श्री रामचंद्र भगवान् की आदर्श दिनचर्या और आदर्श रामराज्य

भगवान् श्रीराम अनन्त क्रोटि ब्रह्माण्ड नायक परम पिता परमेश्वर के अवतार थे और उन्होंने धर्मकी मर्यादा रखने के लिये भारत भूमि अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्ररूप में अवतार लिया था । उस समय राक्षसो का नग्न बीभत्स रूप इतना प्रचण्ड हो गया कि ऋषि मुनियो एवं गौ ब्राह्मणों का जीवन खतरे में पड़ गया था । जहां जहां कोई शास्त्र विहित यज्ञ कर्म आदि किये जाते थे, राक्षस गण उन्हें विध्वंस करने के लिये सदा तत्पर रहते थे ।

राक्षसों का राजा रावण भारत भूमिपर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिये चारों ओर जाल फैला रहा था ,ऐसी स्थिति में देवताओ के आग्रह एवं अनुनय विनय के फल स्वरूप भगवान् स्वयं अपने अंशोंसहित राम, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न के रूपमें अवतीर्ण हुए ।

भगवान् श्रीराम के आदर्श चरित्र का विवरण हम भिन्न भिन्न रामायणों में पाते हैं जिनमें वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण तथा पूज्य श्री गोस्वामी जी का रामचरितमानस प्रमुख है ।

साधारण बालकों की तरह बालकपन में अपने छोटे  भाइयों एवं बाल सखाओ के साथ भगवान् श्रीराम सरयूके तटपर कंदुक क्रीडा एवं अन्य खेलो में ऐसे मस्त हो जाते थे कि उन्हें अपने खाने पीने की भी सुध नहीं रहती थी ।

प्रजापालन के लिये भगवान् विशेष सचेष्ट एवं सतर्क रहते है । राज़सभा में सनकादि तथा नारद अष्ट ऋषि प्रतिदिन जाते है और उनसे वेद पुराण तथा इतिहास की चर्चा करते है । प्रजा को मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका यह पहला आदेश था कि यदि भूल से मैं कुछ अनीतिपूर्ण वचन कहूँ जो शासन विरुद्ध, न्याय विरुद्ध या द्वेषयुक्त हो तो भय छोड़कर मुझे यह कहकर तुरंत रोक देना कि – राम ! तुम्हारा यह कार्य अनुचित है ।

भगवान् श्रीराम जी की दिनचर्या का आनन्दरामायण के राज्यकाण्ड के १९ वें सर्ग में बड़े विस्तार से वर्णन है । श्रीरामदास के द्वारा महर्षि वाल्मीकि जी अपने शिष्य को उपदेश करते हैं –

श्रृणु शिष्य वदाम्यद्य रामराज्ञ: शुभावहा ।
दिनचर्या राज्यकाले कृता लोकान् हि शिक्षितुम् ।।
प्रभाते गायकैर्गीतैर्बोधितो रघुनन्दन: ।
नववाद्यनिनादांश्च सुखं शुश्राव सीतया ।।
ततो ध्यात्वा शिवं देवीं गुरुं दृशरथं सुरान् ।
पुण्यतीर्थानि  मातृश्च देवतायतनानि च ।।
(आनन्द रामायण, राज्यकाण्ड १९ । १-३ ) 
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