सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री खड्गसेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Khadgasen ji

पूजय बाबा श्री गणेशदास जी की टीका और गीता प्रेस भक्तमाल से प्रस्तुत चरित्र :

जन्म और रचनाएं –

श्री खड्गसेन जी का जन्म इ. स. १६०३ एवं रचनाकाल सं १६२८ माना जाता है । ये ग्वालियर में निवास करते थे और भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । श्री राधागोविन्द के गुणगनो को वर्णन करने मे श्री खड्गसेन जी की वाणी अति उज्वल थी । आपने व्रज गोपि और ग्वालो के माता -पिताओं के नामों का ठीक ठीक निर्णय किया । इसके अतिरिक्त ‘दानकेलिदीपक ‘आदि काव्यों का निर्माण किया, जिनसे यह मालूम होता है कि आपको साहित्य का प्रचुर ज्ञान था और आपकी बुद्धि प्रखर थी । श्री राधा गोपाल जी, उनकी सखियाँ और उनके सखाओं की लीलाओं को लिखने और गाने मे ही आपने अपना समय व्यतीत किया । कायस्थ वंश मे जन्म लेकर आपने उसका उद्धार किया । आपके हदयमें भक्ति दृढ थी, अत: सांसारिक विषयों की ओर कभी नही देखा।

राजा की भक्त भगवान में श्रद्धा प्रकट होना-

श्री खड्गसेन भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । एक दिन इनके यहाँ वृंदावन के एक रसिक सन्त पधारे । उन्होंने इनको श्री हितधर्म (श्री हरिवंश महाप्रभु का सम्प्रदाय सिद्धांत ) का उपदेश दिया । रसिक सन्त से इष्ट और धाम का रहस्य सुनकर इन्होंने श्री राधावल्लभ लाल के चरणों मे अपने को अर्पित कर दिया और वृन्दावन आकर श्रीहिताचार्य महाप्रभु से दीक्षा ले ली । श्री श्रीजी की शरण ग्रहण करते ही गृहस्थी एवं जगत के प्रति इनका दृष्टिकोण एकदम बदल गया । श्रीश्यामा-श्याम का अनुपम रूप-माधुर्य इनके नेत्रों मे झलक उठा एवं दसों दिशाएँ आनंद से पूरित हो गई । ये अधिक से अधिक समय नाम और संतवाणी के गान मे लगाने लगे । इनका यश चारों ओर फैल गया और दूर-दूर से साधु संत आकर इनका सत्संग प्राप्त करने लगे । उनकी सेवा सुश्रुषा मे मुक्त हस्त से धन खर्च करने लगे ।

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सुंदर कथा १०२ (श्री भक्तमाल – श्री कल्याणदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kalyandas ji

श्री कल्याण दास जी सन्त सेवी सदगृहस्थ थे । आप ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए थे और श्री राघवेन्द्र सरकार आपके इष्टदेव थे । एकबार आपके यहां कन्या का विवाह था । जाति बिरादरी के साथ साथ सन्तो को भी आपने आमंत्रित कर रखा था । जब भोजन का समय हुआ तो आपने संतो की पंगत पहले करा दी । इससे अन्य ब्राह्मण लोग बड़े असन्तुष्ट हुए और कहने लगे कि इन साधुओ की जाति-पाँति का कोई पता नही है, आपने इन्हे कैसे पहले खिला दिया ? इसपर आपने सबको समझाते हुए कहा कि संतों का “अच्युत” गोत्र होता है और ये समस्त विश्व का कल्याण करनेवाले होते है । सन्त धरा धामपर साक्षात् भगवान् श्री हरि के प्रतिनिधि होते है, अत: उनके पहले प्रसाद ग्रहण कर लेने से आप सब को असन्तुष्ट नही होना चाहिये ।

