सुंदर कथा ८२ (श्री भक्तमाल – श्री पादपद्माचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Paad padmacharya ji

पूज्यपाद श्री रामेश्वर दास रामायणी जी , श्री गणेशदास भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी के कृपाप्रसाद और भक्तमाल टीका से प्रस्तुत भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

श्री सम्प्रदाय के एक महान् गुरुभक्त संत हुए है श्री गंगा धराचार्य जी , जिनकी गुरु भक्ति के कारण इनका नाम गुरुदेव ने श्री पादपद्माचार्य रख दिया था । श्री गंगा जी के तट पर इनके सम्प्रदाय का आश्रम बना हुआ था और अनेक पर्ण कुटियां बनी हुई थी । वही पर एक मंदिर था और संतो के आसन लगाने की व्यवस्था भी थी । स्थान पर नित्य संत सेवा , ठाकुर सेवा और गौ सेवा चलती थी । एक दिन श्री गंगाधराचार्य जी के गुरुदेव को कही यात्रा पर जाना था । कुछ शिष्यो को छोड़ कर अन्य सभी शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! हमे भी यात्रा पर जाने की इच्छा है । कुछ शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! आप हमें कभी अपने साथ यात्रा पर नही ले गए , हमे भी साथ चलना है । श्री गंगाधराचार्य जी गुरुदेव के अधीन थे । वे कुछ बोले नही , शांति से एक जगह पर खड़े थे ।

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सुंदर कथा ७९ (श्री भक्तमाल – श्री रामअवध दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Ramavadh das ji

लगभग सौ वर्ष पहले की बात है । भगवान् श्री राघवेंद्र के परम भक्त क्षेत्रसन्यासी स्वामी रामअवध दास जी वैरागी साधू थे । बरसों से मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचंद्र जी की राजधानी अयोध्यापुरी मे रहते थे । अहर्निश श्री सीताराम नाम का कीर्तन करना उनका सहज स्वभाव हो गया था । रात को कठिनता से केवल दो घंटे सोते । सरयू जी के तीरपर एक पेड़ के नीचे फ्लो । धूनी रात – दिन जलती रहती । बरसात के मौसम में भी कोई छाया नहीं करते थे ।

आश्चर्य तो यह कि मूसलधार वर्षा में भी उनकी धूनी ठंडी नहीं हाती थी । जब देखो तभी स्वामी जी के मुखारविन्द से बड़ मधुर स्वर में श्री सीताराम नाम की  ध्वनि सुनायी पडती । आसपास के सभी मनुष्य -जीव – जंतु तक सीताराम ध्वनि करना सीख गये थे । वहाँ के पक्षियों की बोली में श्री सीताराम की ध्वनि सुनायी पडती, वहाँ के कुत्ते – बिल्ली की बोली में श्री सीताराम स्वर आता, वहाँ के वृक्षों की खड़खड़ाहट में श्री सीताराम नाम सुनायी देता और वहाँ की पवित्र सरयू धारा श्री सीताराम गान करती । तमाम वातावरण सीताराममय हो गया था।

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सुंदर कथा ७० (श्री भक्तमाल – श्री हरिपाल जी ) Sri Bhaktamal – Sri Haripal ji

 पूज्य श्री गणेशदास भक्तमाली जी की टीका , प्रेमानंद स्वामी और द्वारका के महात्माओ द्वारा बताई जानकारी पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।
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श्री हरिपाल जी नामक एक भक्त थे उनका जन्म ब्राह्मण वंश में हुआ था । श्री हरिपाल जी गृहस्थ भक्त थे ।इन्होंने श्री द्वारिकाधीश भगवान् की उपासना में मग्न रहने वाले एक संत को अपने सद्गुरुदेव भगवान् के रूप में वरण किया था । श्री गुरुदेव जी महाराज श्री हरिपाल जी के घर में आया जाया करते थे । एक दिन श्री हरिपाल जी ने गुरुदेव जी से जिज्ञासा प्रकट की – भगवन ! इस संसार में , घर द्वार में हम फंसे पड़े है , घर गृहस्थी के जंजाल से मुक्त होकर भगवान् के चरणारविन्द को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, यही रहते हुए भगवान् को प्राप्त करने का सबसे सरल उपाय कृपा कर के हमें बताये ।

