श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग २ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 2

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ® 
विषधर सर्प का उपाख्यान

महात्मा हरिदास जी फुलिया के पास ही पुण्य सलिला माँ जाहन्वी के किनारे पर एक गुफा बनाकर उसमें रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। नित्य प्रति वहाँ सैकड़ों आदमी इनके दर्शन करने के लिये तथा गंगा स्नान के निमित्त इनके आश्रम के निकट आया करते थे। जो भी मनुष्य इनकी गुफा के समीप जाता, उसके शरीर में एक प्रकार की खुजली होने लगती। लोगों को इसका कुछ भी कारण मालूम न हो सका। उस स्थान में पहुंचने पर चित्त में शांति तो सभी के होती, किंतु वे खुजली से घबड़ा जाते।

लोग इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान लगाने लगे। होते-होते बात सर्वत्र फैल गयी। बहुत से चिकित्सकों ने वहां की जलवायु का निदान किया, अन्त में सभी ने कहा, यहाँ कोई जरूर महाविषधर सर्प रहता है। न जाने कैसे हरिदास जी अभी तक बचे हुए हैं,श्वास से ही मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। वह कहीं बहुत भीतर रहकर श्वास लेता है, उसी का इतना असर है कि लोगों के शरीर में जलन होने लगती है, यदि वह बाहर निकलकर जोरों से फुकांर करे, तो इसकी फुंकार से मनुष्य बच नहीं सकता।

हरिदास जी इस स्थान को शीघ्र ही छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगें, नहीं तो प्राणों का भय है। चिकित्सकों की सम्मति सुनकर सभी ने हरिदास जी से आग्रह पूर्वक प्रार्थना की कि आप इस स्थान को अवश्य ही छोड़ दें। आप तो महात्मा हैं, आपको चाहे कष्ट न भी न हो किन्तु और लोगों को आपके यहाँ रहने से बड़ा भारी कष्ट होगा। दर्शनार्थी बिना आये रहेंगे नहीं और यहाँ आने पर सभी को शारिरिक कष्ट होता है। इसलिए आप हम लोगों का ही ख्याल करके इस स्थान को त्याग दीजिए।

हरिदास जी ने सबके आग्रह करने पर उस स्थान को छोड़ना मंजूर कर लिया और उन लोगों को आश्वासन देते हुए कहा, आप लोगों को कष्ट हो ये मैं नहीं चाहता यदि कल तक सर्प यहाँ से चला नहीं गया तो मैं कल शाम को ही इस स्थान का परित्याग कर दूँगा। कल या तो यहाँ सर्प ही रहेगा या मैं ही रहूंगा, अब दोनों साथ ही साथ यहाँ नहीं रह सकते।

इनके ऐसे निश्चय को सुनकर लोगों को बड़ा भारी आनंद हुआ। और सभी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन बहुत से भक्त एकत्रित होकर हरिदास जी के समीप श्री कृष्ण कीर्तन कर रहे थे कि उसी समय सब लोगों को उस अँधेरे स्थान में बड़ा भारी प्रकाश सा मालूम पडा। सभी भक्त आश्चर्य के साथ उस प्रकाश की ओर देखने लगे। सभी ने देखा कि एक चित्र – विचित्र रंगो का बड़ा भारी सर्प वहाँ से निकलकर गंगा जी की ओर जा रहा है।

उसके मस्तक पर एक बडी सी मणि जडी हुई है उसी का इतना तेज प्रकाश है। सभी ने उस भयंकर सर्प को देखकर आश्चर्य प्रकट किया। सर्प धीरे-धीरे गंगा जी के किनारे बहुत दूर चला गया। उस दिन से आश्रम में आने वाले किसी भी दर्शनार्थी के शरीर में खुजली नहीं हुई। संतो की तो दृष्टीमात्र से अविद्या का बंधन खुल जाता है तथा भगवान् भी कभी उनके वचनो का उल्लंघन नहीं करते।