इस प्रकार की इनकी सन्त निष्ठा देखकर अन्य ब्राह्मण भी प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हो गये । आपके यहा सन्त-सेवा चल रही है सुनकर और भी बहुत से आमंत्रित सन्त भी आ पहुंचे । यह देखकर बिरादरी के लोग कहने लगे-अभी आपके घराती और बराती बाकी ही है, अगर आप इन आमंत्रित सन्तो को भोजन करा देंगे तो उनके लिये क्या बचेगा ? इसपर आपने कहा-चिन्ता करने की बात नहीं है, संतो को खिलाने से कम नही पड़ता, सारी पूर्ति रामजी करेंगे । यह कहकर आपने सब संतो को भोजन करा दिया, फिर जब घरातियों-बारातियों को खिलाने की बात आयी तो आपने पंगत मे सब को बैठवा दिया और परोसने वालों से परोसने को कहा । प्रभुकृपा से सभी ने पूर्ण तृप्ति का अनुभव किया और भोजन मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी । रसोइया कहने लगे इतना भोजन तो हमने बनाया ही नही था, फिर भी समाप्त नही हुआ । सन्त-कृपा का ऐसा चमत्कार देखकर सब लोग धन्यधन्य कह उठे ।

श्री कल्याणदास जी संतो और वैष्णव स्वरूप में भी बड़ी श्रद्धा रखते थे ।एक बार की बात है , श्री कल्याण जी अपने भाई के साथ उत्सव-दर्शनार्थ श्रीधाम वृन्दावन को जा रहे थे । मार्ग में आपने देखा कि एक दुष्ट धनी सरावगी एक दिन वैष्णव को कुछ पैसों के लिए डांट-फटकार लगा रहा है , दुख दे रहा है ।यह देखकर आपको बहुत दुख हुआ । आपने न केवल उन वैष्णव महाभाग का सारा कर्जा उतारकर उस दुष्ट सरावगी से मुक्ति दिला दी, बल्कि उन्हें पर्याप्त धन- धान्य देकर सुखी भी कर दिया। ऐसे उदार मन थे श्री कल्याणदास जी ।

सुंदर कथा १०१ (श्री भक्तमाल – श्री महर्षि वशिष्ठ जी ) Sri Bhaktamal – Sri Maharshi Vashisht ji

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ विश्वस्त्रष्टा ब्रह्माजी के मानसपुत्र है । सृष्टि के प्रारम्भ में ही ब्रह्मा के प्राणो से उत्पन्न उन प्रारम्भिक दस मानसपुत्रो मे से वे एक हैं, जिनमें से देवर्षि नारदके अतिरिक्त शेष नौ प्रजापति हुए । 

१. मरीचि, २. अत्रि, ३. अंगिरा ४. पुलस्त्य ५. पुलह ६. क्रतु ७. भृगु ८. वसिष्ठ ९. दक्ष और १०. नारद  – ये ब्रह्मा के दस मानसपुत्र है । 

इनसे पहले- ब्रह्माजी के मनसे – संकल्प से कुमारचतुष्टय १. सनक २. सनन्दन ३. सनातन और ४. सनत्कुमार उत्पन्न हुए थे परंतु इन चारोने प्रजा सृष्टि अस्वीकार कर दी । सदा पांच वर्षकी अवस्थावाले बालक ही रहते हैं । इन चारोकी अस्वीकृति के कारण ब्रह्मा जी को क्रोध आया तो उनके भ्रूमध्य से भगवान् नीललोहित रूद्र (शिव ) उत्पन्न हुए । इस प्रकार सनकादि कुमार तथा शिव वसिष्ठजी के अग्रज हैं । 

भगवान् ब्रह्माने अपने नौ पुत्रो को प्रजापति नियुक्त किया । इन लोगो को प्रजाकी सृष्टि, संवर्घन तथा संरक्षण का दायित्व प्राप्त हुआ । केवल नारदजी नैष्ठिक ब्रह्मचारी बने रहे । इन नौ प्रजापतियो में से प्रथम मरीचि के पुत्र हुए कर्दम जी । कर्दम ने स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूतिका पाणिग्रहण किया । कर्दम जी की नौ पुत्रियां हुई और पुत्रके रूपमें भगवान् कपिल ने उनके यहां अवतार ग्रहण किया । कर्दम ने अपनी पुत्रियो का विवाह ब्रह्माजी के मानसपुत्र प्रजापतियो से किया । वसिष्ठजी की पत्नी अरुँधती जी महर्षि कर्दम की कन्या हैं ।