श्री गुरुदेव भगवान् ने कहा – हम तुम्हे ऐसा सरल उपाय बताएँगे की एकदिन अवश्य भगवान् आकर तुमसे मिलेंगे। श्री गुरुदेव जी ने कहा – तुम साधु- संतो के चरणों में श्रद्धा रखकर उनकी खूब सेवा किया करो । तुम जीवन में एक नियम का निर्वाह कर लिया तो भगवत्प्राप्ति निश्चित है । सतत नाम जप करते हुए रोज किसी न किसी संत को श्रद्धा से भोजन कराया करो ,भगवान् संतो के पीछे पीछे चलते है । भगवान् अपने भक्तो के समीप छाया कितरह चलते है और गुप्त रूप से श्री सुदर्शन जी भक्तो किब्रक्षा करते रहते है । संतो को रिझा लोग तो भगवान् रीझ जाएंगे । हरिपाल जी ने कहा – गुरुदेव ! हम रोज संतो को कहा ढूंढने जाएंगे ? गुरुदेव जी ने कहा – चिंता नहीं करो , तुम्हारे द्वार पर भगवान् की कृपा से स्वयं संत आ जायेंगे । उस दिन से श्री हरिपाल जी संतो की सेवा  करने लगे , साधु संतो से उनका बडा प्रेम हो गया ।

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सुंदर कथा ५७ (श्री भक्तमाल – श्री रूपकला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Roopkala ji 

वैष्णव रत्न रूपकला जी न केवल रामकथा वाचक थे, बल्कि अयोध्या के उच्चकोटि के पहुँचे हुए संतो में से एक थे । इनकी आध्यात्मिक उपलब्धियों एवं प्रभु की असीम कृपानुभूतियों की चर्चा जब होती है तो इनके जीवन मे घटित अनेक अदृभुत एवं चमत्कारिक घटनाओं के चित्र मानस-पटलपर स्पष्ट रूप से उभरने लगते हैं । इनके प्रभाव से हजारों पथ-भ्रष्ट ,भ्रांत नास्तिकों ने भगवान् की सत्ता में विश्वास करके सन्मार्ग का अवलम्बन किया , हजारो नर नारियों ने मांसाहार छोड़ा और शुद्ध सात्त्विक जीवन की ओर बढे ।

गृहस्थ जीवन में अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए कर्मचेष्टाओं में प्रवृत्त होते हुए भी निष्काम, निरासक्त रूप से भगवान् का भज़न एवं भक्ति-साधना में लीन होकर प्रभुके समीप बैठा जा सकता है भकि-रस में डूबा जा सकता है, इसके ज्वलंत उदाहरण हैं श्रीरूपकला जी महाराज । श्री रूपकला जी की  भक्तमाल टीका बहुत प्रसिद्ध है ।

श्री रूपकला जी का पूरा नाम श्रीसीताराम शरण भगवान् प्रसाद था । पहले इनका नाम। केवल भगवान् प्रसाद था परंतु बाद में जब उन्होंने श्रीराम मंत्र की दीक्षा ग्रहण की तब गुरुदेव जी ने उनके नाम के आगे सीताराम शरण जोड़ दिया । रूपकला नाम इन्हें भागलपुर गुरुहट्टा के महंत श्री हंसकल जी से प्राप्त हुआ ।यह सुखद संयोग ही कहा जायगा कि आप निरन्तर अपने जीवन मे प्रभु श्रीसीताराम के शरण में ही रहे और फलत:  भगवान् के अनुपम ‘ प्रसाद ‘ के अधिकारी बने । 

