सुंदर कथा ७३ (श्री भक्तमाल – श्री गोरा कुम्हार जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gora kumhar ji

पूज्यपाद संत श्री महीपति महाराज , भीमास्वामी रामदासी , श्री नामदेव गाथा के आधार पर और श्री वारकरी संतो के कृपाप्रसाद से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे। http://www.bhaktamal.com  ®

श्री गोरा जी का जन्म :

संतश्रेष्ठ शिरोमणी ज्ञानदेव जी के समकालीन अनेक श्रेष्ठ संत हुए है , उनमे से एक संत गोरा कुम्हार भी एक थे । सारी संत मंडली में संत गोरा कुम्हार सबसे ज्येष्ठ थे अतः उन्हें प्रेम से सब गोरोबा काका अथवा गोरई काका भी कहते थे । महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गाँव है । इस गाँव का मूल नाम त्रयीदशा है परंतु वर्तमान में इसका नाम तेरेढोकी है । यही पर संत गोरा कुम्हार का जन्म हुआ था ।  संतजन इनका जीवन काल सामान्यतः इ.स १२६७ से १३१७ तक मानते है ।तेरेढोकी श्रीक्षेत्र पंढरपूर से लगभग ३० कोस की दूरी होने के कारण उनका पंढरपूर धाम में आना जाना होता था । वे निष्ठावान वारकरी संत थे । गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त रहे इसीलिए संत नामदेव जी ने गोरई काका को वैराग्य का मेरु कहा है ।

संत श्री गोरा कुम्हार ऊँचे अधिकारी सिद्ध पुरुष थे । उनकी गुरु परंपरा श्री ज्ञानदेव और नामदेव की तरह ही नाथपंथीय थी । इनके गुरुदेव थे सिद्ध संत श्री रेवणनाथ जी । अनेक पीढ़ियो से इनके घर में मिट्टी घड़े मटके ,बर्तन आदि बनाने का काम चला आ रहा था । विट्ठल भक्ति भी गोराई काका के परिवार में पहले से चली आ रही थी । इनके माता का नाम श्रीमति रुक्मिणी बाई और पिता का नाम श्री माधव जी था । माता पिता दोनों ही भगवान् श्री कालेश्वर (शिव ) के निष्ठावान उपासक थे परंतु वे पांडुरंग विट्ठल भगवान् में भी समान श्रद्धा रखते थे । हरी हर को एकत्व मान कर दोनों भजन में मग्न रहते थे । उन्हें आठ संताने प्राप्त हुई परंतु सब के सब मृत्यु का ग्रास बन गए । उनके सारे बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो गए इस बात से वे बहुत कुछ दुखी थे परंतु निरंतर भगवान् का भजन चलता रहता था । उन्हें लगता था की सारे के सारे बच्चे मर गए ,कम से कम ये अंतिम एक बच्चा भी रह जाता तो हमें प्रसन्नता होती ।

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सुंदर कथा ७२ (श्री भक्तमाल – श्री गरुड जी ) Sri Bhaktamal – Sri Garud ji

भगवान् श्रीहरि के वाहन और उनके रथ की ध्वजा में स्थित विनता नंदन गरुड भगवान की विभूति हैं । वे नित्यमुक्त और अखंड ज्ञानसम्पन्न हैं । उनका विग्रह सर्ववेदमय है । श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि बृहद्रथ और रथन्‍तर नामक सामवेद के दो भेद ही इनके पंख हैं । उडते समय उन पंखो से सामवेद की ध्वनि निकलती रहती है । वे भगवान् के नित्य परिकर और भगवान् के लीलार्स्वरूप हैं । देवगण उनके परमात्मरूप की स्तुति करते हुए कहते है – 

खगेश्वरं शरणमुपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महाबलं गरुडमुपेत्य खेचरम्।।
( महाभारत, आदिपर्व २३ । २२ )

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सुंदर कथा ७१(श्री भक्तमाल – श्री धनुर्दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Dhanurdas ji

