सुंदर कथा ९७ (श्री भक्तमाल – श्री भगवंतमुदित जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagvant mudit ji

श्री माधवदास जी के सुपुत्र श्री भगवन्तमुदित जी ने रसिक भक्तों से समर्थित तुलसीकंठी और तिलक धारणकर अपने इष्टदेव श्री राधाकृष्ण की नित्य नियम से सेवा की तथा उदार भगवान के परमोदार सुयश का अपनी वाणी से वर्णन करके उसके रस का आस्वादन किया । श्री कुंजबिहारिणी कुंजबिहारी की नित्य निकुंज लीला इनके हृदय मे सर्वदा प्रकाशित रहती थी । दम्पति श्री राधाकृष्ण का जो पारस्परिक सहज स्नेह और प्रीतिकी जो अन्तिम सीमा है, उससे आपका हृदय प्रकाशित था । अनन्य भाव से सेवा करने की जो रसमयी रीति है, उसीको आपने उत्तम से उत्तम मार्ग मानकर अपनाया, उसीपर चले । भक्ति से भिन्न लौकिक -वैदिक -विधि- निषेधों का सहारा छोड़कर आपका हृदय विशेषकर श्री राधाकृष्ण के परमानुराग मे सराबोर रहता था।

श्री भगवन्तमुदित जी परमरसिक सन्त थे । आप आगरा के सूबेदार नबाब शुजाउल्युल्क के दीवान थे । कोई भी ब्राह्मण, गोसाई, साधु या गृहस्थ ब्रजवासी जब आपके यहाँ पहुँच जाता तो आप अन्न, धन और वस्त्र आदि देकर उसे प्रसन्न करते थे; क्योंकि व्रजबासियों के प्रेम मे इनकी बुद्धि रम गयी थी । आपके गुरुदेव का नाम श्री हरिदासजी था । ये श्रीवृन्दावन के ठाकुर श्री गोविन्ददेव जी मन्दिर वे अधिकारी थे । इन्होंने व्रजवासियों के मुख से श्री भगवन्तमुदित जी की बडी प्रशंसा सुनी तो इनके मन मे आया कि हम भी आगरा जाकर (शिष्य) भक्त की भक्ति देखें ।

श्री भगवन्तमुदित जी ने सुना कि श्रीगुरुदेव आ रहे है तो इन्हें इतनी प्रसन्नता हुई कि ये अपने अंगो मे फूले नही समाये । ये अपनी स्त्री से बोले कि कहो, श्री गुरु-चरणो मे क्या भेंट देनी चाहिये ? स्त्री ने कहा – हम दोनों एक-एक धोती पहन ले और शेष सब घर द्वार, कोठार- भण्डार, चल अचल सम्पत्ति श्रीगुरुदेव को समर्पण कर दें और हम दोनों वृन्दावन मे चलकर भजन करे । स्त्री की ऐसी बात सुनकर श्री भगवन्तमुदित जी उसपर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- सच्ची गुरु भक्ति करना तो तुम ही जानती हो, यह तुम्हारी सम्मति हमको अत्यन्त प्रिय लगी है । ऐसे कहते हुए उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे । गुरुदेव रात्रि मे बाहर द्वारपर बैठे सुन रहे थे । सर्वस्व समर्पण की बात गोस्वामी श्री हरिदासजी ने सुन ली और उन्होंने जान लिया कि ये सर्वस्व-त्याग करके विरक्त बनना चाहते है, जिसका अभी योग (उचित समय) नही है, अत: आप उसी समय बिना श्री भगवन्तमुदितजी से मिले ही परिचित व्यक्ति को बताकर लौटकर श्रीवृन्दावन को चले आये और इनके प्रेम भरे त्याग के प्रणपर बहुत ही सन्तुष्ट हुए ।

श्री भगवन्तमुदित जी को जब यह मालूम हुआ कि श्रीगुरुदेव आये और वापस चले गये तो आपका उत्साह नष्ट हो गया । हृदय मे अपार पश्चात्ताप हुआ । फिर आपने गुरुदेव के दर्शन करने का विचार किया और नवाब से आज्ञा माँगकर श्री वृन्दावन आये । गुरुदेव के दर्शनकर सुखी हुए । बहुत से लीला- पदों की रचना की । आपका श्री रसिक अनन्यमाल नामक ग्रन्थ प्रसिद्ध है । इस प्रकार आपने अनन्य  प्रेमका एकरस निर्वाह किया । गुरुदेव से आज्ञा लेकर आगरा को लौट गये । वहाँ किसी कारणवश कई ब्रजवासी चोरो ने आपके घर मे ही चोरी कर ली, पर इससे आपने जरा भी मन मे दुख न माना; क्योंकि आपका मन भगवान की भक्ति मे सराबोर था और दृष्टि मे श्री वृन्दावन-बिहारिणी-बिहारी जी समाये हुए थे । वास्तव मे आप बड़े ही भाग्यशाली और प्रेमी सन्त थे । संसार मे आपका भगवत्प्रेम प्रसिद्ध था । श्री भगवन्तमुदित जी के पिता श्री माधवदास जी उच्च कोटि के रसिक थे । आगे उनकी कथा सुनिये –

