गोवर्धन गिरिराज जी का प्राकट्य

धार्मिक दृष्टि से गिरिराज जी का प्रचीन काल से ही व्रजमे सर्वाधिक परिपूर्ण स्थान और महत्व रहा है । व्रजमें मान्यता है कि इनकी पूजन परिक्रमा के मन्त्र-

गोवर्धन गिरे तुभ्यं गोपानां सर्वरक्षकम्।
नमस्ते देवरूपाय देवानां सुखदायिने ।।

का दो सहस्त्र बार जप कर के चार बार प्रदक्षिणा करनेपर सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है । श्री गिरिराज जी की तलहटी एवं कन्दराओ में भगवान् श्रीकृष्ण तथा श्रीराधाजी के विहार स्थल रहे हैं । अतएव इस भूमि का विशेष महत्व है।

गिरिराज गोवर्धन के अवतरण के संबंध में गर्गसंहिता में उल्लेख है कि भारत के पश्चिमी भागमें स्थित शाल्मलि द्वीपमें पर्वतराज श्री द्रोणाचलके घरमें उनकी पत्नीके गर्भसे श्री गोवर्धननाथ जी का जन्य हुआ । देवताओं ने पुष्पवर्षा करके श्री गोवर्धनजीकी वन्दना की । एक समय पुलस्त्य ऋषि भ्रमण करते हुए वहाँ गये । वहाँ नाना प्रकारके हरे -भरे वृक्ष लताओंसे परिपूरित सुन्दर श्यामल गोवर्घन को देखकर उन्हें अपने स्थलपर स्थापित करनेकी प्रबल इच्छा जाग्रत् हो गयी; क्योंकि काशीके निकट कोई ऐसा पर्वत नहीं था, जहाँ शान्ति से बैठकर वे भजन कर सके । अत: आपने द्रोणाचलजी से गोवर्धनजी को देनेका अनुरोध किया । पढना जारी रखे