सुंदर कथा ९ (श्री भक्तमाल -श्री देवाजी पण्डा) Sri Bhaktamal -Sri Devaji 

उदयपुर के समीप श्रीरूप चतुर्भुज स्वामी का मंदिर है,वहाँ श्री देवजी पण्डा(पुजारी) थे। एक दिन उदयपुर के राणा भगवान् श्री चतुर्भुजजी का दर्शन करने के लिए आये,परंतु नित्य की अपेक्षा आज देर से आये।समय हो गया था , इसलिए पुजारी श्री देवाजी ने भगवान् को शयन करा दिया और प्रसादी माला जो राणाजी को पहनाने के लिए रखी थी ,उसे उन्होंने अपने सिरपर धारण कर लिया।इतनेमें ही राणाजी आ रहे है, यह समाचार मिला ।श्री देवापण्डा जी ने प्रसादी माला अपने सिर से उतारकर रख ली और राणाजी के आनेपर उसे उनके गलेमें पहना दिया।

संयोगवश पण्डाजी के सिरका एक सफेद बाल मालामे लिपटा चला गया।उसे देखकर रणाजी ने कहा-क्या ठाकुरजी के सिरके बाल सफ़ेद हो गए है?पण्डा जी के मुखसे निकल गया-हाँ । राणाजी ने कहा -मै प्रातः काल देखूँगा। पण्डाजी ‘हाँ’ ऐसा कह तो गए ,परंतु अब वे घबराये कि राणाजी हमें अवश्य ही मरवा डालेंगे;क्योंकि मैंने झूठी बात कही है।

उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझा,वे भगवान् के श्रीचरणों का ध्यान करने लगे ।उन्होंने कहा कि हे हृषिकेश श्री कृष्ण भगवान् !मेरे प्राणोंकी रक्षा के लिए कृपा करके आप अपने बालों को सफेद कर लीजिये।आप भक्तरक्षक है ,परंतु मेरे मन में तो आपके प्रति नाममात्र भी भक्ति नहीं है। चिन्तामग्न श्री देवाजी पण्डा से श्री ठाकुरजी ने कहा कि मैंने सफ़ेद बाल धारण कर लिए है,न मानो तो आकर देख लो।

श्री देवाजी पण्डा दुःखके महासागर में डूबे थे,भगवान् की मधुर वाणी सुनकर उनकी जान में जान आयी।मंदिर में जाकर जब उन्होंने दर्शन किया तो सफ़ेद बाल दिखायी पडे।तब पण्डाजी ने अपने मनके अनुभवसे यह जाना कि ठाकुरजी ने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है,उनकी आँखो में आँसू भर आये।

प्रातः काल शीघ्र ही चतुर्भुजजी के सफेद बाल देखने के लिये राणाजी मन्दिरमें आये और सफ़ेद बालोंको देखकर कुछ देर तक तो देखते ही रह गए,फिर परीक्षा लेने के लिये उनमेसे एक बाल खींचा ।बालके खींचे जानेपर पीड़ावश ठाकुरजी ने अपनी नाक चढ़ा ली।बाल उखड गया और उस बालके छिद्रसे रक्तकी धार बह निकली । 

उसके छींटे राणाजी के शरिर पर पडे। इससे राणाजी को मूर्छा आ गयी और वे पृथ्वीपर गिर पड़े।उन्हें अपने शरिर काकुछ भी होश ना रहा। एक पहर बाद जब होश आया तब वे इसे करोडो अपराधो के समान मानकर क्षमा-प्रार्थना करने लगे।श्री भगवान् ने आज्ञा की-तुम्हारे लिए यही दंड है की जो भी राजगद्दी पर बैठे,वह दर्शन के लिए मेरे मन्दिरमे न आये।इस आज्ञा के अनुसार उनकी आन मानकर  जो भी राजा उदयपुरकी राजगद्दीपर बैठते हऐ,वे दर्शन करने मन्दिरमे नही आते है।