सुंदर कथा १०७ (श्री भक्तमाल – श्री टीला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Teela ji

बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी ने दास को जैसा सुनाया वैसा लिख रहा हूं :

नाभादास जी वर्णन करते है – संसार में भरतखंड रुपी सुमेरुपर्वत के शिखर से समान श्री टीलाजी एवं उनके विरक्त शिष्य श्री लाहा जी की परंपरा बहुत प्रसिद्ध हुई ।ब्रह्माण्ड में सबसे ऊँचा पर्वत सुमेरु पर्वत कहा जाता है । पर्वतो का राजा सुमेरु जम्बुद्वीप के मध्य में इलावृत देश में स्थित है ।यह पूरा पर्वत स्वर्णमयी है । इसके शिखर पर २१ स्वर्ग है जहां देवता विराजते है । सभी देवताओ के लोक और ब्रह्मा जी का लोक भी सुमेरु पर्वत पर स्थित है । जैसे सभी देशो में भारत और सभी पर्वतो में सुमेरु ऊँचा है उसी प्रकार श्री कृष्णदास पयहारी जी के शिष्य टीला जी के भजन की पद्धति सुमेरु के सामान है अर्थात सर्वोपरि पद्धति है । यह भजन की पद्धति कौनसी है ? वह है संतो और गौ माता की सेवा।

जन्म और बाल्यकाल :

श्रीटीला जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल १०, सं १५१५ वि.को राजस्थान के किशनगढ़ राज्यान्तर्गत सलेमाबाद मे हुआ था । कुछ संतो का मत है की जन्म खाटू खण्डेला के पास कालूड़ा गाँव में हुआ था । इनकेे पिता श्री हरिराम जी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पण्डित और माता श्रीमती शीलादेवी साधु-सन्त सेवी सद्गृहिणी थी । पिता परम प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध जोशी गोत्रीय ब्राह्मण थे । इनके माता-पिता को बहुत समयतक कोई संतान नहीं थी, बादमे आबूराज निवासी एक सिद्ध संत के आशीर्वाद से इनका जन्म हुआ था । सन्तकृपा, तीर्थक्षेत्र का प्रभाव, पूर्वजन्म के संस्कारो और और माता – पिता की भक्ति के सम्मिलित प्रभाव से बालक टीलाजी मे बचपन से ही भक्ति के दिव्य संस्कार उत्पन्न हो गये थे, जो आयु और शस्त्रानुशीलन के साथ-साथ बढते ही रहे ।

श्री गायत्री महामंत्र जप के प्रभाव सेे टीला जी को श्री गायत्री और सरस्वती जी का साक्षात् दर्शन हुआ । ४ वेद ६ शास्त्र १८ पुराण उनके अंतःकरण में प्रकट हो गए । बचपन मे ही यह बालक किसी ऊँचे टीलेपर (ऊँची जगह अथवा रेत के पहाड़ के ऊपर )चढकर बैठ जाता और किसी सिद्ध सन्त की भाँति समाधिस्थ हो जाता, इस प्रवृत्ति को देखकर ही लोगो ने इनका नाम टीलाजी रख दिया ।

पढना जारी रखे

सभी कल्पो की श्रीराम लीला सत्य है ।

एक दिन श्री रघुनाथ जी ने हनुमान जी से कहाँ – हनुमान ! तुम निरंतर हमारी सेवा मे रहते हो और नाम जप भी करते हो परंतु सत्संग और कथा श्रवण करने नही जाते । यह तुम्हारे अंदर थोडी सी कमी है । हनुमान जी बोले – प्रभु ! आपली आज्ञा तप शिरोधार्य है परंतु जिन भगवान की कथा है वे तो निरंतर मिले हुए है और आपकी सेवा भी मिली हुई है । आपकी जो प्रत्यक्ष अवतार लीला है ,जो चरित्र है वे प्रायःसभी हमने देखे है अतः मै सोचता हूं की कथा श्रवण से क्या लाभ ? श्री रघुनाथ जी बोले – यह सब तप ठीक है परंतु कथा तो श्रवण करनी ही चाहिए । श्री हनुमान जी ने पूछा कि आप ही कृपापूर्वक बताएं की किसके पास जाकर कथा  श्रवण करें ?

