सुंदर कथा १२१ (श्री भक्तमाल – श्री राधिका दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Radhika das ji

संत श्री राधिका दास जी की सिद्ध मानसी सेवा –

बिहार के मिथिला क्षेत्र में गंगा के तट पर रहने वाले एक उच्च कोटि के महात्मा हुए है । वे सर्वथा भोगों और संसार से बहुत दूर रहते थे, अत्यंत निःस्वाद भोजन लेते थे, सदा नाम जाप मे लगे रहते थे। वे मानसिक रूप से नित्य श्री गीतगोविन्द का पाठ करते रहते थे । उनके आश्रम के सभी साधको को निःस्वाद भोजन ही मिलता था, स्वप्न में भी मिर्च, मसाला, दही, दूध, मिष्टान्न, अचार का दर्शन नही होता था । उनके वृद्धावस्था की घटना है, एक दिन बाबा लेटे थे और सेवक उनके चरण दबा रहे थे । उसी समय बाबा को खांसी आने लगी, जैसे उन्हें उठा कर बिठाया वैसे खांसी और तेज हो गयी और कुछ गाढ़ी लाल वस्तु और रक्त जैसे लाल छींटे उनके वस्त्रो पर गिरा । सम्पूर्ण कक्ष में दिव्य सुगंध आने लगी । शिष्यों को पहले तो लगा कि रक्त गिरा है परंतु ठीक से देखा तो पता लगा यह तो ताम्बूल (पान) है ।

सभी शिष्य सोचने लगे कि बाबा तो कभी पान खाते नही, सदा निःस्वाद भोजन करते है और चलकर कही जा भी नही सकते पान खाने । सभी सोच मे पड गए कि यह पान आया कहां से और बाबा ने इसको कब खाया ? बाबा तो राधा राधा राधा राधा कहते हुए रो रहे थे, धीरे धीरे वे समाधि से बाहर आये । निकट के शिष्यों ने जब इस पान का रहस्य पूछा तो बाबा ने बताया कि मानसी सेवा के समय हमने श्री प्रिया लाल जी को कुसुम सेज पर पौढा कर ताम्बूल (पान) दिया , उसमे से थोड़ा सा ताम्बूल प्रसाद के रूप में प्रिया लाल जी ने प्रेम पूर्वक मुझे खिलाया दिया । वही दिव्य पान के कण बाबा के मुख से गिरे । पान तो खाया था भाव राज्य (मानसी) मे परंतु वह प्रत्यक्ष प्रकट हो गया।

सुंदर कथा १२० (श्री भक्तमाल – श्री बिहारी दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Bihari das ji

सर्वत्र श्री भगवान के दर्शन और धाम वासियों के प्रति श्रद्धा –

एक रसिक संत हुए श्री बिहारीदास जी । मथुरा की सीमा पर ही भरतपुर वाले रास्ते पर कुटिया बनाकर भजन करते थे। एक दिन पास ही के खेत मे शौच करने चले गए । उस दिन खेत के मालिक को कुछ आवाज आयी तो जाकर बाबा को खूब मुक्के मार कर पीट दिया और शोर करके अपने कुछ सखाओ को भी बुलाया । उन्होंने लंबी लकड़ियां और डंडा लेकर बाबा को पीटना शुरू किया तो बाबा के मुख से बार बार निकलने लगा – हे प्रियतम, हे गोकुलचंद्र, हे गोपीनाथ !! सबने मारना बंद किया, थोड़ी देर मे सुबह हुई तो देखा कि यह कोई चोर नही है , यह तो पास ही भजन करने वाला महात्मा है । आस पास के लोग जमा हुए और उन्होंने पुलिस को बुलाया ।

पुलिस ने आकर बाबा को गाड़ी में डाला और दवाखाने मे भर्ती करवाया । डॉक्टर ने दावा करके पट्टियां बांध दी । इसके बाद पुलिस इंसेक्टर ने पूछा – बता बाबा ! क्या घटना हुई है ? बाबा बोले मै शौच को गया था उसी समय कन्हैया वहां आ गयो ! उसने खूब मुक्के चलाये । वो कन्हैया खुद बहुत बड़ा चोर है फिर भी उसने अपने सखाओ को बुलाकर कहां की खेत मे चोर घुस गया है । सखाओ ने छड़ी और लाठियों से पिटाई करी । बाद में कन्हैया ने पुलिस को बुलवाया और दवाखाने मे भर्ती कराया । फिर वही कन्हैया ने डॉक्टर बनकर इलाज किया और अब वही कन्हैया इंस्पेक्टर बनकर मुझसे पूछता है की तेरे साथ क्या घटना हुई ?

