सुंदर कथा २४ (श्री भक्तमाल – श्री दण्डवत् स्वामी जी) Sri Bhaktamal- Sri Dandvat swami ji

दण्डवत् स्वामी नामके एक साधु पुरुष पैठणमें रहते थे । यह नमन भक्ति करते थे ।यह प्राणिमात्र में भगवान् विट्ठल कृष्ण का ही दर्शन करते। किसी भी प्राणी को देखते ही यह उसे दण्डवत प्रणाम करते । इसीसे इनका नाम दण्डवत स्वामी पडा । यह एकनाथ महाराजके शिष्य थे । कहीं एक गधा मरा पडा था, कुछ ब्राह्मणोंने दण्डवत्-स्वामी से कहा कि इन्हें भी प्रणाम करिये । 

इन्होंने मरे गधे को भी प्रणाम किया और आश्चर्यकी बात यह कि वह गधा उठ खडा हुआ । इस विलक्षण सिद्धि को देखकर गांवके सब लोग दण्डवत स्वामी को मानने और वन्दन करने लगे। योग साधना से अनेक प्ररकार की सिद्धियों प्राप्त होती हैं इसमें सन्देह नहीं, पर है सिद्धियों पर्मार्थ में बाधक होती हैं इस कारण भगवान के भक्त इन सिद्धियो के पीछे नहीं पड़ते । पढना जारी रखे

सुंदर कथा २३ (श्री भक्तमाल – श्री एकनाथ जी) Sri Bhaktamal- Sri Eknath ji…भाग २

आदरणीय श्री लक्ष्मण पांगारकर द्वारा एकनाथ चरित्र, संत महीपति औ केशव कृत नाथ चरित्र ,संत केशव कृत नाथ चरित्र ,श्री एकनाथ जी के १३ वे वंशज पूज्य श्री वेणीमाधव जी के आशीर्वाद एवं वारकरी संप्रदाय के ग्रंथो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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श्री एकनाथ महाराजने भगवान् की ऐसी निरुपम सेवा की कि उनके संगति सुखके स्नेह से भगवान् ने उनके यहाँ बारह वर्ष रहकर उनकी सेवा की । “वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ” इस गीताके वचनके अनुसार सदा सर्वत्र परमात्माको ही देखनेवाले दुर्लभ महात्माओंकी कोटिमे जब श्री एकनाथ महाराज पहुंचे तब स्वयं भगवान् ब्राह्यणरूपसे उनके यहां आकर रहने लगे । भक्तने भगवान की ऐसी सेवा की कि भगवान् को यह इच्छा हुई कि अब हम भक्तकी सेवा करें । श्री एकनाथजी ने भगवान और संतो से इतना प्रेम किया इतना प्रेम किया कि उसे शब्दों में वर्णन करना अत्यंत कठिन है, या यूं कहे संभव ही नहीं है।
संत श्रीज्ञानदेव लिखते है- उसके संगके खुखके लिये मुझ विदेह को देह धारण करना पड़ता है, यही नहीं बल्कि उसके लिये देह धारण करना मुझे इतना प्रिय होता है कि जिसकी कोई उपमा नहीं ।
– ज्ञानेश्वरी ग्रंथ, अध्याय १२

एकनाथ महाराजकी भक्ति एवं अगाध प्रेम से मोहित होकर भगवान् श्रीकृष्ण ब्राह्मण वेशमें एक बार नाथके घर आये और उन्हें नमस्कार कर सामने खड़े हो गये । उस समय उन दोनोंका इस प्रकार संवाद हूआ :

नाथ – आप केसे आये?

ब्राह्मण – आपका नाम सुना, इच्छा हुई कि आपके साथ अखण्ड समागम हो और आपकी कुछ सेवा बन पड़े इसीलिये आया हूं । सदासे मैं सन्तोका सेवक ही रहा हूं । मुझे वेतन नहीं चाहिये । पेटभर अन्न प्रसाद मिले और आपकी सेवा हो, इतनी ही इच्छा है ।

नाथ – आपके परिवार में कौन-कौन हैं ?

ब्राह्मण- मैं अकेला ही हूँ मेरे न कोई स्त्री है न बच्चे । इस शरीरको श्रीकृष्ण या श्रीखण्डिया कहते हैं ।

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सुंदर कथा २३ (श्री भक्तमाल – श्री एकनाथ जी) Sri Bhaktamal- Sri Eknath ji…भाग १

