सुंदर कथा २०(श्री भक्तमाल -श्री कृष्णदास पयहारी जी) Bhaktamal katha Sri Krishnadas payhaari ji

इस कराल कलिकालमें पयहारी श्रीकृष्णदासजी वैरायगकी सीमा हुए। श्रीकृष्णदास जी ने अन्नको त्यागकर केवल दूधका पान करके भजन किया। इसलिये संतजी ‘पयहारी’ इस नामसे विशेष प्रसिद्ध हुए। श्री पयहारी जी ने शिष्य बनाकर जिसे अपनाया,उससे याचना नहीं की,वरन् उसे भगवत्पद-मोक्षका अधिकारी बना दिया और सांसारिक शोक-मोहसे सदाके लिए छुड़ाकर अभय कर दिया। श्री पयहारी भक्तिमय तेजके समूह थे और आपमें अपार भजनका बल था। बालब्रह्मचारी एवं योगी होनेके कारण आप ऊर्ध्वरेता हो गए थे। भारतवर्ष के छोटे-बड़े जितने राजा-महाराजा थे,वे सभी आपके चरणों की सेवा करते थे। दधिचिवंशी ब्राह्मणोंके वंशमे उत्पन्न होकर आपने भक्तिके प्रतापसे भक्तोंके हृदयकमलोंको सुख दिया।

जयपुरमें गलता नामक एक प्रसिद्ध स्थान है,जो गालव ऋषि का आश्रम माना जाता है,जो ‘गलता गादी’ नाम से प्रसिद्ध है। एक समय वहाँ स्वामी श्री कृष्णदास पयहारी जी विराजमान थे। श्री पयहारी जी महाराज सिद्ध संत थे। एक बार की बात है,श्री पयहारी जी विचरण करते हुए कुल्हू की पहाड़ियों की ओर चले गये और वहाँ एक गुफामें बैठकर भगवान् का भजन करने लगे। स्वामीजी केवल दूध का ही आहार करते परंतु उस निर्जन पहाड़ी गुफामें दूध कहाँसे प्राप्त होता? परंतु प्रभु-प्रेरणा से पहाड़ियों पर चरती हुई एक ग्वाले की गाय झुंडसे निकलकर उस पहाड़ी गुफाके पास चली आयी और उसके स्तनों से दूध स्रवण होने लगा। पयहारी बाबा ने इसे इश्वरकृपा मानकर अपने कमण्डलु में दूध एकत्र कर लिया और वस्त्रपूतकर पी गये। गाय फिरसे जाकर झुण्डमे शामिल हो गयी। अब तो यह नित्यप्रतिका क्रम हो गया।

एक दिन गवालेने गायको गुफाकी ओर जाते देख लिया तो वह उसके पीछे-पीछे वहाँ तक चला गया। वहाँका अद्भुत दृश्य देखकर वह जड़वत् खड़ा रह गया,फिर पयहारी बाबाको सिद्धसंत समझ कर उनके चरणोमे गिर पड़ा और बोला- बाबा! गोमाता की कृपासे आज मुझे आपके दर्शन हो गये; आप मुझे कोई और सेवा बताइये। श्री पयहारी बाबा उसकी साधुता और सेवाभाव से बहुत प्रसन्न हुए और बोले- तुम कोई वर मांग लो। ग्वाला बोला – प्रभो ! आपकी कृपा से मुझे दूध- पूत सब प्राप्त है; मुझे अब किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। हाँ , अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो ऐसी कृपा कीजिये कि मेरे देशके राजा का राज्य फिरसे उन्हें मिल जाय। बाबा उसकी निःस्पृहता,स्वामिभक्ति और परोपकारिता देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले कि तुम अपने राजाको यहाँ बुला लाना।

उन दिनों वहाँके राज शत्रुओंद्वारा राज्य छीन लिये जाने और प्राण संकटके कारण एक गुफामें छिपकर रह रहे थे। गवालेने वहाँ जाकर उनसे पयहारी बाबाके विषयमें बताया और उन्हें लिवा लाया। राजाने बाबाके चरणों में दण्डवत् प्रणाम् किया और अपनी करुणकथा सुनायी। बाबाने राजाको ‘विजयी  भव’ का आशीर्वाद दिया और कहा कि इस पहाड़ीपर चढ़कर चारों ओर देखो,जहाँतक तुम्हारी दृष्टि जायगी, वहाँतक का राज्य तुम्हारा ही जायगा। राजाने बाबा की आज्ञा का पालन किया और थोड़े ही दिनोंमें बिना किसी विशेष प्रयासके उनका खोया राज्य पुनःउन्हें प्राप्त हो गया। राज्य-प्राप्तिके बाद राजाने अपने सम्पूर्ण राज्यमे संत-सेवा और भगवद्भजन का आदेश लागू कर दिया। इस प्रकार श्री पयहारी बाबाकी कृपासे कुल्हू राज्यके लोग भगवद्भक्त हो गये।