सबने कहां की बाबा तो अटपटी सी बाते करता है, इनको कुछ दिन आराम की आवश्यता है । उसी रात बाबा भाव मे डूबकर हरिनाम कर रहे थे तब उनके सामने नीला प्रकाश प्रकट हुआ और श्रीकृष्ण सहित समस्त सखाओ का दर्शन उनको हुआ । भगवान ने कहा – बाबा ! ब्रज वासियो के प्रति तुम्हारी भक्ति देखकर मै प्रसन्न हूँ । तुमने ब्रजवासियो को दोष नही दिया और सबमे मेरे ही दर्शन किए । भगवान ने अपना हाथ बाबा के शरीर पर फेरकर उन्हें ठीक कर दिया । भगवान ने कहा तुम्हे जो माँगना है मांग लो । बाबा ने संतो का संग और भक्ति का ही वरदान मांगा ।

इस घटना से शिक्षा मिलती है की रसिक संतो की तरह सभी मे श्रीभगवान का ही दर्शन करना है और धाम वासियों को भगवान के अपने जन मानकर उनमे श्रद्धा रखनी चाहिए ।

Content Source : Bhaktamal.com

जब नाम भगवान ने सुदर्शन रूप से भक्त की रक्षा की ।

जब नाम भगवान ने सुदर्शन रूप से भक्त की रक्षा की –

एक संत हुए श्री अनंतकृष्ण बाबा जी । उनके पास एक लड़का सत्संग के लिए आया करता था । प्रभावित होकर दीक्षा के लिए प्रार्थना करने पर बाबा ने कहा कि महामंत्र का ११ लाख जप करके आओ उसके बाद विचार करेंगे । लगभग कुछ महीनों में संख्या पूरी करके वह बाबा के पास पुनः आया । बाबा ने कहा ११ लाख और जप करके आना । अभी ३ – ४ वर्ष ही बीते थे साधक जीवन मे प्रवेश किए हुए । उसके मन मे श्रद्धा की कमी हो गयी । वह एक दिन कही जा रहा था तो एक तांत्रिक को कुछ सिद्धियों का प्रदर्शन करते हुए देखा । तांत्रिक ने उससे अपने बारे मे पूछा, उसने अपनी उपासना के बारे मे बताया ।

तांत्रिक ने पूछा कि तुम इतने वर्षों से इतनी संख्या में जप करते हो – साधन करते हो उससे तुम्हे कुछ अनुभूति हुई ? उस लड़के ने कहा अनुभूति तो हुई नही । तांत्रिक ने कहा की देखो तुम आदि जवान हो, हमारी तरह प्रेत सिद्ध कर लो – तुम्हारे सब काम प्रेत कर दिया करेगा, मै भी प्रेतों से सब काम करवाता हूं और मौज करता हूँ । यह शीघ्र ही थोडे मंत्रो के जप से सिद्ध हो जाता है । उसमें तांत्रिक से साधन की विधि जानी । उसने विधि से तंत्रिक मंत्रो का जाप किया पर कुछ हुआ नही । उसने तांत्रिक से कहा की मुझे तो कोई प्रेत सिद्ध हुआ नही । तांत्रिक ने कहा पुनः प्रयास करो । इस बार भी प्रेत प्रकट नही हुआ । तांत्रिक ने प्रेत को बुलाकर पूछा कि तुम इसके सामने क्यों नही प्रकट होते ?

उस प्रेत ने कहा मै तो जैसे ही इसके थोड़े निकट जाता हूँ, इसके पीछे एक चक्र प्रकट हो जाता है । मै महान बलवान होनेपर भी उस चक्र के तेज के सामने टिक नही सकता । अवश्य ही कोई शक्ति इसकी रक्षा करती है । इस घटना के कुछ समय बाद उसको बाबा की याद आयी । जब वह बाबा के पास आया तो बाबा बोले – बच्चा ! तेरा पतन होने से साक्षात नाम भगवान ने सुदर्शन रूप से तुझे बचा लिया । नाम भगवान यदि तुझे नही बचते तो हजारो वर्षो तक तू भी प्रेत योनि में कष्ट पाता फिरता । नाम का प्रभाव प्रकट रूप से न दिखे तब भी नाम का प्रभाव होता ही है । नाम जपने वाले कि रक्षा भगवान सदा करते है ।

इस प्रसंग से शिक्षा मिलती है की वैष्णवो को कभी भी तंत्र भूत सिद्धियों के चक्कर मे नही पड़ना चाहिए ।

सुंदर कथा ११९ (श्री भक्तमाल – श्री दयाल दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Dayaal das ji