श्री रामानुज संप्रदाय के पूर्वचार्यो द्वारा लिखे गए ग्रंथो में धनुर्दास स्वामी जी के जीवन के कुछ प्रसंग मिलते है । श्री कलिवैरिदास स्वामी जी ,भक्त चरितांक ,श्री तोताद्रि मठ के संत और अन्य आचार्यो के आशीर्वाद से प्रेरित चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

मद्रास प्रांत में त्रिचनापल्ली के पास एक स्थान है उदयूर । इसका पुराना नाम निचुलापुरी है । यह वैष्णवों का एक पवित्र तीर्थ है । आज से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व यहां एक धर्नुदास नाम का पहलवान रहता था। अपने बल तथा अद्भुत आचरण के लिये धनुर्दास प्रख्यात था । दक्षिण भारत में धनुर्दास को पिल्लै उरंगा विल्ली के नाम से जाना जाता है । धनुर्दास राजा के सभा के एक महान पहलवान थे । उस पहलवान ने हेमाम्बा नामक एक अत्यंत सुन्दर वेश्या की सुन्दरता पर बहुत मोहित होकर उसे अपनी प्रेयसी बनाकर घर में रख लिया था । वह उस वेश्या के रूप पर इतना मोहित था की जहां भी जाता, उसे साथ ले जाता । अंत में उसके रूप में आसक्त होकर उसे अपनी पत्नी बना लिया , स्त्री ने भी उसे पति रूप में स्वीकार कर लिया था । 

रास्ते से जब धनुर्दास चलता तो स्त्री के आगे-आगे उसे देखते हुए पीठ की ओर उलटे चलता । कही बैठता तो उस स्त्री को सामने बैठाकर ही बैठता ।  उसका व्यवहार सबके लिए कौतूहलजनक था; परंतु वह निर्लज्ज होकर उस स्त्री को देखना कभी भी नहीं छोड़ता था । दक्षिण भारत का एक सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है – श्रीरंग क्षेत्र । त्रिचनपल्ली से यह श्रीरंगम् पास ही है। वर्ष में कई बार यहां महोत्सव होता है। दूर-दूर से लाखों यात्री आते है । एक बार श्रीरंगनाथ का वासन्ती महोत्सव (चैत्रोत्सव)चल रहा था। धर्नुदास जी की प्रेयसी ने भी उत्सव देखना चाहा। धर्नुदास उसे तथा नौकरों-चाकरों के साथ निचलापुरी से श्रीरंगम् आ गया।

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सुंदर कथा ७० (श्री भक्तमाल – श्री हरिपाल जी ) Sri Bhaktamal – Sri Haripal ji

 पूज्य श्री गणेशदास भक्तमाली जी की टीका , प्रेमानंद स्वामी और द्वारका के महात्माओ द्वारा बताई जानकारी पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।
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श्री हरिपाल जी नामक एक भक्त थे उनका जन्म ब्राह्मण वंश में हुआ था । श्री हरिपाल जी गृहस्थ भक्त थे ।इन्होंने श्री द्वारिकाधीश भगवान् की उपासना में मग्न रहने वाले एक संत को अपने सद्गुरुदेव भगवान् के रूप में वरण किया था । श्री गुरुदेव जी महाराज श्री हरिपाल जी के घर में आया जाया करते थे । एक दिन श्री हरिपाल जी ने गुरुदेव जी से जिज्ञासा प्रकट की – भगवन ! इस संसार में , घर द्वार में हम फंसे पड़े है , घर गृहस्थी के जंजाल से मुक्त होकर भगवान् के चरणारविन्द को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, यही रहते हुए भगवान् को प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय कृपा कर के हमें बताये ।

