श्री भरत -हनुमान मिलन , हनुमान द्वारा भरत का संतत्व वर्णन और सरयू माहात्म्य ।

पूज्यपाद श्री हरिदास बाबा जी , श्री रंगराय जी , श्री रामकुमार रामायणी जी ,मनसराजहांस श्री विजयानंद जी , श्री हरिहर प्रसाद जी ,बाबा श्री जयरामदास जी के कृपा प्रसाद एवं मानस टीकाओं से प्रस्तुत भाव । कृपाया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

​लंका के रणक्षेत्र मे मेघनाद के शक्ति-प्रहार से श्री लक्ष्मण जी मूर्छित हो गये । लंका के सुषेण वैद्य की आज्ञा से श्री हनुमान द्रोणाचल पर्वत पर से विशल्यकर्णी औषधि (संजीवनी बूटी) लेने चल दिये । वे वहाँ पहुंचकर औषधि को पहचान नहीं पाये और उन्हे पूरे पर्वत को ही ऊखाड कर ले चलना पडा ।

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि।
बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥

भावार्थ : भरत जी ने आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा ।

शंका : हनुमान जी के अवधपुरी के ऊपर से उड़ने का क्या कारण था ? युद्ध के समय हनुमान जी के मन में अपने बल का अभिमान आ गया था । भगवान् कभी अपने भक्त के मन में अभिमान का अंकुर बढ़ने नहीं देते । लक्ष्मण जी जब मूर्छित हुए तब भगवान् श्री राम ने शोकातुर होकर कहा की हनुमान जैसे महाबली के रहते हुए भी तुम (लक्ष्मण ) पर यह आपत्ति आयी ,यदि हमारे भाई भरत यहां होते तो वे अवश्य तुम्हारी रक्षा करते । (हनुमन्नाटक १३ । ११ )

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८० (श्री भक्तमाल – श्री खुशाल बाबा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Khushal baba ji

खान देशमें (वर्तमान गुजरात महाराष्ट्र सीमा ) फैजपुर नामका एक नगर है । वहाँ डैढ़ सौ साल पहले तुलसीराम भावसार नामक श्री कृष्ण पंढरीनाथ जी के एक भक्त रहते थे । इनकी धर्मपरायणा पत्नी का नाम नाजुकबाई था । इनकी जीविका का धन्धा था कपडे रँगना। दम्पती बड़े ही धर्मपरायण थे । जीविका मे जो कुछ भी मिलता, उसीमें आनन्द के साथ जीवन निर्वाह करते थे । उसीमे से दान धर्म भी किया करते थे । 

इन्हीं पवित्र माता पिता के यहाँ यथासमय श्री खुशाल बाबा का जन्म हुआ था । बचपन सेे ही इनकी चित्तवृत्ति भगवद्भक्ति की ओर झुकी हुई थी । भगवान् के लिए नृत्य और कीर्तन करके उन्हें रिझाते और उनकी लीलाओं को सुनकर बड़े प्रसन्न (खुश ) होते , खुश होकर हँसते और मौज में नाचते रहते । इसी से सबलोग इनको खुशाल बाबा कहते थे । यथाकाल पिता ने इनका विवाह भी करा दिया । इनकी साध्वी पत्नी का नाम मिवराबाई था।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७९ (श्री भक्तमाल – श्री रामअवध दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Ramavadh das ji

लगभग सौ वर्ष पहले की बात है । भगवान् श्री राघवेंद्र के परम भक्त क्षेत्रसन्यासी स्वामी रामअवध दास जी वैरागी साधू थे । बरसों से मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचंद्र जी की राजधानी अयोध्यापुरी मे रहते थे । अहर्निश श्री सीताराम नाम का कीर्तन करना उनका सहज स्वभाव हो गया था । रात को कठिनता से केवल दो घंटे सोते । सरयू जी के तीरपर एक पेड़ के नीचे फ्लो । धूनी रात – दिन जलती रहती । बरसात के मौसम में भी कोई छाया नहीं करते थे ।