इनका जन्म बिहार में श्रावण-कृष्ण नवमी को सन् १८४० ई  में हुआ था । श्रीभक्तमाल में लिखित उनके संक्षिप्त जीवन के अनुसार उनके पिता मुन्शी तपस्वीराम भक्तमाली जी स्वामी रामचरण दास जी के शिष्य थे ।

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सुंदर संत कथा ५(श्री भक्तमाल-श्री मधवदासजी) Bhaktmal Katha

श्री मधवदासजी एक उच्च कोटि के संत हुए है।श्री मधवदासजी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे ।जब इनकी पत्नी स्वर्गलोकको सिधारी,तब इनके हृदयमे संसार से सहसा वैराग्य हो गया और घर छोड़ कर जगन्नाथपुरीका रास्ता पकड़ा।

वहाँ पहुंचकर समुद्रके किनारे एकांत में पड़े रहे और अपने आप को भगवत ध्यान मे तल्लीन कर दिया। ये ऐसे ध्यानमग्न हुए के अन्न-जलकी भी सुध न रही।इस प्रकार जब बिना अन्न-जलके आपको कई दिन बीत गये,तब दयालु जगन्नाथजीने लक्ष्मीजी को आज्ञा दी कि आप स्वयं उत्तम-से-उत्तम भोग सुवर्ण थालमे रखकर मेरे भक्त माधव के पास पंहुचा दे। लक्ष्मी जी प्रभु की आज्ञा पाकर सुवर्ण-थाल श्री मधवदासजी के पास रखकर चली आयी।जब मधवदासजी का ध्यान समाप्त हुआ,तब वे स्वर्ण का थाल देखकर भगवत्कृपाका अनुभव करते हुए अनन्दाश्रु बहाने लगे। भोग लगाया,प्रसाद पा थालको एक ओर रख दिया;फिर ध्यानमग्न हो गए।

उधर जब भगवान के पट खुले,तब पुजारियोंने सोने का एक थाल न देख बहुत शोर-गुल मचाया। पुरिभरमें तलाशी होने लगी। ढूंढते-ढूंढते थाल मधवदासजी के पास पड़ा पाया गया। माधवदासजी को चोर समझकर उनको चाबुक पड़ने लगे। रात्रिमें पुजारियोंको भगवान् ने स्वप्न में कहा-‘मैंने मधवकी चोट अपने ऊपर ले ली,अब तुम्हारा अनिष्ट कर दूंगा;नहीं तो चरणोंपर पड़कर अपने अपराध क्षमा करवा लो।’ बेचारे पण्डा दौड़ते हुए मधवदासजी के पास आये और उनके चरणोमे जा गिरे। मधवदासजीने तुरंत क्षमा प्रदानकर उन्हें निर्भय किया।

अब माधवदासजीके प्रेमकी दशा ऐसी हो गयी कि जब कभी भगवत्दर्शनके लिए मंदिरमे जाते,तब प्रभुकी मूर्तिको ही एकटक देखते रह जाते।दर्शन समाप्त होने पर तल्लीन अवस्थामे वाही खड़े खड़े पुजारियों के देखते देखते अदृश्य हो जाते।एक बार श्री मधवदासजी रात्रिमें मंदिरमे ही रुके रहे। वह जब रात्रिमें इन्हें ठण्ड लगने लगी तो स्वयं जगन्नाथजीने अपनी रजाई इन्हें ओढ़ा दी।
एक बार मधवदासजीको अतिसाका रोग हो गया।वह समुद्र किनारे दूर जा पड़े।वहाँ इतने दुर्बल हो गए कि उठ-बैठ नहीं सकते थे।ऐसी दशा में जगन्नाथजी स्वयं सेवक बनकर आपकी सुश्रुषा करने लगे ,मल साफ़ करने लगे। जब मधवदासजी को होश आया,तब उन्होंने तुरंत पहचान लीया की हो-न-हो यह प्रभु ही हैं।