श्री माधवदास जी बेसुध है, नाडी छूटनेवाली है (प्राण छूटने वाले है ), अब इनका अन्तिम समय आ गया है -ऐसा जानकर लोग उन्हें पालकी में बैठाकर आगरा से श्री वृन्दावन धाम को ले चले । जब आधी दूर आ गये, तब श्री माधबदास जी को होश हो आया । दुखित होकर आपने लोगों से पूछा कि क्रूरो ! तुम लोग मुझे कहाँ लिये जा रहे हो । लोगोने कहा- आप जिस श्री वृन्दावनधाम का नित्य ध्यान किया करते हैं, वही ले चल रहे हैं । यह सुनकर आपने कहा – अभी लौटाओ, यह शरीर श्री वृन्दावन जाने के योग्य कदापि नही है, इसे जब वहाँ जलाया जायगा, तब इसमे से बडी भारी दुर्गन्ध निकलेगी, वह प्रिया प्रियतम को अच्छी नहीं लगेगी ।  प्रिया-प्रियतम के पास जानेयोग्य जो होगा, वह अपने आप उनके पास चला जायगा । आप ऐसे भाव की राशि थे । वापस जाकर आगरा मे ही आपने शरीर छोडा ।

सुंदर कथा ९६ (श्री भक्तमाल – श्री कान्हार दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kanhardas ji

श्री कान्हरदास जी ने सन्तो की कृपा से यह महान् लाभ प्राप्त किया कि अपने हृदय मे भगवान को स्थापित किया । इन्होंने गुरुदेव की शरण मे आकर भक्तिमार्ग को सच्चा, सात्विक, सरल और श्रेष्ठ जाना । आपने संसार धर्म को त्यागकर क्या सत्य है और क्या झूठ है, इस बात को पहचाना और सत् ग्रहण तथा असत् का त्याग किया । भगवद्धर्म को स्वीकार किया । आप संसार से उसी प्रकार अलग रहे, जैसै पेड की शाखा से चन्द्रभा अलग और दूर रहता है, लेकिन दिखाने के लिये पेड़ के पास मे बताया जाता है । आप संसार के सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे । अनेक सद्गुणों से युक्त थे । अत: आप महान् थे । आपने अपने मुख से सदा सज्जनों – भक्तों क्री प्रशंसा की । मिथ्या, कटु और परनिन्दारूप कुवचन आपने कभी नहीं कहे ।

भक्तमाल में श्री कान्हरदास जी के विषय मे विवरण इस प्रकार है :

श्री कान्हरदास जी समदर्शी सन्त थे । किसी सन्त से कोई भूल भी हो जाय तो श्री कान्हरदास जी कटु शब्दों का प्रयोग नही करते थे । आप सन्तसेवी तो थे ही, अत: सन्तो का आवागमन आपके यहाँ बना ही रहता था । एक बार दो सन्त आये, वे कई दिनोंसे भूखे थे । जितना प्रसाद था वह आपने उन संतो को दे दिया । परंतु उसे पाकर भी तृप्त न हुए अत: उन्होने कान्हर दास जी के घरसे एक धातुपात्र(बर्तन) ले जाकर हलवाई के हाथ बेच दिया और दोनों ने भरपेट लड्डू-पेडा खाया । यह जानकर आपका शिष्य सन्तो को फटकारने लगा । उस अज्ञानी शिष्य को आपने समझाया, कि सन्त बर्तन बेचकर खा गये तो अपना ही खाये । हम संतो के दास है । यह सब सामग्री रामजी की है और ये संत भी रामजी के ही है । यह जो चाहे वह करने में समर्थ है ।संत भगवान से भी बढ़कर होते है।

सब सामग्री राम की सन्त राम के राम ।
जो चाहैं सोई करैं तू बोलत बेकाम ।।

इस प्रकार आपकी सन्तनिष्ठा अन्दुत थी ।

एक बार श्री कान्हरदास जी को बड़े जोर से बुखार चढ आया । तब ये आसनपर पड़े-पड़े ही प्रभु की मानसी-सेवा करने लगे । भोग लगने के बाद प्रभु ने इनसे कहा कि तुम भी यह प्रसाद लो – प्रसाद बहुत स्वादिष्ट है । तब आपने शिष्य को जोर से पुकारकर कहा- अरे ! प्रसाद लेने के लिये शीघ्र ही पात्र लाओ । शिष्य ने सोचा कि ज्वर की अधिकता के कारण कुछ भी रहे है । अत: पात्र न लाकर खडा ही रहा । तब फिर आपने डाँटकर कहा कि तुम अभी भी यही खड़े हो ,प्रसाद लेने के लिए शीघ्र कटोरा लाओ । तब वह कटोरा ले आया । इनके हाथो में आते ही कटोरा भर गया । तब सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । उसमे से जिसने-जिसने प्रसाद लिया । सभी को अद्भुत स्वाद और परमानन्द मिला । ऐसे भगवत्प्राप्त सन्त थे श्री कान्हरदास जी !

सुंदर कथा ९५ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्ण परमानंदाचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Parmanandacharya ji

श्री श्री पूर्णवैराठी रामेश्वर दास जी महाराज का कृपाप्रसाद –

श्री पूर्णजी (परमानंदाचार्य )की महिमा अपार है, कोई भी उसका वर्णन नहीं कर सकता है । आप उदयाचल और अस्ताचल – इन दो ऊँचे पर्वतो के बीच बहनेवाली सबसे बडी ( श्रेष्ठ ) नदी के समीप पहाड़ की गुफामे रहते थे । योग की युक्तियों का आश्रय लेकर और प्रभु मे दृढ विस्वास करके समाधि लगाते थे । व्याघ्र, सिंह आदि हिंसक पशु वहीं समीप मे खड़े गरजते रहते थे, परंतु आप उनसे जरा भी नही डरते थे । समाधि के समय आप अपान वायु को प्राणवायु के साथ ब्रह्माण्ड को ले  जाते थे, फिर उसे नीचे की और नहीं आने देते थे । आपने उपदेशार्थ साक्षियों की, मोक्षपद प्रदान करनेवाले पदों की रचना क्री । इस प्रकार मोक्षपद को प्राप्त श्री पूर्णजी की महिमा प्रकट थी ।

