सुंदर कथा ६६ (श्री भक्तमाल – श्री दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Daas ji

श्री दास जी महाराज नामक एक संतसेवी महात्मा हुए है ।श्री दास जी संतो की सेवा को भगवान् की सेवा से बढ़कर मानते थे । एक बार श्रीदास जी के यहा कई सन्त आये ।स्नाध्या – आरती हुई । रात्रि भोजन के वाद श्रीदास जी संतो की चरण सेवा में लग गये । मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराना भूल गये । प्रात:काल मंगला के समय श्री दास जी जब मंदिर जाने लगे तो मंदिर के किवाड़ भीतर से बन्द मिले । प्रयत्न करने पर भी किवाड नहीं खुले । तब श्रीदास जी बड़े असमंजस में पड गये । इतने में आकाश वाणी हुई – अब किवाड नहीं खुलेंगे , मेरी सेवा रहने दो, अब सन्तो की ही सेवा करो । मै रातभर सिंहासन पर खडा रहा हूँ तुमने मुझे शयन ही नहीं कराया ।

यह सुनकर श्री दासजी ने सरल भाव से निवेदन किया -प्रभो ! सन्त-सेवा में लगे रहने के कारण यदि आपकी सेवा में चूक हुई तो आपके नाराज होने का भय मुझे बिलकुल भी नहीं है । परंतु आपकी सेवा में लगा रहूँ और संत – सेवा में भूल-चूक हो जाय, तब मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय है , भगवान् से अधिक महिमा तो भगवान् के भक्तो की है । यह सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये । किवाड खुल गये और भगवान् कहने लगे – हम तुमपर बहुत प्रसन्न है , इस भाव् से संत सेवा करनेवाले मुझे अपने वश में कर लेते हैं । ऐसा कहकर भगवान ने श्रीदास जी को प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और अनेक शुभाशीर्वाद दिए ।

सुंदर कथा ५४ (श्री भक्तमाल – श्री श्यामानंद जी २ ) Sri Bhaktamal – Sri Shyamanand ji 2

http://www.bhaktamal.com ® गौड़ीय महात्मा पूज्यपाद श्री रासिकानंद प्रभु के वंशज पूज्यपाद श्री कृष्ण गोपालानंद जी द्वारा श्यामानंद चरित्र और श्री हित चरण अनुरागी संतो द्वारा व्याख्यान ,आशीर्वचनों  पर आधारित  । कृपया अपने नाम से प्रकाशित न करे ।

वन के पशुओ और दो शेरो पर कृपा :
रास्ते में घने जंगलो से होते हुए उन्होंने ना केवल मनुष्यो का उद्धार किया परंतु हाथी सिंह, भालु, मोर, हिरन आदि पशुओ को भी हरिनाम मंत्र प्रदान करके तार दिया । चलते चलते अचानक दो बड़े बड़े शेर उनका रास्ता रोक कर खड़े हो गए । उनकी दहाड़ सुनकर सभी वैष्णव भयभीत होने लगे । श्री श्यामानंद जी ने हाथ उठाकर कहा – श्री हरिनाम मंत्र  का उच्चारण करो । उच्च स्वर में श्यामानंद प्रभु बोल उठे –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।

हरिनाम श्रवण करते ही वे शेर शांत हो गए। श्यामानंद प्रभु के पास आकर दोनों ने झुककर प्रणाम् किया और वहां से निकल गए ।

वृंदावन में श्यामानंद प्रभु को इतने वर्षो बाद पुनः देखकर श्रीपाद जीव गोस्वामी और अन्य वैष्णवो को बहुत आनंद हुआ । वृंदावन में श्यामानंद प्रभु अपने आराध्य राधा श्यामसुंदर की सेवा में लग गए । एक दिन श्यामानंद प्रभु ध्यान में श्री प्रिया लाल जी की लीलाओं का रसास्वादन कर रहे थे । श्री श्यामसुंदर प्रभु ने ध्यान में कहा – हे श्यामानंद ! आजकल उत्कल देश के लोग पाप कर्म में रत होने लगे है , वे तामसी सिद्धियों और तंत्र मंत्र प्रयोग को ही भक्ति समझते है । वहाँ जाकर श्री रसिक मुरारी जी को अपना शिष्य बनाओ और साथ मिलकर वहाँ के जीवो का उद्धार करो ।

