सुंदर कथा ८१ (श्री भक्तमाल – श्री सेवादास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Sewadas ji

पूज्यपाद श्री चंद्रशेखर दास जी , श्री गिरिधर बाबा और उनकी शिष्या के आशीर्वचन और निजी अनुभव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

श्री वृंदावन में एक विरक्त संत रहते थे जिनका नाम था पूज्य श्री सेवादास जी महाराज । श्री सेवादास जी महाराज ने अपने जीवन मे किसी भी वस्तु का संग्रह नही किया । एक लंगोटी , कमंडल , माला और श्री शालिग्राम जी इतना ही साथ रखते थे । एक छोटी से कुटिया बना रखी थी जिसमे एक बाद सा सुंदर संदूक रखा हुआ था । संत जी बहुत कम ही कुटिया के भीतर बैठकर भजन करते थे , अपना अधिकतम समय वृक्ष के नीचे भजन मे व्यतीत करते थे । यदि कोई संत आ जाये तो कुटिया के भीतर उनका आसान लागा देते थे । एक समय वहां एक बदमाश व्यक्ति आय और उसकी दृष्टि कुटिया के भीतर रखी उस सुंदर संदुक पर पडी । उसने सोचा कि अवश्य ही महात्मा को कोई खजाना प्राप्त हुआ होगा जिसे यहां छुपा रखा है । महात्मा को धन का क्या काम ?मौका पाते ही इसे चुरा लूंगा ।

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सुंदर कथा ५४ (श्री भक्तमाल – श्री श्यामानंद जी  ) Sri Bhaktamal – Sri Shyamanand ji 1

http://www.bhaktamal.com ® गौड़ीय महात्मा पूज्यपाद श्री रासिकानंद प्रभु के वंशज पूज्यपाद श्री कृष्ण गोपालानंद जी द्वारा श्यामानंद चरित्र और श्री हित चरण अनुरागी संतो द्वारा व्याख्यान ,आशीर्वचनों  पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।

भाग १ जन्म और बाल्यकाल :
श्री गौरसुन्दर चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं और संप्रदाय के प्रचार हेतु गौड़ीय संप्रदाय में अनेक सिद्ध संतो का प्राकट्य हुआ है । श्री श्यामानंद प्रभु का जन्म सन् १५३५ ई को चैत्र पूर्णिमा के दिन पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के अंतर्गत धारेंदा बहादुरपुर ग्राम में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री कृष्ण मंडल और माता का नाम दुरिका देवी था । इनके पिता श्री कृष्ण मंडल का जन्म छः गोपो के वंश में हुआ था  । इनके बहुत से पुत्र और पुत्रियां थी परंतु धीरे धीरे वे सब श्यामानंद प्रभु के जन्म से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए अतः श्री कृष्ण मंडल ने अपने इस पुत्र (श्यामानंद प्रभु ) का नाम दुखी रख दिया ।

सभी ज्योतिष के ज्ञाता और संत उस बालक को देखकर कहते थे की यह अवश्य कोई महान संत होगा । देखने में यह बालक ऐसा सुंदर था की जो भी उसे देखता वह देखता ही रह जाता । धीरे धीरे बालक बड़ा हुआ और पिता ने उसे संस्कृत भाषा और शास्त्रो का अध्ययन कराने के लिए भेजा । बहुत ही कम समय में बालक को श्लोक कंठस्थ हो जाते और ऐसी तीक्ष्ण बुद्धि देख कर सभी विद्वानों को बहुत आश्चर्य होता था । बंगाल ओड़ीसा क्षेत्र में उस समय श्री गौरहारी और नित्यानंद प्रभु के प्रभाव से सर्वत्र कृष्ण प्रेम और संकीर्तन की बाढ़ बह रही थी । 

आस पास के वैष्णवो के श्रीमुख से श्री गौरहारी और नित्यानंद प्रभु के गुणगान सुनकर बालक दुखी को गौरहारी के चरणों का आश्रय लेने की तीव्र इच्छा होने लगी । बालक का मन सदा श्री गौर चरणों में लगा रहने लगा था ।  इनके पिता श्री कृष्ण मंडल भी भगवान् श्रीकृष्ण के भक्त थे । जब उन्होंने देखा की बालक दुखी का मन नित्य श्री गौरहारी और नित्यानंद प्रभु के नाम संकीर्तन और गुणगान करने में लगा रहता है तब उन्होंने बालक से कहा – बेटा तुम्हे अब किसी अच्छे वैष्णव संत से मन्त्र दीक्षा प्राप्त करके जीवन को सफल बनाना चाहिए ।

पिता की बात सुनकर बालक न कहा – पूज्यपाद श्री हृदय चैतन्य प्रभु  मेरे गुरुदेव है , वे अम्बिका कलना में विराजते है । पूज्यपाद श्री गौरीदास पंडित उनके गुरुदेव है । श्री गौरसुंदर चैतन्य प्रभु और श्री नित्यानंद प्रभु सदा उनके घर में विराजमान रहते है । यदि आप आज्ञा देंगे तो मै उनके पास जाकर उनसे हरिनाम का प्रसाद ग्रहण करूँ । पिताजी ने कहा – बेटा ! वह तो बहुत दूर है ,तुम वहाँ कैसे पहुँचोगे ? बालक बोला – पिताजी ! यहां आस पास के बहुत लोग शीघ्र ही गौड़ – देश को गंगा स्नान के निमित्त जायेंगे । जब जब वह जाने वाले होंगे ,मै भी उनके साथ चला जाऊंगा ।

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