आश्चर्य तो यह कि मूसलधार वर्षा में भी उनकी धूनी ठंडी नहीं हाती थी । जब देखो तभी स्वामी जी के मुखारविन्द से बड़ मधुर स्वर में श्री सीताराम नाम की  ध्वनि सुनायी पडती । आसपास के सभी मनुष्य -जीव – जंतु तक सीताराम ध्वनि करना सीख गये थे । वहाँ के पक्षियों की बोली में श्री सीताराम की ध्वनि सुनायी पडती, वहाँ के कुत्ते – बिल्ली की बोली में श्री सीताराम स्वर आता, वहाँ के वृक्षों की खड़खड़ाहट में श्री सीताराम नाम सुनायी देता और वहाँ की पवित्र सरयू धारा श्री सीताराम गान करती । तमाम वातावरण सीताराममय हो गया था।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७८ (श्री भक्तमाल – श्री हरिनाभ जी ) Sri Bhaktamal – Sri Harinabh ji

श्री हरिनाभ जी भगवत्कृपा प्राप्त सन्त थे । इनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था और इनकी सन्त सेवा में बडी ही निष्ठा थी । एक बार संन्यासियों की एक बडी मण्डली इनके गाँव में आयी, गाँव वालो ने उन्हें आपके यहाँ भेज दिया । संयोग से उस दिन श्री हरिनाभ जी के यहाँ तनिक भी सीधा सामान ( कच्चा अन्न ) नहीं था और न ही घर में रुपया-पैसा या आभूषण ही था, जिसे देकर दूकान से सौदा आ सकता ।

ऐसे में आपने अपनी विवाहयोग्य कन्या को एक सगोत्र ब्राह्मण के यहाँ गिरवी रख दिया कि पैसे की व्यवस्था होनेपर छुडा लेंगे । इस प्रकार पैसो की व्यवस्था करके आप सीधा सामान लाये और सन्त सेवा की । कुछ समय बाद जब इनके पास पैसे इकट्ठे हो गये तो आपने ब्राह्मण के पैसे लौटा दिये, परंतु फिर भी वह कन्या को वापस केरने में आनाकानी करता रहा ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७७ (श्री भक्तमाल – श्री जगदानंद जी ) Sri Bhaktamal – Sri Jagadanand ji

श्री जगदानन्द जी भगवान् श्री राम के अनन्य भक्त थे । इनकी जैसी भक्ति भगवान् श्रीराम के चरणो मे थी, वैसी किसी विरले ही पुरुष मे होगी । इनमे वर्ण आश्रम या विद्या आदि का अहंकार बिलकुल न था । वैष्णव सन्तो को देखते ही उनके चरणो मे सिर झुकाते,उनकी परिक्रमा करते और मधुर वाणी से सत्कार करते हुए कहते की आज मेरे धन्य भाग्य है, जो मुझे श्री रामजी के प्यारे मिल गये । भोजन विश्रामादि के बाद उनसे प्रार्थना करते कि श्रीराम जी की कोई कथा सुनाइये । इस प्रकार सत्संग में सर्वदा भगवत् कथाओं को कह सुनकर परमधर्म का प्रचार प्रसार करते। 

एक बार दो सन्त तीर्थयात्रा करले हुए काशी जी मे आये । वहां एक सन्त बीमार हो गये और उनका शरीर छूट गया । उसके वियोग में दूसरे सन्त करुण क्रन्दन काने लगे । उनका विलाप सुनकर श्री जगदानंद जी से नहीं रहा गया । निकट जाकर इन्होंने उन संत से से कहां – संत जी !आप विलाप न करे , ये मरे नहीं है । आपके साथ साथ तीर्थयात्रा को पूर्ण करके , अपने स्थान मे पहुंचकर आज से एक माह के बाद शरीर त्यागकर वैकुण्ठ को पधारेंगे । जगदानंद जी का स्पर्श पाकर सन्त उठ बैठे । दोनो ने संतो ने जगदानंद जी को सिद्ध महापुरुष मानकर दंडवत प्रणाम् किया । इस प्रकार अनेकों के संकट काटकर उन्हें परमधर्म का उपदेश किया ।

सुंदर कथा ७६ (श्री भक्तमाल – श्री कुर्मदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kurmadas ji

पूज्यपाद श्री महीपति जी महाराज , प्रह्लाद महाराज , भगवान् बाबा और अन्य वारकरी महात्माओ के आशीर्वचन ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

