सुंदर कथा ९२ (श्री भक्तमाल – श्री कृष्णदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Krishnadas ji

श्री गोवर्धनधारी भगवान् श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर श्री कृष्णदास को अपने नाम मे हिस्सा दिया । श्री कृष्ण दासजी श्री गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा दिये गये भजन भाव के समुद्र एवं समस्त शुभ गुणों की खानि थे । आपके द्वारा रची गयी कविताएं बडी ही अनोखी एवं काव्यदोष से रहित होती थी । आप ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवायें बड़े चतुर थे । श्री गिरिधर गोपाल जी के मंगलमय सुयश से विभूषित आपकी वाणी की विद्वान जन भी सराहना करते थे । आप श्री व्रज की रज ( धूल ) को अपना परम आराध्य मानते थे । चित्त मे उसी को सर्वस्व मानकर शरीर मे एवं सिर-माथेपर धारण करते थे तथा चित्त मे चिन्तन भी करते थे । आप सदा – सर्वदा श्री हरिदासवर्य श्री गोवर्धन जी के समीप बने रहते थे एवं सदा बड़े-बड़े सन्तो के सानिध्य मे रहते थे । आपने श्री राधा-माधव युगल की सेवा का दृढ व्रत ले रखा था ।

१. जलेबियों का भोग
श्री कृष्णदास जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे । महाप्रभु ने ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवा का सम्पूर्ण भार इन्हे सौपा था । एक बार आप श्री ठाकुरजी के सेवाकार्य के लिये दिल्ली गये हुए थे । वहाँ बाजार मे कडाही से निकलती हुई गरमागरम जलेबियों को देखकर , जैसे ही उसकी सुवास अंदर गयी वैसे ही आपने सोचा कि यदि इस जलेबी को हमारे श्रीनाथ जी पाते , तो उन्हें कैसा अद्भुत आनंद आता । उस बाजार में खड़े खड़े मानसी-सेवा मे (मन ही मन) ही कृष्णदास जी उन जलेबियों को स्वर्ण थाल में रखकर श्री श्रीनाथजी को भोग लगाया, भाववश्य भगवान ने उसे स्वीकार कर लिया ।
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सुंदर कथा ९१ (श्री भक्तमाल – श्री गोस्वामी विट्ठालेशसुत जी ) Sri Bhaktamal – Sri Goswami Vitthaleshsut ji

गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के पुत्रों को सर्वभूत सुहृद साक्षात श्री गिवर्धनधारी श्रीकृष्ण जानकर उनका ध्यान करना चाहिए । उनके नाम है –

१. श्री गिरिधर जी, जो बड़े रसिक एवं अत्यंत सुंदर शील स्वभाव वाले थे । २. श्री गोविन्दजी का स्वभाव भी वैसा ही था। ३. श्री बालकृष्णजी महायशस्वी हुए । ४. श्री गोकुलदास जी बडे धीर महापुरुष हुए । ५. श्री रघुनाथ जी महाराज एवं ६. श्री यदुनाथ जी महाराज अपने समगुणों से भजने योग्य हुए । ७. श्री घनश्याम जी सदा-सर्वदा प्रभुप्रेम मे पगे रहते थे, बड़े अनुरागी थे, हृदय मे हमेशा प्रभुक्री स्मृति सँजोये रहते थे । इनका भजन करना चाहिए ये सातों प्रत्यक्ष भगवादविभूति  थे, भगवद्भजन मे परम प्रवीण एवं समर्थ थे तथा श्री कृष्ण की ही भाँति ये भी संसार का उद्धार करनेवाले थे । भक्तमाल में श्री नाभादास जी स्पष्ट कहते है कि इन सातों महापुरुषों का यशोगान करना चाहिये , नित्य स्मरण करना चाहिए ।

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सुंदर कथा ९० (श्री भक्तमाल – श्री श्वपच वाल्मीकि जी ) Sri Bhaktamal – Sri Shwapach Valmiki ji

श्वपच वाल्मीकि नामक एक भगवान् के बड़े भारी भक्त थे, वे अपनी भक्ति को गुप्त ही रखते थे। एक बार की बात है, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमेंइतने ऋषि-महर्षि पधारे कि सम्पूर्ण यज्ञ स्थल भर गया भगवान् श्रीकृष्ण ने वहां एक शंख स्थापित किया और कहा कि यज्ञ के सांगोपांग पूर्ण हो जाने पर यह शंख बिना बजाये ही बजेगा। यदि नहीं बजे तो समझिये कि यज्ञ में अभी कुछ त्रुटि है, यज्ञ पूरा नही हुआ। वही बात हुई। पूर्णाहुति, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणादि सभी कर्म विधिसमेत सम्पन्न हो गये, परंतु वह शंख नहीं बजा। तब सबको बड़ी चिन्ता हुई कि इतने श्रम के बाद भी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। सभी लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कहा कि प्रभो ! आप कृपा करके बताइये कि यज्ञ में कौन-सी कमी रह गयी है। भगवान् श्री कृष्ण बोले-शंख न बजने का रहस्य सुनिये – पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८९ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्णसिंह जी ) Sri Bhaktamal – Sri Purna singh ji