रघुनाथ जी बोले – नीलगिरीपर्वत पर श्री काग भुशुण्डि जी नित्य कथा कहते है , वे बड़े उच्च कोटी के महात्मा है । शंकर जी, देवी देवता, तीर्थ सभी उनके पास जाकर सतसंग करते है , आप उन्ही के पास जाकर तुम भी कथा श्रवण करो । हनुमाम जी ने बटुक रूप धारण किया और नीलगिरी पर्वतपर कथा मे पहुँच गए । वहां श्री कागभुशुण्डि जी हनुमान जी की ही कथा कह रहे थे । उन्होंने कहां की जब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को अपनी शक्ति का स्मरण कराया तब हनुमान जी ने विराट शरीर धारण किया , एक पैर तो था महेंद्रगिरि पर्वत पर भारत के दक्षिणी समुद्र तटपर और दूसरा रखा सीधे लंका के सुबेल पर्वत पर । एक ही बार मे समुद्र लांघ गए ।

वहां विभीषण से मिले, अशोके वाटिका मे जाकर सीधे ,बिना चोरी छिपे श्री सीता जी से मीले और वहां जब  उनपर राक्षसों ने प्रहार किया तब उन्होंने सब राक्षसों को मार गिराया । रावण के दरबार मे भी पहुंचे , वहां रावण ने श्री राम जी के बारे मे अपशब्द प्रयोग किये और राक्षसों से कहां कि इस वानर की पूंछ मे आग लगा दो । हनुमान जी ने यह सुनकर जोर से हूंकार किया और उनके मुख से भयंकर अग्नि प्रकट हुए । उस अग्नि ने लंका को जला दिया और हनुमान जी पुनः एक पग रखा तो इस पर रामजी के पास पहुँच गए। यह सुनते ही हनुमान जी ने सोचा की कागभुशुण्डि जी यह कैसी कथा सुना रहे है । मैन तो इस प्रकार न समुद्र लांघा और न इस प्रकर से लंका जली । लगता है कथा व्यास आजकल असत्य कथा कहने लगे है ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०६ (श्री भक्तमाल – श्री भगवान नारायण दास जी : पिण्डोरी धाम ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagwan Narayan das ji

बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी के श्रीमुख से जैसा सुना वैसा लिख रहा हु , लेखन में भूल चूक के लिए क्षमा करे ।

श्री रामानंदी संप्रदाय के संतों का पंजाब में एक स्थान है – श्री पिण्डोरी धाम । वहां की परंपरा में एक संत हुए है श्री नारायण दास जी महाराज । श्री गुरु परंपरा इस प्रकार है श्री रामानंदाचार्य – श्री अनंतानंदचार्य – श्री कृष्णदास पयहारी – श्री भगवान दास जी – श्री नारायण दास जी । भजन जप साधना आदि के बल से श्री नारायण दास जी दिन दुखी पीड़ित व्यक्तियों को जो भी कहते वो सत्य हो जाता । धीरे धीरे उनके पास आने वालों की भीड़ बढ़ने लगी । यद्यपि नारायण दास जी किसी सिद्धि का प्रयोग नही करते परंतु भगवान के नाम जप के प्रभाव से जो भी उनके पास आता , उसका दुख दूर हो जाता । जब भीड़ बढ़ने लगी तब उनके गुरुदेव श्री भगवान दास जी ने कहा – अधिक भीड़ होने लगी है , यह सब साधु के लिए अच्छा नही है । इन चमत्कारों से भजन साधन मे बाधा उत्पन्न होती है । अब तुम पूर्ण अंतर्मुख हो जाओ, मौन हो जाओ और एकांत में भजन करो । किसी से न कुछ बोलना, न कुछ सुनना, न कोई इशारा करना, केवल रामनाम का मानसिक जप करो ।( इनका नाम भगवान नारायण दास जी प्रसिद्ध हुआ । )

१. बादशाह जहांगीर द्वारा नारायण दास जी को तीक्ष्ण विष पिलाना और श्रीराम नाम की महिमा प्रकट होना –