आदरणीय श्री लक्ष्मण पांगारकर द्वारा एकनाथ चरित्र, संत महीपति औ केशव कृत नाथ चरित्र ,संत केशव कृत नाथ चरित्र ,श्री एकनाथ जी के १३ वे वंशज पूज्य श्री वेणीमाधव जी के आशीर्वाद एवं वारकरी संप्रदाय के ग्रंथो पर आधारित । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।
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संत श्रेष्ठ श्री एकनाथ जी का जीवन चरित्र अध्यात्म मार्ग के साधको के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है । उनके जीवन के कुछ प्रसंग यहां निचे दिए गए है । श्री एकनाथ जी को जिस गुरु परंपरा से ज्ञान, भक्ति ,वैराग्य प्राप्त हुआ वह इस प्रकार है :
श्री आदिनारायण – श्री ब्रह्मा – श्री अत्रि मुनि – श्री दत्तात्रेय महामुनि – श्री जनार्दन सवामी – श्री एकनाथ और आगे …। श्री दत्तात्रेय भगवान् के ३ शिष्य हुए है – सहस्त्रार्जुन , यदु और कलियुग में श्री जनार्दन स्वामी । श्री जनार्दन स्वामी संत एकनाथ जी के गुरुदेव है ।

क्रोध दिलाने पर २०० रुपये इनाम और ब्राह्मण पर एकनाथ जी की कृपा-
श्रीधाम पंढरपुर के पास पैठण नाम का गांव पड़ता है जहां संत श्रीएकनाथजी विराजते थे ।गांव में एक चबूतरा था जहा कुछ दुष्ट बैठकर गप शप किया करते थे और एकनाथ महाराज की फजीहत करने की घातमें रहा करते थे ।कैसे एकनाथ जी का मज़ाक बनाया जाए यह सोचते रहते थे। वह चबूतरा कुचरचौतरा कहलाता था । एकनाथ महाराज का कीर्तन सुनकर जिनका सिर दर्द करता ऐसे और भी कुछ अभागे लोग पैठण मे रहते थे । इस चबूतरे पर बैठकर ये लोग नशा किया करते थे और देर रात तक यहीं बैठकर शतरंज आदि खेलते थे । बेमतलब हंसना हंसाना,निन्दा करना, षडयन्त्र रचना, भद्दी बाते करना, कोई न कोई उपद्रव खड़ा करना एवं नाना प्रकरके बेकार काम करना, यही सब वहां हुआ करता था।

एक दिन ये निशाचर लोग रात को इसी तरह अपनी मौज में थे, इस बीच एक ब्राह्मण पथिक वहां पहुंचा । पैठण भले और विद्वान् लोगों का स्थान होनेसे वह ब्राह्मण वहा इस आशासे आया था कि लड़केके उपनयन (जनेऊ) संस्कार के लिये यहांसे सौ दोसौ रुपये मिल जायंगे । दुर्भाग्य से वह सबसे पहले इस चबूतरेपर ही पहुंचा और उसे यही लोग दिखे । ब्राह्मण भी कुछ अपने ही ढंगका आदमी था । इन लोगो ने उससे कहा- यहां पहली बार देखा तुम्हे ? पैठण में नए हो क्या ? उस ब्राह्मण ने पैठण में आने का कारण उन लोगो को बताया । दुष्ट लोग बोले -यहां एकनाथ नामके एक बड़े भारी महात्मा हैं । बड़े ही शान्त हैं । उन्हें कभी क्रोध तो आता ही नहीं । तुम यदि कोई ऐसा काम करो कि उन्हें चिढा दो तो तुम्हें हम दो सौ रुपये देंगे ।उस ब्राह्मण ने एकनाथ महाराज की शान्ति भंग करनेका निश्चय किया । इन दुष्टो को मनोरंजन की यह नयी सामग्री मिली ।

अब एकनाथ महाराजको चिढानेका उपाय सोचता सोचता वह ब्राह्मण दूसरे दिन सबेरे एकनाथ महाराज के घर पहुँचा । महाराज उस समय पूजामें थे । यह ब्राह्मण घरमें घुसकर बिना हाथ पैर धोये, बिना पूछे, बिना कपड़े उतारे और तो और जूते पहन कर सीधे ठाकुरघर में पहुँचा और उसी हालत में उनके आसन से कुछ दूर नहीं, उनके पास भी नहीं, उन्ही की पालथीपर (गोदमें) जाकर बैठ गया । वह समझता था कि अब एकनाथजी को क्रोध आये बिना रह ही नहीं सकता । पर शान्ति के सागर और धैर्य के मेरु क्या इससे क्षुब्ध हो जायेंगे ? किंचित् हँसकर एकनाथ जी ने उस ब्राह्मण से कहा कि आपके दर्शन से मुझे बडा आनन्द हुआ । मिलने तो बहुत लोग आते हैं पर अपका प्रेम कुछ विलक्षण है । बाजू में पत्नी गिरिजाबाई भगवान् के लिए चंदन घिसने की सेवा कर रही थी । उनसे एकनाथ जी बोले – यह ब्राह्मण देव हमसे इतना प्रेम करते है की इनको हमसे मिलने की लालसा में जूते निकालने तक होश नहीं रहा । हे ब्राह्मणदेव ! आपने ज्यों ही घरमें पैर रखा त्यों ही मुझे आपसे मिलने की प्रबल उत्कंठा हुई, यह सचमुच ही आपके ही प्रेमका प्रभाव है । इस प्रकार ब्राह्मण का पहला वार खाली गया । उसने समझा मामला जरा टेढा है पर दो सौ रुपये का लोभ उसके मन में था । उसने फिर एक बर प्रयत्न करने का निश्चय किया ।