यह समझ झट उनके चरण पकड़ लिए और विनीत भावसे कहने लग – ‘नाथ! मुझ जैसे अधम के लिये क्यों आपने इतना कष्ट उठाया?फिर प्रभो! आप तो सर्वशक्तिमान् हैं। अपनी शक्तिसे ही मेरे दुःख क्यों न हर लिये,वृथा इतना परिश्रम क्यों किया ?’ भगवान कहने लगे – ‘माधव! मुझसे भक्तों का कष्ट नहीं सहा जाता,इसी कारण तुम्हारी सेवा मैंने स्वयं की।तुम जानते हो कि प्रारब्ध भोगने से ही नष्ट होता है-यह मेराही नियम है,इसे मै कैसे तोडू? इसीलिए केवल सेवा करके प्रारब्ध-भोग भक्तोसे करवाता हूं और इसकी सत्यता संसारको दिखलाता हूं।’भगवन् यह कहकर अंतर्धान हो गए।

इन घटनाओं से लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। अब तो माधवदास जी की महिमा चारों ओर फैलने लगी। लोग इनको बहुत घेरने लगे। भक्तों के लिये सकामी संसारी जीवों से घिर जाना एक बड़ी आपत्ति है। आपकों यह सूझा कि अब पागल बन जाना चाहिये। बस, आप पागल बन इधर-उधर हरि-ध्वनि करते घूमने लगे। एक दिन आप एक स्त्री के द्वारपर गये और भिक्षा माँगी। वह स्त्री उस समय चौका दे रही थी, उसने मारे क्रोधसे चौकेका पोतना माधव जी के मुँह पर फेककर मारा। आप बड़े प्रसन्न होकर उस पोतने को अपने डेरेपर ले गये। उसे धो-सुखाकर भगवानके मन्दिर में जा उसकी बत्ती बनाकर जलायी, जिसका यह फल हुआ कि उस पोतनेकी बत्ती से ज्यों-ज्यों मन्दिर में प्रकाश फैलने लगा, त्यों-त्यों उस स्त्री के हृदय-मन्दिर में भी ज्ञानका प्रकाश होना प्रारम्भ हुआ। यहाँ तक कि अन्त में वह स्त्री परम भक्तिमती हो गयी और रात-दिन भगवान के ध्यान में मस्त रहने लगी।

एक बार एक शास्त्री पण्डित शास्त्रार्थद्वारा दिग्विजय करते हुए माधवजी के पाण्डित्य की चर्चा सुनकर शास्त्रार्थ करने जगन्नाथपुरी आये और माधवदासजी से शास्त्रार्थ करने का हठ करने लगे। भक्तों को शास्त्रार्थ निर्रथक प्रतीत होता है। माधवदासजीने बहुत मना किया, पर पंडित भला कैसे मानते ? अन्त में माधवदास जी ने एक पत्र पर यह लिखकर हस्ताक्षर कर दिया, ‘माधव हारा, पंडित जीते। पंडित जी इसपर फूले न समाए। तुरंत काशी चल दिए। वहाँ पंडितों की सभा कर वे अपनी विजय का वर्णन करने लगे और वह प्रमाणपत्र लोगों को दिखाने लगे। पंडितों ने देखा तो उस पर यह लिखा पाया, ‘पंडितजी हारे, माधव जीता।’ अब तो पंडित जी क्रोध के मारे आगबबूला हो गए। उल्टे पैर जगन्नाथपुरी पहुँचे। वहाँ माधवदासजी को जी खोल गालियाँ सुनायीं और कहा कि ‘शास्त्रार्थमें जो हारे’ वही काला मुँह कर गदहे पर चढ़ नगर भरमें घूमे।’ माधवदासजी ने बहुत समझाया, पर वे क्यों मानने लगे ? अवकाश पाकर भगवान् माधवदासजी का रूप बना पंडित जी से शास्त्रार्थ करने पहुँचे और भरी सभा में उन्हें खूब छकाया।