श्री पूर्णसिंह जी परम सदाचारी , वीर एवं महान भगवद्भक्त थे । श्री कृष्ण प्रभु इनके इष्टदेव थे । ये आमेर नरेश श्री पृथ्वीराज जी के पुत्र थे । उनकी माता का नाम पदारथ देवी था । कविहृदय, परम भागवत श्री पूर्णसिंह जी नित्य नूतन सुंदर सुंदर पद रचकर अपने श्री ठाकुर जी को सुनाते । श्री ठाकुर जी को भी इनके पदों को सुनने मे बडा सुख मिलता । यदि कभी किसी कार्यविशेष की व्यस्तता में श्री पूर्णसिंह जी पद नही सुना पाते तो श्री ठाकुर जी स्वप्न मे इनसे पद सुनाने का अनुरोध करते । ऐसे दीवाने हो गए थे ठाकुर जी इनके पदों के ।  एक दो बार इस प्रक्रार का प्रसंग प्राप्त होनेपर इन्होंने दृढ नियम बना लिया की अब मै हर दिन भगवान को पद सुनाऊँगा  । बहुत समय तक नियम अक्षुष्ण रूप से चलता रहा । परंतु एक बार किसी राज्यकार्यवश इन्हें पद सुनाने का ध्यान नही रहा । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८८ (श्री भक्तमाल – श्री भूगर्भगुसाई जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhugarbh gusai ji

श्री भूगर्भगेसाईं जी श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के कृपापात्र श्री गदाधर पण्डित जी के शिष्य थे । आप श्री लोकनाथ  गोस्वामी जी के साथ वृन्दावन आये थे और  फिर वृन्दावन मे ही रह गये, वृन्दावन से बाहर कही नहीं गये । ये संसार से परम विरक्त एवं भगवान की रूपमाधुरी मे अत्यन्त अनुरक्त थे । रसिक भक्तजनो के साथ  मिलकर आप उसी रूप माधुरी का आस्वादन करते रहते । भगवान का मानसी चिन्तन, मानसी अर्चन वन्दन ही आपके जीवन का आधार था । भगवान की मानसी मूर्ति को निरन्तर निहारा करते थे । आपके मन की वृत्ति सदा उसी युगलस्वरूप के चिन्तन मे लगी रहती थी । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८७ (श्री भक्तमाल – श्री मथुरादास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Mathuradas ji

श्री मथुरादास जी नामक एक संत हुए । श्री मथुरादास जी तिजारे ग्राम में निवास करते थे । सर्वदा भगवन्नाम का कीर्तन करते रहते थे । आप मे शुद्ध आचार, यथालाभ संतोष, मैत्रीभाव, सुन्दरशील आदि सभी सद्गुण विशेषरूप से प्रकाशित थे । जिस प्रकार हाथ के दीपक से अन्धकार मिट जाता है और वस्तुएं दिखायी पड़ती है उसी प्रकार भगवत्तत्त्व – ज्ञान के द्वारा आपका हृदय प्रकाशित था ।

आपके हृदय मे प्रभु का विश्वास था और उन्हीं का बल था । श्रीकृष्ण की सेवाके निमित्त जल का घडा आप अपने सिरपर रखकर बडे नेम और प्रेम से लाते थे । आपकी अपने गुरुदेव श्री वर्धमान जी के वचनों मे बडा प्रेम था । आप उनके उपदेशों का संग्रह एवं पालन करते थे । आपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं किया ।
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सुंदर कथा ८६ (श्री भक्तमाल – श्री उमापति शास्त्री जी ) Sri Bhaktamal – Sri Umapati Shastri ji

श्री स्वामी राजेंद्रदासाचार्य जी और अयोध्या के संतो से सुने भाव – लगभग सौ साल पुरानी बात है , श्री अयोध्या में एक वसिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण निवास करते थे । भगवान से भक्त जान किसी भी प्रकार का संबंध बनाते आये है । कोई पिता का, कोई भाई कान, कोई गुरु का तो कोई शिष्य का परंतु ऐसे महात्मा कम ही होते है जो श्री भगवान को अपना शिष्य मानते है । अयोध्या के पंडित श्री उमापति शास्त्री जी मानते थे कि मैं वशिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण राम जी के कुल का पुरोहित हूँ और वे मेरे यजमान है । श्री उमापति जी नित्य कनक भवन जाते और पुजारी को अपनी प्रसादी माला दे कर कहते हमारे यजमान को पहना देना । पुजारी भी सिद्ध थे अतः वे उमापति जी के भाव से अच्छी प्रकार परिचित थे । पुजारी जी ने कभी इस बार का विरोध नही किया । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८५ (श्री भक्तमाल – श्री सेन जी ) Sri Bhaktamal – Sri Sena ji

