श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग ३ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 3

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ® 

श्रीमन् महाप्रभु का संन्यास तथा नीलाचल आगमन 

श्रीगौरसुन्दर ने २४ वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम त्यागकर संन्यास ग्रहण किया और श्रीकृष्णचैतन्य नाम से परिचित होकर श्री जगन्नाथपुरी (नीलाचल) आ गये । श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य के कहनेपर राजा प्रतापरूद्र ने श्रीचैतन्य महाप्रभु के रहने की व्यवस्था अपने राजपुरोहित श्रीकाशी मिश्र के भवन मे की थी । 

एकबार श्री अद्वैताचार्य ,श्रीशिवानन्द सेन, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारि गुप्त तथा अन्य लगभग दो सौ भक्तोंके साथ श्री हरिदास जी भी श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन के लिए श्री जगन्नाथ पुरी आये । श्रीगोपीनाथ आचार्य ने अट्टालिकासे श्रीसार्वभौंम भट्टाचार्य और महाराज प्रतापरूद्र एक एक करके सभी भक्तोंका परिचय बताया। इस प्रकार भक्तोंका परिचय बताते बताते श्री हरिदास जी की ओर संकेत करते हुए कहा-उन्हे देखो ! वे जगत को पवित्र करनेवाले श्री हरिदास ठाकुर है ।

सभी भक्त श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन के लिए श्रीकाशी मिश्र के भवन की ओर चल पडे, किन्तु मार्ग में ही उन सबको श्रीमन् महाप्रभु की भेंट हो गयी । सभी भक्तोंसे मिलकर श्रीमन महाप्रभु को बहूत उल्लास हुआ । श्रीमन् महाप्रभुने सभी से कुशल क्षेम पूछा तथा श्री हरिदास जी को न देखकर महाप्रभु ने पूछा -हरिदास कहाँ है?

श्री हरिदास ठाकुर तो वहाँ तक भी नहीं आये, जहाँ प्रभु मार्ग में वैष्णवों से मिले थे, बल्कि दूर से ही प्रभु का दर्शन करके वे उसी राजपथ के एक किनारे पर दण्डवत होकर पडे रह गये थे। अब प्रभुके पूछनेपर सभी भक्त लोग दौडकर हरिदास जी को बुलाने के लिए वही पहुंच गये तथा उन्होंने कहा- हरिदास ,महाप्रभु तुमसे मिलना चाहते हैं, चलो जल्दी से उनके पास चलो।

श्री हरिदास जी ने कहा – मैं नीच जातिका होऩेके कारण अस्पृश्य हूँ। श्रीजगन्नाथ मन्दिर के निक्ट राजमार्गपर जानेका मेरा अधिकार नहीं है, क्योकि वहाँ राजपथपर श्रीजगन्नाथ देव के सेवकों का आना जाना रहता है । इसलिए एकान्त मे किसी एक बगीचे में यदि मुझे थोडा सा सथान मिल जाये तो मै वहींपर पडा रहकर अपना समय व्यतीत कर लूँगा । मेरी ऐसी इच्छा है कि मैं किसी ऐसे स्थानपर पडा रहूँ जिससे श्रीजगन्नथ के पुजारी सेवक मुझ अस्पृश्य से छु न जाये ।

श्री हरिदास जी के यह वचन भक्तोंने श्रीमन् महाप्रभु को जाकर बतलाये। श्रीमन महाप्रभु श्री हरिदास जी के विचार सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उसी समय श्रीकाशी मिश्र दो व्यक्तियो के साथ वहां आये तथा उन्होने श्रीमन् महाप्रभु के चरणों की वन्दना की । श्रीकाशी मिश्र ने महाप्रभुके चरणों में निवेदन किया -प्रभो ! यदि आपकी आज्ञा हो तो इन वैष्णावो के लिए सब प्रबन्ध किये जायें?

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श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग २ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 2

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ® 
विषधर सर्प का उपाख्यान

महात्मा हरिदास जी फुलिया के पास ही पुण्य सलिला माँ जाहन्वी के किनारे पर एक गुफा बनाकर उसमें रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। नित्य प्रति वहाँ सैकड़ों आदमी इनके दर्शन करने के लिये तथा गंगा स्नान के निमित्त इनके आश्रम के निकट आया करते थे। जो भी मनुष्य इनकी गुफा के समीप जाता, उसके शरीर में एक प्रकार की खुजली होने लगती। लोगों को इसका कुछ भी कारण मालूम न हो सका। उस स्थान में पहुंचने पर चित्त में शांति तो सभी के होती, किंतु वे खुजली से घबड़ा जाते।

लोग इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान लगाने लगे। होते-होते बात सर्वत्र फैल गयी। बहुत से चिकित्सकों ने वहां की जलवायु का निदान किया, अन्त में सभी ने कहा, यहाँ कोई जरूर महाविषधर सर्प रहता है। न जाने कैसे हरिदास जी अभी तक बचे हुए हैं,श्वास से ही मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। वह कहीं बहुत भीतर रहकर श्वास लेता है, उसी का इतना असर है कि लोगों के शरीर में जलन होने लगती है, यदि वह बाहर निकलकर जोरों से फुकांर करे, तो इसकी फुंकार से मनुष्य बच नहीं सकता।