भगवान् श्री पंढरीनाथ के एक भक्त हुए है श्री कुर्मदास जी । कुर्मदास जी पैठण नामक गाँव में रहते थे । श्री  कुर्मदास जी को बाल्यकाल से ही हाथ पाँव के पंजे नहीं थे और इस कारण से उन्हें अपने शरीर को किसी तरह घसीट कर चलना पड़ता था । जहाँ -तहाँ पडे रहते और जो कुछ मिल जाता खा लेते । मुख से राम कृष्ण हरी विट्ठल केशव जपते रहते ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७४ (श्री भक्तमाल – श्री प्रयागदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Prayagdas ji

पूज्यपाद श्री विन्दुजी ब्रह्मचारी ,भगवती मंजुकेशी देवी ,श्री पंचरसचार्य रामहर्षण दास जी महाराज , बाबा बालकृष्ण दास जी महाराज के कृपाप्रसाद एवं लेखो से प्रस्तुत भाव । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

जनकपुर में एक ब्राह्मण दम्पत्ति वास करते थे । ब्राह्मण परम विद्वान् और प्रेमी थे । ब्राह्मण बड़े बड़े लोगो के यहां आया जाया करते थे , बड़े बड़े विद्वान् उनके साथ चलते थे । धन ,सम्पत्ति की भी कोई कमी न थी परंतु उनके घर बहुत समय से कोई संतान उत्पन्न नहीं हो रही थी और इसी कारण से वे दोनों पति- पत्नी बहुत दुखी रहते थे । एक दिन उनके घर में एक संत जी पधारे । ब्राह्मण पति -पत्नी ने संत जी की बड़ी उचित प्रकार से सेवा की और सत्कार किया । ब्राह्मण संत से प्रार्थना करते हुए बोले – हे संत भगवान् ! विवाह होकर बहुत वर्ष बीत गए परंतु हमारे कोई संतान नहीं है ,आप कृपा करे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७३ (श्री भक्तमाल – श्री गोरा कुम्हार जी ) Sri Bhaktamal – Sri Gora kumhar ji

पूज्यपाद संत श्री महीपति महाराज , भीमास्वामी रामदासी , श्री नामदेव गाथा के आधार पर और श्री वारकरी संतो के कृपाप्रसाद से प्रस्तुत भाव ।कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे। http://www.bhaktamal.com  ®

श्री गोरा जी का जन्म :

संतश्रेष्ठ शिरोमणी ज्ञानदेव जी के समकालीन अनेक श्रेष्ठ संत हुए है , उनमे से एक संत गोरा कुम्हार भी एक थे । सारी संत मंडली में संत गोरा कुम्हार सबसे ज्येष्ठ थे अतः उन्हें प्रेम से सब गोरोबा काका अथवा गोरई काका भी कहते थे । महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गाँव है । इस गाँव का मूल नाम त्रयीदशा है परंतु वर्तमान में इसका नाम तेरेढोकी है । यही पर संत गोरा कुम्हार का जन्म हुआ था ।  संतजन इनका जीवन काल सामान्यतः इ.स १२६७ से १३१७ तक मानते है ।तेरेढोकी श्रीक्षेत्र पंढरपूर से लगभग ३० कोस की दूरी होने के कारण उनका पंढरपूर धाम में आना जाना होता था । वे निष्ठावान वारकरी संत थे । गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त रहे इसीलिए संत नामदेव जी ने गोरई काका को वैराग्य का मेरु कहा है ।

संत श्री गोरा कुम्हार ऊँचे अधिकारी सिद्ध पुरुष थे । उनकी गुरु परंपरा श्री ज्ञानदेव और नामदेव की तरह ही नाथपंथीय थी । इनके गुरुदेव थे सिद्ध संत श्री रेवणनाथ जी । अनेक पीढ़ियो से इनके घर में मिट्टी घड़े मटके ,बर्तन आदि बनाने का काम चला आ रहा था । विट्ठल भक्ति भी गोराई काका के परिवार में पहले से चली आ रही थी । इनके माता का नाम श्रीमति रुक्मिणी बाई और पिता का नाम श्री माधव जी था । माता पिता दोनों ही भगवान् श्री कालेश्वर (शिव ) के निष्ठावान उपासक थे परंतु वे पांडुरंग विट्ठल भगवान् में भी समान श्रद्धा रखते थे । हरी हर को एकत्व मान कर दोनों भजन में मग्न रहते थे । उन्हें आठ संताने प्राप्त हुई परंतु सब के सब मृत्यु का ग्रास बन गए । उनके सारे बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो गए इस बात से वे बहुत कुछ दुखी थे परंतु निरंतर भगवान् का भजन चलता रहता था । उन्हें लगता था की सारे के सारे बच्चे मर गए ,कम से कम ये अंतिम एक बच्चा भी रह जाता तो हमें प्रसन्नता होती ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७२ (श्री भक्तमाल – श्री गरुड जी ) Sri Bhaktamal – Sri Garud ji