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सुंदर कथा १०० (श्री भक्तमाल – श्री नरवाहन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Narvahan ji

बाबा श्री गणेशदास भक्तमाली जी की भक्तमाल टीका , परमभागवत श्री हितदास जी महाराज एवं श्री हित अम्बरीष जी के भाव पर आधारित चरित्र –

भगवान श्री कृष्ण के वंशी के अवतार श्री हितहरिवंश महाप्रभु जी को देवबंद मे स्वयं श्री राधाजी से निज मंत्र और उपासना पद्धति की प्राप्ति हुई । श्री राधा जी ने एक दिन महाप्रभु जी को स्वप्न मे वृन्दावन वास कीआज्ञा प्रदान की । उस समय श्री महाप्रभु जी की आयु ३२ वर्ष की थी । अपने पुत्रों और पत्नी से चलने के लिए पूछा परंतु उनकी रुचि किंचित संसार मे देखी । श्री महाप्रभु जी अकेले ही श्री वृन्दावन की ओर भजन करने के हेतु से चलने लगे । कुछ बाल्यकाल के संगी मित्र थे, उन्होंने कहा कि हमारी भी साथ चलने की इच्छा है – हम आपके बिना नही राह सकते । श्री महाप्रभु जी ने उनको भी साथ ले लिया । रास्ते मे चलते चलते सहारनपुर के निकट चिडथावल नामक एक गांव में विश्राम किया । स्वप्न में श्री राधारानी ने महाप्रभु जी से कहा – यहाँ आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण देवता विराजते है ।

उनके पास श्री राधावल्लभ लाल जी का बड़ा सुंदर श्रीविग्रह है – उस विग्रह को लेकर आपको श्री वृन्दावन पधारना है, परंतु उन ब्राह्मणदेव का प्रण है कि यह श्रीविग्रह वे उसी को प्रदान करेंगे जो उनकी २ कन्याओं से विवाह करेगा । उनकी कन्याओं से विवाह करने की आज्ञा श्री राधा रानी ने महाप्रभु जी को प्रदान की। महाप्रभु जी संसार छोड कर चले थे भजन करने परंतु श्री राधा जी ने विवाह करने की आज्ञा दी । महाप्रभु जी स्वामिनी जी की आज्ञा का कोई विरोध नही किया – वे सीधे आत्मदेव ब्राह्मण का घर ढूंढकर वहां पहुंचे । श्री राधारानी ने आत्मदेव ब्राह्मण को भी स्वप्न मे उनकी कन्याओं का विवाह श्री महाप्रभु जी से सम्पन्न करा देने की आज्ञा दी । आत्मदेव ब्राह्मण के पास यह श्री राधा वल्लभ जी का विग्रह कहा से आया इसपर संतो ने लिखा है –

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सुंदर कथा ९९ (श्री भक्तमाल – श्री पीपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Peepa ji

पूज्य श्री नारायणदास भक्तमाली मामाजी, श्री राजेंद्रदासाचार्य जी , बाबा गणेशदास जी द्वारा श्री रामानंद पुस्तकालय की भक्तमाल और गीता प्रेस भक्तमाल से श्री पीपानंदचार्य जी का चरित्र :

मनु: पीपाभिधो जात उत्तराफाल्गुनी युजी ।
पूर्णिमायां ध्रुवे चैत्र्यां धनवारे बुधस्य च ।।

श्री मनु जी महाराज कलियुग मे धर्मप्रचार के लिये राजस्थान प्रान्त के गांगरोनगढ़ के राजघराने मे वि.सं १४१६ की चैत्रीय पूर्णिमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, ध्रुवसंज्ञक योग मे बुधवार के दिन श्री पीपा जी के रूप मे अवतरित हुए ।