१. श्री रामजी द्वारा पर्वत शिला उठाकर छाया देने वाली गुफा के रूप में स्थापित करना –

श्री रामस्नेही सम्प्रदाय के एक संत हुए श्री दयालदास जी महाराज । अहर्निश श्री राम नाप का जाप करते हुए वे राजस्थान के खेड़ापा क्षेत्र में विराजते थे । अपने गुरुदेव से आज्ञा लेकर वे तपस्या करने एक पहाड़ पर आसन लगाकर बैठ गए । उस क्षेत्र मे जल बहुत कम है और सूखा होने के कारण उस पहाड़ पर वृक्ष भी नही थे । तपस्या करते करते बहुत समय बीता । एक दिन तेज गर्मी पड रही थी , प्रभु रामचंद्र जी को बडी दया आयी । रामजी ने एक पहाड़ का बड़ा हिस्सा उठाकर ऐसे रख दिया कि दयालदास जी के शरीर पर छाया हो गयी । खुले पहाड़ के ऊपर रखी हुई वह पत्थर की शिला ऐसी। रखी कि वह गुफा जैसे दिखाई देने लगी । आज भी प्रभु राम द्वारा रखी उस शिला के दर्शन होते है । बहुत काल बाद जब शरीर का होश हुआ तो बड़ी विशाल शिला देखर आश्चर्य मे पड गए । प्रभु की कृपा का अनुभव करके पुनः नाम मे लीन हो गए ।

२. इंद्र द्वारा कामदेव और अप्सरा को भेजना –

श्री दयालदास जी महाराज तपस्या मे ऐसे लग गए कि इंद्र को भय हो गया । इंद्र ने सोचा ये संत कलयुग मे इतनी कठोर साधना क्यों कर रहे है ? कही इन्हें इन्द्रपद की कामना तो नही है ? उसने बहुत प्रयास किये , सिद्धियां दयालदास जी के सामने प्रकट होकर बोली – हमे स्वीकार करो । जिन सिद्धियों के लिए साधक बड़े बड़े प्रयास करते है उन सिद्धियों की ओर इन्होंने ध्यान तक नही दिया । अंत मे इंद्र ने कामदेव और स्वर्ग की एक अप्सरा को इनकी तपस्या मे विघ्न डालने भेजा । कामदेव ने अपना सम्पूर्ण बल लगाकर इनके मन मे काम उत्पन्न करने का प्रयास किया । कामदेव ने सुंदर सुगंध, भोजन पदार्थ, पुष्प लताएं सभी वस्तुओं को प्रकट किया ।

अप्सरा ने भी अपने रूप और नृत्य के द्वारा इनको आकर्षित करना चाहा । चार दिन तक उसने अपनी सम्पूर्ण कलाओं से इनको मोहित करने का प्रयास किया । उसने ऐसा नृत्या किया की उसके चरण चिन्ह भूमि पर बन गए पर दयालदास जी रामनाम मे ऐसे डूबे रहे की अप्सरा की ओर देखा तक नही । अब अप्सरा को भारी अपमान का अनुभाव हुआ । अंत मे क्रोध में भरकर बोली कि अरे ! कैसा महात्मा है ? मैने चार दिन नृत्य किया और इतना परिश्रम करके उत्तम से उत्तम श्रृंगार किया । कलयुग मे तो साधारण मल मूत्र के स्त्री पुरुष से जीव का पतन हो जाता है । मेरा अति कोमल सुंदर दिव्य शरीर है ।

आकृष्ट होते या न होते , पर एक बार मेरी ओर देख तो लेते । वापस देवराज इंद्र को जाकर क्या उत्तर दूंगी ? । एक पृथ्वी के मनुष्य को मोहित नही कर सकी । मै श्राप देती हूं की तुम्हारी नेत्र ज्योति चली जाए और तुम्हारे नेत्रो मे भयंकर वेदना हो । श्री दयालदास जी परम संत थे, चाहते तो अपने तपस्या के बल से अप्सरा को भस्म कर सकते पर इन्होंने अप्सरा पर क्रोध नही किया । श्राप को स्वीकार कर लिया । जब इनके नेत्रो मे बहुत वेदना होने लगी तब अपने गुरुदेव श्री रामदास जी को जाकर सारी घटना सुनाई ।