१. श्री पूर्ण जी भगवत्कृपा प्राप्त श्री रामभक्त सन्त थे । एक बार आपका शरीर अस्वस्थ हो गया । आपको औषधि के लिये औंगरा ( एक जडी ) की आवश्यकता थी । आस पास उस समय कोई नही था जिससे जडी लाने कहा जाये । इनके मन की बात जानकर भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और औंगरा लाकर दिया । जिससे ये स्वस्थ हो गये । भगवत्कृपाका अनुभव करके आप प्रेम-विभोर हो गये । आप पूर्णतया अकाम और सभी प्रकार की आसक्तियोंसे रहित थे ।

२. एक बार एक यवन-बादशाह ने आपके इन्द्रिय -संयम की परीक्षा लेनी चाही, किंतु पूर्ण जी उसमें पूर्ण सफल रहे । वह प्रसंग इस प्रकार है – आश्रम से कुछ दूरपर नगर था, वहाँ यवन बादशाह रहता था । उसकी कन्या ने श्री पूर्णजी का दर्शन , सत्संग किया तो वह अत्यन्त ही प्रभावित हो गयी । उसने अपने पितासे कहा कि मै दूसरे किसी के साथ व्याह न करूँगी । संसारी सुखों की मुझे बिल्कुल इच्छा नही है । आप मुझे श्री पूर्णजी की सेवामें रख दीजिये । बादशाह ने श्री पूर्णजी के पास आना-जाना प्रारम्भ किया और अपनी दीनता से उन्हें प्रसन्न कर लिया । किसी दिन श्री पुर्नजी ने उस बादशाह से कहा कि चाहो सो माँग लो । तब उसने यही वरदान माँगा कि मेरी कन्या को आप अपनी सेवा में रख लीजिये । यह अन्यत्र नहीं जाना चाहती है । आपने कहा कि हम विरक्त साधु हैं, अपना धर्म छोडकर उसे संसारी सुख नही दे सकते है । वह मेरे निकट रहकर भजन साधन कर सकती है । यवन-कन्या की भी यही इच्छा थी, अत: वह आपके पास रही । आप पूर्ण अकाम थे, अत: इस परीक्षा मे उत्तीर्ण हुए । कुछ काल बाद यवन-कन्या सत्संग-लाभ लेकर सद्गति को प्राप्त ही गयी ।

३. श्री पूर्ण जी का नाम श्री अग्रदेव जी के शिष्यों मे आया है । एक बार आप स्वर्णरेखा नदी के तट पर स्थित पीपल की छाया मे विराजे थे । भगवत्स्मरण करते हुए शान्त एकान्त मे आपको निद्रा आ गयी । वृक्ष की खडखडाहट से आपकी नींद खुली तो आपने एक अद्भुत विशाल वानर को पीपलपर इधर उधर कूदते देखा । यह सोच में पड़ गए कि यह अद्भुत वानर कौन है ? उसी समय वानर के मुख से – “दासोऽहं राघवेन्द्रस्य ” (मै श्री राघवेंद्र प्रभु का दास हूं )यह स्पष्ट सुनायी पडा । साक्षात् श्री हनुमान जी है, यह जानकर आपने साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया और हनुमदाज्ञा से उसे पवित्र स्थल जानकर आपने वहीं अपना निवासस्थान बनाया और वहां श्री हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की । भगवन्नाम जप के प्रभाव से आपमे सर्वसिद्धियाँ आ गयी । सुख शान्ति के निमित्त आनेवाले जनसमुदाय के मनोरथ पूर्ण होने लगे । आपकी प्रसिद्धि हो गयी ।

४. वह अकबर का शासन-काल था । दुष्ट यवन हिन्दू धर्म मे अनेक प्रकार से बाधा करते थे । साधु का सुयश न सह सकने वाले यवन अधिकारियों ने आदेश दिया कि शंख -घंटा नाद मत करो । आपने सुनी – अनसुनी कर दी । सायंकाल को आपने जैसे ही शंखध्वनि की, कई सिपाहियोंके साथ मुस्लिम थानेदार इनायत खाँ पकडने आ गया, पर पकड़ न सका, क्योंकि मंदिर के चारों ओर बड़े-बड़े बन्दरों की भीड़ ने सेना का रास्ता रोक लिया । ऐसे विशाल वानर उन यवनों ने कभी नही देखे थे। वे भय से पीछे हो गए और सब निराश लौट गये । दूसरे दिन शंख बजते ही वे लोग और बड़ी सेना लेकर पुन: पकड़ने आये तो उनके आश्वर्य का ठिकाना न रहा ।उन्हें वहां श्री पूर्ण जी का छिन्न-भिन्न मृत शरीर पड़ा मिला, कही हाथ, कही पैर, कही मस्तक।  वे खुश हुए की साधू मर गया और लौट चले । अभी वे चौकीपर पहुँचे भी न थे कि पुन: शंख ध्वनि होने लगी । वापस आकर देखा तो फिर वही दृश्य देखा और डर कर भागा । इनायत खाँ समझ गया कि यह हिंदु फ़क़ीर सिद्ध है । इनायत खां ने इनकी सिद्धियों का चमत्कार अकबर को लिख भेजा ।