भक्तवर श्री पीपा जी पहले भवानी देवी के भक्त थे । मुक्ति मांगने के लिये आपने देवी का ध्यान किया, देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर सत्य बात कही कि -मुक्ति देने की शक्ति मुझमे नहीं है, वह शक्ति तो भगवान मे है । उनकी शरण मे जाना ही सुदृढ साधन है । देवीजी केउपदेशानुसार आचार्य श्रीरामानन्द जी के चरणकमलों का आश्रय पाकर श्रीपीपाजी अति भक्तिकी अन्तिम सीमा हुए । गुरुकृपा एवं अतिभक्ति के प्रभाव से आपमे असंख्य अमूल्य सदूगुण थे, उन्हें सन्तजन सदा गाते रहते है । भक्त ,भगवन्त और गुरुदेव की आपने ऐसी आराधना की कि उसका स्पर्श करके अर्थात् देख-सुन और समझ करके सम्पूर्ण वैष्णवो की आराधना-प्रणाली अत्यन्त सरस हो गयी । आपने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण संसार का कल्याण किया । इसका प्रमाण यह है कि आपने परम हिंसक सिंह को उपदेश देकर अहिंसक और विनीत बना दिया ।

१. श्री स्वामी रामानंदाचार्य का शिष्य बनने की कथा :

गागरौनगढ़ नामक एक विशाल किला एवं नगर है, वहाँ पीपा नामक एक राजा हुए । वे देवी के बड़े भक्त थे । एक बार उस नगर मे साधुओं की जमात आयी । राजाने जमात का स्वागत करके कहा – देवीजी को चालीस मन अन्न का भोग लगता है, सभी लोग प्रसाद लेते है, आपलोग भी देवीजी का प्रसाद ग्रहण कीजिये । साधुओं ने कहा-हमारे साथ श्री ठाकुर जी हैं, हम उन्ही को भोग लगाकर प्रसाद लेते है, दूसरे देवी – देवताओं का नही । तब राजाने उन्हें सीधा-सामान दिया । साधुओं ने रसोई करके भगवान का भोग लगाया और मन ही मन प्रार्थना की -हे प्रभो ! इस राजा की बुद्धि को बदल दीजिये, इसे अपना भक्त बना लीजिये ।रात को जब राजा महल में सोया तो उसने एक बडा भयानक स्वप्न देखा कि एक विकराल देहधारी प्रेत ने उसे पटक दिया है और उस कारण राजा भयभीत होकर रोने लगा । जागते ही राजाने स्वप्न की घटनापर विचार किया, तब उसे वैराग्य हो गया । अब राजा के सोचने -विचारने की रीति दूसरी हो गयी । उसे भगवान की भक्ति विशेष प्रिय लगने लगी ।

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सुंदर कथा ९८ (श्री भक्तमाल – श्री सरस्वती जी ) Sri Bhaktamal – Sri Saraswati ji

श्रीपाद देवादास जी महाराज और अयोध्या के महात्म्या श्री सीतारामशरण जी के कृपाप्रसाद से सुनी सत्य घटना –

श्री महाराज जी ने इस चरित्र को कई बार सुनाया –
अयोध्या के बहुत निकट ही पौराणिक नदी कुटिला है – जिसे आज टेढ़ी कहते है, उसके तट के निकट ही एक भक्त परिवार रहता था । उनके घर एक सरस्वती नाम की बालिका थी । वे लोग नित्य श्री कनक बिहारिणी बिहारी जी का दर्शन करने अयोध्या आते थे । सरस्वती जी का कोई सगा भाई नही था , केवल एक मौसेरा भाई ही था । वह जब भी श्री रधुनाथ जी का दर्शन करने आती, उसमे मन मे यही भाव आता की सरकार मेरे अपने भाई ही है ।

उसकी आयु उस समय मात्र दो वर्ष की थी । रक्षाबंधन से कुछ समय पूर्व उसने सरकार से कहा की मै आपको राखी बांधने आऊंगी । उसने सुंदर राखी बनाई और रक्षाबंधन पूर्णिमा पर मंदिर लेकर गयी । पुजारी जी से कहा कि हमने भैया के लिए राखी लायी है । पुजारी जी ने छोटी सी सरस्वती को गोद मे उठा लिया और उससे कहा कि मै तुम्हे राखी सहित सरकार को स्पर्श कर देता हूं और राखी मै बांध दूंगा। पुजारी जी ने राखी बांध दी और उसको प्रसाद दिया । अब हर वर्ष राखी बांधने का उसका नियम बन गया । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९७ (श्री भक्तमाल – श्री भगवंतमुदित जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagvant mudit ji