एकनाथ महाराज स्नान संध्या आदि से निवृत हो चुके थे, मध्याह्न् भोजनका समय था। भोजनके लिये उस ब्राह्मणका आसन एकनाथजी के आरानके समीप ही लगाया गया था । पत्तले परोसी गयीं, घी परोसनेके लिये गिरिजा बाई आयी और ब्राह्मणके सामने दोनेमें घी डालनेके लिये ज्यों ही वह झुकी ,त्यों ही ब्राह्मण लपककर उनकी पीठपर चढ़ बैठा । तब एकनाथजी महाराज गिरिजाबाईंसे कहते है- हाँ, सँभलना, ब्राह्मण कहीं नीचे न गिर पड़े । गिरिजा-बाई भी एकनाथ महाराजकी ही धर्मपत्नी थीं । उन्होंने मुसकराते हुए उत्तर दिया- कोई हर्ज नहीं, हरिपण्डित को( पुत्रको) पीठपर लादे काम करते रहनेका मुझे अभ्यास है ! मैं भला अपने इस दूसरे बच्चेको नीचे कैसे गिरने दूंगी।

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सुंदर कथा २२(श्री भक्तमाल -श्री कूबाजी ) Bhaktamal katha Sri Kubaji

राजपूताना के किसी गांवमें कुम्हार जातिके एक कूबाजी नामके भगवद्भक्त रहते थे । ये अपनी पत्नी पुरीके साथ महीनेभरमें मिट्टीके तीस बर्तन बना लेते और उन्हींको बेचकर पति पत्नी जीवन निर्वाह करते थे । धनका लोभ था नहीं भगवान् के भजनमें अधिक से अधिक समय लगना चाहिये, इस विचारसे कूबाजी अधिक बर्तन नहीं बनाते थे ।घरपर आये हुए अतिथियोंकी सेवा और भगवान् का भजन, बस इन्ही दो कामोंमें उनकी रुचि थी । उनका सुन्दर नाम केवलराम था ।आपने अपनी भक्तिके प्रभावसे अपने कुलका ही नहीं, संसारका भी उद्धार किया। आप साधू संतो की बडी अच्छी सेवा करते थे ।

(१) कुएं में गिरने पर श्री भगवान् की कृपा से सकुशल लौटना-
एक बार कूबाजी के गांव में दो सौ साधू पधारे।किसीने साधुओं का सत्कार नहीं किया सबने कूबाजी का नाम बताया। आपके घरमे सब संत पधारे। उनका सप्रेम स्वागत-सत्कार किया । परंतु उस दिन घरमे अन्न धन कुछ भी न था । बडी भारी अवश्यकता थी, अत: आप कर्ज लेनेके लिये चले परंतु किसी महाज़नने कर्ज नहीं दिया । एक महाजनने कहा ,यदि मेरा कुआँ खोदनेका काम कर दो तो मैं तुम्हारे लिये आवश्यक सीधा सामान उधार दे सकता हूँ। इस बातको स्वीकारकर आपने प्रतिज्ञा की और आवश्यक अन्न-धन लाये । एकमात्र श्यामसुंदर जिन्हें प्रिय हैं, ऐसे संतोंको आपने बड़े प्रेमसे भोजन कराया ।

संतो की सेवा के लिए कुंआ खोदने का कार्य भी प्रसन्नता से मान्य कर लिया ।अब साधु संतोंकी सेवासे अवकाश पाकर श्रीकेवल रामजी महाज़नका कुंआ खोदने लगे । खोदते समय आप तोतेकी तरह भगवान् के नामोंका उच्चारण कर रहे थे । कुंआ खुद गया यह जानकर महाजनको और कूबाजीको बडी प्रसन्नता हुई । खोदते-खोदते रेतीली जमीन आ गयी और चारों ओरसे कईं हजार मन मिट्टी खिसककर गिर पडी । उसमें श्री केवलरामजी दब गये । लोगोंने सोचा कि अब इतनी मिट्टीको कैसे हटाया जाय । केवल-रामजी तो मर ही गये होगे, अब मिट्टी को हटानेसे भी क्या लाभ ! इस प्रकार शोक करतें हुए लोग अपने-अपने घरोंको चले गये ।

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सुंदर कथा २१(श्री भक्तमाल -श्री पृथ्वीराज जी) Bhaktamal katha Sri- Prithviraj ji