एकबार पुजारी मंदिर में भगवानको भोग लगानेके लिये जलेबियों के थाल ले जा रहे थे, उसमेंसे एक जलेबी गिर गयी । राजाका छोटा सा बालक उसे उठाकर खा गया ।
यह देखकर राजाके मनमें बडा भारी दुख हुआ कि बिना भोग लगे ही इसने खा लिया, तुरंत हाथमें तलवार लेकर उसे मार डालनेके लिये उठा, परंतु समीपमें उपस्थित सन्तोने उसे बचा लिया और राजासे कहा कि अब तो यह बालक हमारा हो गया । यदि अपको लेना है तो मूल्य देकर आप इसे रख लिजिये ।

संत श्री प्रियादास जी कहते है की कुल्हू के  राजाका यह पुत्र बडा भारी भगवद्भक्त है, साधुओकी सेवा तथा उनका सम्मान करनेमें उसके समान दूसरा कोई नहीं है ।वह साधू संतो की भक्ति सेवा में बड़ी श्रद्धा रखता था। एक बार अपने भण्डारेकी पंक्तिमें एक सन्तकी पत्नी को गर्भवती देखकर राजपुत्रने दो पत्तलें दीं और कहा कि गर्भस्थ बालक भक्त है और वह मेरा इष्टदेव है, मैं ऐसा मनमें मानता हूँ । इसीलिये दूसरा पत्तल है रहा हूँ ।

कोई वैष्णव वेषधारी मनुष्य जूतियोंको बेचता और गाँठता था, उसे देखकर राजपुत्रको बडी दया आयी और उसने उससे कहा भगवन् ! आप दूसरे लोगोंको सन्त मानकर उनकी जूतियोंकी सेवा करते हैं, आपके इस गुप्त भावको तुच्छ प्राणी क्या जानें । इसलिये आप इस जूती-सेवा-कार्य को छोड़ दीजिये । इस बेषको धारणकर और इस कार्यक्रो देखकर लोगोके मनमें कुभाब होता है । ऐसा कहकर उसे वैष्णव सेवा एवं स्वनिर्वाह के  लिये बहुत-सी खेती करनेयोग्य भूमि और धन दिया, साथ ही उसे ज्ञान-प्रकाश भी दिया, उसकी बुद्धि श्री रामजी में रम गयी ।

एक बार पयहारी श्रीकृष्णदासजी महाराज अपनी गुफामें विराजमान थे, उसी समय द्वारपर एक सिंह आकर खडा हो गया । आपने विचार किया कि ‘ आज तो अतिथि-प्रभु पधारे हैं । उनके भोज़नके लिये श्री पयहारी जी ने अपनी जाँघ काटकर मांस सामने रख दिया और प्रार्थना की ‘ प्रभो !भोजन कीजिये । धर्मकी बहुत बडी महिमा है और उसका पालन करना बहुत ही कठिन है । इनकी सच्ची धर्मनिष्ठाको देखकर भगवान् श्री रामचन्द्रजी से नहीं रहा गया, उन्होंने प्रकट होकर दर्शन दिया; क्योंकि स्वामीजी का भाव बिलकुल सत्य था । भगवान् श्री रामचन्द्रजी का दर्शन करके जांघका दुख न जाने कहां चला गया । संसार में लोग अतिथिको अन्न जल देनेमें ही कष्टका अनुभव करते हैं, तब इस प्रकार अपने शरीरका दान कौन कर सकता है ! पयहारी जी के इस चरित्रको सुनकर लोगोंके मनमें महान् आश्चर्य होता है ।

श्री कृष्णदास पयहारी जी आज भी सशरीर विराजमान है एवं अधिकारी व्यक्तियो को उनका आज भी दर्शन होता है।संतो में मान्यता है कि हमारे शत्रुघ्न भैया ही स्वामी जी के रूप में कलयुग में प्रकट हुए है।

समस्त संत भक्तो की जय।
भक्तवत्सल भगवान् की जय।।