श्री माधवदास जी के सुपुत्र श्री भगवन्तमुदित जी ने रसिक भक्तों से समर्थित तुलसीकंठी और तिलक धारणकर अपने इष्टदेव श्री राधाकृष्ण की नित्य नियम से सेवा की तथा उदार भगवान के परमोदार सुयश का अपनी वाणी से वर्णन करके उसके रस का आस्वादन किया ।

श्री भगवन्तमुदित जी परमरसिक सन्त थे । आप आगरा के सूबेदार नबाब शुजाउल्युल्क के दीवान थे । कोई भी ब्राह्मण, गोसाई, साधु या गृहस्थ ब्रजवासी जब आपके यहाँ पहुँच जाता तो आप अन्न, धन और वस्त्र आदि देकर उसे प्रसन्न करते थे; क्योंकि व्रजबासियों के प्रेम मे इनकी बुद्धि रम गयी थी ।

1. श्री भगवंत मुदित जी और उनकी पत्नी की गुरुभक्ति –

आपके गुरुदेव का नाम श्री हरिदासजी था । ये श्रीवृन्दावन के ठाकुर श्री गोविन्ददेव जी मन्दिर के अधिकारी थे । इन्होंने व्रजवासियों के मुख से श्री भगवन्तमुदित जी की बडी प्रशंसा सुनी तो इनके मन मे आया कि हम भी आगरा जाकर (शिष्य) भक्त की भक्ति देखें । श्री भगवन्तमुदित जी ने सुना कि श्रीगुरुदेव उनके द्वार पर आ रहे है तो इन्हें इतनी प्रसन्नता हुई कि ये अपने अंगो मे फूले नही समाये । ये अपनी स्त्री से बोले कि कहो, श्री गुरु-चरणो मे क्या भेंट देनी चाहिये ? स्त्री ने कहा – हम दोनों एक-एक धोती पहन ले और शेष सब घर द्वार, कोठार- भण्डार, चल अचल सम्पत्ति श्रीगुरुदेव को समर्पण कर दें और हम दोनों वृन्दावन मे चलकर भजन करे ।

पत्नी की ऐसी बात सुनकर श्री भगवन्तमुदित जी उसपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- सच्ची गुरु भक्ति करना तो तुम ही जानती हो, यह तुम्हारी सम्मति हमको अत्यन्त प्रिय लगी है । ऐसे कहते हुए उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे । गुरुदेव रात्रि मे बाहर द्वारपर बैठे सुन रहे थे । सर्वस्व समर्पण की बात गोस्वामी श्री हरिदासजी ने सुन ली और उन्होंने जान लिया कि ये सर्वस्व-त्याग करके विरक्त बनना चाहते है, जिसका अभी योग (उचित समय) नही है, अत: गुरुदेव जी उसी समय बिना श्री भगवन्तमुदितजी से मिले ही परिचित व्यक्ति को बताकर लौटकर श्रीवृन्दावन को चले आये और इनके प्रेम भरे त्याग के प्रणपर बहुत ही सन्तुष्ट हुए ।

श्री भगवन्तमुदित जी को जब यह मालूम हुआ कि श्रीगुरुदेव आये और वापस चले गये तो आपका उत्साह नष्ट हो गया । हृदय मे अपार पश्चात्ताप हुआ । फिर आपने गुरुदेव के दर्शन करने का विचार किया और नवाब से आज्ञा माँगकर श्री वृन्दावन आये । गुरुदेव के दर्शनकर सुखी हुए । बहुत से लीला- पदों की रचना की । आपका श्री रसिक अनन्यमाल नामक ग्रन्थ प्रसिद्ध है । इस प्रकार आपने अनन्य प्रेमका एकरस निर्वाह किया ।

2. ब्रजवासियों के प्रति भगवत्भाव ।

गुरुदेव से आज्ञा लेकर आगरा को लौट गये । वहाँ किसी कारणवश कई ब्रजवासी चोरो ने आपके घर मे ही चोरी कर ली, पर इससे आपने जरा भी मन मे दुख न माना; क्योंकि आपका विश्वास था कि ब्रजवासी भगवान के ही अपने पार्षद है । आपने यही माना की भगवान के पार्षद और रिश्तेदारों ने हमे सेवा का अवसर दिया । इस भाव के कारण भगवान के साक्षात्कार भी प्राप्त हुए । संसार मे आपका भगवत्प्रेम प्रसिद्ध था ।