श्री गुरुदेव भगवान् ने कहा – हम तुम्हे ऐसा सरल उपाय बताएँगे की एकदिन अवश्य भगवान् आकर तुमसे मिलेंगे। श्री गुरुदेव जी ने कहा – तुम साधु- संतो के चरणों में श्रद्धा रखकर उनकी खूब सेवा किया करो । तुम जीवन में एक नियम का निर्वाह कर लिया तो भगवत्प्राप्ति निश्चित है । सतत नाम जप करते हुए रोज किसी न किसी संत को श्रद्धा से भोजन कराया करो ,भगवान् संतो के पीछे पीछे चलते है । भगवान् अपने भक्तो के समीप छाया कितरह चलते है और गुप्त रूप से श्री सुदर्शन जी भक्तो किब्रक्षा करते रहते है । संतो को रिझा लोग तो भगवान् रीझ जाएंगे । हरिपाल जी ने कहा – गुरुदेव ! हम रोज संतो को कहा ढूंढने जाएंगे ? गुरुदेव जी ने कहा – चिंता नहीं करो , तुम्हारे द्वार पर भगवान् की कृपा से स्वयं संत आ जायेंगे । उस दिन से श्री हरिपाल जी संतो की सेवा  करने लगे , साधु संतो से उनका बडा प्रेम हो गया ।

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सुंदर कथा ६९ (श्री भक्तमाल – श्री मणिराम माली ) Sri Bhaktamal – Sri Maniram mali ji

श्री जगन्नाथ पुरी धाम में मणिदास नाम के माली रहते थे। इनकी जन्म तिथि का ठीक ठीक पता नहीं है परंतु संत बताते है की मणिदास जी का जन्म संवत् १६०० के लगभग जगन्नाथ पुरी में हुआ था । फूल-माला बेचकर जो कुछ मिलता था, उसमें से साधु-ब्राह्मणों की वे सेवा भी करते थे, दीन-दु:खियों को, भूखों को भी दान करते थे और अपने कुटुम्‍ब का काम भी चलाते थे । अक्षर-ज्ञान मणिदास ने नहीं पाया था; पर यह सच्‍ची शिक्षा उन्‍होंने ग्रहण कर ली थी कि दीन-दु:खी प्राणियों पर दया करनी चाहिये और दुष्‍कर्मो का त्‍याग करके भगवान का भजन करना चाहिये । संतो में इनका बहुत भाव था और नित्य मणिराम जी सत्संग में जाया करते थे ।

मणिराम का एक छोटा से खेत था जहांपर यह सुंदर फूल उगाता । मणिराम माली प्रेम से फूलों की माला बनाकर जगन्नाथजी के मंदिर के सामने ले जाकर बेचनेे के लिए रखता । एक माला सबसे पहले भगवान को समर्पित करता और शेष मालाएं भगवान के दर्शनों के लिए आने वाले भक्तों को बेच देता। फूल मालाएं बेचकर जो कुछ धन आता उसमे साधू संत गौ सेवा करता और बचा हए धन से अपने परिवार का पालन पोषण करता था । कुछ समय बाद मणिदास के स्‍त्री-पुत्र एक भयंकर रोग की चपेट में आ गए और एक-एक करके सबका परलोकवास हो गया। जो संसार के विषयों में आसक्त, माया-मोह में लिपटे प्राणी हैं, वे सम्‍पत्ति तथा परिवार का नाश होने पर दु:खी होते हैं और भगवान को दोष देते हैं; किंतु मणिदास ने तो इसे भगवान की कृपा मानी।

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सुंदर कथा ६८ (श्री भक्तमाल – श्री सिलपिल्ले की भक्त- दो कन्याएँ ) Sri Bhaktamal – Sri Silpille ki bhakt

http://www.bhaktamal.com ® पूज्यपाद श्री भक्तमाली जी के टीका ,प्रियादास शरण एवं पुराने संतो के लेख पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।