३. श्री रामजी की कृपा से नेत्रज्योति की प्राप्ति –

श्री गुरुदेव जी ने कहा – श्री राम जी ने सदा अपने भक्तों पर कृपा की है , उन्ही प्रभु को भक्तों की याद दिला दिलाकर करुणा भरे स्वर मे पुकारो । प्रभु स्वयं तुम्हारी इस पीड़ा को दूर करेंगे । श्री दयालदास जी महाराज ने ५२ भक्तो का समरण करके प्रभु को सुनाया । उनके द्वारा रचे इसी ग्रंथ का नाम श्री करुणासागर है । ग्रंथ पूर्ण होनेपर श्री राम जी बालरूप मे इनकी गोद मे आकर बैठ गए । इनके नेत्रो पर अपने हाथ फेरते हुए बोले – मै आपकी गोद मे बैठा हूं, मुझे देखो । रामजी के ऐसा कहते ही श्री दयालदास जी की नेत्र ज्योति पुनः प्रकट हो गयी ।

४. इंद्र ने प्रकट होकर माला गुंथी –

एक दिन भजन करते करते श्री दयालदास जी महाराज की माला का धागा टूट गया । उनके पास सुई धागा नही था । मोटा धागा आदि ढूंढने जाएंगे तो भजन का समय व्यर्थ चला जायेगा । यह देखकर देवराज इंद्र उनके पास मोटा धागा और सुई लेकर प्रकट हुए । देवराज इंद्र ने स्वयं अपने हाथ से उनकी तुलसी माला गुंथी । उस माला के आज भी दर्शन होते है ।

श्री खेड़ापा वाले सरकार जी और हमारे श्री राजेंद्रदास बाबा इन संतो की कृपा से जैसा सुना और मुझे स्मरण रहा वैसे लिखने का प्रयास किया । भूल चूक के लिए दास को क्षमा करें ।

Image Credits – Sri Ramdham Kherapa

सुंदर कथा ११८ (श्री भक्तमाल – श्री गौरांग दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Gaurang das ji

सखीरूप से मानसी सेवा और श्री कृष्ण का रसगुल्ला –

ब्रज के परम रसिक संत बाबा श्री गौरांग दास जी को एकबार भगवान ने स्वप्न दिया कि मेरा एक विग्रह गिरिराज जी मे अमुक स्थान पर है, उसको निकालकर नित्य सेवा करो। बाबा बड़ी प्रेम से ठाकुर जी की सेवा करते । ठाकुर जी रोज बाबा से कुछ न कुछ मांगने लगे की आज मुकुट चाहिए, आज बंशी चाहिए, आज मखान चाहिए , आज बढ़िया पोशाख चाहिए । बाबा ने कहा – मै तो एक लंगोटी वाला बाबा, बिना धन के यह सब चीजे कहां से लाऊंगा? बाबा चलकर संत श्री जगदीश दास जी के पास गए और सारी बात बतायी । उन्होंने कहा – अपनी असमर्थता व्यक्त कर दो और मानसी मे ठाकुर जी की सारी मांगे पूरी कर दिया करो । अब बाबा नित्य मानसी सेवा करने लगे । एक दिन स्नान कर के भजन करने बैठे और जब उठे तो शिष्यों ने देखा कि उनके कमर और लंगोट पर शक्कर की चाशनी (शक्कर पाक) लगी थी।

शिष्यों ने पूछा – बाबा ये चाशनी कैसे लग गयी ? आप तो स्नान करके भजन करने बैठे थे । बाबा ने अपनी मानसी सेवा को गुप्त रखना चाहा और कहा – कुछ नही हुआ, कुछ नही हुआ । जब शिष्यों ने आग्रह करके पूछा तब बताया कि आज मानसी सेवा में मैने सोचा की शरीर से तो मै बंगाली हूं, रसगुल्ला अच्छे बना लूंगा और श्री प्रिया लाल जी को बडे सुंदर रसगुल्ला बनाकर खिलाऊंगा । मोटे मोटे रसगुल्ला बनाकर मैने श्री गुरु सखी के हाथ मे दिए और उन्होंने श्री राधा कृष्ण को दिए । राधारानी तो ठीक तरह से तोड तोड कर रसगुल्ला खाने लगी परंतु नटखट ठाकुर जी ने तो बडा सा रसगुल्ला एक बार मे ही मुख में डाल दिया और जैसे ही मुख में दबाया तो बगल मे सखी रूप मे मै ही खड़ा था । ठाकुर जी के उस रसगुल्ले का रस उड़कर मेरे शरीर पर लग गया ।

Image credits : Sri Radhakund Blog

सुंदर कथा ११७ (श्री भक्तमाल – श्री हरिवंश देवाचार्य जी) Sri Bhaktamal – Sri Harivansh Devacharya ji

जब रसिक संत की कृपा से एक भूत को भी हुई दिव्य वृंदावन की प्राप्ति –

श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है श्री हरिवंश देवाचार्य जी महाराज । एक बार वे युगल नाम का जप करते करते भरतपुर से गोवर्धन जा रहे थे ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

