सुंदर कथा ७७ (श्री भक्तमाल – श्री जगदानंद जी ) Sri Bhaktamal – Sri Jagadanand ji

श्री जगदानन्द जी भगवान् श्री राम के अनन्य भक्त थे । इनकी जैसी भक्ति भगवान् श्रीराम के चरणो मे थी, वैसी किसी विरले ही पुरुष मे होगी । इनमे वर्ण आश्रम या विद्या आदि का अहंकार बिलकुल न था । वैष्णव सन्तो को देखते ही उनके चरणो मे सिर झुकाते,उनकी परिक्रमा करते और मधुर वाणी से सत्कार करते हुए कहते की आज मेरे धन्य भाग्य है, जो मुझे श्री रामजी के प्यारे मिल गये । भोजन विश्रामादि के बाद उनसे प्रार्थना करते कि श्रीराम जी की कोई कथा सुनाइये । इस प्रकार सत्संग में सर्वदा भगवत् कथाओं को कह सुनकर परमधर्म का प्रचार प्रसार करते। 

एक बार दो सन्त तीर्थयात्रा करले हुए काशी जी मे आये । वहां एक सन्त बीमार हो गये और उनका शरीर छूट गया । उसके वियोग में दूसरे सन्त करुण क्रन्दन काने लगे । उनका विलाप सुनकर श्री जगदानंद जी से नहीं रहा गया । निकट जाकर इन्होंने उन संत से से कहां – संत जी !आप विलाप न करे , ये मरे नहीं है । आपके साथ साथ तीर्थयात्रा को पूर्ण करके , अपने स्थान मे पहुंचकर आज से एक माह के बाद शरीर त्यागकर वैकुण्ठ को पधारेंगे । जगदानंद जी का स्पर्श पाकर सन्त उठ बैठे । दोनो ने संतो ने जगदानंद जी को सिद्ध महापुरुष मानकर दंडवत प्रणाम् किया । इस प्रकार अनेकों के संकट काटकर उन्हें परमधर्म का उपदेश किया ।

पूज्यपाद संतो के जीवन के कुछ प्रेरणात्मक सत्य प्रसंग और चमत्कार -भाग १।

® यह सब चरित्र और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी, पंडित बाबा, श्री रामसुखदास जी एवं कुछ अवध के महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे । Copyrights :www.bhaktamal.com ®

१. एक प्रेमि संत :

पूज्य श्री हरीबाबा जी महान् संत हुए है , उनके साथ नित्य कुछ न कुछ संत मंडली रहती ही थी । एक समय हरीबाबा के साथ कुछ प्रेमी संत यात्रा करने गए थे , उन संतो में एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ लिए रहते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को बगल में रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तो वे शालिग्राम जी वाही गाडी में रह गए । संत अपनी मस्ती में उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब हरीबाबा जी के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने देखा की हमारे शालिग्राम जी नहीं है ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगवान् मिले नहीं । उन्होंने भगवान् के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया । हरीबाबा ने कहा – महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये शालिग्राम जी देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है । हरीबाबा बोले – आपने उन्हें कहा रखा था ,मुझे तो लगता है गाडी में ही छुट गए होंगे और अब कई घंटे बीं गए है । गाडी से किसीने निकल लिए होंगे और गाडी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी । संत बोले – मै स्टेशन मास्टर से बात करना चाहता हूँ वहाँ जाकर ।

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