सुंदर कथा ५५ (श्री भक्तमाल – श्री कैकेयी जी ) Sri Bhaktamal – Sri kaikai ji 

पूज्यपाद पंचरसचार्य श्री रामहर्षण दस जी , भक्तमाली जी , श्यामसुंदर जी के कृपाप्रसाद एवं भक्तचारित्र पुस्तक से प्रेरित भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

कैकेयी पद कमल सुचि बंदौं बारं बार।
राम काज-हित जिन कुजस बिपुल लियौ सिर धार ।।

रामायण में महारानी कैकेयी का चरित्र सबसे अधिक बदनाम है । जिसने सारे विश्व के परमप्रिय प्रणाराम राम को बिना अपराध वन में भिजवाने का अपराध किया -उसका पापिनी, कलंकिनी , राक्षसी, कुलविनाशिनी कहलाना कोई आश्चर्य की बात नहीं । समस्त सद्गुणों के आधार, जगदाधार राम जिसकी आखों के काँटे हो गये, उसपर गालियों की बौछार न हो तो किसपर हो । इसीसे लाखों वर्ष बीत जानेपर भी आज जगत के नर-नारी कैकेेयी का नाम सुनते ही नाक भी सिकोड़ लेते है और मौका पानेपर उसे दो-चार ऊँचे – निचे शब्द सुनाने से बाज नहीं आते । परतुं इससे यह नहीं समझना चाहिये कि कैकेयी सर्वथा दुर्गुणों की ही खान थीं, उनमें कोई सदगुण था ही नहीं । सच्ची बात तो यह है कि यदि कैकेयी के श्रीरामवनवास का कारण होने का प्रसङ्ग निकाल लिया जाय तो कैकेयी का चरित्र रामायण के प्राय: सभी स्त्री-चरित्रो मे सबसे बढकर समझा जाय ।

कैकेयी के रामवनवास का कारण होने में एक बड़ा भारी रहस्य छिपा हुआ है, जिसका उदृघाटन होनेपर यह सिद्ध हो जाता है कि श्रीराम के अनन्य और अनुकूल भक्ती मे कैकेयी जी का स्थान सबसे ऊँचा है । कैकेयी महाराज कैकय की पुत्री और दशरथजी की छोटी रानी थीं । ये केवल अप्रतिम सुन्दरी ही नहीं थीं, प्रथम श्रेणी की पतिव्रता और वीरांगना भी थीं । बुद्धिमत्ता, सरलता, निर्भयता, दयालुता, आदि सद्गुणो का कैकेयी के जीवन मे पूर्ण विकास था । इन्होने अपने प्रेम और स्वाभाव से महाराज के हृदयपर इतना अधिकार का लिया था कि महाराज तीनों पटरानियों में कैकेयी को ही सबसे अधिक मानते थे । कैकेयी पति-सेवा के लिये सभी कुछ भी कर सकती थीं ।

दक्षिण दिशा में दण्डकारण्य में वैजयन्त नामक एक प्रसिद्ध नगर है, जहाँ तिमिध्वज असुर रहता था जिसका दूसरा नाम शंबर विख्यात था । वह महासुर सैकडो प्रकार की माया जानता था । देवता उसे पराजित न कर सके तब वह इंद्र से संग्राम (युद्ध)करने को तेयार हुआ । उस बड़े भारी देवासुर संग्राम मे क्षत-विक्षत पुरुषो को रात में सोते समय राक्षस लोग बिछोने से खींचकर मारा करते थे । इन्द्र ने राजा दशरथ से सहायता मांगी । अन्य राजर्षियो के साथ महाबाहु राजा दशरथ भी कैकयी साथ लेकर इन्द्र की सहायता के लिये गये और उन्होने राक्षसो के साथ घनघोर युद्ध किया ।  उस समय कैकेेयी जी भी पति के साथ रणाङ्गण में गयी थी – आराम भोगने के लिए नहीं, सेवा और शूरता से पतिदेव को सुख पहुँचा ने के लिए ।

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