3. श्री भगवन्तमुदित जी के पिता श्री माधवदास जी उच्च कोटि के रसिक थे । आगे उनकी कथा सुनिये –

श्री माधवदास जी बेसुध है, नाडी छूटनेवाली है (प्राण छूटने वाले है ), अब इनका अन्तिम समय आ गया है -ऐसा जानकर लोग उन्हें पालकी में बैठाकर आगरा से श्री वृन्दावन धाम को ले चले । जब आधी दूर आ गये, तब श्री माधबदास जी को होश हो आया । दुखित होकर आपने लोगों से पूछा कि क्रूरो ! तुम लोग मुझे कहाँ लिये जा रहे हो । लोगोने कहा- आप जिस श्री वृन्दावनधाम का नित्य ध्यान किया करते हैं, वही ले चल रहे हैं । यह सुनकर आपने कहा – अभी लौटाओ, यह शरीर श्री वृन्दावन जाने के योग्य कदापि नही है, इसे जब वहाँ जलाया जायगा, तब इसमे से बडी भारी दुर्गन्ध निकलेगी, वह प्रिया प्रियतम को अच्छी नहीं लगेगी । प्रिया-प्रियतम के पास जानेयोग्य जो होगा, वह अपने आप उनके पास चला जायगा । आप ऐसे भाव की राशि थे । वापस जाकर आगरा मे ही आपने शरीर छोडा ।

सुंदर कथा ९६ (श्री भक्तमाल – श्री कान्हार दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kanhardas ji

श्री कान्हरदास जी ने सन्तो की कृपा से यह महान् लाभ प्राप्त किया कि अपने हृदय मे भगवान को स्थापित किया । इन्होंने गुरुदेव की शरण मे आकर भक्तिमार्ग को सच्चा, सात्विक, सरल और श्रेष्ठ जाना । आपने संसार धर्म को त्यागकर क्या सत्य है और क्या झूठ है, इस बात को पहचाना और सत् ग्रहण तथा असत् का त्याग किया । भगवद्धर्म को स्वीकार किया । आप संसार से उसी प्रकार अलग रहे, जैसै पेड की शाखा से चन्द्रभा अलग और दूर रहता है, लेकिन दिखाने के लिये पेड़ के पास मे बताया जाता है । आप संसार के सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे । अनेक सद्गुणों से युक्त थे । अत: आप महान् थे । आपने अपने मुख से सदा सज्जनों – भक्तों क्री प्रशंसा की । मिथ्या, कटु और परनिन्दारूप कुवचन आपने कभी नहीं कहे ।

भक्तमाल में श्री कान्हरदास जी के विषय मे विवरण इस प्रकार है :

श्री कान्हरदास जी समदर्शी सन्त थे । किसी सन्त से कोई भूल भी हो जाय तो श्री कान्हरदास जी कटु शब्दों का प्रयोग नही करते थे । आप सन्तसेवी तो थे ही, अत: सन्तो का आवागमन आपके यहाँ बना ही रहता था । एक बार दो सन्त आये, वे कई दिनोंसे भूखे थे । जितना प्रसाद था वह आपने उन संतो को दे दिया । परंतु उसे पाकर भी तृप्त न हुए अत: उन्होने कान्हर दास जी के घरसे एक धातुपात्र(बर्तन) ले जाकर हलवाई के हाथ बेच दिया और दोनों ने भरपेट लड्डू-पेडा खाया । यह जानकर आपका शिष्य सन्तो को फटकारने लगा । उस अज्ञानी शिष्य को आपने समझाया, कि सन्त बर्तन बेचकर खा गये तो अपना ही खाये । हम संतो के दास है । यह सब सामग्री रामजी की है और ये संत भी रामजी के ही है । यह जो चाहे वह करने में समर्थ है ।संत भगवान से भी बढ़कर होते है। पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९५ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्ण परमानंदाचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Parmanandacharya ji

