सुंदर कथा २९ (श्री भक्तमाल – गौ ब्राह्मण प्रतिपालक भगवान् श्री परशुराम) Sri Bhaktamal – Sri Parshuram ji

श्री देवदत्त जी महाराज ,रेणुकमाहात्म्य एवं श्री दत्तपादाचार्य जी की कृपा से प्रेरित चरित्र । कृपा अपने नाम से प्रकाशित ना करे । Copyrights : http://www.bhaktamal.com

एक बार महर्षि ऋचीक से उनकी पत्नी और सास दोनो ने ही पुत्र प्राप्ति के लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीक ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनो के लिये अलग अलग मंत्रो से चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये ।सत्यवती की मां ने यह समझकर कि ऋषिने अपनी पत्नी के लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा अतः उसने बेटी से वह चरु मांग लिया । इसपर सत्यवती ने अपना चरु माँ को दे दिया और माँ का चरु वह स्वयं खा गयी ।

जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती-से कहा कि तुमने बडा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगो को दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता । (सत्यवती-ने ऋचीक मुनि को प्रसन्न किया और प्रार्थना की कि  स्वामी ! ऐसा नहीं होना चाहिये । तब उन्होंने कहा – अच्छी बात है । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा घोर प्रकृतिका होगा । समयपर सत्यवतीके गर्भसै जमदग्निका जन्म हुआ ।(परंतु जमदग्नि की जगह उनके पुत्र परशुराम घोर प्रकृति के हुए) के  सत्यवती समस्त लोकों को पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी कौशिकी नदी बन गयी ।

महाभारत्तमें कहा गया है कि त्रेतायुग एवं द्वापरयुग के सन्धिकाल में वैशाख शुक्ल तृतीया ( अक्षय तृतीया) के शुभ दिन उत्तम नक्षत्र और उत्तम मुहूर्त में भृगुकुलोत्पन्न महर्षि जमदग्नि एवं काशिराज सुता भगवती रेणुका के माध्यमसे भगवान् विष्णुका भार्गवराम (परशुराम) के रूपमें पृथ्वीपर अवतार हुआ ।

महर्षि जमदग्नि का आश्रम रेवा-नर्मदानदी के तटपर था । वहांपर भगवान् परशुरामका आविर्भाव हुआ था । उनके पितामह महातपस्वी ऋचीक का विवाह क्षत्रिय गाधिराज की सुपुत्री (ऋषि विश्वामित्रकी बहिन) सत्यवती के साथ हुआ था । उन दिनों विशेष कारणों से कुछ ब्राह्मण ऋषियोंके विवाह क्षत्रिय राजकन्याओ के साथ हुए हैं । ऐसे विवाहोंमें संतति ब्राह्मण ही मानी जाती है । महर्षि जमदग्नि एवं भगवती रेणुका को पाँच पुत्र हुए

१ ) रुमण्वान् २) सुषेण ३ ) वसु ४) विश्वावसु तथा ५) भार्गवराम (परशुराम) । परशुराम सबसे छोटे थे तथापि सबसे वीर एवं वेदज्ञ थे । पाँच वर्षकी अवस्था में उनका सविधि यझोपवीत संस्काऱ हुआ, तत्पश्चात् माता पिता की सम्मति लेकर वे शालग्राम क्षेत्र मे जाकर गुरु महर्षि कश्यप के समक्ष उपस्थित हुए और शास्त्र तथा शस्त्रका ज्ञान प्रदान करनेके लिये उनसे प्रार्थना की ।

गुरु महर्षि कश्यपने परशुराम को सविधि दीक्षा दी और शास्त्र एवं शस्त्रविद्या सिखाना प्रारम्भ किया । क्रुशाग्रबुद्धि सम्पन्न एवं अदम्य उत्साही होनेसे परशुराम अल्प समयमें ही चारों वेद और धनुविद्यामें निपुण हो गये । गुरु की आज्ञा तथा आशीर्वाद लेकर परशुराम अपने माता पिताके पास आये और उनका भी आशीर्वाद प्राप्त किया ।

परशुराम अपने घरसे प्रस्थान कर गन्धमादन पर्वत पर गये और उत्कट तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शंकर को प्रसन्न कर उनसे उच्चकोटिकी धनुर्विद्या प्राप्त की- परशुराम ने भगवान् श्री शंकर से ४१ अस्त्र भी प्राप्त किये, जो भयंकर तथा महाविनाशक थे, जैसे कि ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, आग्नेयास्त्र, वायत्वास्त्र इत्यादि। इन महान् अस्त्रों के प्रताप से परशुराम महाधनुर्धर एवं मन्त्रविशारद हुए । परशुराम को निम्नलिखित अस्त्र-शस्त्रों की जानकारी प्राप्त थीः

परशुराम को जिन ४१ अस्त्र-शस्त्रों की जानकारी प्राप्त थी वह इस प्रकार है-

पढना जारी रखे