५. उस समय अकबर बादशाह को पुत्र की कामना थी, अत: वह जगह जगह पुत्र प्राप्ति हेतु भटक रहा था । एक दिन वह हाथीपर चढकर श्री पूर्ण जी के पास आया । श्री परमानन्दाचार्य जी(पूर्ण जी) ने सब कुछ जान लिया । उसे सदल-बल सन्त के पास आते देखकर अहंकारी अनधिकारी समझा । आप जिस चौकीपर बैठे थे, उसको ऊपर उड़ने का आदेश दिया । चौकी सहित उड़कर आकाश मे हाथी के हौदे से ऊपर स्थित हो गये और उनके पैर जाकर अकबर से सिर से जा लगे । उन्होंने अकबर से कहा – गर्व छोडो, सम्पत्ति और राज्य नश्वर है । हिन्दू-मुस्लिम सभी तुम्हारे लिये समान है ।  मुझ सन्त के आशीर्वाद से पुत्र तो प्राप्त होगा परंतु वह पुत्र भी सन्त हो जायगा । तुम्हे तो अपने पुत्र को अपनी गद्दी पर बिठाकर उसे राजा बनाने की इच्छा है । अत: तुम सलीम शाह चिस्ती (फतेहपुर सीकरी) के पास जाकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करो ।

श्री परमानन्दाचार्य जी के वैष्णव तेज युक्त रूप को देखकर अकबर को विराट-स्वरूप का ध्यान हो आया और तब उसने हाथ जोड़कर कहा – आप तो साक्षात भगवान के रूप में पूर्ण विराट हैं -आप पूर्णवैराठी है । तभी से आपका यह नाम प्रसिद्ध हो गया ।अकबर ने चरणों मे गिरकर क्षमा मांगी और रत्नजटित टोपी भेट की १२ ग्राम जागीर के रूप में दिए । पूर्वाश्रम में आपका नाम परमेश्वर प्रसाद था । श्री अनन्तानन्दाचार्य के प्रशिष्य खेमदासजी से आपने सं १५७५ मे विरक्त दीक्षा ली । ग्वालियर में आपकी गद्दी है । आपने सं १६६१ मैं कालूरामाचार्य को दीक्षा दो । आपके द्वारा संस्थापित श्रीहनुमान् मन्दिर आपके शिष्यों-प्रशिप्यों के द्वारा अधिक समृद्ध हुआ । इसे ग्वालियर राज्यसे जागीर भी मिली थी । यह स्थान वैष्णवो के ५२ द्ववरो में से एक है और गंगादास जी के नामपर संस्थापित गंगादास जी की बडी शाला ग्वालियर मे प्रसिद्ध है ।

इस आश्रम का इतिहास इस प्रकार है -१८५७ की क्रांति के समय स्थान के महंत श्री गंगादास जी महाराज थे। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई भी इन्ही की शिष्या थी । १८५७ के स्वाधीनता समर में झांसी की रानी अंग्रेज़ो से लड़ते हुए विजयश्री वरण करती हुई ग्वालियर आयी । रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर पर विजय प्राप्त की और अपना लश्कर (सेना) स्वर्णरेखा नदी के किनारे -वर्तमान में जो फूलबाग मैदान है ,वहां लगा दिया । अंग्रेजो को पता चला कि रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर जीत लिया है और आगे समय हाथ से निकल गया तो वह और भी आस पास के क्षेत्रों पर जीत हासिल कर लेगी । अंग्रेजों ने बड़ी सेना सहित ग्वालियर पर हमला कर दिया । रानी अभी जीत की खुशियां मना भी नही पाई थी की अंग्रेजो का आक्रमण हो गया । रानी और उसकी कुछ सेविकाओं ने मर्दो जैसे कपड़े पहन लिए और युद्ध लड़ने चली गयी । युद्ध मे रानी बुरी तरह घायल हो कर एक स्थान पर गिर पड़ी। मर्दो जैसे कपड़े पहनने के कारण अंग्रेज उसको पहचान नही पाए और उसे वही छोड़ दिया। रानी को पता था कि अब उसके प्राण नही रहेंगे। पीठ पर उनका पुत्र भी था ।

रानी ने इच्छा जताई कि वह अब गुरुदेव की शरण मे जाना चाहती है । उनके कुछ वफादार सेवक उनको श्री गंगादास जी के पास लेकर गए । महारानी ने श्री गंगादास जी के चरणों मे प्रणाम करके यह प्रार्थना की की वे तुलसी गंगाजल प्रदानकर उन्हें अंतिम विदा दे। महारानी ने यह भी प्रार्थना की कि उनका पार्थिव शरीर फिरंगियों के हाथ न लगने पाये । अंग्रेज रानी का पता लगाते हुए आश्रम पर आए और उन्होंने आश्रम को चारों ओर से घेर लिया । श्री गंगादास जी ने तत्काल अपने अखाड़े के साधुओ को आश्रम और रानी के देह की रक्षा करने की आज्ञा दी। उस समय लगभग १२०० साधु उपस्थित थे और अंग्रेजो की सेना बहुत बड़ी थी । अपने गुरुदेव के आदेश पर वे सब साधु अंग्रेजी सेना से युद्ध करने लगे और उनके भयंकर आक्रमण को देखते हुए अंग्रेज़ हैरान रह गए । वे कल्पना भी नही कर सकते थे कि यह तिलक ,तुलसी धारी – घंटा शंख बजाने वाले साधु ऐसा भयंकर युद्ध कर सकते है । अंग्रेज़ो की बहुत बड़ी सेना को उन साधुओ ने मार भगाया परंतु इस युद्ध मे ७४५ संत शहीद हो गए और महारानी के प्राण भी नही बचे । उन साधुओ ने तलवार, भाले, नेजे, चिमटे आदि जो भी हथियार युद्ध के समय उपयोग में लाये थे – वे आज भी आश्रम मे सुरक्षित है ।