नारायण दास जी तत्काल जडवत हो गए और अंतर्मुख होकर साधना करने लगे । किससे कुछ भिक्षा भी नही मांगते , जो किसीने दे दिया वह प्रसाद समझ कर पा लेते । एक दिन नारायण दास जी बैठ कर साधना कर रहे थे , वहीं से जहांगीर बादशाह अपने सैनिकों के साथ जा रहा था । उसने सैनिको से पूछा कि इस हिंदु फकीर को रास्ते से हटाओ । सैनिको ने नारायण दास जी से हटने को कहा परंतु वे न कुछ बोले न वहां से हिले । बादशाह ने कहा – लगता है यह कोई जासूस है , इसको गिरफ्तार करके साथ ले चलो । बादशाह उनको अपने साथ लाहौर ले गया (वर्तमान पाकिस्तान) और उनसे बहुत पूछा कि तुम कौन हो? कहां से आये हो ? किसके लिए काम करते हो ? वहां क्यों बैठे थे ? बहुत देर तक पूछने पर भी वे कुछ बोले नही । बादशाह को बहुत क्रोध आया और उसने वैद्य को बुलाकर कहां – भयंकर तीक्ष्ण हालाहल विष (जहर) पिलाकर इसको मार दो ।
पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०५ (श्री भक्तमाल – श्री रुपरसिक देवाचार्य जी : रूपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Roop Rasik ji

१. श्री रूपा जी की संत निष्ठा –

श्री रूपरसिक देवाचार्य जी दक्षिण देश के रहनेवाले और जाति के ब्राह्मण थे । परिवार-पोषण के लिये आप खेती करते थे । सन्तसेवा मे आपकी बडी निष्ठा थी । बहुत कालतक आप के यहाँ सन्तसेवा सुचारु रूप से चलती रही । एक साल वर्षा के अभाव मे (वर्षा कम होने के कारण )खेती मे अन्न को उपज कुछ भी नही हुई । ऐसी स्थिति मे घर मे उपवास की स्थिति आ गयी । बाल-बच्चे भूखे मरने लगे । श्री रूपा जी अन्न की तलाश मे कही जा रहे थे । मार्ग मे सन्त जन मिल गये तो उन्हें अनुनय-विनयकर घर लिवा लाये । ये तो सन्तो के आने से बड़े प्रसन्न हो रहे थे, परंतु इनकी पत्नी घबड़ायी कि इतने सन्तो का सत्कार कैसे होगा ? घर मे तो कुछ अन्न धन ही नही है।

इन्होंने पत्नी से कहा कि- यदि कोई आभूषण हो तो दो, उसे बेचकर संतो की सेवा मे लगा दूँ । इन संतो के आशीर्वाद से ही दुखों की निवृत्ति होगीं । पत्नी के पास केवल एक नथ थी । उसने सोच रखा था कि कुछ दिन में यदि धन की व्यवस्था नही हो पायी तो यह नथ बेच कर अन्न खरीद लेंगे। परंतु वह नथ अब उसने लाकर पति को दे दी । श्री रूपाजी ने उसे ही बेचकर सन्तो की सेवा की । सन्तो के पीछे सबने सीथ-प्रसादी (संतो से विनती कर के मांगा हुआ उनका जूठा अथवा बचा हुआ प्रसाद) पायी । उसी रात को भगवान ने स्वप्न मे कहा कि घरमें अमुक जगह अपार सम्पत्ति गडी पडी है, उसे खोदकर आनन्द पूर्वक सन्त सेवा करो । श्रीरूपाजी ने वह स्थान खोदा तो सचमुच इन्हें बहुत सारा धन प्राप्त हुआ । फिर तो बड़े आनन्द से दिन बीतने लगे ।

२. श्री हरिव्यास देव जी द्वारा गोलोक से पधार कर रूपा जी को मंत्र दीक्षा प्रदान करना