अन्त में उनकी शर्त के अनुसार उनका मुँह काला कर गदहेपर चढ़ा, सौ-दो-सौ बालकों को ले धूल उड़ाते नगर में सैर की। माधवदासजीने जब यह हाल सुना, तब भागे और भगवान् के चरण पकड़ उनसे पंडितजीके अपराधों की क्षमा चाही। भगवान् तुरंत अन्तर्धान ध्यान हो गए। माधवदासजी ने पंडित जी को गदहे से उताकर क्षमा माँगी, उनका रोष दूर किया। धन्य है भक्तों की सहिष्णुता और दयालुता ! एक बार माधवदासजी व्रजयात्रा को जा रहे थे। मार्ग में एक बाई आपको भोजन कराने ले गयी। बाई ने बड़े प्रेम से आपको भोजन करवाया।

सुंदर कथा ४(श्री भक्तमाल-श्री तिलोक जी) Sri Bhaktmal – Sri Tilok ji

एक भक्त हुऐ जीनका नाम श्री तिलोकजी था।श्री तिलोकभक्तजी पूर्व देशके रहनेवाले थे और जातिके सोनार थे। इन्हीने हृदयमें भक्तिसार-संतसेवा का व्रत धारण कर रखा था।

एक बार वहाँके राजाकी लड़कीका विवाह था। उसने इन्हें एक जोड़ा पायजेब बनाने के लिए सोना दिया,परंतु इनके यहाँ तो नित्यप्रति अनेको संत महात्मा आया करते थे,उनकी सेवासे इन्हें किंचिन्मात्र भी अवकश नहीं मिलता था, अतः आभूषण नहीं बना पाये। जब विवाह के दो दिन ही  रह गए और आभूषण बनकर नहीं आया तो राजाको क्रोध हुआ और सिपहियोंको आदेश दिया कि तिलोक सोनारको पकड़ लाओ। सिपहियोंने तुरंत ही इन्हें लाकर राजाके सम्मुख कर दिया।राजने इन्हें डाँटकर कहा कि तुम बड़े धूर्त हो। समयपर आभूषण बनाकर लानेको कहकर भी नहीं लाये। इन्होंने कहा-‘महाराज! अब थोडा काम शेष रह गया है,अभी आपकी पुत्रीके विवाहके दो दिन शेष है। यदि मै ठीक समयपर न लाऊँ तो आप मुझे मरवा डालना ‘।

राजाकी कन्याके विवाहका  दिन भी आ गया,परंतु इन्होंने आभूषण बनाने के लिए जो सोना आया था,उसे हाथसे स्पर्श भी नहीं किया। फिर उन्होंने सोचा की समयपर आभूषण न मिलनेसे अब राजा मुझे जरूर मार डालेगा,अतः डर के मारे जंगलमे जाकर छिप गए।यथासमय राजाके चार-पांच कर्मचारी आभूषण लनेके लिए श्री तिलोकजी के घर आये।भक्तके ऊपर संकट आया जानकर भगवान् ने श्री तिलोकभक्तका रूप धारणकर अपने संकल्पमात्रसे आभूषण बनाया और उसे लेकर राजाके पास पहुँचे। वहाँ जाकर राजाको पायजेब का जोड़ा दिया। आभूषण को देखते ही राजाके नेत्र ऐसे लुभाये की देखनेसे तृप्त ही नहीं होते थे। राजा श्री तिलोकजीपर बहुत प्रसन्न हुआ। उनकी पहलेकी भूल-चूक माफ़ कर दी और उन्हें बहुत-सा धन पुरस्कार में दिया।

