सुंदर कथा ८३ (श्री भक्तमाल – श्री पवनपुत्र दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Pavanputra das ji

पूज्य संतो की कृपा से कुछ छिपे हुए गुप्त भक्तो के चरित्र जो हमने सुने थे वह आज अनायास ही याद आ गए । उनमे से एक चरित्र संतो की कृपा से लिख रहा हूं –

श्री पवनपुत्र दास जी नामक एक हनुमान जी के भोले भक्त हुए है । यह घटना उस समय की है जब भारत देश मे अंग्रेजो का शासन था । अंग्रेज़ अधिकारी के दफ्तरों के बाहर इनको पहरेदार (आज जिसे सेक्युरिटी गार्ड कहते है )की नौकरी मिली हुई थी । घर परिवार चलाने के लिए नौकरी कर लेते थे , कुछ संतो की सेवा भी हो जाया करती थी पैसो से । कभी किसी जगह में जाना पड़ता , कभी किसी और जगह जाना पड़ता । एक समय कोई बड़ा अंग्रेज़ अधिकारी भारत आया हुए था और पवनपुत्र दास जी को उनके निवास स्थान पर पहरेदारी करने का भार सौंपा गया । श्री पवनपुत्र दास जी ज्यादा पढ़े लिखे नही थे , संस्कृत आदि का ज्ञान भी उनको नही था परंतु हिंदी में श्री राम चरित मानस जी की चौपाइयों का पाठ करते और हनुमान चालीसा का पाठ लेते , ज्यादा कुछ नही आता था ।

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सुंदर कथा ७८ (श्री भक्तमाल – श्री हरिनाभ जी ) Sri Bhaktamal – Sri Harinabh ji

श्री हरिनाभ जी भगवत्कृपा प्राप्त सन्त थे । इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था और इनकी सन्त सेवा में बडी ही निष्ठा थी । एक बार संन्यासियों की एक बडी मण्डली इनके गाँव में आयी, गाँव वालो ने उन्हें आपके यहाँ भेज दिया । संयोग से उस दिन श्री हरिनाभ जी के यहाँ तनिक भी सीधा सामान ( कच्चा अन्न ) नहीं था और न ही घर में रुपया-पैसा या आभूषण ही था, जिसे देकर दूकान से सौदा आ सकता ।

ऐसे में आपने अपनी विवाहयोग्य कन्या को एक सगोत्र ब्राह्मण के यहाँ गिरवी रख दिया कि पैसे की व्यवस्था होनेपर छुडा लेंगे । इस प्रकार पैसो की व्यवस्था करके आप सीधा सामान लाये और सन्त सेवा की । कुछ समय बाद जब इनके पास पैसे इकट्ठे हो गये तो आपने ब्राह्मण के पैसे लौटा दिये, परंतु फिर भी वह कन्या को वापस केरने में आनाकानी करता रहा ।

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सुंदर कथा ७६ (श्री भक्तमाल – श्री कुर्मदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kurmadas ji

पूज्यपाद श्री महीपति जी महाराज व भगवान् बाबा के आशीर्वचन ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

भगवान् श्री पंढरीनाथ के एक भक्त हुए है श्री कुर्मदास जी । कुर्मदास जी पैठण नामक गाँव में रहते थे । श्री कुर्मदास जी को बाल्यकाल से ही हाथ पाँव के पंजे नहीं थे और इस कारण से उन्हें अपने शरीर को किसी तरह घसीट कर चलना पड़ता था । जहाँ -तहाँ पडे रहते और जो कुछ मिल जाता खा लेते । मुख से राम कृष्ण हरी विट्ठल केशव जपते रहते ।

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सुंदर कथा ७४ (श्री भक्तमाल – श्री प्रयागदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Prayagdas ji

पूज्यपाद श्री विन्दुजी ब्रह्मचारी ,भगवती मंजुकेशी देवी ,श्री पंचरसचार्य रामहर्षण दास जी महाराज , बाबा बालकृष्ण दास जी महाराज के कृपाप्रसाद एवं लेखो से प्रस्तुत भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

जनकपुर में एक ब्राह्मण दम्पत्ति वास करते थे । ब्राह्मण परम विद्वान् और प्रेमी थे । ब्राह्मण बड़े बड़े लोगो के यहां आया जाया करते थे , बड़े बड़े विद्वान् उनके साथ चलते थे । धन ,सम्पत्ति की भी कोई कमी न थी परंतु उनके घर बहुत समय से कोई संतान उत्पन्न नहीं हो रही थी और इसी कारण से वे दोनों पति- पत्नी बहुत दुखी रहते थे । एक दिन उनके घर में एक संत जी पधारे । ब्राह्मण पति -पत्नी ने संत जी की बड़ी उचित प्रकार से सेवा की और सत्कार किया । ब्राह्मण संत से प्रार्थना करते हुए बोले – हे संत भगवान् ! विवाह होकर बहुत वर्ष बीत गए परंतु हमारे कोई संतान नहीं है ,आप कृपा करे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ५९ (श्री भक्तमाल – श्री गोपालदास और विष्णुदास जी) Sri Bhaktamal – Gopaldas and Vishnudas ji

पूज्यपाद श्री भक्तमाली जी के टीका से पढ़ा और श्री राजेंद्रदास जी के श्रीमुख से सुने हुए भाव –