सन्तो के श्रीमुख से श्री हरिव्यास देवाचार्य जी (निम्बार्क सम्प्रदाय के महान संत) की महिमा सुनकर आपने निश्चय किया कि मैं इन्हीं से मन्त्र दीक्षा लूंगा । अपने निश्चय के अनुसार आप अपने गांव से श्रीमथुरा – वृन्दावन के लिये चल पड़े । परंतु संयोग की बात, जब आप मथुरा पहुंचे तो पता चला कि श्री हरिव्यासजी तो नित्य निकुंज मे प्रवेश कर गये (शरीर शांत हो चुका) । इस दु:खद समाचार से आपको बहुत अधिक पीडा हुई । आप मथुरा के विश्रामघाटपर प्राण त्याग का संकल्प कर जा बैठे । अन्त मे निष्ठा की विजय हुई । श्री हरिव्यास देवाचार्य जी ने नित्य धाम (भगवान के धाम) से प्रकट होकर इन्हें दर्शन दिया । मंत्र दीक्षा देकर श्री महावाणी (श्री हरिव्यास देवाचार्य जी द्वारा रचित ग्रंथ) जी के अनुशीलन का आदेश दिया । श्रीगुरुदेव की यह अलौकिक कृपा देखकर आप आनन्द विभोर हो गये । तत्पश्वात् श्रीगुरुके आदेशानुसार आप आजीवन श्री महावाणी जी के मनन चिन्तन में रत रहते हुए श्री श्यामा श्याम की आराधना करते रहे ।

सुंदर कथा १०४ (श्री भक्तमाल – श्री हरेराम बाबा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Hareram Baba ji

श्री जगदगुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज के श्रीमुख से दास ने श्री हरेराम बाबा का चरित्र सुना वह लिख रहा हूँ – संतो की चरण रज मस्तक पर धारण करके और आप सभी भक्तों की चरण वंदना करके, श्री हरेराम बाबा जी का चरित्र लिख रहा हूं। हो सकता है मेरे सुनने में कुछ कम ज्यादा हुआ हो, कोई त्रुटि हो तो क्षमा चाहता हूँ ।

श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्षमण मंदिर में विराजते थे । वहां के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी गिरिराज की परिक्रमा करने नित्य जाते । एक दिन परिक्रमा करते करते आन्योर ग्राम में लुकलुक दाऊजी नामक स्थान के पास कुंज लताओं में उन्हें एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई पड़े । उनके नेत्रों से अविरल जल बह रहा था , उनके सम्पूर्ण शरीर पर ब्रज रज लगी हुई थी और मुख से झाग निकल रहा था । थोड़ी देर पुजारी रामचन्द्रदास जी वही ठहर गए । कुछ देर में उनका शरीर पुनः सामान्य स्तिथि पर आने लगा । वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।

पुजारी जी समझ गए की यह कोई महान सिद्ध संत है । उन्होंने उनका नाम पूछा तो कह दिया की प्रेम से सब उन्हें हरेराम बाबा ही कहते है । पुजारी जी उनको लक्ष्मण मंदिर में , श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले गए । धीरे धीरे दोनों संतो में हरिचर्चा बढ़ने लगी और स्नेह हो गया । श्री हरिराम बाबा भी साथ ही रहने लगे । श्री हरेराम बाबा ने १२ वर्ष केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की । उनके पास ४ लकड़ी के टुकड़े थे जिन्हें वो करताल की तरह उपयोग में लाते थे। उसी को बजा बजा कर महामंत्र का अहर्निश १२ वर्षो तक जप करते करते श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते रहे । जब नींद लगती वही सो जाते, जब नींद खुलती तब पुनः परिक्रमा में लग जाते थे । नित्य वृन्दावन की परिक्रमा और यमुना जल पान , यमुना जी स्नान उनका नियम था । बाद में बाबा श्री सुदामाकुटी मे विराजमान हुए ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री कीताचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kitacharya ji

श्री रामचन्द्र जी द्वारा श्रीकीताजी के कन्या की रक्षा और संत हृदय कीता जी का राजा को क्षमा करना

श्री कीता जी महाराज का जन्म जंगल मे आखेट(शिकार) करनेवाली जाति मे हुआ था, परंतु पूर्वजन्म के संस्कारों से आपकी चित्तवृत्ति अनिमेषरूप से भगवत्स्वरूप मे लगी रहती थी । आप सर्वदा भगवान् श्री राम की कीर्ति का गान किया करते थे । साथ ही आपकी सन्तसेवा मे बडी प्रीति थी, यहां तक कि जब धन नही होता तब आप सन्तसेवा के लिये भगवद्भक्ति विमुख जनों (अधर्मी और नास्तिक) को जंगल मे लूट भी लिया करते थे और उससे सन्त सेवा करते थे । एक बार की बात है, आपके यहां एक सन्तमण्डली आ गयी, परंतु आपके पास धन की कोई स्थायी व्यवस्था तो थी नही, लूटने को कोई नास्तिक भक्ति विमुख भी मिला नही ,अत: आपने अपनी एक युवती कन्या को ही राजाके यहां गिरवी रख दिया और उस प्राप्त धनसे सन्तसेवा की। आपको आशा थी कि बाद मे धन प्राप्त होनेपर कन्या को छुड़ा लूंगा ।