भीष्म: सेनाभिधो नाम तुलायां रविवासरे ।
द्वादश्यां माधवे कृष्णे पूर्वाभाद्रपदे शुभे ।
तदीयाराधने सक्तो ब्रह्मयोगे जनिष्यति ।।

श्री भीष्म जी ही स्वयं भक्त सेन के रूप में अवतरीत हुए। वघेलखण्ड मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ मे सेनभक्त का प्राकट्य हुआ । आपका जन्म विक्रम संवत १३५७ में वैशाख कृष्ण द्वादशी, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, तुला लग्न , शुभ योग रविवार को हुआ । आपने स्वामी श्री रामानंदाचार्य जी की आज्ञा से भक्तों की सेवा को प्रधानता दी । कुछ विद्वान मानते है कि इनका जन्म स्थान ग्राम सोहल थाठीयन जिला अमृतसर साहिब में १३९० ईस्वी में हुआ था  । परंतु भक्तमाल, अगस्त्य संहिता और महाराज श्री रघुराजसिंह जी द्वारा रचित श्री राम रसिकावली से इनका जन्म बांधवगढ़ ही निश्चित होता है । इनके पिता का नाम श्री मुकन्द राय जी, माता का नाम जीवनी जी एवं पत्नि का नाम श्रीमती सुलखनी जी था । इनके दो पुत्र और एक पुत्री थे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८४ (श्री भक्तमाल – अपने पुत्र को विष देने वाली दो भक्तिमती नारियाँ ) Sri Bhaktamal 

१. पहली कथा :एक राजा बड़ा भक्त था । उसके यहाँ बहुत से साधु-सन्त आते रहते थे । राजा उनकी प्रेम से सेवा करता था । एक बार एक महान संत अपने साथियों समेत पधारे । राजा का सत्संग के कारण संतो से बडा प्रेम हो गया । वे सन्त राजा के यहाँ से नित्य ही चलने के लिये तैयार होते, परंतु राजा एक-न-एक बात ( उत्सव आदि) कहकर प्रार्थना करके उन्हे रोक लेता और कहता क्रि प्रभो ! आज रुक जाइये, कल चले जाइयेगा । इस प्रकार उनको एक वर्ष और कुछ मास बीत गये । एक दिन उन सन्तो ने निश्चय कर लिया कि अब यहां रुके हुए बहुत समय बीत गया ,कल हम अवश्य ही चले जायेंगे । राजाके रोकनेपर किसी भी प्रकर से नही रुकेंगे । यह जानकर राजा की आशा टूट गयी, वह इस प्रकार व्याकुल हुआ कि उसका शरीर छूटने लगा । रानी ने राजा से पूछकर सब जान लिया कि राजा सन्त वियोग से जीवित न रहेगा । तब उसने संतो को रोकने के लिये एक विचित्र उपाय किया । रानी ने अपने ही पुत्र को विष दे दिया; क्योकि सन्त तो स्वतन्त्र है, इन्हे कैसे रोककर रखा जाय ?
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सुंदर कथा ८३ (श्री भक्तमाल – श्री पवनपुत्र दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Pavanputra das ji

पूज्य संतो की कृपा से कुछ छिपे हुए गुप्त भक्तो के चरित्र जो हमने सुने थे वह आज अनायास ही याद आ गए । उनमे से एक चरित्र संतो की कृपा से लिख रहा हूं –

श्री पवनपुत्र दास जी नामक एक हनुमान जी के भोले भक्त हुए है । यह घटना उस समय की है जब भारत देश मे अंग्रेजो का शासन था । अंग्रेज़ अधिकारी के दफ्तरों के बाहर इनको पहरेदार (आज जिसे सेक्युरिटी गार्ड कहते है )की नौकरी मिली हुई थी । घर परिवार चलाने के लिए नौकरी कर लेते थे , कुछ संतो की सेवा भी हो जाय करती थी पैसो से । कभी किसी जगह में जाना पड़ता , कभी किसी और जगह जाना पड़ता । एक समय कोई बड़ा अंग्रेज़ अधिकारी भारत आया हुए था और पवनपुत्र दास जी को उनके निवास स्थान पर पहरेदारी करने का भार सौंप गया । श्री पवनपुत्र दास जी ज्यादा पढ़े लिखे नही थे , संस्कृत आदि का ज्ञान भी उनको नही था परंतु हिंदी में श्री राम चरित मानस जी की चौपाइयों का पाठ करते और हनुमान चालीसा का पाठ लेते , ज्यादा कुछ नही आता था । पढना जारी रखे