हरिदास जी इस स्थान को शीघ्र ही छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगें, नहीं तो प्राणों का भय है। चिकित्सकों की सम्मति सुनकर सभी ने हरिदास जी से आग्रह पूर्वक प्रार्थना की कि आप इस स्थान को अवश्य ही छोड़ दें। आप तो महात्मा हैं, आपको चाहे कष्ट न भी न हो किन्तु और लोगों को आपके यहाँ रहने से बड़ा भारी कष्ट होगा। दर्शनार्थी बिना आये रहेंगे नहीं और यहाँ आने पर सभी को शारिरिक कष्ट होता है। इसलिए आप हम लोगों का ही ख्याल करके इस स्थान को त्याग दीजिए।

हरिदास जी ने सबके आग्रह करने पर उस स्थान को छोड़ना मंजूर कर लिया और उन लोगों को आश्वासन देते हुए कहा, आप लोगों को कष्ट हो ये मैं नहीं चाहता यदि कल तक सर्प यहाँ से चला नहीं गया तो मैं कल शाम को ही इस स्थान का परित्याग कर दूँगा। कल या तो यहाँ सर्प ही रहेगा या मैं ही रहूंगा, अब दोनों साथ ही साथ यहाँ नहीं रह सकते।

इनके ऐसे निश्चय को सुनकर लोगों को बड़ा भारी आनंद हुआ। और सभी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन बहुत से भक्त एकत्रित होकर हरिदास जी के समीप श्री कृष्ण कीर्तन कर रहे थे कि उसी समय सब लोगों को उस अँधेरे स्थान में बड़ा भारी प्रकाश सा मालूम पडा। सभी भक्त आश्चर्य के साथ उस प्रकाश की ओर देखने लगे। सभी ने देखा कि एक चित्र – विचित्र रंगो का बड़ा भारी सर्प वहाँ से निकलकर गंगा जी की ओर जा रहा है।

उसके मस्तक पर एक बडी सी मणि जडी हुई है उसी का इतना तेज प्रकाश है। सभी ने उस भयंकर सर्प को देखकर आश्चर्य प्रकट किया। सर्प धीरे-धीरे गंगा जी के किनारे बहुत दूर चला गया। उस दिन से आश्रम में आने वाले किसी भी दर्शनार्थी के शरीर में खुजली नहीं हुई। संतो की तो दृष्टीमात्र से अविद्या का बंधन खुल जाता है तथा भगवान् भी कभी उनके वचनो का उल्लंघन नहीं करते।

सपेेरे मे अथिष्ठित नागराज वासुकी का उपाखयान 

एक दिन एक विशिष्ट व्यक्ति घर में एक सपेरा आया। सपेरे मे विष दन्त रहित सर्प के दंशन के साथ साथ मन्त्र के प्रभाव से सर्पो के अधिष्ठात देवता नागराज वासुकी का आवेश हो गया । मृदंग तथा मंजीरे की ध्वनि के साथ गाये जानेवाले गीत तथा सपेरे के द्वारा जपे जा रहे मन्त्र की शक्ति के प्रभाव को देखकर सभी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे।

दैवयोग से श्री हरिदास ठाकुर भी वहाँ आ पहुंचे । वे भी एक और खडे होकर उस दृश्य को देखने लगे। देखते ही देखते मन्त्र के प्रभाव से उस सपेरे के शरीर में अधिष्ठित्त नागराज वासुकी (विष्णुभक्त शेष -अनन्त) स्वयं उसके माध्यम से उद्दण्ड नृत्य करने लगे । कालियद में कालिया के ऊपर चढकर अखिल क्लाओंके गुरु भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार ताण्डव नृत्य किया था, उसी प्रकार की भाव भंगी को अवलम्बन करके सपेरा भी नृत्य करने लगा तथा कालिया नागके प्रति श्रीकृष्ण ने दण्ड देने के बहाने से जो अत्यधिक दया की थी, उस लीला से सम्बन्धित एक गीत गाने लगा।

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सुंदर कथा ५१(श्री भक्तमाल – नामचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी) भाग १ Sri Bhaktamal -Namacharya Sri Haridas ji Part 1

नामाचार्य श्री हरिदास जी का स्वरुप

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ®  

महाप्रभु के परिकर श्रीशिवानंद सेन के आत्मज श्री कविकर्णपूर ने स्वरचित श्री गौरगणोद्देश दीपिका नामक ग्रंथ में लिखा है –

ऋचीकस्य मुने: पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपा: ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ।।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९३)

ऋचीक मुनि के पुत्र महातपा ब्रह्मा श्री प्रह्लाद के साथ मिलकर अब श्रीहरिदास ठाकुर कहलाते हैं।

मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते।
उक्तो मुनिसुत: प्रातस्तुलसीपत्रमाहरण्।
अधौतमभिशप्तस्तं पित्रा यवनतां गत: ।
स एव हरिदास: सन् जात: परमभक्तिमान्।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९४-९५)

श्री मुरारिगुप्त द्वारा रचित श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (जो वर्तमान समय में श्रीचैतन्यचरित के नाम से प्रसिद्ध है) मे कहा क्या है कि किसी एक मुनिकुमार ने एक दिन प्रात:काल तुलसी पत्र चयन करके, उन्हें धोये बिना ही अपने पिता को भगवान् की सेवा के उद्देश्य से अर्पित कर दिये ये । इसी कारण उनके पिता ने उन्हें होने का अभिशाप दिया था ।

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