सुंदर कथा ८४ (श्री भक्तमाल – अपने पुत्र को विष देने वाली दो भक्तिमती नारियाँ ) Sri Bhaktamal 

१. पहली कथा :एक राजा बड़ा भक्त था । उसके यहाँ बहुत से साधु-सन्त आते रहते थे । राजा उनकी प्रेम से सेवा करता था । एक बार एक महान संत अपने साथियों समेत पधारे । राजा का सत्संग के कारण संतो से बडा प्रेम हो गया । वे सन्त राजा के यहाँ से नित्य ही चलने के लिये तैयार होते, परंतु राजा एक-न-एक बात ( उत्सव आदि) कहकर प्रार्थना करके उन्हे रोक लेता और कहता क्रि प्रभो ! आज रुक जाइये, कल चले जाइयेगा । इस प्रकार उनको एक वर्ष और कुछ मास बीत गये । एक दिन उन सन्तो ने निश्चय कर लिया कि अब यहां रुके हुए बहुत समय बीत गया ,कल हम अवश्य ही चले जायेंगे । राजाके रोकनेपर किसी भी प्रकर से नही रुकेंगे । यह जानकर राजा की आशा टूट गयी, वह इस प्रकार व्याकुल हुआ कि उसका शरीर छूटने लगा । रानी ने राजा से पूछकर सब जान लिया कि राजा सन्त वियोग से जीवित न रहेगा । तब उसने संतो को रोकने के लिये एक विचित्र उपाय किया । रानी ने अपने ही पुत्र को विष दे दिया; क्योकि सन्त तो स्वतन्त्र है, इन्हे कैसे रोककर रखा जाय ?
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सुंदर कथा ७७ (श्री भक्तमाल – श्री जगदानंद जी ) Sri Bhaktamal – Sri Jagadanand ji

श्री जगदानन्द जी भगवान् श्री राम के अनन्य भक्त थे । इनकी जैसी भक्ति भगवान् श्रीराम के चरणो मे थी, वैसी किसी विरले ही पुरुष मे होगी । इनमे वर्ण आश्रम या विद्या आदि का अहंकार बिलकुल न था । वैष्णव सन्तो को देखते ही उनके चरणो मे सिर झुकाते,उनकी परिक्रमा करते और मधुर वाणी से सत्कार करते हुए कहते की आज मेरे धन्य भाग्य है, जो मुझे श्री रामजी के प्यारे मिल गये । भोजन विश्रामादि के बाद उनसे प्रार्थना करते कि श्रीराम जी की कोई कथा सुनाइये । इस प्रकार सत्संग में सर्वदा भगवत् कथाओं को कह सुनकर परमधर्म का प्रचार प्रसार करते। 

एक बार दो सन्त तीर्थयात्रा करले हुए काशी जी मे आये । वहां एक सन्त बीमार हो गये और उनका शरीर छूट गया । उसके वियोग में दूसरे सन्त करुण क्रन्दन काने लगे । उनका विलाप सुनकर श्री जगदानंद जी से नहीं रहा गया । निकट जाकर इन्होंने उन संत से से कहां – संत जी !आप विलाप न करे , ये मरे नहीं है । आपके साथ साथ तीर्थयात्रा को पूर्ण करके , अपने स्थान मे पहुंचकर आज से एक माह के बाद शरीर त्यागकर वैकुण्ठ को पधारेंगे । जगदानंद जी का स्पर्श पाकर सन्त उठ बैठे । दोनो ने संतो ने जगदानंद जी को सिद्ध महापुरुष मानकर दंडवत प्रणाम् किया । इस प्रकार अनेकों के संकट काटकर उन्हें परमधर्म का उपदेश किया ।

सुंदर कथा ६६ (श्री भक्तमाल – श्री दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Daas ji

श्री दास जी महाराज नामक एक संतसेवी महात्मा हुए है ।श्री दास जी संतो की सेवा को भगवान् की सेवा से बढ़कर मानते थे । एक बार श्रीदास जी के यहा कई सन्त आये ।स्नाध्या – आरती हुई । रात्रि भोजन के वाद श्रीदास जी संतो की चरण सेवा में लग गये । मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराना भूल गये । प्रात:काल मंगला के समय श्री दास जी जब मंदिर जाने लगे तो मंदिर के किवाड़ भीतर से बन्द मिले । प्रयत्न करने पर भी किवाड नहीं खुले । तब श्रीदास जी बड़े असमंजस में पड गये । इतने में आकाश वाणी हुई – अब किवाड नहीं खुलेंगे , मेरी सेवा रहने दो, अब सन्तो की ही सेवा करो । मै रातभर सिंहासन पर खडा रहा हूँ तुमने मुझे शयन ही नहीं कराया ।

यह सुनकर श्री दासजी ने सरल भाव से निवेदन किया -प्रभो ! सन्त-सेवा में लगे रहने के कारण यदि आपकी सेवा में चूक हुई तो आपके नाराज होने का भय मुझे बिलकुल भी नहीं है । परंतु आपकी सेवा में लगा रहूँ और संत – सेवा में भूल-चूक हो जाय, तब मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय है , भगवान् से अधिक महिमा तो भगवान् के भक्तो की है । यह सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये । किवाड खुल गये और भगवान् कहने लगे – हम तुमपर बहुत प्रसन्न है , इस भाव् से संत सेवा करनेवाले मुझे अपने वश में कर लेते हैं । ऐसा कहकर भगवान ने श्रीदास जी को प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और अनेक शुभाशीर्वाद दिए ।

सुंदर कथा ६५ (श्री भक्तमाल – श्री गोपाल जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gopal ji