उधर जब राजा की दृष्टि कन्यापर पडी तब उसके मन मे कुस्तित भाव आ गया । कन्या को भी राजा की बुरी नजर का पता चला तो उसने अपने पिता के घर गुप्त रूप से महल की एक दासी की सहायता से संदेश भेजा । बेचारे कीताजी क्या करते, राजसत्तासे टकराने से समस्या का हल नहीं होना था, अन्त मै उन्होने प्रभु श्री रामचन्द्र जी की शरण ली । उधर कन्या ने भी अपनी लज्जा-रक्षा के लिये प्रभुसे प्रार्थना की । भक्त की लज्जा भगवान् की लज्जा होती है, जिस भक्त ने संतो सेवा के लिये अपनी लज्जा दाँवपर रख दी हो, उसकी लज्जा का रक्षण तो उन परम प्रभु को करना ही होता है और उन्होंने किया भी । राजा जब कन्या की ओर वासना के भाव से आगे बढा तो उसको कन्या के स्थानपर भयंकर सिंहिनी दिखायी दी । अब तो उसके प्राणों पर संकट आ गये और काममद समाप्त हो गया ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०३ (श्री भक्तमाल – श्री खड्गसेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Khadgasen ji

पूजय बाबा श्री गणेशदास जी की टीका और गीता प्रेस भक्तमाल से प्रस्तुत चरित्र :

जन्म और रचनाएं –

श्री खड्गसेन जी का जन्म इ. स. १६०३ एवं रचनाकाल सं १६२८ माना जाता है । ये ग्वालियर में निवास करते थे और भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । श्री राधागोविन्द के गुणगनो को वर्णन करने मे श्री खड्गसेन जी की वाणी अति उज्वल थी । आपने व्रज गोपि और ग्वालो के माता -पिताओं के नामों का ठीक ठीक निर्णय किया । इसके अतिरिक्त ‘दानकेलिदीपक ‘आदि काव्यों का निर्माण किया, जिनसे यह मालूम होता है कि आपको साहित्य का प्रचुर ज्ञान था और आपकी बुद्धि प्रखर थी । श्री राधा गोपाल जी, उनकी सखियाँ और उनके सखाओं की लीलाओं को लिखने और गाने मे ही आपने अपना समय व्यतीत किया । कायस्थ वंश मे जन्म लेकर आपने उसका उद्धार किया । आपके हदयमें भक्ति दृढ थी, अत: सांसारिक विषयों की ओर कभी नही देखा।

राजा की भक्त भगवान में श्रद्धा प्रकट होना-

श्री खड्गसेन भानगढ़ के राजा माधोसिंह के दीवान थे । एक दिन इनके यहाँ वृंदावन के एक रसिक सन्त पधारे । उन्होंने इनको श्री हितधर्म (श्री हरिवंश महाप्रभु का सम्प्रदाय सिद्धांत ) का उपदेश दिया । रसिक सन्त से इष्ट और धाम का रहस्य सुनकर इन्होंने श्री राधावल्लभ लाल के चरणों मे अपने को अर्पित कर दिया और वृन्दावन आकर श्रीहिताचार्य महाप्रभु से दीक्षा ले ली । श्री श्रीजी की शरण ग्रहण करते ही गृहस्थी एवं जगत के प्रति इनका दृष्टिकोण एकदम बदल गया । श्रीश्यामा-श्याम का अनुपम रूप-माधुर्य इनके नेत्रों मे झलक उठा एवं दसों दिशाएँ आनंद से पूरित हो गई । ये अधिक से अधिक समय नाम और संतवाणी के गान मे लगाने लगे । इनका यश चारों ओर फैल गया और दूर-दूर से साधु संत आकर इनका सत्संग प्राप्त करने लगे । उनकी सेवा सुश्रुषा मे मुक्त हस्त से धन खर्च करने लगे ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०२ (श्री भक्तमाल – श्री कल्याणदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kalyandas ji