श्यामानंद प्रभु का मन अब वृंदावन छोड़ कर अन्यत्र कही जाने को नहीं हो रहा था । वे सोचने लगे की अभी तो उत्कल देश से आया हूं ,अब तो मै वृंदावन में ही रहूँगा । श्यामानंद जी ने प्रभु के इस आज्ञा के बारे में किसीको कुछ नहीं बताया और वृंदावन में ही रहने का निश्चय किया ।जब श्री कृष्ण ने देखा की श्यामानंद जी हमारी बात नहीं मान रहे है तो उन्होंने श्री जीव गोस्वामी को स्वप्न में दर्शन देकर कहा – हे जीव ! मैंने तीन बार श्यामानंद से उत्कल देश जाने को कहा परंतु वह ब्रज छोड़कर नहीं जाता । अब आप ही उसे कुछ समझाओ । अगले दिन जीव गोस्वामी ने श्यामानंद को समझाकर उत्कल जाने के लिए कह दिया । श्यामानंद जी किशोरदास, श्यामदास , बालकदास आदि शिष्यो को साथ लेकर उत्कल देश को चल दिए ।

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श्री भक्तमाल – नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी भाग २ Shri Bhaktamal – Namacharya Sri Haridas ji Part 2

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ® 
विषधर सर्प का उपाख्यान

महात्मा हरिदास जी फुलिया के पास ही पुण्य सलिला माँ जाहन्वी के किनारे पर एक गुफा बनाकर उसमें रहते थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। नित्य प्रति वहाँ सैकड़ों आदमी इनके दर्शन करने के लिये तथा गंगा स्नान के निमित्त इनके आश्रम के निकट आया करते थे। जो भी मनुष्य इनकी गुफा के समीप जाता, उसके शरीर में एक प्रकार की खुजली होने लगती। लोगों को इसका कुछ भी कारण मालूम न हो सका। उस स्थान में पहुंचने पर चित्त में शांति तो सभी के होती, किंतु वे खुजली से घबड़ा जाते।

लोग इस विषय में भाँति-भाँति के अनुमान लगाने लगे। होते-होते बात सर्वत्र फैल गयी। बहुत से चिकित्सकों ने वहां की जलवायु का निदान किया, अन्त में सभी ने कहा, यहाँ कोई जरूर महाविषधर सर्प रहता है। न जाने कैसे हरिदास जी अभी तक बचे हुए हैं,श्वास से ही मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। वह कहीं बहुत भीतर रहकर श्वास लेता है, उसी का इतना असर है कि लोगों के शरीर में जलन होने लगती है, यदि वह बाहर निकलकर जोरों से फुकांर करे, तो इसकी फुंकार से मनुष्य बच नहीं सकता।

हरिदास जी इस स्थान को शीघ्र ही छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगें, नहीं तो प्राणों का भय है। चिकित्सकों की सम्मति सुनकर सभी ने हरिदास जी से आग्रह पूर्वक प्रार्थना की कि आप इस स्थान को अवश्य ही छोड़ दें। आप तो महात्मा हैं, आपको चाहे कष्ट न भी न हो किन्तु और लोगों को आपके यहाँ रहने से बड़ा भारी कष्ट होगा। दर्शनार्थी बिना आये रहेंगे नहीं और यहाँ आने पर सभी को शारिरिक कष्ट होता है। इसलिए आप हम लोगों का ही ख्याल करके इस स्थान को त्याग दीजिए।

हरिदास जी ने सबके आग्रह करने पर उस स्थान को छोड़ना मंजूर कर लिया और उन लोगों को आश्वासन देते हुए कहा, आप लोगों को कष्ट हो ये मैं नहीं चाहता यदि कल तक सर्प यहाँ से चला नहीं गया तो मैं कल शाम को ही इस स्थान का परित्याग कर दूँगा। कल या तो यहाँ सर्प ही रहेगा या मैं ही रहूंगा, अब दोनों साथ ही साथ यहाँ नहीं रह सकते।

इनके ऐसे निश्चय को सुनकर लोगों को बड़ा भारी आनंद हुआ। और सभी अपने-अपने स्थानों को चले गये। दूसरे दिन बहुत से भक्त एकत्रित होकर हरिदास जी के समीप श्री कृष्ण कीर्तन कर रहे थे कि उसी समय सब लोगों को उस अँधेरे स्थान में बड़ा भारी प्रकाश सा मालूम पडा। सभी भक्त आश्चर्य के साथ उस प्रकाश की ओर देखने लगे। सभी ने देखा कि एक चित्र – विचित्र रंगो का बड़ा भारी सर्प वहाँ से निकलकर गंगा जी की ओर जा रहा है।