श्री तिलोकरूपधारी भगवान् मुरारी इस प्रकार धन लेकर श्री तिलोकभक्त के घर आकर विराजमान हुए। श्री तिलोकरूपधारी भगवान् ने  दूसरे दिन प्रातःकाल ही महान उत्सव किया।उसमे अत्यन्त रसमय,परम स्वादिष्ट अनेको प्रकारके व्यंजन बने थे। साधु-ब्रह्मणोंने खूब पाया। फिर भगवान् एक संतके रूप धारणकर झोलीभर साधू संतो का बचाहुआ सीथ-प्रसाद लिए हुए वहाँ गए,जहाँ श्री तिलोक भक्तजी छिपे बैठे थे। श्रीतिलोकजी को प्रसाद देकर संत रूपधारी भगवान् ने कहा-‘श्री तिलोकभक्त के घर गया था।उन्होंने ही खूब प्रसाद पवाया और झोली भी भर दी।’
श्री तिलोकभक्त ने पूछा- कौन तिलोक?भगवान् ने कहा -‘जिसके समान त्रैलोक्यमें दूसरा कोई नहीं है।’ फिर भगवान् ने पूरा विवरण बताया। संतरूपधारी भगवान् के वचन सुनकर श्री तिलोकजी के मन को शांति मिली।फिर भगवत्प्रेम में मग्न श्री तिलोकजी रात्रिके समये घर आये। घरपर साधू-संतो की चहल-पहल तथा घरको धन-धान्य से भरा हुआ देखकर श्री तिलोकजीका श्री प्रभु के श्रीचरणोंकी ओर और भी अधिक झुकाव हो गया ।वे सामझ गए कि श्री प्रभुन मेरे उपर महान कृपा की है,निश्चय ही मेरे किसी महान भाग्यका उदय हुआ है।

सुंदर कथा ३(श्री भक्तमाल-श्री रामदास जी) Sri Bhaktmal – Sri Ramdas ji

श्री द्वारकापुरी के समीप ही डाकोर नाम का एक गाँव है,वहा श्री रामदासजी नाम के भक्त रहते थे।वे प्रति एकादशीको द्वारका जाकर श्री रणछोड़जीके मंदिर में जागरण कीर्तन करते थे।जब इनका शरीर वृद्ध हो गया,तब भगवन ने आज्ञा दी, की अब एकादशीकी रात का जागरण घरपर ही कर लिया करो। पर इन्होने ठाकुरजी की यह बात नहीं मानी। भक्तका दृढ़ नियम देखकर भाव में भरकर भगवन बोले-अब तुम्हारे यहाँ आने का कष्ट मुझसे सहन नहीं होता है,इसलिए अब मै ही तुम्हारे घर चलूँगा। अगली एकादशी को गाडी ले आना और उसे मंदिरके पीछे खिड़कीकी ओर खड़ा कर देना ।मै खिड़की खोल दूंगा,तुम मुझे गोद में भरकर उठा ले जाना और गाडी में पधराकर शीघ्र ही चल देना।
भक्त रामदासजी ने वैसा ही किया.जागरण करने
के लिए गाडीपर चढ़कर आये।सभी लोगो ने समझा की भक्त जी अब वृद्ध हो गए है ।अतः गड़ीपर चढ़कर आये है।
एकादशीकी रातको जागरण हुआ ,द्वादशी की आधी रातको वे खिड़की के मार्गसे मंदिरमे गए।श्री ठाकुरजीके श्रीविग्रह पर से सभी आभूषण उतारकर वही मंदिरमे रख दिए। इनको तो भगवानसे सच्चा प्रेम था ,आभूषणोंसे क्या प्रयोजन?
श्री रणछोडजी को गाड़ीमें पधराकर चल दिए।

प्रातः काल जब पुजारियोंने देखा तो मंदिर सूना उजड़ा पड़ा है।लोग समझ गए की श्री रामदासजी गाड़ी लाये थे,वही ले गए। पुजारियोंने पीछा किया।उन्हें आते देखकर श्री रामदासजीने कहा की अब कौन उपाय करना चाहिए?भगवानने कहा -मुझे बावली में पधरा दो।भक्तने ऐसा ही किया और सुखपूर्वक गाडी हांक दी ।पुजारियोंने रामदासजी को पकड़ा और खूब मार लगायी।इनके शरीरमे बहुत-से-घाव हो गए।

