सुंदर कथा ७६ (श्री भक्तमाल – श्री कुर्मदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kurmadas ji

पूज्यपाद श्री महीपति जी महाराज , प्रह्लाद महाराज , भगवान् बाबा और अन्य वारकरी महात्माओ के आशीर्वचन ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

भगवान् श्री पंढरीनाथ के एक भक्त हुए है श्री कुर्मदास जी । कुर्मदास जी पैठण नामक गाँव में रहते थे । श्री  कुर्मदास जी को बाल्यकाल से ही हाथ पाँव के पंजे नहीं थे और इस कारण से उन्हें अपने शरीर को किसी तरह घसीट कर चलना पड़ता था । जहाँ -तहाँ पडे रहते और जो कुछ मिल जाता खा लेते । मुख से राम कृष्ण हरी विट्ठल केशव जपते रहते ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७३ (श्री भक्तमाल – श्री गोरा कुम्हार जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gora kumhar ji

पूज्यपाद संत श्री महीपति महाराज , भीमास्वामी रामदासी , श्री नामदेव गाथा के आधार पर और श्री वारकरी संतो के कृपाप्रसाद से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे। http://www.bhaktamal.com  ®

श्री गोरा जी का जन्म :

संतश्रेष्ठ शिरोमणी ज्ञानदेव जी के समकालीन अनेक श्रेष्ठ संत हुए है , उनमे से एक संत गोरा कुम्हार भी एक थे । सारी संत मंडली में संत गोरा कुम्हार सबसे ज्येष्ठ थे अतः उन्हें प्रेम से सब गोरोबा काका अथवा गोरई काका भी कहते थे । महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गाँव है । इस गाँव का मूल नाम त्रयीदशा है परंतु वर्तमान में इसका नाम तेरेढोकी है । यही पर संत गोरा कुम्हार का जन्म हुआ था ।  संतजन इनका जीवन काल सामान्यतः इ.स १२६७ से १३१७ तक मानते है ।तेरेढोकी श्रीक्षेत्र पंढरपूर से लगभग ३० कोस की दूरी होने के कारण उनका पंढरपूर धाम में आना जाना होता था । वे निष्ठावान वारकरी संत थे । गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त रहे इसीलिए संत नामदेव जी ने गोरई काका को वैराग्य का मेरु कहा है ।

संत श्री गोरा कुम्हार ऊँचे अधिकारी सिद्ध पुरुष थे । उनकी गुरु परंपरा श्री ज्ञानदेव और नामदेव की तरह ही नाथपंथीय थी । इनके गुरुदेव थे सिद्ध संत श्री रेवणनाथ जी । अनेक पीढ़ियो से इनके घर में मिट्टी घड़े मटके ,बर्तन आदि बनाने का काम चला आ रहा था । विट्ठल भक्ति भी गोराई काका के परिवार में पहले से चली आ रही थी । इनके माता का नाम श्रीमति रुक्मिणी बाई और पिता का नाम श्री माधव जी था । माता पिता दोनों ही भगवान् श्री कालेश्वर (शिव ) के निष्ठावान उपासक थे परंतु वे पांडुरंग विट्ठल भगवान् में भी समान श्रद्धा रखते थे । हरी हर को एकत्व मान कर दोनों भजन में मग्न रहते थे । उन्हें आठ संताने प्राप्त हुई परंतु सब के सब मृत्यु का ग्रास बन गए । उनके सारे बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो गए इस बात से वे बहुत कुछ दुखी थे परंतु निरंतर भगवान् का भजन चलता रहता था । उन्हें लगता था की सारे के सारे बच्चे मर गए ,कम से कम ये अंतिम एक बच्चा भी रह जाता तो हमें प्रसन्नता होती ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ४९(श्री भक्तमाल – श्री बहिणाबाई जी) Sri Bhaktamal – Sri Bahinabai ji

यह चरित्र जगद्गुरु श्री तुकाराम महाराज, देहु मंदिर साहित्य, संत श्री वामनराव जी एवं वारकरी संप्रदाय के संतो से सुनी जानकारी ,साहित्य के आधार पर दिया गया है ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे। http://www.bhaktamal.com ® 

संत चरित्रों का श्रवण और मनन करना ,मानव के मन पर अच्छे संस्कार करने का श्रेष्ठ साधन है । पंढरपुर धाम मे विराजमान श्री कृष्ण ,पांडुरंग अथवा विट्ठल नाम से जाने जाते है। भगवान् श्री विट्ठल के अनन्य भक्त जगतगुरु श्री तुकाराम जी महाराज के कई शिष्य हुए परंतु स्त्री वर्ग में उनकी मात्र एक ही शिष्या हुई है जिनका नाम संत श्री बहिणाबाई था।

बहिणाबाई का जन्म मराठवाड़ा प्रांत में वैजपूर तालुका के  देवगांव में शेक १५५० में हुआ था।( बहुत से विद्वानों का मत है के जन्म १५५१ में हुआ था ।) इनके पिता का नाम श्री आऊ जी कुलकर्णी और माता का नाम श्री जानकीदेवी था। गाँव के पश्चिम दिशा में शिवानंद नामक महान तीर्थ है,जहाँ श्री अगस्त्य मुनि ने अनुष्ठान किया था। ग्रामवासियो की श्रद्धा थी  की इस तीर्थ के पास ‘लक्ष्यतीर्थ ‘ में स्नान करके अनुष्ठान करने से मनोकामना पूर्ण होती है । इसी तीर्थ पर श्री आऊ जी कुलकर्णी ने अनुष्ठान करने पर श्री बहिणाबाई का जन्म हुआ था ।

जन्म होते ही विद्वान पंडितो ने इनके पिता को बता दिया था की यह कन्या महान भक्ता होगी । जब बहिणाबाई  नौ वर्ष की थी उस समय देवगांव से १० मिल दूर शिवपुर से बहिणाबाई के लिए विवाह का प्रस्ताव आया। उनका विवाह चंद्रकांत पाठक नामक तीस वर्ष के व्यक्ति से तय किया गया और यह उसका दूसरा विवाह था । वह कर्मठ ब्राह्मण था और कुछ संशयी वृत्ति का  भी था। बहिणाबाई बाल्यकाल से ही बहुत सरल स्वभाव की थी, वह सोचती की हमरे पति ज्ञानी है और इस विवाह से वह अप्रसन्न नहीं हुई ।

पढना जारी रखे