श्री कल्याण दास जी सन्त सेवी सदगृहस्थ थे । आप ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए थे और श्री राघवेन्द्र सरकार आपके इष्टदेव थे । एकबार आपके यहां कन्या का विवाह था । जाति बिरादरी के साथ साथ सन्तो को भी आपने आमंत्रित कर रखा था । जब भोजन का समय हुआ तो आपने संतो की पंगत पहले करा दी । इससे अन्य ब्राह्मण लोग बड़े असन्तुष्ट हुए और कहने लगे कि इन साधुओ की जाति-पाँति का कोई पता नही है, आपने इन्हे कैसे पहले खिला दिया ? इसपर आपने सबको समझाते हुए कहा कि संतों का “अच्युत” गोत्र होता है और ये समस्त विश्व का कल्याण करनेवाले होते है । सन्त धरा धामपर साक्षात् भगवान् श्री हरि के प्रतिनिधि होते है, अत: उनके पहले प्रसाद ग्रहण कर लेने से आप सब को असन्तुष्ट नही होना चाहिये ।

इस प्रकार की इनकी सन्त निष्ठा देखकर अन्य ब्राह्मण भी प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हो गये । आपके यहा सन्त-सेवा चल रही है सुनकर और भी बहुत से आमंत्रित सन्त भी आ पहुंचे । यह देखकर बिरादरी के लोग कहने लगे-अभी आपके घराती और बराती बाकी ही है, अगर आप इन आमंत्रित सन्तो को भोजन करा देंगे तो उनके लिये क्या बचेगा ? इसपर आपने कहा-चिन्ता करने की बात नहीं है, संतो को खिलाने से कम नही पड़ता, सारी पूर्ति रामजी करेंगे । यह कहकर आपने सब संतो को भोजन करा दिया, फिर जब घरातियों-बारातियों को खिलाने की बात आयी तो आपने पंगत मे सब को बैठवा दिया और परोसने वालों से परोसने को कहा । प्रभुकृपा से सभी ने पूर्ण तृप्ति का अनुभव किया और भोजन मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं आयी । रसोइया कहने लगे इतना भोजन तो हमने बनाया ही नही था, फिर भी समाप्त नही हुआ । सन्त-कृपा का ऐसा चमत्कार देखकर सब लोग धन्यधन्य कह उठे ।

श्री कल्याणदास जी संतो और वैष्णव स्वरूप में भी बड़ी श्रद्धा रखते थे ।एक बार की बात है , श्री कल्याण जी अपने भाई के साथ उत्सव-दर्शनार्थ श्रीधाम वृन्दावन को जा रहे थे । मार्ग में आपने देखा कि एक दुष्ट धनी सरावगी एक दिन वैष्णव को कुछ पैसों के लिए डांट-फटकार लगा रहा है , दुख दे रहा है ।यह देखकर आपको बहुत दुख हुआ । आपने न केवल उन वैष्णव महाभाग का सारा कर्जा उतारकर उस दुष्ट सरावगी से मुक्ति दिला दी, बल्कि उन्हें पर्याप्त धन- धान्य देकर सुखी भी कर दिया। ऐसे उदार मन थे श्री कल्याणदास जी ।

सुंदर कथा १०१ (श्री भक्तमाल – श्री महर्षि वशिष्ठ जी ) Sri Bhaktamal – Sri Maharshi Vashisht ji

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ विश्वस्त्रष्टा ब्रह्माजी के मानसपुत्र है । सृष्टि के प्रारम्भ में ही ब्रह्मा के प्राणो से उत्पन्न उन प्रारम्भिक दस मानसपुत्रो मे से वे एक हैं, जिनमें से देवर्षि नारदके अतिरिक्त शेष नौ प्रजापति हुए । 

१. मरीचि, २. अत्रि, ३. अंगिरा ४. पुलस्त्य ५. पुलह ६. क्रतु ७. भृगु ८. वसिष्ठ ९. दक्ष और १०. नारद  – ये ब्रह्मा के दस मानसपुत्र है । 

