सुंदर कथा ११६ (श्री भक्तमाल – श्री बिहारिन दास जी) Sri Bhaktamal – Sri Biharin das ji

रसिकाचार्यो की मानसी सेवा –

श्री बिहारिन देव जी महाराज वृंदावन के हरिदासी सम्प्रदाय के एक रसिक संत हुए है । श्री विट्ठल विपुल देव जी से विरक्त वेश प्राप्त करके भजन मे लग गए । श्री गुरुदेव के निकुंज पधारने के बाद बांकेबिहारी लाल जी की सेवा का भार बिहारिन देव के ऊपर था । एक दिन बिहारिन देव जी प्रातः जल्दी उठकर श्रीयमुना जी मे स्नान करने गए और उनका मन श्री बिहारी जी की किसी लीला के चिंतन मे लग गया । उनकी समाधि लग गयी और वे मानसी भाव राज्य मे ही अपनी नित्य सेवा करने लगे ।

प्रातः काल भक्त लोग और नित्य दर्शन को आने वाले ब्रजवासी मंगला आरती हेतु आये । बहुत देर तक पट नही खुले तो वहां के सेवको से पूछा – क्या आज प्यारे को जगाया नही गया? अभी तक मंगला आरती क्यो नही हुई? सेवको ने कहा की पट तो तभी खुलेंगे जब श्री बिहारिन देव जी यमुना स्नान से लौटेंगे क्योंकि ताले की चाबी उन्ही के पास है और सेवा भी वही करते है । बिहारिन देव जी की मानसी सेवा से समाधि खुली शाम ५ बजे और वे स्थान पर वापास आये ।

वैष्णवो और ब्रजवासियों ने पूछा – बाबा! कहां रह गए थे? आज बिहारी जी को नही जगाया , भोग नही लगाया , सुबह से कोई अता पता नही । बिहारिन देव जी बोले – बिहारी जी ने तो आज बहुत बढ़िया भोग आरोगा है । रसगुल्ला, दाल, फुल्का, पकौड़ी, कचौरियां, जलेबी खाकर बिहारी जी प्रसन्न हो गए । आज मैने ठाकुर जी को सुंदर गुलाबी रंग की पोशाख पहनायी है और केवड़ा इत्र लगाया है । सारा गर्भ गृह केवड़े की सुंदर सुगंध से महक रहा है ।

ब्रजवासी बोले – बाबा हम सुबह से यही बैठे है । ताला खोलकर तुम कब आये और कब बिहारी जी का श्रृंगार करके भोग धराया ? कैसी अटपटी बाते करते हो , क्यो असत्य बात करते हो? बाबा कोई नशा कर लिया है क्या ?

बाबा बोले –

कोऊ मदमाते भांग के , कोऊ अमल अफीम ।
श्री बिहारीदास रसमाधुरी, मत्त मुदित तोफीम ।।

कोई भांग के नशे मे मस्त रहता है तो कोई अफीम के परंतु बिहारीदास तो बिहारिणी बिहारी जी के रस माधुरी के नशे मे मस्त रहता है ।

बिहारिन दास जी ने आगे जाकर पट खोले तो सबने देखा की बिहारी जी ने सुंदर गुलाबी पोशाख पहनी है, गर्भगृह से केवड़े का इत्र महक रहा है और बगल मे भोग सामग्री भी वही रखी है जो बाबा ने बताई थी । सब समझ गए की बिहारिन दास जी सिद्ध रसिक संत है और इनको मानसी सेवा सिद्ध हो चुकी है ।

सुंदर कथा ११५ (श्री भक्तमाल – श्री गणेशदास भक्तमाल जी) Sri Bhaktamal – Sri Ganeshdas ji