भक्तजी को मार-पीटकर पुजारी लोगोंने गाड़ीमे तथा गाडीके चारो ओर भगवानको ढूँढने लगे,पर वे कही नहीं मिले।तब सब पछताकर बोले की इस भक्तको हमने बेकार ही मारा। इसी बीच उनमेसे एक बोल उठा-मैंने इस रामदास को इस ओर से आते देखा,इस ओर यह गया था। चलो वाहां देखे।सभी लोगोने जाकर बावलीमें देखा तो भगवान मिल गए।उसका जल खूनसे लाल हो गया था।भगवनने कहा- तुम लोगोने जो मेरे भक्तको मारा है।

उस चोट को मैंने अपने शरीरपर लिया है ,इसीसे मेरे शरीरसे खून बह रहा है,अब मै तुम लोगों के साथ कदापि नहीं जाऊंगा।यह कहकर श्री ठाकुरजीने उन्हें दूसरी मूर्ति एक स्थानमे थी,सो बता दी और कहा की उसे ले जाकर मंदिरमे पधराओ, अपनी जीविका के लिए इस मूर्ति के बराबर सोना ले लो और वापस जाओ। पुजारी लोभवश राजी हो गए और बोले-तौल दीजिये।रामदासजी के घरपर आकर भगवानने कहा-रामदास,तराजू बांधकर तौल दो।रामदासजी की पत्नी के कानमे एक सोनेकी बाली थी,उसीमे उन्होंने भगवानको तौलदिया और पुजारियों को दे दिया। पुजारी अत्यंत लज्जित होकर अपने घर को चल दिए।

श्री रणछोडजी रामदासजी के घरमें ही विराजे.इस प्रसंगमे भक्तिका प्रकट प्रताप कहा गया है। भक्तके शरीरपर पड़ी चोट प्रभुने अपने उपर ले लिया,तब उनका ‘आयुध-क्षत’ नाम हुआ। भगवान् ने भक्त् से अपनी एकरूपता दिखानेके लिए ही चोट सही, अन्यथा उन्हें भला कौन मार सकता है?भगवान को ही डाकू की तरह लूट लाने से उस गाँव का नाम डाकौर हुआ , भक्त  रामदास के वंशज स्वयं को भगवान के डाकू कहलाने में अपना गौरव मानते है । आज भी श्री रणछोड़ भगवान को पट्टी बाँधी जाती है। धन्य है भक्त श्री रामदासजी।

सुंदर कथा २(श्री भक्तमाल – श्री लालाचार्य जी) Sri Bhaktmal – Sri Lalacharya ji

श्री लालाचार्य जी महाराज महान संत हो गए । ये परम वैष्णव संत श्री रामानुजाचार्य जी के जामाता थे।वैष्णव वेश के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा थी।वे वैष्णव वेशधारी प्रत्येक संत को अपना भाई मानते थे और उसका उसी प्रकार आदर सत्कार करते थे।श्री लालाचार्यजी के इस भावको उनकी धर्मपत्नी तो जानती थी,परन्तु साधारण लोग भला इसे क्या समझे ।एक दिन श्री लालाचार्यजी की पत्नी जल भरने के लिए नदीतट पर गयी हुई थी,उनके साथ उनकी कुछ सहेलियां भी थी ,जो श्री लालाचार्याजी की वैष्णवनिष्ठा के कारण उनका मजाक उडाया करती थी।उसी समय किसी वैष्णव संत का शारीर बहता हुआ उधर नदी किनारे आया ,उसके शारीर पर वैष्णवचिन्ह अंकित थे और वह तुलसी कंठी माला धारण किये हुए थे।