उसके मस्तक पर एक बडी सी मणि जडी हुई है उसी का इतना तेज प्रकाश है। सभी ने उस भयंकर सर्प को देखकर आश्चर्य प्रकट किया। सर्प धीरे-धीरे गंगा जी के किनारे बहुत दूर चला गया। उस दिन से आश्रम में आने वाले किसी भी दर्शनार्थी के शरीर में खुजली नहीं हुई। संतो की तो दृष्टीमात्र से अविद्या का बंधन खुल जाता है तथा भगवान् भी कभी उनके वचनो का उल्लंघन नहीं करते।

सपेेरे मे अथिष्ठित नागराज वासुकी का उपाखयान 

एक दिन एक विशिष्ट व्यक्ति घर में एक सपेरा आया। सपेरे मे विष दन्त रहित सर्प के दंशन के साथ साथ मन्त्र के प्रभाव से सर्पो के अधिष्ठात देवता नागराज वासुकी का आवेश हो गया । मृदंग तथा मंजीरे की ध्वनि के साथ गाये जानेवाले गीत तथा सपेरे के द्वारा जपे जा रहे मन्त्र की शक्ति के प्रभाव को देखकर सभी मन्त्र मुग्ध हो रहे थे।

दैवयोग से श्री हरिदास ठाकुर भी वहाँ आ पहुंचे । वे भी एक और खडे होकर उस दृश्य को देखने लगे। देखते ही देखते मन्त्र के प्रभाव से उस सपेरे के शरीर में अधिष्ठित्त नागराज वासुकी (विष्णुभक्त शेष -अनन्त) स्वयं उसके माध्यम से उद्दण्ड नृत्य करने लगे । कालियद में कालिया के ऊपर चढकर अखिल क्लाओंके गुरु भगवान श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार ताण्डव नृत्य किया था, उसी प्रकार की भाव भंगी को अवलम्बन करके सपेरा भी नृत्य करने लगा तथा कालिया नागके प्रति श्रीकृष्ण ने दण्ड देने के बहाने से जो अत्यधिक दया की थी, उस लीला से सम्बन्धित एक गीत गाने लगा।

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सुंदर कथा ५१(श्री भक्तमाल – नामचार्य श्री हरिदास ठाकुर जी) भाग १ Sri Bhaktamal -Namacharya Sri Haridas ji Part 1

नामाचार्य श्री हरिदास जी का स्वरुप

यह चरित्र पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी की चैतन्य चरितावली ,त्रिदंडी पूज्य श्री नारायण गोस्वामी महाराज द्वारा लिखी पुस्तके और श्री  चैतन्य चरितामृत के आधार पर दिया गया है । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे ।www.bhaktamal.com ®  

महाप्रभु के परिकर श्रीशिवानंद सेन के आत्मज श्री कविकर्णपूर ने स्वरचित श्री गौरगणोद्देश दीपिका नामक ग्रंथ में लिखा है –

ऋचीकस्य मुने: पुत्रो नाम्ना ब्रह्मा महातपा: ।
प्रह्लादेन समं जातो हरिदासाख्यकोऽपि सन् ।।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९३)

ऋचीक मुनि के पुत्र महातपा ब्रह्मा श्री प्रह्लाद के साथ मिलकर अब श्रीहरिदास ठाकुर कहलाते हैं।

मुरारिगुप्तचरणैश्चैतन्यचरितामृते।
उक्तो मुनिसुत: प्रातस्तुलसीपत्रमाहरण्।
अधौतमभिशप्तस्तं पित्रा यवनतां गत: ।
स एव हरिदास: सन् जात: परमभक्तिमान्।
(श्री गौरगणोद्देश दीपिका ९४-९५)

श्री मुरारिगुप्त द्वारा रचित श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (जो वर्तमान समय में श्रीचैतन्यचरित के नाम से प्रसिद्ध है) मे कहा क्या है कि किसी एक मुनिकुमार ने एक दिन प्रात:काल तुलसी पत्र चयन करके, उन्हें धोये बिना ही अपने पिता को भगवान् की सेवा के उद्देश्य से अर्पित कर दिये ये । इसी कारण उनके पिता ने उन्हें होने का अभिशाप दिया था ।

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सुंदर कथा ३८(श्री भक्तमाल – श्री रंग जी) Sri Bhaktamal – Sri Rang ji