श्री गंगादास जी ने महारानी के पुत्र को उनके विश्वस्त अनुचर के साथ सुरक्षित स्थान पर भेज दिया । इतने सब साधुओ और महारानी का अंतिम संस्कार करने के लिए उस समय लकड़ियां कम पड गयी । अंग्रेजो ने आश्रम को लगभग नष्ट कर दिया था । श्री गंगादास जी ने बची हुई अपनी झोपड़ी को ही गिराकर रानी के लिए चिता बना दी और उनका वैदिक रीति से अंतिम संस्कार किया । जहां रानी का अंतिम संस्कार हुआ था वही पर आज भी उनकी समाधि स्थित है । अंतिम संस्कार होने के बाद श्री गंगादास जी महाराज शेष बचे हुए साधु संतों को लेकर ग्वालियर के बाहर वन को चले गए । कुछ समय बाद शांति स्थापित होने पर ग्वालियर रियासत के महाराज श्री जियाजीराव सिंधिया ने स्वयं जाकर श्री गंगादास जी महाराज से प्रार्थना की कि वे पुनः आश्रम पर लौट चले । श्री गंगादास जी के मना करने पर राजा ने तीन दिन भूखे प्यासे रहते हुए कहा कि यदि महाराज श्री आश्रम पर नही लौटेंगे तो वे भी अपनी रियासत में नही जाएंगे । राजा पर प्रसन्न होकर महाराज श्री पुनः ग्वालियर आये और उन्होंने आश्रम को पुनः उसी रूप में स्थापित कराया। महाराज श्री के नामपर ही आश्रम का नाम श्री गंगादास जी के बड़ी शाला प्रसिद्ध हो गया ।

सुंदर कथा ९४ (श्री भक्तमाल – श्री केशवभट्ट काश्मीरी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Keshavbhatt ji

श्री केशवभट्ट जी मनुष्यों मे मुकुटमणि हुए । जिनकी  महा महिमा सारे संसार मे फैल गयी । आपके नाम के साथ  ‘काश्मीरी’ यह विशेषण अति प्रसिद्ध हो गया था । आप पापों एवं पापरूप लोगों को ताप देने वाले तथा जगत के आभूषण स्वरूप थे । आप परम सुदृढ श्री हरिभक्तिरूपी कुठार से पाखण्ड धर्मरूपी वृक्षो का समूलोच्छेद करनेवाले हुए । आपने मथुरापुरी में यवनों के बढते हुए आतंक को देखकर उनसे वाद विवादकर उन परम उद्दण्ड यवनों को बलपूर्वक हराया । अनेकों अजेय काजी आपकी सिद्धि का चमत्कार देखकर एकदम भयभीत हो गये । आपका उपर्युक्त सुयश सारे संसार मे प्रसिद्ध है, सब सन्त इनके साक्षी है ।

आपका जन्म काश्मीरी ब्राह्मण कुल मे बारहवी शताब्दी के लगभग हुआ माना जाता है । कुछ इतिहासवेत्ताओं का कथन है कि काशी मे श्री रामानन्द जी और नदिया मे  श्री चैतन्यदेव जी से आपका सत्संग हुआ था । एक बार दिग्विजय (देश के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते हुए यात्रा करना ) निमित्त पर्यटन करते हुए आप नवद्वीप (बंगाल) मे आये । वहाँ का विद्वद्वर्ग आपसे भयभीत हो गया । तब श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यवर्ग को साथ लेकर श्री गंगाजी के परम सुखद पुलिनपर जाकर बैठ गये और बालकों को पढाते हुए शास्त्रचर्चा करने लगे । उसी समय टहलते हुए श्री केशवभट्ट जी भी आकर आपके समीप बैठ गये । तब श्रीमहाप्रभुजी अत्यन्त नम्रतापूर्वक बोले -सारे संसार में आपका सुयश छा रहा है, अत: मेरे मन मे यह अभिलाषा हो रही है कि मै भी आपके श्री मुख से कुछ शास्त्र सम्बन्धी चर्चा सुनूँ ।

श्री कृष्णचैतन्य के इन वचनों को सुनकर श्री केशवभट्ट जी
बोले कि तुम तो अभी बालक हो और बालकों के साथ पढते हो, परंतु बातें बडोंक्री तरह बहुत बडी बडी करते हो । परंतु तुम्हारी नम्रता सुशीलता आदि देखकर मैं बहुत प्रसन्न दूं अत: तुम्हारा जो भी सुनने का आग्रह हो वह कहो, हम वही सुनायेंगे । श्री महाप्रभु जी ने कहा – आप श्री गंगाजी का स्वरूप वर्णन करिये । तब श्री केशवभट्ट जी ने तत्काल स्वरचित नवीन सौ श्लोक धाराप्रवाह कह सुनाये । उन्हें सुनकर श्री महाप्रभुजी की बुद्धि भाव विभोर हो गयी । तत्पश्चात उन्ही सौ श्लोको में से  एक श्लोक कणठस्थ करके श्री महाप्रभुजी ने भी श्री केशवभट्ट जी को सुनाया और निवेदन किया कि इस एक व्याख्या एवं दोष और गुणों का भी वर्णन करिये। सुनकर श्री केशवभट्टजीने कहा कि भला मेरी रचना मे दोष कहां ? श्री महाप्रभुजी ने कहा – काव्य रचना मे दोष का लेश रहना स्वाभाविक ही है । यदि आप मुझे आज्ञा दे तो मै इसके दोष गुण कह सुनाऊँ। 