बीच के एक गांव मे उन्होंने देखा की एक युवक को कुछ लोग चप्पल जूतों से पीट रहे है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने उन लोगो से पूछा की इस युवक को चप्पलों से क्यो पीटा जा रहा है ? लोगो ने बताया की इसपर प्रेत चढ़ गया है और हम इसको लेकर गांव की सीमा पर रहने वाले एक अघोरी के पास लेकर प्रेत उतरवाने जा रहे है । अघोरी अपने उपास्य देवता को मांस और शराब का भोग लगता है और तंत्र क्रिया से भूत को उतरवा देता है । संत ने कहा – क्या मै इस युवक पर चढ़ा हुआ भूत उतार दूं ? लोगो ने कहां – इस गांव मे महीने मे एक दो बार किसी न किसको भूत पकड़ लेता है । आप तो आज इसका भूत उतारकर चले जाओगे पर कहीं उस अघोरी को इस बात का पता चल गया तो फिर वह नाराज हो जाएगा और किसीका भूत नही उतरवायेगा ।

संत ने कहा देखो इस युवक की अवस्था तो बहुत दयनीय हो गयी है यदि अभी इसका भूत नही उतारा तो यह मर भी सकता है, तुम उस अघोरी को मत बताना पर इसका भूत मुझे उतारने दो । लोगो ने कहां चलो ठीक है आप ही इसका भूत उतरवा दो । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने अपना सीधा हाथ उसके मस्तक से लगाकर कहां की यदि मैने श्री वृंदावन की उपासना सच्चे हृदय से की है । यदि मेरी इस उपासना की कथनी और करनी मे कोई अंतर नही है तो यह भूत इसको तत्काल छोड़ दे । वह भूत उसी क्षण सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा – संत जी आप मुझपर कृपा करें, मुझे इस योनि मे बहुत कष्ट होता है । आपके इस युवक को स्पर्श करने के कारण और आपके दर्शन से मेरी पीड़ा शांत हो गयी है । श्री हरिवंश देवाचार्य जी ने पूछा – तुम यहाँ के लोगो को क्यों बार बार पकड़ते हो ?

भूत ने कहा – अघोरी के मन मे मांस और शराब पाने की लालसा होती है । वह अघोरी लोगो को मांस और शराब के बारे मे अच्छी बातें बताकर उन्हे खिला पिला देता है । ऐसे आहार से उन लोगो का शरीर अपवित्र हो जाता है और मै उनको बहुत ही सरलता से पकड़ लेता हूं । इस तरह वह अघोरी मुझसे काम करवाता है । बहुत पाप करने के कारण मै इस योनि मे पड गया हूं पर जब मै जीवित था उस समय एक बार मैने संतो से श्रीवृंदावन की महिमा सुनी थी । आप मुझपर कृपा करो । संत ने पूछा – कैसे कृपा करूँ ?

भूत बोला – आप जैसे रसिक संत की चरण रज ही वृंदावन की प्राप्ति करवा सकती है, आप कृपा करके अपने दाहिने चरण की रज प्रदान करो । संत ने जैसे ही सुना की यह भूत वृंदावन प्राप्त करने की इच्छा रखता है , वे प्रसन्न हो गए । पास खड़े लोगो ने हंसते हुए भूत से कहां – अरे तुम तो बड़े मूर्ख मालूम पड़ते हो । यहां नीचे झुककर स्वयं ही अपने हाथ से रज प्राप्त कर लो । इसपर भूत ने अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही । भूत ने कहा – दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी ।

अभिमानी कभी संत के सामने झुकता नही और पापी व्यक्ति तो संत की किसी वस्तु का स्पर्श तक नही कर सकता । यदि संत अपनी ओर से कृपा करके उनकी चरण रज लेने की आज्ञा दे तब ही पापी को रज प्राप्त हो सकती है । यदि संत अनुमति देकर अपनी चरण रज लेने की आज्ञा देंगे तभी मै उसको स्पर्श कर सकूंगा । इस बात को सुनकर श्री हरिवंश देवाचार्य जी का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने अपना चरण उठाकर कहां – इस पदरज को लेकर अपने मस्तक से लगा । भूत ने जैसे ही उनकी पदरज अपने मस्तक से लगायी वैसे ही उसने दिव्य शरीर धारण कर लिया और उसने संत को प्रणाम करके कहां की आपकी कृपा से मै श्रीवृंदावन को जा रहा हूँ ।