इनसे पहले- ब्रह्माजी के मनसे – संकल्प से कुमारचतुष्टय १. सनक २. सनन्दन ३. सनातन और ४. सनत्कुमार उत्पन्न हुए थे परंतु इन चारोने प्रजा सृष्टि अस्वीकार कर दी । सदा पांच वर्षकी अवस्थावाले बालक ही रहते हैं । इन चारोकी अस्वीकृति के कारण ब्रह्मा जी को क्रोध आया तो उनके भ्रूमध्य से भगवान् नीललोहित रूद्र (शिव ) उत्पन्न हुए । इस प्रकार सनकादि कुमार तथा शिव वसिष्ठजी के अग्रज हैं । 

भगवान् ब्रह्माने अपने नौ पुत्रो को प्रजापति नियुक्त किया । इन लोगो को प्रजाकी सृष्टि, संवर्घन तथा संरक्षण का दायित्व प्राप्त हुआ । केवल नारदजी नैष्ठिक ब्रह्मचारी बने रहे । इन नौ प्रजापतियो में से प्रथम मरीचि के पुत्र हुए कर्दम जी । कर्दम ने स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहूतिका पाणिग्रहण किया । कर्दम जी की नौ पुत्रियां हुई और पुत्रके रूपमें भगवान् कपिल ने उनके यहां अवतार ग्रहण किया । कर्दम ने अपनी पुत्रियो का विवाह ब्रह्माजी के मानसपुत्र प्रजापतियो से किया । वसिष्ठजी की पत्नी अरुँधती जी महर्षि कर्दम की कन्या हैं ।

पढना जारी रखे

सुंदर कथा १०० (श्री भक्तमाल – श्री नरवाहन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Narvahan ji

बाबा श्री गणेशदास भक्तमाली जी की भक्तमाल टीका , परमभागवत श्री हितदास जी महाराज एवं श्री हित अम्बरीष जी के भाव पर आधारित चरित्र –

भगवान श्री कृष्ण के वंशी के अवतार श्री हितहरिवंश महाप्रभु जी को देवबंद मे स्वयं श्री राधाजी से निज मंत्र और उपासना पद्धति की प्राप्ति हुई । श्री राधा जी ने एक दिन महाप्रभु जी को स्वप्न मे वृन्दावन वास कीआज्ञा प्रदान की । उस समय श्री महाप्रभु जी की आयु ३२ वर्ष की थी । अपने पुत्रों और पत्नी से चलने के लिए पूछा परंतु उनकी रुचि किंचित संसार मे देखी । श्री महाप्रभु जी अकेले ही श्री वृन्दावन की ओर भजन करने के हेतु से चलने लगे । कुछ बाल्यकाल के संगी मित्र थे, उन्होंने कहा कि हमारी भी साथ चलने की इच्छा है – हम आपके बिना नही राह सकते । श्री महाप्रभु जी ने उनको भी साथ ले लिया । रास्ते मे चलते चलते सहारनपुर के निकट चिडथावल नामक एक गांव में विश्राम किया । स्वप्न में श्री राधारानी ने महाप्रभु जी से कहा – यहाँ आत्मदेव नाम के एक ब्राह्मण देवता विराजते है ।

उनके पास श्री राधावल्लभ लाल जी का बड़ा सुंदर श्रीविग्रह है – उस विग्रह को लेकर आपको श्री वृन्दावन पधारना है, परंतु उन ब्राह्मणदेव का प्रण है कि यह श्रीविग्रह वे उसी को प्रदान करेंगे जो उनकी २ कन्याओं से विवाह करेगा । उनकी कन्याओं से विवाह करने की आज्ञा श्री राधा रानी ने महाप्रभु जी को प्रदान की। महाप्रभु जी संसार छोड कर चले थे भजन करने परंतु श्री राधा जी ने विवाह करने की आज्ञा दी । महाप्रभु जी स्वामिनी जी की आज्ञा का कोई विरोध नही किया – वे सीधे आत्मदेव ब्राह्मण का घर ढूंढकर वहां पहुंचे । श्री राधारानी ने आत्मदेव ब्राह्मण को भी स्वप्न मे उनकी कन्याओं का विवाह श्री महाप्रभु जी से सम्पन्न करा देने की आज्ञा दी । आत्मदेव ब्राह्मण के पास यह श्री राधा वल्लभ जी का विग्रह कहा से आया इसपर संतो ने लिखा है –

पढना जारी रखे