सिलपिल्ले (कृष्ण )भगवान् की भक्त – दो कन्याएँ
श्री भक्तमाल ग्रंथ में नाभादास जी ने लिखा है – ठाकुर सिलपिल्ले ( श्रीकृष्ण ) की दो भक्ता कन्याएं थी । इनमे एक राजा की कन्या थी और दूसरी जमींदार की कन्या थी । एक दिन राजा के महल में एक संत भगवान् पधारे । वे संत प्रेम से महल में कुछ दिन विराजे । राजा और जमींदार दोनों की की कन्याएं महल में खेल रही थी उसी समय उनकी दृष्टि संत की और गयी । उस समय संत भगवान् अपने शालिग्राम जी की सेवा में मग्न थे ।उन दोनों कन्याओं ने देखा की संत जी एक गोल काले पत्थर ( शालिग्राम ) जी को स्नान करवा रहे है , सुंदर तुलसी दाल पधरा रहे है , प्रेम से पद गाकर सुना रहे है , चंदन और सुगंध अर्पण कर रहे है , पभोग अर्पण कर रहे है । संतो ने कहा है की जिस समय की यह घटना है उस समय इनकी उम्र आठ वर्ष की थी । 

उन दोनों कन्याओं ने संत भगवान् से कहा की यह आप क्या कर रहे है ? संत भगवान् ने उन दोनों की बताया की यह पत्थर नहीं अपितु स्वयं श्री भगवान् है और मै इनकी सेवा कर रहा था । संत जी ने उन दोनों को भगवान् का चरणामृत और प्रसाद भी दिया जिससे उनके मन में भी सेवा करने की उत्कण्ठा हुई । संत जी का महल में प्रवचन भी हुआ जिसे सुनकर दोनों कन्याओं के हृदय में और अधिक भगवत्प्रेम जाग उठा । उन्होंने संत भगवान् से विनती करते हुए कहा की हमें भी आप जैसी सेवा हमें भी करनी है ,हम भी सुकुमार श्यामसुंदर की पूजा करेंगी ,हमें  आप ठाकुर जी की मूर्ति दे दीजिये ।उन दोनों के मन में भाव आया की यही संत हमारे सद्गुरुदेव भगवान् है ।

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सुंदर कथा ६७ (श्री भक्तमाल – श्री लाखा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Laakha ji

श्री लाखा जी की अद्भुत संत सेवा से भगवान् का प्रसन्न होना :

श्री लाखा जी मारवाड के वानरवंशी थे, इनकी जाति के लोग राज दरबार में नृत्य – गानकर आजीविका चलाते है । वानरवंशी अथवा वानर जाती को मारवाड़ में डोम जाती भी कहा जाता है , इस जाती के लोग राजाओ के दरबार में नृत्य गान वाद्य बजाने का कार्य करके अपनी आजीविका चलते थे। यह जाती कत्थक जाती के समकक्ष है ये नित्य साधुओ की सेवा करते थे । एक समय बड़ा भारी अकाल पडा , लोग भूखों मरने लगे । श्री लखा जी वेषनिष्ठ संत थे , संतो के वेषमात्र का आदर करत थेे । तब तुलसी कण्ठीमाला और तिलक धारण करके बहुत से लोग (नास्तिक आस्तिक) इनके यहां अन्न खाने के लिए आने लगे । इन सबका भरण पोषण कहाँ से कैसे और कहाँतक हो ? अन्ततोगत्वा बहुत सोच-विचारकर इन्होने यह निश्चय किया की इस स्थान को छोडकर कही अन्यत्र चलकर रहें ।

इनके इस निश्वय को जानकर भगवान् ने इनसे स्वप्न मे कहा – लाखाजी ! ध्यान देकर सुनो -अन्यत्र जाने का विचार न करो । हमने एक उपाय कर दिया है, तदनुसार तुम्हारे पास एक गाडीभर गेहूँ आयेंगे और एक भैस आयेगी। जब गाडीभर गेहूँ आ जाय, तब उन्हें कोठी मे भर देना और उसके ऊपर के मुख को बन्द का देना । उसमे से निकालने के लिये नीचे का मुंह खोल देना । उससे आवश्यकतानुसार अधिक से अधिक गेहूँ निकलेंगे । उन्हें पीसकर रोटियाँ बनवाना और भैस के दूध को जमा करके मथ लेना । जो घी निकले उससे रोटियो को चुपड देना और छाछ के साथ सबको भोजन कराते रहना । इतना सुनने के बाद श्री लाखाजी की आखें खुल गयीं ।