आमेरनरेश श्री पृथ्वीराज जी स्वामी श्रीकृष्णदास पयोहारी जी के शिष्य थे । एक बार श्री स्वामी जी की आज्ञासे राजाजी उनके साथ द्वारका जी की यात्रा के लिये तैयार  हुए । राजाके दीवान ने जब यह बात सुनी तो उसे दुख हुआ । वह रातको एकान्तमें श्रीपयोहारीजी महाराज़के पास गया और महाराजसे चुपकेसे कानमें कहा- महाराज जी ! इस समय राजा तन-मन और धनसे साधुओं की सेवामें लगे हुए हैं, आमेर नगरकी जनतामें भक्तिकी सुंदर भावना व्याप्त है । राजाके चले जानेसे साधुसेवामें तथा भक्तिप्रचार में बाधा होगी । अत: मेरे विचारसे तो आप  राजाको साथ न ले जायें, सो ही ठीक है। श्रीपयोहारी जी ने कहाँ- तुम जाओ, मैं राजाको साथ नहीं ले जाऊँगा ।

मंत्रीकी बातको स्वामीजीने राजासे नहीं बताया । प्रातःकाल राजा पृथ्वीराज हाथ जोडकर श्रीस्वामीजीके सामने खड़े हो गये । तब श्रीस्वामीजी ने आज्ञा दी कि -तुम मेरे साथ न चलकर यहीं आमेरमें ही रहो और साधुुसेवा करो ।राजाने श्रीपयोहारीजी से प्रार्थना की – प्रभो ! मैं श्रीद्वारकानाथ जी के दर्शन, श्रीगोमती-संगममें स्नान एवं भुजाओं-में शंख-चक्रकी छाप धारण करूँ, इसीलिये आप अपने मनमें मुझे भी साथ ले चलनेकी इच्छा कीजिये।
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सुंदर कथा २०(श्री भक्तमाल -श्री कृष्णदास पयहारी जी) Bhaktamal katha Sri Krishnadas payhaari ji

इस कराल कलिकालमें पयहारी श्रीकृष्णदासजी वैरायगकी सीमा हुए। श्रीकृष्णदास जी ने अन्नको त्यागकर केवल दूधका पान करके भजन किया। इसलिये संतजी ‘पयहारी’ इस नामसे विशेष प्रसिद्ध हुए। श्री पयहारी जी ने शिष्य बनाकर जिसे अपनाया,उससे याचना नहीं की,वरन् उसे भगवत्पद-मोक्षका अधिकारी बना दिया और सांसारिक शोक-मोहसे सदाके लिए छुड़ाकर अभय कर दिया। श्री पयहारी भक्तिमय तेजके समूह थे और आपमें अपार भजनका बल था। बालब्रह्मचारी एवं योगी होनेके कारण आप ऊर्ध्वरेता हो गए थे। भारतवर्ष के छोटे-बड़े जितने राजा-महाराजा थे,वे सभी आपके चरणों की सेवा करते थे। दधिचिवंशी ब्राह्मणोंके वंशमे उत्पन्न होकर आपने भक्तिके प्रतापसे भक्तोंके हृदयकमलोंको सुख दिया।

जयपुरमें गलता नामक एक प्रसिद्ध स्थान है,जो गालव ऋषि का आश्रम माना जाता है,जो ‘गलता गादी’ नाम से प्रसिद्ध है। एक समय वहाँ स्वामी श्री कृष्णदास पयहारी जी विराजमान थे। श्री पयहारी जी महाराज सिद्ध संत थे। एक बार की बात है,श्री पयहारी जी विचरण करते हुए कुल्हू की पहाड़ियों की ओर चले गये और वहाँ एक गुफामें बैठकर भगवान् का भजन करने लगे। स्वामीजी केवल दूध का ही आहार करते परंतु उस निर्जन पहाड़ी गुफामें दूध कहाँसे प्राप्त होता? परंतु प्रभु-प्रेरणा से पहाड़ियों पर चरती हुई एक ग्वाले की गाय झुंडसे निकलकर उस पहाड़ी गुफाके पास चली आयी और उसके स्तनों से दूध स्रवण होने लगा। पयहारी बाबा ने इसे इश्वरकृपा मानकर अपने कमण्डलु में दूध एकत्र कर लिया और वस्त्रपूतकर पी गये। गाय फिरसे जाकर झुण्डमे शामिल हो गयी। अब तो यह नित्यप्रतिका क्रम हो गया।

एक दिन गवालेने गायको गुफाकी ओर जाते देख लिया तो वह उसके पीछे-पीछे वहाँ तक चला गया। वहाँका अद्भुत दृश्य देखकर वह जड़वत् खड़ा रह गया,फिर पयहारी बाबाको सिद्धसंत समझ कर उनके चरणोमे गिर पड़ा और बोला- बाबा! गोमाता की कृपासे आज मुझे आपके दर्शन हो गये; आप मुझे कोई और सेवा बताइये। श्री पयहारी बाबा उसकी साधुता और सेवाभाव से बहुत प्रसन्न हुए और बोले- तुम कोई वर मांग लो। ग्वाला बोला – प्रभो ! आपकी कृपा से मुझे दूध- पूत सब प्राप्त है; मुझे अब किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं। हाँ , अगर आप कुछ देना ही चाहते है तो ऐसी कृपा कीजिये कि मेरे देशके राजा का राज्य फिरसे उन्हें मिल जाय। बाबा उसकी निःस्पृहता,स्वामिभक्ति और परोपकारिता देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए और बोले कि तुम अपने राजाको यहाँ बुला लाना।