इस घटना मे भूत के द्वारा २ महत्वपूर्ण बातें बताई गई थी –
१. अपवित्र अवस्था मे रहने वाले और अपवित्र वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्तियों को भूत प्रेत सरलता से पकड़ सकते है।
२. दो प्रकार के व्यक्तियों को संतो की चरण रज प्राप्त नही हो सकती , एक अभिमानी और दूसरा पापी । संत की अनुमति के बिना पापी व्यक्ति संत की किसी भी वस्तु का स्पर्श तक नह कर सकता ।

राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे ।
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे ।।

वृंदावन के एक रसिक संत के द्वारा मुझ दास को सुनाया गया प्रसंग मैने लिखने का प्रयास किया है । भूल चूक क्षमा करें ।

Image Credits : Shri Nimbarkacharya Peeth Page

सुंदर कथा ११६ (श्री भक्तमाल – श्री बिहारिन दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Biharin das ji

रसिकाचार्यो की मानसी सेवा –

श्री बिहारिन देव जी महाराज वृंदावन के हरिदासी सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है । श्री विट्ठल विपुल देव जी से विरक्त वेश प्राप्त करके भजन मे लग गए । श्री गुरुदेव के निकुंज पधारने के बाद बांकेबिहारी लाल जी की सेवा का भार बिहारिन देव के ऊपर था । एक दिन बिहारिन देव जी प्रातः जल्दी उठकर श्रीयमुना जी मे स्नान करने गए और उनका मन श्री बिहारी जी की किसी लीला के चिंतन मे लग गया । उनकी समाधि लग गयी और वे मानसी भाव राज्य मे ही अपनी नित्य सेवा करने लगे ।

प्रातः काल भक्त लोग और नित्य दर्शन को आने वाले ब्रजवासी मंगला आरती हेतु आये । बहुत देर तक पट नही खुले तो वहां के सेवको से पूछा – क्या आज प्यारे को जगाया नही गया? अभी तक मंगला आरती क्यो नही हुई? सेवको ने कहा की पट तो तभी खुलेंगे जब श्री बिहारिन देव जी यमुना स्नान से लौटेंगे क्योंकि ताले की चाबी उन्ही के पास है और सेवा भी वही करते है । बिहारिन देव जी की मानसी सेवा से समाधि खुली शाम ५ बजे और वे स्थान पर वापास आये ।

वैष्णवो और ब्रजवासियों ने पूछा – बाबा! कहां रह गए थे? आज बिहारी जी को नही जगाया , भोग नही लगाया , सुबह से कोई अता पता नही । बिहारिन देव जी बोले – बिहारी जी ने तो आज बहुत बढ़िया भोग आरोगा है । रसगुल्ला, दाल, फुल्का, पकौड़ी, कचौरियां, जलेबी खाकर बिहारी जी प्रसन्न हो गए । आज मैने ठाकुर जी को सुंदर गुलाबी रंग की पोशाख पहनायी है और केवड़ा इत्र लगाया है । सारा गर्भ गृह केवड़े की सुंदर सुगंध से महक रहा है ।

ब्रजवासी बोले – बाबा हम सुबह से यही बैठे है । ताला खोलकर तुम कब आये और कब बिहारी जी का श्रृंगार करके भोग धराया ? कैसी अटपटी बाते करते हो , क्यो असत्य बात करते हो? बाबा कोई नशा कर लिया है क्या ?

बाबा बोले –

कोऊ मदमाते भांग के , कोऊ अमल अफीम ।
श्री बिहारीदास रसमाधुरी, मत्त मुदित तोफीम ।।

कोई भांग के नशे मे मस्त रहता है तो कोई अफीम के परंतु बिहारीदास तो बिहारिणी बिहारी जी के रस माधुरी के नशे मे मस्त रहता है ।

बिहारिन दास जी ने आगे जाकर पट खोले तो सबने देखा की बिहारी जी ने सुंदर गुलाबी पोशाख पहनी है, गर्भगृह से केवड़े का इत्र महक रहा है और बगल मे भोग सामग्री भी वही रखी है जो बाबा ने बताई थी । सब समझ गए की बिहारिन दास जी सिद्ध रसिक संत है और इनको मानसी सेवा सिद्ध हो चुकी है ।