सपेेरे मे अथिष्ठित नागराज वासुकी का उपाखयान 

एक दिन एक विशिष्ट व्यक्ति घर में एक सपेरा आया। सपेरे मे विष दन्त रहित सर्प के दंशन के साथ साथ मन्त्र के प्रभाव से सर्पो के अधिष्ठात देवता नागराज वासुकी का आवेश हो गया । मृदंग तथा मंजीरे की ध्वनि के साथ गाये जानेवाले गीत तथा सपेरे के द्वारा जपे जा रहे मन्त्र की शक्ति के प्रभाव को देखकर सभी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे।

दैवयोग से श्री हरिदास ठाकुर भी वहाँ आ पहुंचे । वे भी एक और खडे होकर उस दृश्य को देखने लगे। देखते ही देखते मन्त्र के प्रभाव से उस सपेरे के शरीर में अधिष्ठित्त नागराज वासुकी (विष्णुभक्त शेष -अनन्त) स्वयं उसके माध्यम से उद्दण्ड नृत्य करने लगे । कालियद में कालिया के ऊपर चढकर अखिल क्लाओंके गुरु भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार ताण्डव नृत्य किया था, उसी प्रकार की भाव भंगी को अवलम्बन करके सपेरा भी नृत्य करने लगा तथा कालिया नागके प्रति श्रीकृष्ण ने दण्ड देने के बहाने से जो अत्यधिक दया की थी, उस लीला से सम्बन्धित एक गीत गाने लगा।

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सुंदर कथा ५१(श्री भक्तमाल – नामचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी) भाग १ Sri Bhaktamal -Namacharya Sri Haridas ji Part 1

नामाचार्य श्री हरिदास जी का स्वरुप

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ®  

महाप्रभु के परिकर श्रीशिवानंद सेन के आत्मज श्री कविकर्णपूर ने स्वरचित श्री गौरगणोद्देश दीपिका नामक ग्रंथ में लिखा है –

ऋचीकस्य मुने: पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपा: ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ।।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९३)

ऋचीक मुनि के पुत्र महातपा ब्रह्मा श्री प्रह्लाद के साथ मिलकर अब श्रीहरिदास ठाकुर कहलाते हैं।

मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते।
उक्तो मुनिसुत: प्रातस्तुलसीपत्रमाहरण्।
अधौतमभिशप्तस्तं पित्रा यवनतां गत: ।
स एव हरिदास: सन् जात: परमभक्तिमान्।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९४-९५)

श्री मुरारिगुप्त द्वारा रचित श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (जो वर्तमान समय में श्रीचैतन्यचरित के नाम से प्रसिद्ध है) मे कहा क्या है कि किसी एक मुनिकुमार ने एक दिन प्रात:काल तुलसी पत्र चयन करके, उन्हें धोये बिना ही अपने पिता को भगवान् की सेवा के उद्देश्य से अर्पित कर दिये ये । इसी कारण उनके पिता ने उन्हें होने का अभिशाप दिया था ।

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सुंदर कथा ४०(श्री भक्तमाल – श्री जयदेव जी) Sri Bhaktamal – Sri Jaidev ji

पूज्यपाद श्री गणेशदास जी की टीका गीता प्रेस अंक , राधसर्वेश्वर शरण देवाचार्य , बालकृष्णदेवचार्य के कृपाप्रसाद और निम्बार्क साहित्य के आधार पर लिखे भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

निम्बार्क सम्प्रदाय के महान संत महाकवि श्रीजयदेव जी संस्कृत के कविराजों के राजा चक्रवर्ती सम्राट थे । शेष दूसरे सभी कवि आपके सामने छोटे बड़े राजाओं के समान थे । आपके द्वारा रचित  गीतगोविन्द महाकाव्य तीनों लोको में बहुत अधिक प्रसिद्ध एवं उत्तम सिद्ध हुआ । यह गीतगोविन्द कोकशास्त्र का, साहित्य के नवरसो का और विशेषकर उज्वल एवं सरस श्रृंगार रस का सागर है ।