श्री श्री पूर्णवैराठी रामेश्वर दास जी महाराज का कृपाप्रसाद –

श्री पूर्णजी (परमानंदाचार्य )की महिमा अपार है, कोई भी उसका वर्णन नहीं कर सकता है । आप उदयाचल और अस्ताचल – इन दो ऊँचे पर्वतो के बीच बहनेवाली सबसे बडी ( श्रेष्ठ ) नदी के समीप पहाड़ की गुफामे रहते थे । योग की युक्तियों का आश्रय लेकर और प्रभु मे दृढ विस्वास करके समाधि लगाते थे । व्याघ्र, सिंह आदि हिंसक पशु वहीं समीप मे खड़े गरजते रहते थे, परंतु आप उनसे जरा भी नही डरते थे । समाधि के समय आप अपान वायु को प्राणवायु के साथ ब्रह्माण्ड को ले जाते थे, फिर उसे नीचे की और नहीं आने देते थे । आपने उपदेशार्थ साक्षियों की, मोक्षपद प्रदान करनेवाले पदों की रचना क्री । इस प्रकार मोक्षपद को प्राप्त श्री पूर्णजी की महिमा प्रकट थी ।

१. श्री पूर्ण जी भगवत्कृपा प्राप्त श्री रामभक्त सन्त थे । एक बार आपका शरीर अस्वस्थ हो गया । आपको औषधि के लिये औंगरा ( एक जडी ) की आवश्यकता थी । आस पास उस समय कोई नही था जिससे जडी लाने कहा जाये । इनके मन की बात जानकर भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और औंगरा लाकर दिया । जिससे ये स्वस्थ हो गये । भगवत्कृपाका अनुभव करके आप प्रेम-विभोर हो गये । आप पूर्णतया अकाम और सभी प्रकार की आसक्तियोंसे रहित थे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९४ (श्री भक्तमाल – श्री केशवभट्ट काश्मीरी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Keshavbhatt ji

श्री केशवभट्ट जी मनुष्यों मे मुकुटमणि हुए । जिनकी महा महिमा सारे संसार मे फैल गयी । आपके नाम के साथ ‘काश्मीरी’ यह विशेषण अति प्रसिद्ध हो गया था । आप पापों एवं पापरूप लोगों को ताप देने वाले तथा जगत के आभूषण स्वरूप थे । आप परम सुदृढ श्री हरिभक्तिरूपी कुठार से पाखण्ड धर्मरूपी वृक्षो का समूलोच्छेद करनेवाले हुए । आपने मथुरापुरी में यवनों के बढते हुए आतंक को देखकर उनसे वाद विवादकर उन परम उद्दण्ड यवनों को बलपूर्वक हराया । अनेकों अजेय काजी आपकी सिद्धि का चमत्कार देखकर एकदम भयभीत हो गये । आपका उपर्युक्त सुयश सारे संसार मे प्रसिद्ध है, सब सन्त इनके साक्षी है ।

आपका जन्म काश्मीरी ब्राह्मण कुल मे बारहवी शताब्दी के लगभग हुआ माना जाता है । कुछ इतिहासवेत्ताओं का कथन है कि काशी मे श्री रामानन्द जी और नदिया मे श्री चैतन्यदेव जी से आपका सत्संग हुआ था । एक बार दिग्विजय (देश के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते हुए यात्रा करना ) निमित्त पर्यटन करते हुए आप नवद्वीप (बंगाल) मे आये । वहाँ का विद्वद्वर्ग आपसे भयभीत हो गया । तब श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यवर्ग को साथ लेकर श्री गंगाजी के परम सुखद पुलिनपर जाकर बैठ गये और बालकों को पढाते हुए शास्त्रचर्चा करने लगे । उसी समय टहलते हुए श्री केशवभट्ट जी भी आकर आपके समीप बैठ गये । तब श्रीमहाप्रभुजी अत्यन्त नम्रतापूर्वक बोले -सारे संसार में आपका सुयश छा रहा है, अत: मेरे मन मे यह अभिलाषा हो रही है कि मै भी आपके श्री मुख से कुछ शास्त्र सम्बन्धी चर्चा सुनूँ ।
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