भगवान् श्रीहरि के वाहन और उनके रथ की ध्वजा में स्थित विनता नंदन गरुड भगवान की विभूति हैं । वे नित्यमुक्त और अखंड ज्ञानसम्पन्न हैं । उनका विग्रह सर्ववेदमय है । श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि बृहद्रथ और रथन्‍तर नामक सामवेद के दो भेद ही इनके पंख हैं । उडते समय उन पंखो से सामवेद की ध्वनि निकलती रहती है । वे भगवान् के नित्य परिकर और भगवान् के लीलार्स्वरूप हैं । देवगण उनके परमात्मरूप की स्तुति करते हुए कहते है – 

खगेश्वरं शरणमुपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महाबलं गरुडमुपेत्य खेचरम्।।
( महाभारत, आदिपर्व २३ । २२ )

पढना जारी रखे

सुंदर कथा ७१(श्री भक्तमाल – श्री धनुर्दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Dhanurdas ji

श्री रामानुज संप्रदाय के पूर्वचार्यो द्वारा लिखे गए ग्रंथो में धनुर्दास स्वामी जी के जीवन के कुछ प्रसंग मिलते है । श्री कलिवैरिदास स्वामी जी ,भक्त चरितांक ,श्री तोताद्रि मठ के संत और अन्य आचार्यो के आशीर्वाद से प्रेरित चरित्र । कृपया अपने नाम से प्रकाशित ना करे । http://www.bhaktamal.com ®

मद्रास प्रांत में त्रिचनापल्ली के पास एक स्थान है उदयूर । इसका पुराना नाम निचुलापुरी है । यह वैष्णवों का एक पवित्र तीर्थ है । आज से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व यहां एक धर्नुदास नाम का पहलवान रहता था। अपने बल तथा अद्भुत आचरण के लिये धनुर्दास प्रख्यात था । दक्षिण भारत में धनुर्दास को पिल्लै उरंगा विल्ली के नाम से जाना जाता है । धनुर्दास राजा के सभा के एक महान पहलवान थे । उस पहलवान ने हेमाम्बा नामक एक अत्यंत सुन्दर वेश्या की सुन्दरता पर बहुत मोहित होकर उसे अपनी प्रेयसी बनाकर घर में रख लिया था । वह उस वेश्या के रूप पर इतना मोहित था की जहां भी जाता, उसे साथ ले जाता । अंत में उसके रूप में आसक्त होकर उसे अपनी पत्नी बना लिया , स्त्री ने भी उसे पति रूप में स्वीकार कर लिया था । 

रास्ते से जब धनुर्दास चलता तो स्त्री के आगे-आगे उसे देखते हुए पीठ की ओर उलटे चलता । कही बैठता तो उस स्त्री को सामने बैठाकर ही बैठता ।  उसका व्यवहार सबके लिए कौतूहलजनक था; परंतु वह निर्लज्ज होकर उस स्त्री को देखना कभी भी नहीं छोड़ता था । दक्षिण भारत का एक सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है – श्रीरंग क्षेत्र । त्रिचनपल्ली से यह श्रीरंगम् पास ही है। वर्ष में कई बार यहां महोत्सव होता है। दूर-दूर से लाखों यात्री आते है । एक बार श्रीरंगनाथ का वासन्ती महोत्सव (चैत्रोत्सव)चल रहा था। धर्नुदास जी की प्रेयसी ने भी उत्सव देखना चाहा। धर्नुदास उसे तथा नौकरों-चाकरों के साथ निचलापुरी से श्रीरंगम् आ गया।

पढना जारी रखे