श्री गोपालदास जी और श्री विष्णुदास जी दोनों गुरुभाई थे ।अनंत सद्गुणों से युक्त, स्वभाव से गंभीर और हरिगुण गायक भक्तवर श्री गोपालदास जी बांबोली ग्राम के निवासी थे । भजन -भावमें शूरवीर श्री विष्णुदास जी दक्षिण दिशा में काशीर ग्राम के निवासी थे । ये दोनों संतो भक्तो को गुरु गोविन्द के सामान मानकर उनकी सेवा करते थे । साधु- सेवा में दोनों गुरुभाइयों का हार्दिक परम अनुराग था ।
यह दोनों साधु- संतो को ऐसे सुख देनेवाले थे की इन्होंने एक नयी रीति चलायी । जब कभी किसी संत महात्मा के यहाँ कोई महोत्सव ,भोज , भंडारा होता और इनको निमंत्रण आता तब ये बड़े उल्लास के साथ बैल गाड़ी में भरकर घी, चीनी और आटा आदि जो भी सामान लगता वह सब ले जाते थे । कोठारी से मित्रता कर के उससे कह देते – देखो संतो की सेवा में किसी चीज़ की कमी नहीं पड़नी चाहिए । क्या क्या सामान कम है हमें आप हमें बता दो , हम सब ला देंगे ,महंत जी को इस बारे में पता नहीं चलना चाहिए की यह सामान कौन दे गया । इस तरह ये दोनों गुरुभाई गुप्त रूप से सेवा करते थे ।

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सुंदर कथा २४ (श्री भक्तमाल – श्री दण्डवत् स्वामी जी) Sri Bhaktamal- Sri Dandvat swami ji

दण्डवत् स्वामी नामके एक साधु पुरुष पैठणमें रहते थे । यह नमन भक्ति करते थे ।यह प्राणिमात्र में भगवान् विट्ठल कृष्ण का ही दर्शन करते। किसी भी प्राणी को देखते ही यह उसे दण्डवत प्रणाम करते । इसीसे इनका नाम दण्डवत स्वामी पडा । यह एकनाथ महाराजके शिष्य थे । कहीं एक गधा मरा पडा था, कुछ ब्राह्मणोंने दण्डवत्-स्वामी से कहा कि इन्हें भी प्रणाम करिये । 

इन्होंने मरे गधे को भी प्रणाम किया और आश्चर्यकी बात यह कि वह गधा उठ खडा हुआ । इस विलक्षण सिद्धि को देखकर गांवके सब लोग दण्डवत स्वामी को मानने और वन्दन करने लगे। योग साधना से अनेक प्ररकार की सिद्धियों प्राप्त होती हैं इसमें सन्देह नहीं, पर है सिद्धियों पर्मार्थ में बाधक होती हैं इस कारण भगवान के भक्त इन सिद्धियो के पीछे नहीं पड़ते । पढना जारी रखे

सुंदर संत कथा ६ ( श्री भक्तमाल -श्री कामध्वज जी) Sri Bhaktamal – Sri Kamdhwaj ji

राजस्थान के उदैपुर राज्य में एक सेवक परिवार रहता था। उस परिवार में चार भाई थे। उसमे से तीन भाई तो उदैपुर के शासक रणजी के यहाँ सेवा कार्य करते थे,परन्तु चौथे भाई श्री कामध्वज जी भगवद्भक्त थे। वे वन में रहकर भजन करते और समय पर घर आकर भोजन-प्रसाद पाकर फिर वन में चले जाते। यही उनका नित्य का कार्य था। उनके तीनो भाई उनको ‘कामके न काज के दुश्मन अनाज के ‘ मानकर उनसे नाराज ही रहा करते थे। एक दिन तीनो भाइयो ने श्री कामध्वज जी से कहा ‘भाई-यदि तुम थोड़ी देर के लिए राणाजी के दरबारमे हाजिरी लगा दिया करो तो हमें तुम्हारा भी वेतन मिल जाया करे , जिससे घर का खर्च भी ठीक से चल सके ।

इसपर श्री कामध्वजजी ने उत्तर दिया – मै जिसका सेवक हूँ ,उसकी सेवा करता हूँ और उसकी हाजिरी बजता हूँ, दुसरे से हमें क्या काम ? भाई लोग उनका उतार सुनकर बहुत नाराज हुए और बोले –‘जब तुम मर जाओगे तोह तुम्हे जलाएगा कौन?’ श्री कामध्वजजी ने उत्तर दिया – जिसके हम सेवक है ,वही हमें जलाएगा । यह सुनकर भाईलोग उन्हें उनके हालपर छोड़ कर चले गए। इधर एक दिन भजन करते करते श्री कामध्वजजी का शारीर छूट गया।

कामध्वजजी का शव वन में पड़ा हुआ था। बंधू-बंधवो को न कोई खबर थी और न ही वे खोज-खबर रखने की जरुरत समझते थे। परन्तु दीनबंधु श्री भगवन भला अपने ऐसे अनन्य सेवकको कैसे भुला सकते थे। उन्होंने अपने उस सेवक श्री कामध्वजजी की दाहक्रिया का भार अपने सेवकश्रेष्ठ श्री हनुमान जी को सौपा ।

श्री हनुमान जी महाराज ने उनके लिए चन्दन की चिता तैयार की,उसपर श्री कामध्वजजी का शरीर रखा और उनकी दहक्रिया की । जिस वन में श्री कामध्वजजी रहते थे,वह बहुत से प्रेत भी रहते थे। श्री कामध्वजजी की चिताग्नि से निकले परम पवित्र धुएं का ऐसा दिव्या प्रभाव हुआ कि उसके स्पर्श और आघ्राणसे वे प्रेत उस अपवित्र प्रेतयोनी से मुक्त होकर भगवद्धाम चले ।