सुंदर कथा ११५ (श्री भक्तमाल – श्री गणेशदास जी) Sri Bhaktamal – Sri Ganeshdas ji

बाबा श्री गमेशदास भक्तमाली जी पर स्वयं श्री रामराजा सरकार की कृपा –

बाबा श्री गणेशदास भक्तमाली जी जब अपने विद्यार्थी जीवन की समाप्ति के बाद साधना के पथ पर निकले तो कुछ दिन विंध्याचल रहे, फिर चित्रकूट रहे और आगे चलते चलते जंगलों के रास्ते से ओरछा की तरफ बढ़े । जाते जाते रास्ता भटक गए , तीन दिन बाद जैसे तैसे ओरछा पहुंचे । तीन दिन से भूखे थे, इतनी भूख लगी कि वहां बेतवा नदी के तट पर बैठे बैठे थोड़ी मिट्टी खाकर जल पी लिया और वही सो गए । अगले दिन उठे तो सोचने लगे की आज तो एकादशी है, आज भी जल पीकर ही भजन करेंगे । भगवान के नाम का जाप करने बैठे उतने मे ही एक वैष्णव वहां आये और कहां की ब्रह्मचारी जी प्रणाम ! मै पंडित रामराजा ! यही ओरछा का रहने वाला हूं । आप भूख से पीड़ित लहते है । मेरे घर मे बहुत पवित्रता है अतः आप मेरे घर एकादशी का फलाहार करने पधारें । ब्रह्मचारी महाराज उनके साथ उनके घर गए और भगवान का प्रसाद पाकर वापस बेतवा नदी के तट पर आकर भजन करने लगे ।

अगले दिन द्वादशी के दिन पंडित राजाराम जी पुनः वहां आये और बोले – आज द्वादशी है ! शास्त्र कहता है की द्वादशी का पारायण करने से ही पुण्य मिलता है अतः आप प्रसाद पाने मेरे घर पधारें । कुछ दिन वही नदी किनारे रहकर भजन किया । एक दिन ब्रह्मचारी जी के मन आया कि चलो उन राजाराम पंडित से मिलकर आये और ओरछा मे निवास करने का कोई स्थान पूछा जाए । पूरे ओरछा मे घूम घूम कर पंडित राजाराम के घर का पता पूछा पर कुछ पता नही लगा, संध्याकाल होनेपर श्री रामराजा सरकार के मंदिर गए और वहां के पुजारी जी से पूछा – बाबा! आप की उम्र बहुत हो गयी यहां रहते रहते ।कृपया यह बताएं कि ओरछा मे कोई पंडित रामराजा निवास करते है क्या? पूरा ओरछा ढूंढ लिया पर पंडित रामराजा का कुछ पता नही लगा ।

पुजारी जी ने नेत्रों से अश्रु बहने लगे , उन्होंने कहा – वो कोई पंडित राजाराम नही थे, वे स्वयं रामराजा सरकार थे जिन्होंने आपको प्रसाद पवाया । मुझे श्री रामराजा सरकार ने स्वप्न दर्शन देकर कहा कि मेरा प्रिया भक्त काशी से ओरछा आएगा । आप उसके भोजन और निवास का इंतजाम मंदिर में ही कर दीजिए । कुछ महीने वही रहकर फिर श्री वृंदावन को आये ।


सुंदर कथा ११४ (श्री भक्तमाल – श्री दादू दीनदयाल जी) Sri Bhaktamal – Dadu Deendayal ji

संतो का हृदय कैसा होता है –संत दादू दयाल जी भिक्षा मांगने जिस रास्ते से निकलते वहां बीच मे एक ऐसा घर पड़ता था जहां रहने वाला व्यक्ति दयाल जी की भरपूर निंदा करता था । उनको देखते ही कहता था – बडा संत बना फिरता है, बड़ा ज्ञानी बना फिरता है । कई प्रकार के दोष गिनाता और अंदर चला जाता । कई बार जब वह निंदक नजर नही आता तब भी दयाल जी उसके मकान के सामने कुछ देर प्रतीक्षा करते और आगे बढ़ जाते । कुछ दिन वह निंदक नही दिखाई पड़ा तो दयाल जी ने आसपास पूछा । पूछने पर पता लगा की उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है । इस बात से दयाल जी अत्यंत दुखी होकर जोर जोर से रोने लगे । शिष्य ने पूछा – गुरुदेव ! आप क्यों रोते हो? दयाल जी ने कारण बताने पर शिष्य बोला – वह तो आपका निंदक था , वह मर गया तो आप को प्रसन्न होना चाहिए परंतु आप तो रो रहे है – ऐसा क्यों ? दयाल जी बोले – वह मेरी निंदा करके मुझे सदा स्मरण करवाता रहता की मै कोई संत महात्मा नही हूँ, मै कोई ज्ञानी नही हूं, वह मुझे स्मरण करता रहता था की यह संसार कांटो से भरा है । वह मुझे ज्ञान और त्याग का अहंकार नही होने देता था । यह सब उसने मेरे लिए किया वह भी मुफ्त मे । वह बडा नेक इंसान था, अब उसके जाने पर मेरे मन का मैल कौन धोएगा ?इतना ही नही , इसके कुछ दिन बाद वह व्यक्ति दिव्य शरीर धारण करके दयाल जी के सामने प्रकट हुआ । उससे दयाल जी ने पूछा की तुम्हारी तो कुछ समय पहले मृत्यु हो चुकी थी ? उस व्यक्ति ने कहां – आप जैसे परम संत की निंदा करने के पाप से मैं प्रेत योनि मे चला गया था और कुछ दिनों से कष्ट पा रहा था परंतु कुछ दिनों के बाद मेरी मृत्यु की घटना सुनते ही आपने मेरा स्मरण किया और प्रभु से मेरे उद्धार की प्रार्थना भी की । मुझ जैसे निंदक पर भी आप जैसे महात्मा कृपा करते है । आप जैसे परम नामजापक संत के संकल्प से मै प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक को जा रहा हूँ ।

