सुंदर कथा ६८ (श्री भक्तमाल – श्री सिलपिल्ले की भक्त- दो कन्याएँ ) Sri Bhaktamal – Sri Silpille ki bhakt

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सिलपिल्ले (कृष्ण )भगवान् की भक्त – दो कन्याएँ
श्री भक्तमाल ग्रंथ में नाभादास जी ने लिखा है – ठाकुर सिलपिल्ले ( श्रीकृष्ण ) की दो भक्ता कन्याएं थी । इनमे एक राजा की कन्या थी और दूसरी जमींदार की कन्या थी । एक दिन राजा के महल में एक संत भगवान् पधारे । वे संत प्रेम से महल में कुछ दिन विराजे । राजा और जमींदार दोनों की की कन्याएं महल में खेल रही थी उसी समय उनकी दृष्टि संत की और गयी । उस समय संत भगवान् अपने शालिग्राम जी की सेवा में मग्न थे ।उन दोनों कन्याओं ने देखा की संत जी एक गोल काले पत्थर ( शालिग्राम ) जी को स्नान करवा रहे है , सुंदर तुलसी दाल पधरा रहे है , प्रेम से पद गाकर सुना रहे है , चंदन और सुगंध अर्पण कर रहे है , पभोग अर्पण कर रहे है । संतो ने कहा है की जिस समय की यह घटना है उस समय इनकी उम्र आठ वर्ष की थी । 

उन दोनों कन्याओं ने संत भगवान् से कहा की यह आप क्या कर रहे है ? संत भगवान् ने उन दोनों की बताया की यह पत्थर नहीं अपितु स्वयं श्री भगवान् है और मै इनकी सेवा कर रहा था । संत जी ने उन दोनों को भगवान् का चरणामृत और प्रसाद भी दिया जिससे उनके मन में भी सेवा करने की उत्कण्ठा हुई । संत जी का महल में प्रवचन भी हुआ जिसे सुनकर दोनों कन्याओं के हृदय में और अधिक भगवत्प्रेम जाग उठा । उन्होंने संत भगवान् से विनती करते हुए कहा की हमें भी आप जैसी सेवा हमें भी करनी है ,हम भी सुकुमार श्यामसुंदर की पूजा करेंगी ,हमें  आप ठाकुर जी की मूर्ति दे दीजिये ।उन दोनों के मन में भाव आया की यही संत हमारे सद्गुरुदेव भगवान् है ।

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