तब आपने कहा – अच्छा, तुम्ही कहो । तब श्री महाप्रभुजी ने उस श्लोक की गुण – दोषमयी एक नवीन व्याख्या कर दी । श्री केशवभट्ट जी ने कहा – अच्छा, अब हम प्रातःकाल तुमसे फिर मिलेंगे और इसपर अपना विचार व्यक्त करेंगे । ऐसा कहकर आप अपने निवास स्थानपर चले आये और एकांत मे श्री सरस्वती जी का ध्यान किया । केश्वभट्ट जी को सरस्वती सिद्ध थी । श्री सरस्वती जी तत्काल एक बालिका के रूप में इनके सम्मुख आ उपस्थित हुई । आपने उपालम्भ भरे स्वर मे कहा कि सारे संसार को जितवा करके आपने एक बालक से मुझे हरा दिया ।

श्री सरस्वती जी ने कहा- वे बालक नहीं है, वे तो साक्षात् लोकपालक भगवान श्रीकृष्ण है और मेरे स्वामी है । भला मेरी सामर्थ्य ही कितनी है जो मै उनके सम्मुख खडी होकर वाद विवाद कर सकूं ! श्री सरस्वती जी की यह सुख स्त्रोततमयी वाणी सुनकर श्री केशवभट्ट जी मन में बड़े हर्षित हुए और वाद विवाद के भाव का परित्याग करके श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभुजी के पास आये तथा बहुत प्रकार से विनय प्रार्थना की । तब श्री महाप्रभुजी ने कृपापूर्वक कहा कि वाद विवादके प्रपंच को छोड़कर फलस्वरूपा भक्ति का रसास्वादन कीजिये, अब आज से किसी को भूलकर भी नही हराइये । श्री केशवभट्ट जी ने श्रीमहाप्रभु जी की यह बात हृदय मे धारण कर ली और शास्त्रार्थ तथा दिग्विजय छोडकर एकांतिक भक्ति सुख मे निमग्न रहने लगे ।

आपके समय मे दिल्ली का बादशाह अलाउद्दीन खिलजी था, उसके उग्र स्वभाव से हिन्दू प्रजा ऊब उठी थी। उसने घोषणा की कि सारे हिन्दू मन्दिर तोड़ दिये जायँ । उस समय मथुरा के सूबेदार के आदेशानुसार एक फ़कीर ने लाल दरवाजेपर एव यन्त्र टाँगा, जिसके प्रभाव से जो भी हिन्दू उस दरवाजे से निकलता वह मुसलमान बन जाता और दूसरे लोग जबरन उसे अपने धर्म मे शामिल कर लेते । इस महान् विपत्ति से बचने के लिये सभी ब्रजवासी श्री केशव भट्टजी के पास पहुँचे । श्रीआचार्यदेव स्वयं शिष्यसमूह को साथ ले उस स्थानपर गये और उनके वैष्णव तेज से वह यन्त्र निष्फल हो गया। इस तरह आपने धर्म की रक्षा की ।

सुंदर कथा ९३ (श्री भक्तमाल – श्री जापू जी ) Sri Bhaktamal – Sri Jaapu ji

श्री जापू जी परम प्रेमी भगवद्भक्त थे । इनके श्रीमुख से सदा भगवान का नाम सीताराम सीताराम का जाप होता रहता अतः इनका नाम श्री जापू जी पड गया । नित्य ही सन्त-भगवन्त-सेवा एवं उत्सवों की धूम आपके यहाँ मची रहती थी । इन्होंने अपने समस्त धन संतो की सेवा में लगा दिया परंतु कुछ काल मे सब धन व्यय हो गया । अपना सर्वस्व व्यय करने के बाद आप सन्त सेवा के निमित्त राहजनी (लूट, डकैती) करने लगे । एक बार आपके यहाँ संतो की मंडली पधारी और घर पर ना धन था और ना कुछ अन्न । पास ही में एक सुनार रहता था जो सोने में मिलावट आदि करके बेचता था और वह सुनार कभी शुभ कार्य मे धन नही व्यय करता था । आपने उस सुनार को लूटा और आकर संतो को भोजन कराया और वस्त्रादि भी दिया । सुनार ने आपके घरपर आकर झगडा किया । झगडा बढते देखकर राजा के सिपाहियों ने दोनों को पकड़कर राजा के सामने उपस्थित किया ।

राजाने दोनों को कारागार मे डाल दिया । श्री जापूजी को अपनी चिन्ता न थी । पर घर मे सन्त जन् विराजमान है ,उनकी सेवा से वंचित होने से जापूजी चिन्तित हुए । रात को जापूजी सतत सीताराम सीताराम का जाप कर रहे थे । राजा से स्वप्न मे भगवान ने कहा कि – तूने मेरे भक्त जापूजी को कैदखाने मे बन्द कर रखा है । उसे शीघ्र छोड़ दे, नहीं तो तेरा कल्याण नही होगा । सबेरा होते ही राजा ने श्री जापूजी को कारागार से मुक्त करने का आदेश दिया और आपको निरपराध समझा । सुनार को अपराधी समझकर उसको नहीं छोडा । श्री जापूजी ने कहा कि हम अकेले घर नही जाएंगे, पहले तुम इस सुनार को भी मुक्त करो । सुनार के बिना अकेले कैद से मुक्त होना स्वीकार नही किया । सुनार ने सोचा कि अवश्य ही जापूजी के पास कोई शक्ति है। लगता है कि जापूजी रात्रि में जो मंत्र (सीताराम) जप रहे थे, उसी के प्रभाव से राजा ने इन्हें मुक्त करने का आदेश दिया और हमे नही मुक्त कराया । अगली रात जापूजी के साथ सुनार भी नाम का जप करने लगा ।