उन दिनों वहाँके राज शत्रुओंद्वारा राज्य छीन लिये जाने और प्राण संकटके कारण एक गुफामें छिपकर रह रहे थे। गवालेने वहाँ जाकर उनसे पयहारी बाबाके विषयमें बताया और उन्हें लिवा लाया। राजाने बाबाके चरणों में दण्डवत् प्रणाम् किया और अपनी करुणकथा सुनायी। बाबाने राजाको ‘विजयी  भव’ का आशीर्वाद दिया और कहा कि इस पहाड़ीपर चढ़कर चारों ओर देखो,जहाँतक तुम्हारी दृष्टि जायगी, वहाँतक का राज्य तुम्हारा ही जायगा। राजाने बाबा की आज्ञा का पालन किया और थोड़े ही दिनोंमें बिना किसी विशेष प्रयासके उनका खोया राज्य पुनःउन्हें प्राप्त हो गया। राज्य-प्राप्तिके बाद राजाने अपने सम्पूर्ण राज्यमे संत-सेवा और भगवद्भजन का आदेश लागू कर दिया। इस प्रकार श्री पयहारी बाबाकी कृपासे कुल्हू राज्यके लोग भगवद्भक्त हो गये।

एकबार पुजारी मंदिर में भगवानको भोग लगानेके लिये जलेबियों के थाल ले जा रहे थे, उसमेंसे एक जलेबी गिर गयी । राजाका छोटा सा बालक उसे उठाकर खा गया ।
यह देखकर राजाके मनमें बडा भारी दुख हुआ कि बिना भोग लगे ही इसने खा लिया, तुरंत हाथमें तलवार लेकर उसे मार डालनेके लिये उठा, परंतु समीपमें उपस्थित सन्तोने उसे बचा लिया और राजासे कहा कि अब तो यह बालक हमारा हो गया । यदि अपको लेना है तो मूल्य देकर आप इसे रख लिजिये ।

संत श्री प्रियादास जी कहते है की कुल्हू के  राजाका यह पुत्र बडा भारी भगवद्भक्त है, साधुओकी सेवा तथा उनका सम्मान करनेमें उसके समान दूसरा कोई नहीं है ।वह साधू संतो की भक्ति सेवा में बड़ी श्रद्धा रखता था। एक बार अपने भण्डारेकी पंक्तिमें एक सन्तकी पत्नी को गर्भवती देखकर राजपुत्रने दो पत्तलें दीं और कहा कि गर्भस्थ बालक भक्त है और वह मेरा इष्टदेव है, मैं ऐसा मनमें मानता हूँ । इसीलिये दूसरा पत्तल है रहा हूँ ।

कोई वैष्णव वेषधारी मनुष्य जूतियोंको बेचता और गाँठता था, उसे देखकर राजपुत्रको बडी दया आयी और उसने उससे कहा भगवन् ! आप दूसरे लोगोंको सन्त मानकर उनकी जूतियोंकी सेवा करते हैं, आपके इस गुप्त भावको तुच्छ प्राणी क्या जानें । इसलिये आप इस जूती-सेवा-कार्य को छोड़ दीजिये । इस बेषको धारणकर और इस कार्यक्रो देखकर लोगोके मनमें कुभाब होता है । ऐसा कहकर उसे वैष्णव सेवा एवं स्वनिर्वाह के  लिये बहुत-सी खेती करनेयोग्य भूमि और धन दिया, साथ ही उसे ज्ञान-प्रकाश भी दिया, उसकी बुद्धि श्री रामजी में रम गयी ।

एक बार पयहारी श्रीकृष्णदासजी महाराज अपनी गुफामें विराजमान थे, उसी समय द्वारपर एक सिंह आकर खडा हो गया । आपने विचार किया कि ‘ आज तो अतिथि-प्रभु पधारे हैं । उनके भोज़नके लिये श्री पयहारी जी ने अपनी जाँघ काटकर मांस सामने रख दिया और प्रार्थना की ‘ प्रभो !भोजन कीजिये । धर्मकी बहुत बडी महिमा है और उसका पालन करना बहुत ही कठिन है । इनकी सच्ची धर्मनिष्ठाको देखकर भगवान् श्री रामचन्द्रजी से नहीं रहा गया, उन्होंने प्रकट होकर दर्शन दिया; क्योंकि स्वामीजी का भाव बिलकुल सत्य था । भगवान् श्री रामचन्द्रजी का दर्शन करके जांघका दुख न जाने कहां चला गया । संसार में लोग अतिथिको अन्न जल देनेमें ही कष्टका अनुभव करते हैं, तब इस प्रकार अपने शरीरका दान कौन कर सकता है ! पयहारी जी के इस चरित्रको सुनकर लोगोंके मनमें महान् आश्चर्य होता है ।