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सुंदर कथा ६६ (श्री भक्तमाल – श्री दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Daas ji

श्री दास जी महाराज नामक एक संतसेवी महात्मा हुए है ।श्री दास जी संतो की सेवा को भगवान् की सेवा से बढ़कर मानते थे । एक बार श्रीदास जी के यहा कई सन्त आये ।स्नाध्या – आरती हुई । रात्रि भोजन के वाद श्रीदास जी संतो की चरण सेवा में लग गये । मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराना भूल गये । प्रात:काल मंगला के समय श्री दास जी जब मंदिर जाने लगे तो मंदिर के किवाड़ भीतर से बन्द मिले । प्रयत्न करने पर भी किवाड नहीं खुले । तब श्रीदास जी बड़े असमंजस में पड गये । इतने में आकाश वाणी हुई – अब किवाड नहीं खुलेंगे , मेरी सेवा रहने दो, अब सन्तो की ही सेवा करो । मै रातभर सिंहासन पर खडा रहा हूँ तुमने मुझे शयन ही नहीं कराया ।

यह सुनकर श्री दासजी ने सरल भाव से निवेदन किया -प्रभो ! सन्त-सेवा में लगे रहने के कारण यदि आपकी सेवा में चूक हुई तो आपके नाराज होने का भय मुझे बिलकुल भी नहीं है । परंतु आपकी सेवा में लगा रहूँ और संत – सेवा में भूल-चूक हो जाय, तब मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय है , भगवान् से अधिक महिमा तो भगवान् के भक्तो की है । यह सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये । किवाड खुल गये और भगवान् कहने लगे – हम तुमपर बहुत प्रसन्न है , इस भाव् से संत सेवा करनेवाले मुझे अपने वश में कर लेते हैं । ऐसा कहकर भगवान ने श्रीदास जी को प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और अनेक शुभाशीर्वाद दिए ।

सुंदर कथा ६५ (श्री भक्तमाल – श्री गोपाल जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gopal ji

जाबनेर ग्राम में एक संतसेवी भक्त श्री गोपाल जी रहते थे । भगवान् से भक्त को  इष्ट मानने की, सेवा करने की प्रतिज्ञा उन्होंने की थी और उसका पालन किया । श्री गोपाल जी के कुल मे एक सज्जन (काकाजी) विरक्त वैष्णव हो गए थे । उन्होने सन्तो के मुख से इनकी निष्ठा प्रशंसा सुनी कि श्री गोपाल जी भक्तोंको इष्टदेव मानते हैं । तब वे विरक्त संत श्री गोपाल भक्त की परीक्षा लेने के विचार से उनके द्वारपर आये । इन्हें आया देखकर श्री गोपाल भक्त जी ने झट आकर सप्रेम साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया कि -भगवन् ! अपने निज घर में पधारिये । 

उन्होने (परीक्षा की दृष्टि से ) उत्तर दिया कि – मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं स्त्री का मुख न देखूंगा । तुम्हरे घर के भीतर जाकर मैं अपनी इस प्रतिज्ञा को कैसे छोड दूं?तब श्री गोपाल जी ने कहा -आप अपनी प्रतिज्ञा न छोडिये। परिवार की सभी स्त्रियां एक ओर अलग छिप जायेंगी । आपके सामने नहीं आयेगी । ऐसा कहकर घर के अंदर जाकर उन्होने सब स्त्रियो को अलग कमरे में छिपा दिया । तब इनको अंदर ले आये । घर की स्त्रियां भी संतो में बड़ी निष्ठा रखती थी  अतः इसी बीच सन्त दर्शन के भाव् से या कौतुकवश एक स्त्री ने बहार झाँककर संत जी को देखा, स्त्री की झांकते ही उन संत ने गोपाल भक्त के गालपर एक तमाचा मारा । श्री गोपालजी के  मन मे जरा सा भी कष्ट नहीं हुआ । 

