,कल हम अवश्य ही चले जायेंगे । राजाके रोकनेपर किसी भी प्रकर से नही रुकेंगे । यह जानकर राजा की आशा टूट गयी, वह इस प्रकार व्याकुल हुआ कि उसका शरीर छूटने लगा । रानी ने राजा से पूछकर सब जान लिया कि राजा सन्त वियोग से जीवित न रहेगा । तब उसने संतो को रोकने के लिये एक विचित्र उपाय किया । रानी ने अपने ही पुत्र को विष दे दिया; क्योकि सन्त तो स्वतन्त्र है, इन्हे कैसे रोककर रखा जाय ?
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सुंदर कथा ८३ (श्री भक्तमाल – श्री पवनपुत्र दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Pavanputra das ji

पूज्य संतो की कृपा से कुछ छिपे हुए गुप्त भक्तो के चरित्र जो हमने सुने थे वह आज अनायास ही याद आ गए । उनमे से एक चरित्र संतो की कृपा से लिख रहा हूं –

श्री पवनपुत्र दास जी नामक एक हनुमान जी के भोले भक्त हुए है । यह घटना उस समय की है जब भारत देश मे अंग्रेजो का शासन था । अंग्रेज़ अधिकारी के दफ्तरों के बाहर इनको पहरेदार (आज जिसे सेक्युरिटी गार्ड कहते है )की नौकरी मिली हुई थी । घर परिवार चलाने के लिए नौकरी कर लेते थे , कुछ संतो की सेवा भी हो जाय करती थी पैसो से । कभी किसी जगह में जाना पड़ता , कभी किसी और जगह जाना पड़ता । एक समय कोई बड़ा अंग्रेज़ अधिकारी भारत आया हुए था और पवनपुत्र दास जी को उनके निवास स्थान पर पहरेदारी करने का भार सौंप गया । श्री पवनपुत्र दास जी ज्यादा पढ़े लिखे नही थे , संस्कृत आदि का ज्ञान भी उनको नही था परंतु हिंदी में श्री राम चरित मानस जी की चौपाइयों का पाठ करते और हनुमान चालीसा का पाठ लेते , ज्यादा कुछ नही आता था । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८२ (श्री भक्तमाल – श्री पादपद्माचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Paad padmacharya ji

पूज्यपाद श्री रामेश्वर दास रामायणी जी , श्री गणेशदास भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी के कृपाप्रसाद और भक्तमाल टीका से प्रस्तुत भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

श्री सम्प्रदाय के एक महान् गुरुभक्त संत हुए है श्री गंगा धराचार्य जी , जिनकी गुरु भक्ति के कारण इनका नाम गुरुदेव ने श्री पादपद्माचार्य रख दिया था । श्री गंगा जी के तट पर इनके सम्प्रदाय का आश्रम बना हुआ था और अनेक पर्ण कुटियां बनी हुई थी । वही पर एक मंदिर था और संतो के आसन लगाने की व्यवस्था भी थी । स्थान पर नित्य संत सेवा , ठाकुर सेवा और गौ सेवा चलती थी । एक दिन श्री गंगाधराचार्य जी के गुरुदेव को कही यात्रा पर जाना था । कुछ शिष्यो को छोड़ कर अन्य सभी शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! हमे भी यात्रा पर जाने की इच्छा है । कुछ शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! आप हमें कभी अपने साथ यात्रा पर नही ले गए , हमे भी साथ चलना है । श्री गंगाधराचार्य जी गुरुदेव के अधीन थे । वे कुछ बोले नही , शांति से एक जगह पर खड़े थे ।

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सुंदर कथा ८१ (श्री भक्तमाल – श्री सेवादास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Sewadas ji

पूज्यपाद श्री चंद्रशेखर दास जी , श्री गिरिधर बाबा और उनकी शिष्या के आशीर्वचन और निजी अनुभव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

श्री वृंदावन में एक विरक्त संत रहते थे जिनका नाम था पूज्य श्री सेवादास जी महाराज । श्री सेवादास जी महाराज ने अपने जीवन मे किसी भी वस्तु का संग्रह नही किया । एक लंगोटी , कमंडल , माला और श्री शालिग्राम जी इतना ही साथ रखते थे । एक छोटी से कुटिया बना रखी थी जिसमे एक बाद सा सुंदर संदूक रखा हुआ था । संत जी बहुत कम ही कुटिया के भीतर बैठकर भजन करते थे , अपना अधिकतम समय वृक्ष के नीचे भजन मे व्यतीत करते थे । यदि कोई संत आ जाये तो कुटिया के भीतर उनका आसान लागा देते थे । एक समय वहां एक बदमाश व्यक्ति आय और उसकी दृष्टि कुटिया के भीतर रखी उस सुंदर संदुक पर पडी । उसने सोचा कि अवश्य ही महात्मा को कोई खजाना प्राप्त हुआ होगा जिसे यहां छुपा रखा है । महात्मा को धन का क्या काम ?मौका पाते ही इसे चुरा लूंगा ।