श्री रंग जी श्रीअनन्तानन्दाचार्यजी महाराज के प्रधान शिष्यो में एक थे । गृहस्थाश्रम के समय आपका निवास द्यौसा  नामक ग्राममें था, जो तत्कालीन जयपुर राज्य में आता था । आप वैश्यकुल में उत्पन्न हुए थे ।आपके यहाँ सेवाकार्य करने के लिये एक नौकर रखा गया था, परंतु वह स्वभाव से बडा ही दुष्ट था । कालवश मृत्यु को प्राप्तकर वह यमलोक गया । वहाँ उस पापी को यमराज ने दूतकार्य में नियुक्त किया और मृत प्राणियों के प्राणों को लानेका कार्य सौंपा ।

एक बार यमराज ने उसे एक बनजारे के प्राणोंका हरण करके लाने को कहा, जो कि उसी द्यौसा ग्राम का रहनेवाला था, जहाँ वह मरने से पहले श्री रंग जी के यहाँ नौकरी करता था । वहाँ आने पर वह सबसे पहले वह श्री रंग जी से मिलने गया । वे उसे देखते ही चौंक पडे और बोले- अरे मैंने सुना कि तू मर गया है, फिर तू यहाँ कैसे आ गया ? 

यमदूत ने कहा – मालिक ! आपने ठीक ही सुना था, मैं मर चुका हूँ और अब यमदूत बन गया हूँ । यहाँ पास जो बंजारा रहता है ,मैं उस बनजारे को ले जाने आया हूँ । श्री रंगजी ने कहा -अभी तो वह पूर्ण स्वस्थ है और थोडी देर पहले ही मेरे यहाँ से कुछ माल लादकर ले गया है, उसे तुम कैसे ले जाओगे ? उसने कहा – मैं उसके बैल के सींगपर बैठ जाऊँगा, जिससे कालप्रेरित वह बैल सींग मारकर उसका पेट फाड़ देगा । श्री रंगजी ने पूछा-क्या तुमलोग सबके साथ ऐसा ही व्यवहार करते हो ? 

यमदूत बोला-नहीं, हमलोग केवल पापियों-के साथ ही ऐसा व्यवहार करते हैं, भगवान् के  भक्तों की और तो हम देख भी नहीं सकते, अत: मैं आपको भी यह सलाह देने आया हूँ कि जीवन के शेष भाग में आप भगवद्भक्ति कर लें । मैंने आपका नमक खाया है, अत: आपको कष्ट में पड़ते नहीं देखना चाहता है । आपको यदि मेरी बातोंपर विश्वास न हो तो आप मेरे साथ बनजारे के घर चलिये । मैं केवल आपको ही दिखायी दूंगा, दूसरा कोई मुझे नहीं देख सकेया ।

यह कहकर यमदूत बनजारे का प्राण हरण करने के उद्देश्य से उसके घरकी ओर चल दिया । श्री रंगजी भी उसके पीछे-पीछे चल दिये, वहां जाकर श्री रंगजी ने देखा कि बनजारा अपने बैल को खली -भूसा चला रहा है । बैल बार-बार सिर हिला रहा था, जिससे बनजारे को खली- भूसा चलाने में असुविधा हो रही थी; अत: उसने एक हाथ से बैलको जोरसे हटाया। ठीक उसी समय यमदूत जाकर बैल के सींगो पर बैठ गया, फिर तो कालप्रेरीत बैलने क्रोध में भरकर सींगो से ऐसा प्रहार किया कि बनजारे का पेट फट गया, उसकी आंतें बाहर निकल आयी और वह वहीं तुरंत मर गया ।

श्री रंगजी की आंखोंके सामने घटी इस आश्चर्यमयी घटनाने उनको आंखें खेल दीं, उन्होंने श्रीअनन्तानन्द जी महाराज के चरण पकड़े और उनके उपदेशानुसार भगवद्भक्ति करने लगे ।

श्री रंग जी के पुत्र को रात में भूत दिखायी देता था उसके भयसे उसका शरीर नित्य सूखता ही चला जाता था ।
श्री रंगजी ने बालक से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि रात मे भयंकर प्रेत के दिख में से मैं दिन रात चिन्तित रहता हूँ । तब श्रीरंगजी पुत्रके सोने के स्थानपर स्वयं सोये । रात होते ही वह प्रेत आया । श्रीरंगजी क्रोध करके उसे मारने के लिये दौड़े एयर कहने लगे – बालक को डरा के परेशान करता है । 