There was a notorious person who used to say bad words(Ninda/burai) to saint Dadu Dayal jee. Everyday as soon as dadu deendayal would start roaming for daily alms and prachar, this wicked person would come and abuse saint dadu deendayal. This continued for long period of time. One day dadu deendayal started crying when he did not see that wicked person. The disciples asked – Gurudev what happened ? Why are you crying ? Dadu deendayal said – My nindak is no more. He used to clean my soul and mind everyday. He used to show me my faults and constantly reminded me that i am not perfect. He did all this for me , and that too for free. He was a great person. I will become dirty now, who will clean me everyday ?सुना कि निंदक मर गया , तो दादू दीना रोए ।।

सुंदर कथा ११३ (श्री भक्तमाल – श्री रामकृष्ण दास जी) Sri Bhaktamal – Ramkrishna Das ji

संतो के श्रीमुख से निकला वाक्य सत्य ही होता है -श्री गिरिराज गोवर्धन जी की तरहठी में एक सिद्ध गौड़ीय वैष्णव संत रहते थे श्री रामकृष्ण दास जी जिनको सभी श्री पंडित बाबा के नाम से जानते थे । एक ब्रजवासन स्त्री संत बाबा की सेवा करने रोज आती और उनको फल आदि दे जाती । बाबा किसी को कभी अपना शिष्य नहीं बनाते थे । एक बार वह भोली ब्रजवासन स्त्री बाबा के पास आकर बोली – बाबा ! मुझे कौनसा मंत्र जपना चाहिए ? बाबा ने पूछा – बेटी कौनसे कुल से हो ? कौनसे संप्रदाय से हो ?उस स्त्री ने उत्तर दिया की बाबा मै तो वल्लभ कुल की हूँ। बाबा बोले – बेटी वल्लभ कुल में तो एक ही मंत्र जपा जाता है अष्टाक्षर मंत्र – श्री कृष्णः शरणम् मम , तुम भी यही जपा करो । ब्रजवासन स्त्री बोली – बाबा ! यह नाम ( कृष्ण ) मेरे मुन्ना (बेटे) के चाचा अर्थात मेरे जेठ जी का है , मै नहीं जप सकती । मुझे लाज आती है । बाबा बोले – अच्छा फिर क्या जप सकती हो ?उनको क्या कहकर पुकारती हो ? स्त्री ने कहा – हम तो मुन्ना के चाचा ही कहते है उनको । बाबा बोले – तो तुम “मुन्ना के चाचा शरणम मम ” जपो परंतु रूप ध्यान और मन से स्मरण भगवान् श्रीकृष्ण का ही रखना । फिर बाबा बोले – अच्छा और क्या पूछना चाहती है बता ? स्त्री बोली – बाबा मेरे मन में एक इच्छा है की भगवान् मुझे बड़ी एकादशी के दिन ही अपने धाम लेकर जाए ।बाबा मुस्कुराये और बोले ठीक है ऐसा ही होगा । तू यह बताया हुआ नाम जप और अंदर से भाव स्मरण भगवान् का ही रखना । बाबा के शरीर छोडने के बाद जब वह स्त्री भी बूढी हो गयी और कुछ ही समय बाद जब बड़ी एकादशी आयी तो एकाएक एक नीला तेज प्रकट हुआ ,भगवान स्वयं उसे लेने आये और कहा की चल मेरे साथ, मै तुझे ले जाने आया हूँ । भगवान् ने याद दिलाया की तूने पंडित बाबा से इच्छा कही थी की इसी दिन भगवान् मुझे अपने धाम ले जाए । आज मै बाबा की वाणी सत्य करने आया हूं । मंत्र तो अजब गजब का था पर संत के मुख से निकल था ,इसी मंत्र का स्मरण करती हुई वह स्त्री श्री भगवान् के साथ गोलोक धाम को चली गयी ।