श्री कृष्णदास पयहारी जी आज भी सशरीर विराजमान है एवं अधिकारी व्यक्तियो को उनका आज भी दर्शन होता है।संतो में मान्यता है कि हमारे शत्रुघ्न भैया ही स्वामी जी के रूप में कलयुग में प्रकट हुए है।

समस्त संत भक्तो की जय।
भक्तवत्सल भगवान् की जय।।

सुंदर कथा १९(श्री भक्तमाल -श्री प्रेमनिधि जी) Bhaktamal katha Sri Premnidhi ji

(१) भगवान् श्री कृष्ण के एक बड़े प्रेमी भक्त हुए जिनका नाम श्री प्रेमनिधि जी महाराज था।
श्री प्रेमनिधिजी में प्रेमाभक्ति सम्बन्धी अनंत गुण प्रकट थे।उस ज्योतिषी विप्रको धन्यवाद है,जिसने गुणोंके अनुरूप ऐसा (सार्थक)नाम रखा।आप सुंदर,शीलवान् और स्वभावसे नम्र थे।आपकी वाणी मधुर,रसमयी और श्रोताओंका सर्वविध कल्याण करनेवाली थी।

हरिभक्तों को सुख देने के लिये आप कल्पवृक्षके समान थे, जिसमें प्रेमा-पराभक्तिके बहुत से फल लगे रहते थे।घरमें रहते हुए आप गृहस्थाश्रमके प्रपंचो से परम विरक्त थे।विषयोको त्यागकर सारतत्व प्रेमका आस्वादन करनेवाले,सदाचारी और परम उदार थे। नियमपूर्वक भगवद्भक्तोंके साथ सत्संग किया करते थे। (आगरानिवासी)भक्तोंपर दया करके आपने श्रीवृन्दावनसे बाहर आगरेमें निवास किया और भगवान् की कथाओ के द्वारा सबको पवित्र किया।

श्री प्रेमनिधिजी मिश्र श्रीविट्ठलनाथजीके शिष्य थे।आप महान् प्रेमी संत थे और आगरेमे रहते थे। आप बड़े सुंदर भावसे श्रीश्यामबिहारी जी की सेवा-पूजा किया करते थे।नित्य सुबह होने से कुछ पहले ही श्रीठाकुरसेवा के लिये आप श्रीयमुनाजीसे जल लाया करते थे ।एक बार वर्षाका मौसम था,अधिक वर्षाके कारण जहाँ-तहाँ सर्वत्र रास्तेमें कीचड़ हो गया। तब आपको बड़ी चिंता हुई कि यमुनाजल कैसे लायें? आपने अपने मनमें विचारा कि यदि अंधेरेमे जल लेने जाऊ तो किचड़मे फसने का भय है और यदि प्रकाश होने पर जाऊ तो आने-जाने वाले लोगो से छू जाऊंगा। यह भी ठीक न होगा।अंतमे सोच-विचारकर निश्चय किया कि अन्धेरे में ही जल लाना ठीक है। जैसे ही आप दरवाजे के बहार निकले अंधेरे के कारण रास्ता ठीक से दिखाई नहीं पड रहा था। वही आपने देखा कि एक सुकुमार किशोर बालक मशाल लिए जा रहा है। वहा उजाला अच्छा था,राह देखने में आसानी होगी अतः आप उसके पीछे- पीछे चल दिये। पढना जारी रखे

सुंदर कथा १८(श्री भक्तमाल -श्री चतुर्दास जी) Sri Bhaktamal -Sri Chaturdas ji

पूज्य श्री भक्तमाली गणेशदास जी एवं श्रीमन् महाराज जी के व्याख्यान पर आधारित । अपने नाम से प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com ® 

श्री किल्हदेवजी के एक शिष्य हुए जिनका नाम श्री चतुर्दास जी था। श्री चतुर्दास जी संत एवं तीर्थदर्शनार्थ भ्रमण करते रहते थे। एक बार संत जी एक गाँव के समीप एक वृक्ष के नीचे जाकर ठहरे। संत जी ने वहां पर आसान लगा दिया और भगवन्नाम जप करने लगे। ग्रामवासियो ने आकर संतजी से कहा – महाराज! यहाँ न ठहरकर आप किसी दूसरे स्थानपर ठहरें, यहाँ एक अत्यंत प्रबल प्रेत का निवास है। संतजी ने पूछा कि वह क्या करता है तो लोगोंने बताया कि यहाँ रहने वाले को बड़ा कष्ट देता है। भैंसा, सिंह ,हाथी आदि रूपों को धारण करके डराता है और फिर ऊपर ले जाकर पटक देता है। इस तरह वह किसीको जिन्दा नहीं छोड़ता, मार ही डालता है। संत जी ने आसान लगा दिया था ,अब जहा एक बार आसान डल गया वह डल गया,उठना उचित नहीं समझा । श्री चतुर्दास जी भगवान् राम के अनन्य भक्त थे,सर्वत्र सबमे अपने प्रभुको ही देखते थे, अतः निडर थे।