सहेलियों ने व्यंग करते हुए पूछा- इन्हें देखकर ठीक से पहचान लो , तुम्हारे जेठ है या देवर । पत्नी ने घर आकर श्री लालाचार्य जी से यह बात कही ,ये बात सुनकर वे रोने लगे.अंतमे ये सोच कर अपने मन को शांत किया ये मेरे भाई भगवद्भक्त थे -वैष्णव संत थे इन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति हुई है।तत्पश्चात उनका शव प्राप्तकर अंतिम क्रिया करने के उद्देश्यसे वे नदिकिनारे आये और विधि-विधानपूर्वक उनकी क्रिया की।

तेरहवी के दिन श्री लालाचार्याजी ने उन वैष्णवसंतके निमित्त ब्राह्मण भोजनका आयोजन किया और उसके हेतु स्थानीय ब्राह्मणोंको आमंत्रित किया ,परन्तु उन ब्राह्मणोंने सोचा न जाने किसका शव उठा लाये, उसकी जाती गोत्र का कुछ पता नही और उसके तेरहवी में हमें खिलाकर भ्रष्टकर देना चाहते है।अतः इसके घर कोई ब्राह्मण नहीं जाना चाहिए तथा जो ब्राह्मण परिचय का आये उसे भी ये सब बताकर रोक देना चाहिए।

जब श्री लालाचार्यजी को यह पता चला तो वह बहुत चिंतित हुए और उन्होंने ये सब बातें श्री रामानुजाचार्य से कही।श्रीरामानुजाचार्य जी ने कहा की इस विषय में तुम्हे चिंता नहीं करनी चाहिए,वे ब्राह्मण अज्ञानी है और उन्हें वैष्णव-प्रसाद के महात्म्य का ज्ञान नहीं है ।यह कहकर उन्होंने दिव्य वैष्णव पार्षदोंका आवाहन किया और वैष्णव-प्रसाद की महिमा जानने वाले वे दिव्य पार्षद ब्राह्मण वेशमें उपस्थित होकर श्री लालाचार्याजी के घर की ओर जाने लगे। उन्हें देखकर वहाके स्थानीय ब्राह्मणोंने उन्हें रोकना चाहा ,परन्तु उनके दिव्या तेज से अभिभूत होकर खड़े-के -खड़े रह गए और आपसमें विचार किया के जब ये लोग भोजन करके बहार आएंगे तब हमलोग इनकी हसी उड़ायेंगे की कहो,किसके श्रद्धाके ब्राह्मण भोजनमें आप गए थे?क्या उसके कुल-गोत्र का भी आप सबको ज्ञान है?

इधर ब्राह्मण लोग ऐसा सोच ही रहे थे ,उधर ब्राह्मण वेशधारी पार्षद श्री लालाचार्याजी के आंगन से भोजन कर आकाशमार्ग से श्री वैकुंठधामके लिए प्रस्थान कर गए। ब्राह्मणों ने जब उन्हें आकाशमार्ग से जाते देखा तो उनकी आँखें खुली रह गयी. उन्हें अपनी भूल का पछतावा हुआ।वे लोग आकर श्री लालाचार्याजी महाराज के चरणोंमें गिर पड़े और क्षमा मांगते हुए रोने लगे।संत श्री लालाचार्याजी महाराज तो परम वैष्णव थे ,उन्हें उन लोगो पर किंचित रोष न था।वे बोले -आपसब ब्राह्मण है ,इस प्रकार कहकर मुझे लज्जित न करे।आप सबकी कृपासे मुझे वैष्णव पार्षदों के दर्शन हुए,अतः मई तोह स्वयं आपका कृतज्ञ हूँ।

ब्राह्मणों को अब श्री लालाचार्यजी के साधुत्व और सिद्धत्वमें रंचमात्रभी संदेह नहीं रह गया।उनसब ने श्री लालाचार्याजी के यहाँ जाकर भग्वाद्प्रसाद के रूपमें पृथ्वी पर गिरे हुए अन्नकणोंको बीन-बीनकर खाया और आनंदमग्न हो गए ।उनसब ने आचार्य श्री का शिष्यत्व ग्रहण किया और वैष्णव दीक्षा प्राप्त की ।