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श्री भरत -हनुमान मिलन , हनुमान द्वारा भरत का संतत्व वर्णन और सरयू माहात्म्य ।

पूज्यपाद श्री हरिदास बाबा जी , श्री रंगराय जी , श्री रामकुमार रामायणी जी ,मनसराजहांस श्री विजयानंद जी , श्री हरिहर प्रसाद जी ,बाबा श्री जयरामदास जी के कृपा प्रसाद एवं मानस टीकाओं से प्रस्तुत भाव । कृपाया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

लंका के रणक्षेत्र मे मेघनाद के शक्ति-प्रहार से श्री लक्ष्मण जी मूर्छित हो गये । लंका के सुषेण वैद्य की आज्ञा से श्री हनुमान द्रोणाचल पर्वत पर से विशल्यकर्णी औषधि (संजीवनी बूटी) लेने चल दिये । वे वहाँ पहुंचकर औषधि को पहचान नहीं पाये और उन्हे पूरे पर्वत को ही ऊखाड कर ले चलना पडा ।

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥

भावार्थ : भरत जी ने आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा ।

शंका : हनुमान जी के अवधपुरी के ऊपर से उड़ने का क्या कारण था ? युद्ध के समय हनुमान जी के मन में अपने बल का अभिमान आ गया था । भगवान् कभी अपने भक्त के मन में अभिमान का अंकुर बढ़ने नहीं देते । लक्ष्मण जी जब मूर्छित हुए तब भगवान् श्री राम ने शोकातुर होकर कहा की हनुमान जैसे महाबली के रहते हुए भी तुम (लक्ष्मण ) पर यह आपत्ति आयी ,यदि हमारे भाई भरत यहां होते तो वे अवश्य तुम्हारी रक्षा करते । (हनुमन्नाटक १३ । ११ )

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सुंदर कथा ८० (श्री भक्तमाल – श्री खुशाल बाबा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Khushal baba ji

खान देशमें (वर्तमान गुजरात महाराष्ट्र सीमा ) फैजपुर नामका एक नगर है । वहाँ डैढ़ सौ साल पहले तुलसीराम भावसार नामक श्री कृष्ण पंढरीनाथ जी के एक भक्त रहते थे । इनकी धर्मपरायणा पत्नी का नाम नाजुकबाई था । इनकी जीविका का धन्धा था कपडे रँगना। दम्पती बड़े ही धर्मपरायण थे । जीविका मे जो कुछ भी मिलता, उसीमें आनन्द के साथ जीवन निर्वाह करते थे । उसीमे से दान धर्म भी किया करते थे ।

इन्हीं पवित्र माता पिता के यहाँ यथासमय श्री खुशाल बाबा का जन्म हुआ था । बचपन सेे ही इनकी चित्तवृत्ति भगवद्भक्ति की ओर झुकी हुई थी । भगवान् के लिए नृत्य और कीर्तन करके उन्हें रिझाते और उनकी लीलाओं को सुनकर बड़े प्रसन्न (खुश ) होते , खुश होकर हँसते और मौज में नाचते रहते । इसी से सबलोग इनको खुशाल बाबा कहते थे । यथाकाल पिता ने इनका विवाह भी करा दिया । इनकी साध्वी पत्नी का नाम मिवराबाई था।

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सुंदर कथा ७९ (श्री भक्तमाल – श्री रामअवध दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Ramavadh das ji

लगभग सौ वर्ष पहले की बात है । भगवान् श्री राघवेंद्र के परम भक्त क्षेत्रसन्यासी स्वामी रामअवध दास जी वैरागी साधू थे । बरसों से मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचंद्र जी की राजधानी अयोध्यापुरी मे रहते थे । अहर्निश श्री सीताराम नाम का कीर्तन करना उनका सहज स्वभाव हो गया था । रात को कठिनता से केवल दो घंटे सोते । सरयू जी के तीरपर एक पेड़ के नीचे फ्लो । धूनी रात – दिन जलती रहती । बरसात के मौसम में भी कोई छाया नहीं करते थे ।

आश्चर्य तो यह कि मूसलधार वर्षा में भी उनकी धूनी ठंडी नहीं हाती थी । जब देखो तभी स्वामी जी के मुखारविन्द से बड़ मधुर स्वर में श्री सीताराम नाम की  ध्वनि सुनायी पडती । आसपास के सभी मनुष्य -जीव – जंतु तक सीताराम ध्वनि करना सीख गये थे । वहाँ के पक्षियों की बोली में श्री सीताराम की ध्वनि सुनायी पडती, वहाँ के कुत्ते – बिल्ली की बोली में श्री सीताराम स्वर आता, वहाँ के वृक्षों की खड़खड़ाहट में श्री सीताराम नाम सुनायी देता और वहाँ की पवित्र सरयू धारा श्री सीताराम गान करती । तमाम वातावरण सीताराममय हो गया था।

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