सहस्त्रमुख रावण की कथा । Sahastramukh Raavan

लंका विज़यके बाद श्रीरामका राज्याभिषेक हो गया था । इस अवसरपर इनके अभिनन्दनके लिये सभी ऋषि मुनि  राजदरबार में, उपस्थित हए । उन्होंने एक स्वर से कहा – राबणके मारे जानेसे अब विश्वमे शान्ति स्थापित हो गयी है । सब लोग सुख और शान्ति की श्वास ले रहे है । उस समय मुनियोद्वारा श्रीरामके पराक्रम और रावणके विनाश की बात सुनकर देवी सीताको हँसी आ गयी । इस समयमे उनकी हंसी देखकर सबका ध्यान उनकी तरफ गया और मुनियोंने देवी सीतासे हसीका कारण पूछा ।

इसपर सीताने रामजी तथा मुनियोंकी आज्ञा लेकर एक अद्भुत वृत्तान्त बतलाते हुए कहा :
जब मैं छोटी थी, तब मेरे पिता महाराज जनकने अपने घरमे एक ब्राह्मणक्रो आदरपूर्वक चातुर्मास्य व्रत करवाया। मैं भलीभांति ब्राह्मण देवताकी सेवा करती थी । अवकाशके समय ब्राह्मण देवता तरह तरहकी कथा मुझे सुनाया करते थे । एक दिन उन्होंने सहस्त्रमुख रावणका वृत्तान्त सुनाया, जो इस प्रकार है- पढना जारी रखे