इसकी अष्टपदियो का जो कोई नित्य अध्ययन एवं गान करे, उसकी बुद्धि पवित्र एवं प्रखर होकर दिन प्रतिदिन बढेगी । जहां अष्टपदियो का प्रेमपूर्वक गान होता है, वहाँ उन्हें सुनने के लिये भगवान् श्रीराधारमण जी अवश्य आते हैं और सुनकर प्रसन्न होते हैं । श्री पद्मावती जी के पति श्री जयदेव जी सन्तरूपी कमलवन को आनन्दित करनेवाले सूर्य के समान इस पृथ्वीपर अवतरित हुए ।

श्री जयदेव जी का जन्म और बाल्यकाल की लीलाएं –
कविसम्राट श्री जयदेव जी बंगाल प्रान्त के वीरभूमि जिले के अन्तर्गत किन्दुबिल्व नामक ग्राममें बसंत पंचमी के दिन पाँवह सौ साल पूर्व प्रकट हुए थे । आप के पिता का नाम भोजदेव और माता का नाम वामदेवी था । भोजदेव कान्यकुब्ज से बंगाल मे आये हुए पञ्च ब्राह्मणो में भरद्वाजगोत्रज श्रीहर्ष के वंशज थे । पांच वर्ष के थे तब इनके माता पिता भगवान् के धाम को पधार गए। ये भगवान ला भजन करते हुए किसी प्रकार अपना निर्वाह करते थे । पूर्व संस्कार बहुत अच्छे होने के कारण इन्होंने कष्टमें रहकर भी बहुत अच्छा विद्याभ्यास कर लिया था और सरल प्रेमके प्रभाव से भगवान् श्री कृष्ण की परम कृपा के अधिकारी हो गये थे ।

इनके पिता को निरंजन नामक उसी गांव के एक ब्राह्मण के कुछ रुपये देने थे । निरंजन ने जयदेव को संसार से उदासीन जानकर उनकी भगवद्भक्ति से अनुचित लाभ उठाने के विचार से किसी प्रकार उनके घर द्वार हथियाने का निक्षय किया । उस ने एक दस्तावेज बनाया और आकर जयदेव से कहा- देख जयदेव! मैं तेरे राधा कृष्ण को और गोपी कृष्ण को नहीं जानता ,या तो अभी मेरे रुपये ब्याज समेत है दे, नहीं तो इस दस्तावेज पर सही करके घर द्वारपर मुझें अपना कब्जा कर लेने दे ।

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भगवान् श्री गौरी शंकर एवं श्री लक्ष्मी नारायण एक स्वरुप है -धर्म शास्त्रो में अनेक प्रमाण ।

भगवान् श्री गौरी शंकर और श्री लक्ष्मी नारायण एक ही है इसके बहुत से प्रमाण शास्त्रो में उपलब्ध है। प्रमुख कुछ कथाये और श्लोक यहाँ दीये जा रही है जिस कारण से इनका एक स्वरुप होना स्पष्ट है –

shiv vishnu one form

(१)एक बार भगवान् नारायण अपने वैकुण्ठ लोक में सोये हुए थे । उन्हीने एक स्वप्न देखा , स्वप्न में वे क्या देखते है कि करोडो चन्द्रमाओं की कान्तिवाले, त्रिशूल डमरू धारी, स्वर्णाभरण भूषित, सुरेन्द्र वन्दित, अणिमादि सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान् शिव प्रेम और आनन्दातिरेक़ से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है । उन्हें देखकर भगवान् श्री हरि हर्ष गदगद हो सहसा  शय्यापर उठकर बैठ गये और कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे । उन्हें इम प्रकार बैठेे देखकर श्रीलक्ष्मी जी उनसे पूछने लगी कि -भगवन्! अपके इस प्रकार उठ बैठने का क्या कारण है ?

भगवान् ने कुछ देरतक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनन्द मे निमग्न हुए चुपचाप बैठे रहे । अन्त मे कुछ स्वस्थ होनेपर वे गदगद कंठ से इस प्रकार बोले – देवि ! मैंने अभी स्वप्न में भगवान् श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है, उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनन्दमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी । मालूम होता है, शंकर ने मुझे स्मरण किया है । अहोभाग्य ! चलो, कैंलास में चलकर हमलोग महादेव के दर्शन करे । यह कहकर दोनों कैलास की ओर चल दिये ।

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