प्रेत ने दैन्यतापूर्वक कहा कि आप कृपा कर के मुझे इस पाप योनि से मुक्त करके सद्गति प्रदान कीजिये । मैं जाति का सुनार हूं परायी स्त्री से पाप संबंध के कारण मैं प्रेत हो गया हूँ ।अपने उद्धार का उपाय संसार में खोजने के बाद अब अपकी शरण ली है । प्रेत की आर्तवाणी सुनकर श्री रंगजी ने उसे चरणामृत दिया और उसका अत्यन्त सुन्दर दिव्यरूप कर दिया । इस प्रकार श्री रंगजी के भक्तिभाव का गान किया गया है ।

सुंदर कथा ३७(श्री भक्तमाल – श्री किल्हदेव जी) Sri Bhaktamal – Sri Kilhdev ji

जिस प्रकार गंगा जी के पुत्र श्री भीष्म पितामह को मृत्युने नष्ट नहीं किया, उसी प्रकार स्वामी किल्हदेवजी भी साधारण जीवों की तरह मृत्यु के वशमे नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपनी इच्छा से प्राणोंका त्याग किया । कारण कि आपकी चित्तवृत्ति दिन रात श्री रामचन्द्रजी के चरणारविन्दो का ध्यान करने में लगी रहती थी । आप माया के षड्विकारोंपर विजय प्राप्त करनेवाले महान शूरवीर थे । सदा भगवद्भजन में आनन्द में मग्न रहते थे ।

सभी प्राणी आपको देखते ही नतमस्तक हो जाते थे और आप सभी प्राणियो में अपने इष्टदेव को देखकर उन्हें सिर झुकाते थे । सांख्यशास्त्र तथा योगका आपको सुदृढ ज्ञान था और योग की क्रियाओं का आपको इतना सुन्दर अनुभव था कि जैसे हाथमे रखे आँवले का होता है । ब्रह्मरन्ध के मार्ग से प्राणो को निकालकर आपने शरीर का त्याग किया और अपने योगाभ्यास के बल से भगवद् रूप पार्षदत्व प्राप्त किया । इस प्रकार श्री सुमेरुदेव जी के सुपुत्र श्री कील्हदेवजी ने अपने पवित्र यश को पृथ्वीपर फैलाया, आप विश्वविख्यात सन्त हुए ।

श्री कील्हदेव जी महाराज श्री कृष्णदास पयहारी के प्रधान शिष्यो मे से एक थे । श्रीपयहारीजी के परमधाम गमन के बाद गलतागादी ( जयपुर) के महन्त आप ही हुए । आप दिव्यदृष्टि संपन्न परम वैष्णव सिद्ध संत थे । कहते हैं कि भक्तमाल ग्रन्थ के रचनाकार श्री नाभादास जी महाराज के नेत्र क्या, नेत्र के चिह्न भी  नहीं थे, श्री कील्हदेवजी ने अपने कमण्डलु के जलसे  उनके नेत्र स्थान को धुला, जिससे उनके बाह्य चक्षु प्रकट हो गये ।

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सुंदर कथा ३१(श्री भक्तमाल – श्री नारायणदास जी बंगाल वाले) Sri Bhaktamal – Sri Narayan das ji

बंगाल के सुप्रसिद्ध राजा कीर्तिचन्द्र के राज्यमें तटपर श्री नारायणदास जी नाम के श्रीराम भक्त का घर था । वे बड़े ही शुद्धचित्त तथा सरल स्वभाव के मनुष्य थे । वे धनवान् थे और विद्वान् थे ,पर उनकी सादगी और सरलता ऐसी थी कि उन्हें कोई वैभव सम्पन्न समझ ही नहीं सकता था । धनमे उनकी आसक्ति थी भी नहीं । मर्थादापुरुषोत्तम श्रीराम में ही उनका चित सदा लगा रहता था । 

नारायणदासजी की पत्नी मालती भी भक्तिमती, सुशीला एवं पतिव्रता थीं । यद्यपि पत्नीके मनमें कोई सन्तान न होनेका दु:ख था; फिर भी नारायणदास जी को इस अभाव की तनिक भी परचा नहीं थी । अवस्था ढल जाने पर संसार त्यागकर श्री अयोध्याजीमे रहते हुए जीवनके शेष दिन भगवान् के भजन में बिता देनेका उन्होंने निश्चय किया । पत्नीका साथ चलने का दृढ आग्रह देखकर उसे  भी उन्होंने साथ ले लिया । उदार बैलोंपर आवश्यक सामान लादकर घर से वे चल पड़े । साथमें कोई भी सेवक ले चलना उन्हें पसंद नहीं आया, यद्यपि कई नौकर साथ चलने को उत्सुक थे । 