दूसरी रात को भगवान ने पुन: राजा को स्वप्न दिया और कहा कि जैसा भक्त जापूजी कहते है, वैसा ही करो । राजा ने दोनों को छोड़ दिया । सुनार ने मन मे विचार किया कि यह संत तो बड़े दयालु है – यदि चाहते तो अकेले कैदखाने से निकल जाते परंतु इन्होंने ऐसा नही किया । सुनार को विश्वास हो गया कि भगवान के नाम के बल पर मैं इस छोटे से बंधन से मुक्त हुआ – तो संसार के इतने बड़े बड़हन से भी अवश्य ही मुक्त हो जाऊंगा । उसने निश्चय किया कि अब इस नाम का त्याग अब मैं कभी नही करूँगा । ऊपर से उसके धन का अन्न संतो के पेट मे जाने से भी उसकी बुद्धि अति निर्मल हो गयी । एक क्षण भी सच्चे संत का संग हो तो जीवन परिवर्तित हो जाता है।

बाबा श्री तुलसीदास ने कहा है –

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध ।
तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध ।।

कबीर दास जी कहते है –

कबिरा संगत साधु की ज्यों गंधी का वास ।
जो कछु गंधी देहि नहिं तो भी वास सुवास ।।

अर्थात संतो का संग, इत्र (सुगंध) बेचने वाले की संगत के बराबर है । इत्र बेचने वाला चाहे कुछ न दे तो भी उसके समीप जाने पर खुशबू मिलती है । उसी प्रकार संत चाहे मुख से कुछ भी न बोले तो भी उनके समीप जाने (संग करने) पर मन पवित्र होता है (मन कि दुर्गन्ध नष्ट होती है )।

राजा ने जापू जी को सारी घटना सुना दी और पूछा कि आप जैसे भगवान के भक्त ने सुनार का धन आखिर क्यो लूटा ? जापूजी ने सच्ची घटना बता दी और साधु-सेवा की महिमा बतायी । किसी भी तीर्थ का सेवन करने से पहले ,किसी भी पुराण का श्रवण करने से पहले उसका महात्म्य श्रवण करने से उसमे श्रद्धा अधिक हो जाती है । इसी तरह जापू जी ने संत सेवा की कुछ सच्ची घटनाएं और संत सेवा का बहुत महात्म्य सुनाया । इससे राजा और सुनार दोनों के हृदय मे भगवद्गक्ति एवं सन्त सेवा की निष्ठा दृढ हुई । भगवान् जापूजी की सेवा से सन्तुष्ट हो गये और स्वप्न में जापू जी से कहा कि अब आपको चोरी करने की आवश्यकता नही है , पास ही में जमीन मे गडे धन का पता भगवान ने जापू को बताया। उसी धन से भगवान ने जापू जी सन्त सेवा करने का आदेश दिया । राजा भी और सुनार भी जीवनपर्यन्त निष्ठापूर्वक संत सेवा में लगे रहे ।

सुंदर कथा ९२ (श्री भक्तमाल – श्री कृष्णदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Krishnadas ji

श्री गोवर्धनधारी भगवान् श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर श्री कृष्णदास को अपने नाम मे हिस्सा दिया । श्री कृष्ण दासजी श्री गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा दिये गये भजन भाव के समुद्र एवं समस्त शुभ गुणों की खानि थे । आपके द्वारा रची गयी कविताएं बडी ही अनोखी एवं काव्यदोष से रहित होती थी । आप ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवायें बड़े चतुर थे । श्री गिरिधर गोपाल जी के मंगलमय सुयश से विभूषित आपकी वाणी की विद्वान जन भी सराहना करते थे । आप श्री व्रज की रज ( धूल ) को अपना परम आराध्य मानते थे । चित्त मे उसी को सर्वस्व मानकर शरीर मे एवं सिर-माथेपर धारण करते थे तथा चित्त मे चिन्तन भी करते थे । आप सदा – सर्वदा श्री हरिदासवर्य श्री गोवर्धन जी के समीप बने रहते थे एवं सदा बड़े-बड़े सन्तो के सानिध्य मे रहते थे । आपने श्री राधा-माधव युगल की सेवा का दृढ व्रत ले रखा था ।

१. जलेबियों का भोग
श्री कृष्णदास जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे । महाप्रभु ने ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवा का सम्पूर्ण भार इन्हे सौपा था । एक बार आप श्री ठाकुरजी के सेवाकार्य के लिये दिल्ली गये हुए थे । वहाँ बाजार मे कडाही से निकलती हुई गरमागरम जलेबियों को देखकर , जैसे ही उसकी सुवास अंदर गयी वैसे ही आपने सोचा कि यदि इस जलेबी को हमारे श्रीनाथ जी पाते , तो उन्हें कैसा अद्भुत आनंद आता । उस बाजार में खड़े खड़े मानसी-सेवा मे (मन ही मन) ही कृष्णदास जी उन जलेबियों को स्वर्ण थाल में रखकर श्री श्रीनाथजी को भोग लगाया, भाववश्य भगवान ने उसे स्वीकार कर लिया ।