रात में प्रेत भ्रमण करके आया तो प्रेतने इन्हें देखा, संतजी का वैष्णव तेज इतना प्रचंड था की उनके समीप तक नहीं आ पा रहा था। इनके तेजसे भयभीत होकर इनसे दूर ही रहा । गाँव के चारो ओर चक्कर लगता रहा और चिल्लाता रहा कि – यह जगह तो हमारी है ,साधुबाबा ने अपना आसान लगा लिया,अब हम कहा जाए? लोगोने उसका प्रलाप सुना।प्रातः काल आकर देखा तो संतजी अपने भजन-पूजन में व्यस्त थे। सब समझ गए थे की संतजी उच्च कोटि के महापुरुष है। सबने प्रार्थना करी के प्रेत पीड़ा से कैसे मुक्ति मिले। संतजी ने कहा – तुम सब इसीलिए डर रहे हो क्योंकि तुम लोग भगवन्नाम नहीं जपते ।तुम ने अब तक शरणागति नहीं ली,गले में तुलसी जी धारण नहीं की। कंठ में तुलसी बाँधने से भूत प्रेत व्यक्ति को छू तक नहीं सकते।

गाँवमें सभी लोगो ने संतजी से शरणागति स्वीकार की। एक के बाद एक सबो को महाराज जी ने श्रीराम तारक मंत्र का उपदेश कर शरणागति प्रदान की। अब प्रेत ने देखा कि सब शरणागत हो गए , इस गाँव में रहना अब असंभव हो जायेगा।प्रेत यह भी जान गया था के संतजी से ही हमारा उद्धार हो सकता है। दीक्षा के बाद संत जी सबको उपदेश दे ही रहे थे कि प्रेत थोड़ी दूरी पर खड़ा हो कर रोने लगा। विनती करके बोला- महाराज!आपने सबका उद्धार किया,सब पर कृपा कि। क्या मुझपर कृपा नहीं करेंगे? संत प्रसन्न हुए और बोले क्यों नहीं होगी।
संतजी की कृपा से प्रेत समीप आ सका, संत जी ने शंख बजाकर दक्षिण कर्ण में श्रीराम तारक मंत्र का जैसे ही उपदेश किया उसी क्षण प्रेत दिव्य स्वरुप धारण कर के आकाश मार्ग से मुक्त हो गया। संतजी ने सबसे कहा कि अब यहाँ कभी किसीको प्रेत-बाधा नहीं होगी।

श्री चतुरदासजी महाराज की जय।
भक्तवत्सल भगवान् की जय।।

सुंदर कथा १७(श्री भक्तमाल -श्री दामाजी पंत)Sri Bhaktamal -Sri Damaji pant

श्री दामाजी पंत भगवान् श्री विट्ठल के अनन्य भक्त हुए है।
महाराष्ट्र में तेरहवीं शताब्दी में भयंकर अकाल पड़ा था। अन्न के आभाव से हजारो मनुष्य तड़प तड़प कर मर गए।
वृक्षों की छाल और पत्तेतक नहीं बचे थे। उन दिनों गोवल-कुंडा बेदरशाही राज्य के अंतर्गत मंगलबेड्या प्रांत का शासनभार श्री दामाजी पंत के ऊपर था।

दामाजी और उनकी धर्मपत्नी दोनों ही भगवान् पांडुरंग श्री विट्ठल के अनन्य भक्त थे। पांडुरंग के चिंतन में रात दिन उनका मन लगा रहता था। भगवान् का स्मरण करते हुए निष्काम भाव से कर्त्तव्य कर्म करना उनका व्रत था। दिन- दुखियों की हर प्रकार से वे सेवा- सहायता किया करते थे। शत्रु को भी कष्ट में पड़ा देखकर व्याकुल हो जानेवाले दामाजी पंत अपनी अकालपीड़ित प्रजाका करुण क्रंदन सहन न कर सके। राज्य भण्डार में अन्न भरा पड़ा था। दयाके सम्मुख बादशाह का भय कैसा। अन्न भण्डार के ताले खोल दिए गए। भूक से व्याकुल हजारो मनुष्य, साधु ,संत ,गायें मरने से बच गए।

