सुंदर कथा १९(श्री भक्तमाल -श्री प्रेमनिधि जी) Bhaktamal katha Sri Premnidhi ji

(१) भगवान् श्री कृष्ण के एक बड़े प्रेमी भक्त हुए जिनका नाम श्री प्रेमनिधि जी महाराज था।
श्री प्रेमनिधिजी में प्रेमाभक्ति सम्बन्धी अनंत गुण प्रकट थे।उस ज्योतिषी विप्रको धन्यवाद है,जिसने गुणोंके अनुरूप ऐसा (सार्थक)नाम रखा।आप सुंदर,शीलवान् और स्वभावसे नम्र थे।आपकी वाणी मधुर,रसमयी और श्रोताओंका सर्वविध कल्याण करनेवाली थी।

हरिभक्तों को सुख देने के लिये आप कल्पवृक्षके समान थे, जिसमें प्रेमा-पराभक्तिके बहुत से फल लगे रहते थे।घरमें रहते हुए आप गृहस्थाश्रमके प्रपंचो से परम विरक्त थे।विषयोको त्यागकर सारतत्व प्रेमका आस्वादन करनेवाले,सदाचारी और परम उदार थे। नियमपूर्वक भगवद्भक्तोंके साथ सत्संग किया करते थे। (आगरानिवासी)भक्तोंपर दया करके आपने श्रीवृन्दावनसे बाहर आगरेमें निवास किया और भगवान् की कथाओ के द्वारा सबको पवित्र किया।

श्री प्रेमनिधिजी मिश्र श्रीविट्ठलनाथजीके शिष्य थे।आप महान् प्रेमी संत थे और आगरेमे रहते थे। आप बड़े सुंदर भावसे श्रीश्यामबिहारी जी की सेवा-पूजा किया करते थे।नित्य सुबह होने से कुछ पहले ही श्रीठाकुरसेवा के लिये आप श्रीयमुनाजीसे जल लाया करते थे ।एक बार वर्षाका मौसम था,अधिक वर्षाके कारण जहाँ-तहाँ सर्वत्र रास्तेमें कीचड़ हो गया। तब आपको बड़ी चिंता हुई कि यमुनाजल कैसे लायें? आपने अपने मनमें विचारा कि यदि अंधेरेमे जल लेने जाऊ तो किचड़मे फसने का भय है और यदि प्रकाश होने पर जाऊ तो आने-जाने वाले लोगो से छू जाऊंगा। यह भी ठीक न होगा।अंतमे सोच-विचारकर निश्चय किया कि अन्धेरे में ही जल लाना ठीक है। जैसे ही आप दरवाजे के बहार निकले अंधेरे के कारण रास्ता ठीक से दिखाई नहीं पड रहा था। वही आपने देखा कि एक सुकुमार किशोर बालक मशाल लिए जा रहा है। वहा उजाला अच्छा था,राह देखने में आसानी होगी अतः आप उसके पीछे- पीछे चल दिये। पढना जारी रखे