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सुंदर कथा ९१ (श्री भक्तमाल – श्री गोस्वामी विट्ठालेशसुत जी ) Sri Bhaktamal – Sri Goswami Vitthaleshsut ji

गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के पुत्रों को सर्वभूत सुहृद साक्षात श्री गिवर्धनधारी श्रीकृष्ण जानकर उनका ध्यान करना चाहिए । उनके नाम है –

१. श्री गिरिधर जी, जो बड़े रसिक एवं अत्यंत सुंदर शील स्वभाव वाले थे । २. श्री गोविन्दजी का स्वभाव भी वैसा ही था। ३. श्री बालकृष्णजी महायशस्वी हुए । ४. श्री गोकुलदास जी बडे धीर महापुरुष हुए । ५. श्री रघुनाथ जी महाराज एवं ६. श्री यदुनाथ जी महाराज अपने समगुणों से भजने योग्य हुए । ७. श्री घनश्याम जी सदा-सर्वदा प्रभुप्रेम मे पगे रहते थे, बड़े अनुरागी थे, हृदय मे हमेशा प्रभुक्री स्मृति सँजोये रहते थे । इनका भजन करना चाहिए ये सातों प्रत्यक्ष भगवादविभूति  थे, भगवद्भजन मे परम प्रवीण एवं समर्थ थे तथा श्री कृष्ण की ही भाँति ये भी संसार का उद्धार करनेवाले थे । भक्तमाल में श्री नाभादास जी स्पष्ट कहते है कि इन सातों महापुरुषों का यशोगान करना चाहिये , नित्य स्मरण करना चाहिए ।

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सुंदर कथा ९० (श्री भक्तमाल – श्री श्वपच वाल्मीकि जी ) Sri Bhaktamal – Sri Shwapach Valmiki ji

श्वपच वाल्मीकि नामक एक भगवान् के बड़े भारी भक्त थे, वे अपनी भक्ति को गुप्त ही रखते थे। एक बार की बात है, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमेंइतने ऋषि-महर्षि पधारे कि सम्पूर्ण यज्ञ स्थल भर गया भगवान् श्रीकृष्ण ने वहां एक शंख स्थापित किया और कहा कि यज्ञ के सांगोपांग पूर्ण हो जाने पर यह शंख बिना बजाये ही बजेगा। यदि नहीं बजे तो समझिये कि यज्ञ में अभी कुछ त्रुटि है, यज्ञ पूरा नही हुआ। वही बात हुई। पूर्णाहुति, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणादि सभी कर्म विधिसमेत सम्पन्न हो गये, परंतु वह शंख नहीं बजा। तब सबको बड़ी चिन्ता हुई कि इतने श्रम के बाद भी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। सभी लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कहा कि प्रभो ! आप कृपा करके बताइये कि यज्ञ में कौन-सी कमी रह गयी है। भगवान् श्री कृष्ण बोले-शंख न बजने का रहस्य सुनिये – पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८९ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्णसिंह जी ) Sri Bhaktamal – Sri Purna singh ji

श्री पूर्णसिंह जी परम सदाचारी , वीर एवं महान भगवद्भक्त थे । श्री कृष्ण प्रभु इनके इष्टदेव थे । ये आमेर नरेश श्री पृथ्वीराज जी के पुत्र थे । उनकी माता का नाम पदारथ देवी था । कविहृदय, परम भागवत श्री पूर्णसिंह जी नित्य नूतन सुंदर सुंदर पद रचकर अपने श्री ठाकुर जी को सुनाते । श्री ठाकुर जी को भी इनके पदों को सुनने मे बडा सुख मिलता । यदि कभी किसी कार्यविशेष की व्यस्तता में श्री पूर्णसिंह जी पद नही सुना पाते तो श्री ठाकुर जी स्वप्न मे इनसे पद सुनाने का अनुरोध करते । ऐसे दीवाने हो गए थे ठाकुर जी इनके पदों के ।  एक दो बार इस प्रक्रार का प्रसंग प्राप्त होनेपर इन्होंने दृढ नियम बना लिया की अब मै हर दिन भगवान को पद सुनाऊँगा  । बहुत समय तक नियम अक्षुष्ण रूप से चलता रहा । परंतु एक बार किसी राज्यकार्यवश इन्हें पद सुनाने का ध्यान नही रहा । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ८८ (श्री भक्तमाल – श्री भूगर्भगुसाई जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhugarbh gusai ji

श्री भूगर्भगेसाईं जी श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के कृपापात्र श्री गदाधर पण्डित जी के शिष्य थे । आप श्री लोकनाथ  गोस्वामी जी के साथ वृन्दावन आये थे और  फिर वृन्दावन मे ही रह गये, वृन्दावन से बाहर कही नहीं गये । ये संसार से परम विरक्त एवं भगवान की रूपमाधुरी मे अत्यन्त अनुरक्त थे । रसिक भक्तजनो के साथ  मिलकर आप उसी रूप माधुरी का आस्वादन करते रहते । भगवान का मानसी चिन्तन, मानसी अर्चन वन्दन ही आपके जीवन का आधार था । भगवान की मानसी मूर्ति को निरन्तर निहारा करते थे । आपके मन की वृत्ति सदा उसी युगलस्वरूप के चिन्तन मे लगी रहती थी । पढना जारी रखे