समाज में ऐसे कुछ लोग होते है जो उदार,पुण्यात्मा पुरुषों की अकारण निंदा करते है। दामाजी के सहायक नायाब सूबेदार ने देखा कि अवसर अच्छा है,यदि दामजी को बादशाह हटा दे तो मै प्रधान सूबेदार बन सकुंगा। उसने बादशाह को लिखकर सूचना भेजी । दामाजी पंत ने अपनी कीर्ति के लिये सरकारी अन्न- भण्डार लुच्चे लफंगों को लूटा दिया। नायाब सूबेदार का पत्र पाते ही बादशाह क्रोधसे आग-बबूला हो गया। उसने सेनापति को एक हजार सैनिको के साथ दामाजी को ले आने की आज्ञा दी। 

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सुंदर कथा १५ (श्री भक्तमाल- श्री अंबादासजी Sri Bhaktamal katha- Sri Ambadasji)

श्री समर्थ रामदास स्वामी एक दिन अपने शिष्यों के साथ यात्रा पर निकले थे। दोपहर के समय एक बड़े कुएँ के निकट एक सघन वृक्ष की छाया में आसन लगाकर वे विश्राम करने लगे। उन्होंने अपने शिष्यो को निकट बुलाया। वृक्ष की एक शाखा कुए के ऊपर थी। उसकी ओर संकेत करते हुए पूछा – ‘क्या कोई इस शाखा को काट सकता है?’
इस शाखा के पत्ते पतझड़ में गिरकर कुएँ का पानी दूषित करते होंगे।

शाखाको उसके मूल स्थान से ही काटना पड़ेगा।’ वहाँ दूसरी कोई शाखा नहीं थी, जिस पर खड़े होकर कोई उस शाखा को काट सके। शाखा को मूल स्थान से काटने का मतलब था कि उसी शाखा पर खड़े होकर उसे काटा जाए। पैरों को टिकाने का कोई स्थान ही न था। निश्चय ही शाखा काटने वाला कुएँ में गिरेगा। और उसकी मृत्यु भी निश्चित थी।

जब बहुत समय तक कोई बड़ा गुरुभाई सामने नहीं आया ,तब श्री अम्बादास जी नाम के शिष्य सामने आकर प्रणाम् करके बोले, ‘यदि आप आज्ञा दें तो गुरुदेव जरूर काट दूँगा।’ अम्बादास ने विनम्रता से कहा।

गुरुदेव ने कहा,क्या तुम्हे यह ज्ञात है कि डाल काटने पर तुम गिर जाओगे।

अम्बादास जी ने कहा, क्या गुरुदेव की आज्ञा पालन करके आजतक कोई गिरा है?

समर्थ स्वामी प्रसन्न होकर बोले – ‘तो कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष पर चढ़ जाओ और उस शाखा को काट डालो।

सभी शिष्य यह आज्ञा सुनकर श्री समर्थ के मुख की ओर निहारते, कभी अम्बादास की ओर निहारते, कभी अम्बादास की ओर तो कभी उस शाखा की ओर। गुरु की आज्ञा पाते ही उसने अपनी धोती बाँधी और कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष पर चढ़ गया। उसी शाखा पर खड़े होकर उसने कुल्हाड़ी चलानी शुरू कर दी।श्री रामदास स्वामी ने फिर परीक्षा लेने हेतु कहा ‘सोच समझ कर विचार करना,ऐसे डाल काटने में तो तू कुएँ में चला जाएगा।’
परंतु इस बार भी वह नहीं डरा। उसने कहा-
‘गुरुदेव! आपकी महती कृपा मुझे संसार-सागर से पार उतारने में पूर्ण समर्थ है।’ यह कूप किस गणना में है। मैं तो आपके आशीर्वाद से सदैव सुरक्षित रहा हूँ। ‘यदि इतनी श्रद्धा है तो फिर अपना काम करो।’ श्री समर्थ ने आज्ञा प्रदान कर दी।

शाखा आधी से कुछ ज्यादा ही कट पाई थी कि टूटकर अम्बादास के साथ कुएँ में जा गिरी। सभी शिष्य व्याकुल हो उठे, परंतु स्वामी समर्थ रामदास शांत बैठे रहे। उनमें जिसकी इतनी श्रद्धा है, उसका अमंगल संभव ही न था। अम्बादास जैसे ही कुँए में गिरा तो श्रीरामजी ने उनको धर लिया।अम्बादासजी को कुएँ में अपने इष्ट देव भगवान राम का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ।

शिष्यों के प्रयास से अम्बादास को कुएँ से निकाला गया तो वह गुरुदेव के चरणों में लेट गया।’ आपने तो मेरा कल्याण कर दिया। ‘कल्याण तो तेरी श्रद्धा ने कर दिया। तू अब कल्याण रूप हो गया’। श्री समर्थ रामदासजी ने कहा। तभी से अम्बादासजी का नाम कल्याण स्वामी हो गया।

धन्य है महान गुरुभक्त श्री अम्बादासजी महाराज।
जय जय श्री सीताराम।