पति पत्नी श्रीराम नामका कीर्तन करते चलते थे । मार्गमे धर्मशालाओं में या किसी ग्राममें निवास करते थे । इस प्रकार वे चित्रकूट पहुंच गये । चित्रकूट की उस पुण्य भूमि को देखकर नारायणदास जी का हृदय प्रेम विहृल हो गया । वे वहाँ कुछ दिनके लिये ठहर गये । सत्सङ्ग, साधु सेवा, भजन कीर्तन, दान पुण्य करते हुए कुछ दिन चित्रकूट रहनेके पश्चात् वे अयोध्या की और चले । 

श्रीराम सीता जी तथा लक्ष्मणजी के साथ वनके बीहड मार्गसे ही आयोध्या से चित्रकूट आये है । हमें भी वन के कष्ठोंका अनुभव करते हुए उसी मार्ग से अयोध्या जाना चाहिये । यह सोचकर नारायणदास ने सीधा मार्ग छोड़ दिया और वे वन पर्वतो के दुर्गम मार्ग से चलने लगे । कौन-सा मार्ग सीधा अयोध्या जाता है और . कौन-सा नहीं, यह वे नहीं जानते थे । जानने का साधन भी नहीं था । 

भगवान का नाम-कीर्तन करते कंकड़-पत्थर और काँटोंसे भरी ऊबड़-खाबड़ पगडंडो से भयंकर पशुओं से भरे जंगल के बीच से वे चले जा रहे थे । वृक्षोंके नीचे किसी झरने के किनारे विश्राम करते और बैल वहीं घास चर लेते, इस प्रकार यात्रा चल रही थी । एक कार वे लुटेरे भीलो के गांव के पास जा पहुंचे । भीलोंने समझ लिया कि इनके पास धन है । उन्होंने इनके पास आकर पूछा- तुमलोग इस बीहड़ वन में है केसे आ गये?  नारायणदास ने सरलतापूर्वक बता दिया हैं कि हम अयोध्या जी जा रहे है । भीलोंने कहा- तुमलोग तो मार्ग भूलकर इस वनमें आ गये। चलो, अच्छा हुआ कि हमलोगो से भेंट को गयी । हमलोग भी अयोध्या जी ही है जा रहे हैं ।

 नारायणदास ने समझा कि हमें ये मार्गदर्शक मिल गये । वे उन दुष्ठोंपर विश्वास करके निश्चिन्त हो गये । वे लोग इनको बातों में भुलाकर दुर्गम वनमें ले गये । घोर वनमें पहुंचकर भैलो ने नारायणदास को पकड़ लिया और इतना पीटा कि वे मूर्छित हो गये । उनके हाथ पैर बाँधकर एक खाइमे फेंक दिया और ऊपरसे पत्थर पटक दिये ।  उनको मरा समझकर वे दुष्ट उनकी पत्नी के पास आये ।  मालती अपने पुण्य पति की दुर्दशा देखकर मूर्छित हो गयी थी । वह पृथ्वीपर पडी थी । वे नरराक्षस उसे घसीट ने लगे और गालियाँ देने लगे । थोडी देरमें मालती को होश आया ।

उसने देखा कि इन दुष्ठो की नीयत बहुत बुरी है । भय और क्रोध से वह कांपने लगी । कोई और उपाय न देखकर उस मालती ने नेत्र बंद करके श्रीराघव जी को पुकारना प्रारम्भ किया– प्रभो ! आप शरणागत रक्षक नहीं हैं क्या ? मैंने तो सुना है कि सेवकों की रक्षाके लिये ही आप धनुष-बाण धारण करते हैं । क्या सचमुच आप शरणमें आये अनाथों को शरण देते हैं? हमारे तो आप ही स्वामी हैं, आप ही रक्षक हैं । हमारी रक्षा क्यों नहीं करते, दयामय? 