जाबनेर ग्राम में एक संतसेवी भक्त श्री गोपाल जी रहते थे । भगवान् से भक्त को  इष्ट मानने की, सेवा करने की प्रतिज्ञा उन्होंने की थी और उसका पालन किया । श्री गोपाल जी के कुल मे एक सज्जन (काकाजी) विरक्त वैष्णव हो गए थे । उन्होने सन्तो के मुख से इनकी निष्ठा प्रशंसा सुनी कि श्री गोपाल जी भक्तोंको इष्टदेव मानते हैं । तब वे विरक्त संत श्री गोपाल भक्त की परीक्षा लेने के विचार से उनके द्वारपर आये । इन्हें आया देखकर श्री गोपाल भक्त जी ने झट आकर सप्रेम साष्टांग दण्डवत् प्रणाम किया कि -भगवन् ! अपने निज घर में पधारिये । 

उन्होने (परीक्षा की दृष्टि से ) उत्तर दिया कि – मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं स्त्री का मुख न देखूंगा । तुम्हरे घर के भीतर जाकर मैं अपनी इस प्रतिज्ञा को कैसे छोड दूं?तब श्री गोपाल जी ने कहा -आप अपनी प्रतिज्ञा न छोडिये। परिवार की सभी स्त्रियां एक ओर अलग छिप जायेंगी । आपके सामने नहीं आयेगी । ऐसा कहकर घर के अंदर जाकर उन्होने सब स्त्रियो को अलग कमरे में छिपा दिया । तब इनको अंदर ले आये । घर की स्त्रियां भी संतो में बड़ी निष्ठा रखती थी  अतः इसी बीच सन्त दर्शन के भाव् से या कौतुकवश एक स्त्री ने बहार झाँककर संत जी को देखा, स्त्री की झांकते ही उन संत ने गोपाल भक्त के गालपर एक तमाचा मारा । श्री गोपालजी के  मन मे जरा सा भी कष्ट नहीं हुआ । 

श्री गोपाल जीे हाथ जोडकर बोले – महाराज जी ! आपने एक  कपोल(गाल ) को तमाचा प्रसाद दिया, वह तो कृतार्थ हो क्या । दूसरा आपके कृपाप्रसाद से वंचित रह गया । अत: उसे रोष हो रहा है, एक गाल को तो संत की कृपा प्राप्त हो गयी और दूसरा बिना कृपा के ही रह गया । कृपा करके इस कपोलपर भी तमाचा  मारकर इसे भी कृतार्थ कर दीजिये । प्रियवाणी सुनकर उन वैष्णव संत के नेत्रो मे आसू भर आये । वह श्रीगोपाल जी के चरणो मे लिपट गए क्या और बोले – आपकी सन्तनिष्ठा अलौकिक है । मैने आकर आपकी परीक्षा ली । आज मुझे आपसे बहुत बडी यह शिक्षा मिली कि भक्त को अति सहनशील होना चाहिये तथा भगवान् के भक्त को भगवान् से भी बढकर मानना चाहिये । 

सुंदर कथा ६४ (श्री भक्तमाल – श्री लक्ष्मण भक्त जी ) Sri Bhaktamal – Sri Lakshman bhakt ji

एक बड़े प्रेमी महात्मा थे जिनकी संतो में बड़ी श्रद्धा थी ।उनस नाम था श्री लक्ष्मण जी । भक्त लक्ष्मण जी बडे सद्भाव से साधुओं की सेवा करते थे। बिना किसी रोक टोक के लक्ष्मण जी के यहां संतो का दिन रात आवागमन रहता था । संतो के वेष मात्र का आदर लक्ष्मण जी करते थे ।इनकी इस उदारता को देखकर एक दुष्ट ने भी सन्तवेष धारण कर लिया और कई दिनतक लक्ष्मण भक्त के यहां रहा । लक्ष्मण जी उसकी भी सेवा करते रहे क्योंकि लक्ष्मीन जी वेषनिष्ठ सन्त थे । एक दिन मौका पाकर वह वेषधारी भगवान् के मंदिर में घुस गया । भगवां के आभूषण – पार्षदों को  लेकर भाग गया । यह देखकर भगवान ने एक सिपाही का रूप धारणकर उसे जा पकडा और उसे श्रीलक्ष्मण भक्त के पास लाये और बोले – देखो, यह तुम्हरे मंदिर का सामान चुराकर ले जा रहा है । 

श्री लक्ष्मण जी ने कहा – इन संत को सामान की आवश्यकता होगी । इसलिये ले जा रहे हैं । मेरे मास जो कुछ है , इन्ही का है । इनहें ले जाने दो । अब वे सिपाही भगवान् क्या करते ? वह सामान लेकर गया तो भगवान भी साथ साथ चले । फिर उसके आगे- आगे चलने लगे इसके बाद अन्तर्धान हो गये । इधर-उधर बहुत निगाह दौडानेपर भी नहीं दीखे । इस तरह कभी प्रकट कभी अप्रकट होते देखकर उसे भय हुआ । भगवान् की कृपा से उसकी बुद्धि निर्मल हो गयी ।उसने मन मे अनुमान कर लिया कि भक्तों के हितकारी भगवान् की यह लीला है । मैं भक्त की चोरी करके दुख पाउँगा । श्रीलक्ष्मण जी की सहज सरलता का स्मरण करता हुआ वापस लौट आया । उसने सब सामान देकर हृदय के दुष्ट भाव को खोलकर रख दिया और चरणो मे पडकर क्षमा मांगने लगा । भक्त के प्रताप से  वह सच्चा संत बन गया।  इस तरह संत वेष में अपार निष्ठा के कारण भगवान् ने श्री लक्ष्मण जी पर कृपा की।