श्री गोपाल जीे हाथ जोडकर बोले – महाराज जी ! आपने एक  कपोल(गाल ) को तमाचा प्रसाद दिया, वह तो कृतार्थ हो क्या ।  दूसरा आपके कृपाप्रसाद से वंचित रह गया । अत: उसे रोष हो रहा है, कृपा करके इस कपोलपर भी तमाचा  मारकर इसे भी कृतार्थ कर दीजिये । प्रियवाणी सुनकर उन वैष्णव संत के नेत्रो मे आसू भर आये । वह श्रीगोपाल जी के चरणो मे लिपट गए क्या और बोले – आपकी सन्तनिष्ठा अलौकिक है । मैने आकर आपकी परीक्षा ली । आज मुझे आपसे बहुत बडी यह शिक्षा मिली कि भक्त को अति सहनशील होना चाहिये तथा भगवान् के भक्त को भगवान् से भी बढकर मानना चाहिये । 

सुंदर कथा ६४ (श्री भक्तमाल – श्री लक्ष्मण भक्त जी ) Sri Bhaktamal – Sri Lakshman bhakt ji

एक बड़े प्रेमी महात्मा थे जिनकी संतो में बड़ी श्रद्धा थी ।उनस नाम था श्री लक्ष्मण जी । भक्त लक्ष्मण जी बडे सद्भाव से साधुओं की सेवा करते थे। बिना किसी रोक टोक के लक्ष्मण जी के यहां संतो का दिन रात आवागमन रहता था । संतो के वेष मात्र का आदर लक्ष्मण जी करते थे ।इनकी इस उदारता को देखकर एक दुष्ट ने भी सन्तवेष धारण कर लिया और कई दिनतक लक्ष्मण भक्त के यहां रहा । लक्ष्मण जी उसकी भी सेवा करते रहे क्योंकि लक्ष्मीन जी वेषनिष्ठ सन्त थे । एक दिन मौका पाकर वह वेषधारी भगवान् के मंदिर में घुस गया । भगवां के आभूषण – पार्षदों को  लेकर भाग गया । यह देखकर भगवान ने एक सिपाही का रूप धारणकर उसे जा पकडा और उसे श्रीलक्ष्मण भक्त के पास लाये और बोले – देखो, यह तुम्हरे मंदिर का सामान चुराकर ले जा रहा है । 

श्री लक्ष्मण जी ने कहा – इन संत को सामान की आवश्यकता होगी । इसलिये ले जा रहे हैं । मेरे मास जो कुछ है , इन्ही का है । इनहें ले जाने दो । अब वे सिपाही भगवान् क्या करते ? वह सामान लेकर गया तो भगवान भी साथ साथ चले । फिर उसके आगे- आगे चलने लगे इसके बाद अन्तर्धान हो गये । इधर-उधर बहुत निगाह दौडानेपर भी नहीं दीखे । इस तरह कभी प्रकट कभी अप्रकट होते देखकर उसे भय हुआ । भगवान् की कृपा से उसकी बुद्धि निर्मल हो गयी ।उसने मन मे अनुमान कर लिया कि भक्तों के हितकारी भगवान् की यह लीला है । मैं भक्त की चोरी करके दुख पाउँगा । श्रीलक्ष्मण जी की सहज सरलता का स्मरण करता हुआ वापस लौट आया । उसने सब सामान देकर हृदय के दुष्ट भाव को खोलकर रख दिया और चरणो मे पडकर क्षमा मांगने लगा । भक्त के प्रताप से  वह सच्चा संत बन गया।  इस तरह संत वेष में अपार निष्ठा के कारण भगवान् ने श्री लक्ष्मण जी पर कृपा की।