मालती नेत्र बंद किये कातर कण्ठसे प्रार्थना कर रही थी । भीलों को लगा कि कहींसे छोड़े की टापोंका शब्द आ रहा है । वे कुछ सोच सकें, इससे पहले ही सफेद छोड़ेपर सवार एक नौजावन आता दिखायी पडा । मस्तकपर सोने का मुकुट, कानोंमें रत्नकुण्डल, सर्वाङ्ग आभरणभूषित, कमरमे तलवार, हाथमें विशाल धनुष, पीठपर तरकस कसा हुआ । उस श्यामवर्ण कमललोचन युवक को देखकर डाकू डर गये । उन्हें वह यमराज से भी भयंकर दीख पडा । प्राण लेकर वे चारों ओर भागे । किसीका भागते समय गिरकर सिर फूटा, किसीका पैर टूटा, किसीके दांत टूटे । सबको चोट लगी । 

उस युवकने पास आकर घोड़ेसे उतरकर कहा- ‘ माता ! तुम कौन हो? इस वनमें अकेली केसे आयीं? तुम्हारे साथ क्या कोई पुरुष नहीं है? ये कौन तुम्हें घेरे हुए थे ? प्राणोंमें अमृत घोलते हुए ये शब्द कानमें पड़े । मालतीने नेत्र खेलकर देखा और एकटक उस रूपराशिको देखती रह गयी । युवक के फिर पूछनेपर उसने किसी प्रकार बड़े कष्टसे अपनी कहानी सुनाकर प्रार्थना करते हुए कहा -मैं नहीं जानती कि तुम कौन हो । कोई भी हो, मेरी दुर्दशा देखकर ही दयामय रघुवीर ने तुम्हें भेजा है । मैं नहीं जानती कि मेरे पतिदेव को ये दुष्ट कहां फेक आये । वे जीवित नहीं होंगे । तुम मुझ दीना अबलापर दया करो । मेरे धर्मके भाई बनो । एक चिता बना दो । मैं उसमें जलकर अपने अंदर की ज्वाला को शान्त करूंगी । 

युवक ने कहा – देवि ! आप चिन्ता न करे । आपके पति जीवित हैं । मैंने आते समय यह शब्द सुना है-  हाय मालती! हमलोग अयोध्या जाकर श्रीरामके दर्शन न कर सके । अवश्य ये शब्द तुम्हारे पति के ही होंग । तुम मेरे साथ चलो । वह स्थान यहां से दूर नहीं है । 

मालती में अब एक पग चलने की भी शक्ति नहीं थी । भवभयहारी भगवान् ने अपना अभय हस्त बढाया और ‘माता’ कहकर मालती को आश्वासन दिया । वह उन सर्वेश्वरका हाथ पकडकर चलने लगी । डाकुओ ने नारायणदास जी को खाईंमें पटक दिया था । उनके हाथ पैर लताओ से बंधे थे । उनका अङ्ग अङ्ग मार पड़नेसे कुचल गया था । यड़े बड़े कई पत्थर उनकी  छातीपर ऊपर से गिरे थे । उन्होंने मन- ही-मन कहा-  प्रभु! तुम्हारे प्रत्येक विधानमें ही जीवका मङ्गल है । मुझें तुम्हारी प्रत्येक व्यवस्था में आनन्द है । मैं तो एकमात्र तुम्हारी शरण हूँ ।  इतना सोचते सोचते वे मूर्छित हो गये । मालती ने वहाँ जाकर पतिकी यह दशा देखी तो वह धड़ाम से भूमिपर गिर पडी । भगवान् ने उसे आश्वासन  दिया । 

प्रभुने खाईमें उतर कर नारायणदास की छातीपर से शिलाएं हटा दीं, उनके सारे बन्धन काट डाले और उन्हें  ऊपर उठा लाये । श्रीराघव जी के हाथोका अमृतस्त्रावी स्पर्श पाकर नारायणदास के शरीरमें चेतना लौट आयी । उनके शरीर, मन, प्राण सब की व्यथा तत्काल दूर हो गयी । नारायणदास ने नेत्र खोलने पर अपने सामने उन धनुषधारी को देखा। कई क्षण वे अपलक देखते रहे । हदयने कहा – इस भीषण विपत्ति से परित्राण भला, श्रीजानकी नाथ को छोड़कर और  कौन दे सकता है ।

ये पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणि गलेमे पहनने वाले मेरे श्रीरघुनाथ ही तो हैं । बस, वे प्रभुके चरणोंमें लोट गये । उनके नेत्रोंकी धाराने प्रभुके चरण धो दिये । भगवान अपने ऐसे भक्तो क्या छिपे रह सकते हैं? प्रभुने अपने ज्योतिर्मय चिन्मय स्वरूप का दर्शन देकर दम्पति को कृतार्थ किया, उन्हें भक्ति का वरदान दिया । भगवान् की आज्ञासे नारायणदास पत्नी के साथ वहाँ से चलकर कुछ दिमोंमें अयोध्या पहुंच गये । श्रीसरयूजीके तटपर उन्होंने अपनी पर्णकुटी बना ली । वहीं साधु स्नेचा और भगवान का भजन करते हुए उन्होंने शेष जीवन व्यतीत किया । 

सुंदर कथा ९ (श्री भक्तमाल -श्री देवाजी पण्डा) Sri Bhaktamal -Sri Devaji 

उदयपुर के समीप श्रीरूप चतुर्भुज स्वामी का मंदिर है,वहाँ श्री देवजी पण्डा(पुजारी) थे। एक दिन उदयपुर के राणा भगवान् श्री चतुर्भुजजी का दर्शन करने के लिए आये,परंतु नित्य की अपेक्षा आज देर से आये।समय हो गया था , इसलिए पुजारी श्री देवाजी ने भगवान् को शयन करा दिया और प्रसादी माला जो राणाजी को पहनाने के लिए रखी थी ,उसे उन्होंने अपने सिरपर धारण कर लिया।इतनेमें ही राणाजी आ रहे है, यह समाचार मिला ।श्री देवापण्डा जी ने प्रसादी माला अपने सिर से उतारकर रख ली और राणाजी के आनेपर उसे उनके गलेमें पहना दिया।

संयोगवश पण्डाजी के सिरका एक सफेद बाल मालामे लिपटा चला गया।उसे देखकर रणाजी ने कहा-क्या ठाकुरजी के सिरके बाल सफ़ेद हो गए है?पण्डा जी के मुखसे निकल गया-हाँ । राणाजी ने कहा -मै प्रातः काल देखूँगा। पण्डाजी ‘हाँ’ ऐसा कह तो गए ,परंतु अब वे घबराये कि राणाजी हमें अवश्य ही मरवा डालेंगे;क्योंकि मैंने झूठी बात कही है।

उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझा,वे भगवान् के श्रीचरणों का ध्यान करने लगे ।उन्होंने कहा कि हे हृषिकेश श्री कृष्ण भगवान् !मेरे प्राणोंकी रक्षा के लिए कृपा करके आप अपने बालों को सफेद कर लीजिये।आप भक्तरक्षक है ,परंतु मेरे मन में तो आपके प्रति नाममात्र भी भक्ति नहीं है। चिन्तामग्न श्री देवाजी पण्डा से श्री ठाकुरजी ने कहा कि मैंने सफ़ेद बाल धारण कर लिए है,न मानो तो आकर देख लो।

श्री देवाजी पण्डा दुःखके महासागर में डूबे थे,भगवान् की मधुर वाणी सुनकर उनकी जान में जान आयी।मंदिर में जाकर जब उन्होंने दर्शन किया तो सफ़ेद बाल दिखायी पडे।तब पण्डाजी ने अपने मनके अनुभवसे यह जाना कि ठाकुरजी ने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है,उनकी आँखो में आँसू भर आये।

प्रातः काल शीघ्र ही चतुर्भुजजी के सफेद बाल देखने के लिये राणाजी मन्दिरमें आये और सफ़ेद बालोंको देखकर कुछ देर तक तो देखते ही रह गए,फिर परीक्षा लेने के लिये उनमेसे एक बाल खींचा ।बालके खींचे जानेपर पीड़ावश ठाकुरजी ने अपनी नाक चढ़ा ली।बाल उखड गया और उस बालके छिद्रसे रक्तकी धार बह निकली । 

उसके छींटे राणाजी के शरिर पर पडे। इससे राणाजी को मूर्छा आ गयी और वे पृथ्वीपर गिर पड़े।उन्हें अपने शरिर काकुछ भी होश ना रहा। एक पहर बाद जब होश आया तब वे इसे करोडो अपराधो के समान मानकर क्षमा-प्रार्थना करने लगे।श्री भगवान् ने आज्ञा की-तुम्हारे लिए यही दंड है की जो भी राजगद्दी पर बैठे,वह दर्शन के लिए मेरे मन्दिरमे न आये।इस आज्ञा के अनुसार उनकी आन मानकर  जो भी राजा उदयपुरकी राजगद्दीपर बैठते हऐ,वे दर्शन करने मन्दिरमे नही आते है।