बाबा श्री गमेशदास भक्तमाली जी पर स्वयं श्री रामराजा सरकार की कृपा –

बाबा श्री गणेशदास भक्तमाली जी जब अपने विद्यार्थी जीवन की समाप्ति के बाद साधना के पथ पर निकले तो कुछ दिन विंध्याचल रहे, फिर चित्रकूट रहे और आगे चलते चलते जंगलों के रास्ते से ओरछा की तरफ बढ़े । जाते जाते रास्ता भटक गए , तीन दिन बाद जैसे तैसे ओरछा पहुंचे । तीन दिन से भूखे थे, इतनी भूख लगी कि वहां बेतवा नदी के तट पर बैठे बैठे थोड़ी मिट्टी खाकर जल पी लिया और वही सो गए । अगले दिन उठे तो सोचने लगे की आज तो एकादशी है, आज भी जल पीकर ही भजन करेंगे । भगवान के नाम का जाप करने बैठे उतने मे ही एक वैष्णव वहां आये और कहां की ब्रह्मचारी जी प्रणाम ! मै पंडित रामराजा ! यही ओरछा का रहने वाला हूं । आप भूख से पीड़ित लहते है । मेरे घर मे बहुत पवित्रता है अतः आप मेरे घर एकादशी का फलाहार करने पधारें । ब्रह्मचारी महाराज उनके साथ उनके घर गए और भगवान का प्रसाद पाकर वापस बेतवा नदी के तट पर आकर भजन करने लगे ।

अगले दिन द्वादशी के दिन पंडित राजाराम जी पुनः वहां आये और बोले – आज द्वादशी है ! शास्त्र कहता है की द्वादशी का पारायण करने से ही पुण्य मिलता है अतः आप प्रसाद पाने मेरे घर पधारें । कुछ दिन वही नदी किनारे रहकर भजन किया । एक दिन ब्रह्मचारी जी के मन आया कि चलो उन राजाराम पंडित से मिलकर आये और ओरछा मे निवास करने का कोई स्थान पूछा जाए । पूरे ओरछा मे घूम घूम कर पंडित राजाराम के घर का पता पूछा पर कुछ पता नही लगा, संध्याकाल होनेपर श्री रामराजा सरकार के मंदिर गए और वहां के पुजारी जी से पूछा – बाबा! आप की उम्र बहुत हो गयी यहां रहते रहते ।कृपया यह बताएं कि ओरछा मे कोई पंडित रामराजा निवास करते है क्या? पूरा ओरछा ढूंढ लिया पर पंडित रामराजा का कुछ पता नही लगा ।

पुजारी जी ने नेत्रों से अश्रु बहने लगे , उन्होंने कहा – वो कोई पंडित राजाराम नही थे, वे स्वयं रामराजा सरकार थे जिन्होंने आपको प्रसाद पवाया । मुझे श्री रामराजा सरकार ने स्वप्न दर्शन देकर कहा कि मेरा प्रिया भक्त काशी से ओरछा आएगा । आप उसके भोजन और निवास का इंतजाम मंदिर में ही कर दीजिए । कुछ महीने वही रहकर फिर श्री वृंदावन को आये ।


सुंदर कथा ११४ (श्री भक्तमाल – श्री दादू दीनदयाल जी) Sri Bhaktamal – Dadu Deendayal ji

संतो का हृदय कैसा होता है –संत दादू दयाल जी भिक्षा मांगने जिस रास्ते से निकलते वहां बीच मे एक ऐसा घर पड़ता था जहां रहने वाला व्यक्ति दयाल जी की भरपूर निंदा करता था । उनको देखते ही कहता था – बडा संत बना फिरता है, बड़ा ज्ञानी बना फिरता है । कई प्रकार के दोष गिनाता और अंदर चला जाता । कई बार जब वह निंदक नजर नही आता तब भी दयाल जी उसके मकान के सामने कुछ देर प्रतीक्षा करते और आगे बढ़ जाते । कुछ दिन वह निंदक नही दिखाई पड़ा तो दयाल जी ने आसपास पूछा । पूछने पर पता लगा की उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है । इस बात से दयाल जी अत्यंत दुखी होकर जोर जोर से रोने लगे । शिष्य ने पूछा – गुरुदेव ! आप क्यों रोते हो? दयाल जी ने कारण बताने पर शिष्य बोला – वह तो आपका निंदक था , वह मर गया तो आप को प्रसन्न होना चाहिए परंतु आप तो रो रहे है – ऐसा क्यों ? दयाल जी बोले – वह मेरी निंदा करके मुझे सदा स्मरण करवाता रहता की मै कोई संत महात्मा नही हूँ, मै कोई ज्ञानी नही हूं, वह मुझे स्मरण करता रहता था की यह संसार कांटो से भरा है । वह मुझे ज्ञान और त्याग का अहंकार नही होने देता था । यह सब उसने मेरे लिए किया वह भी मुफ्त मे । वह बडा नेक इंसान था, अब उसके जाने पर मेरे मन का मैल कौन धोएगा ?इतना ही नही , इसके कुछ दिन बाद वह व्यक्ति दिव्य शरीर धारण करके दयाल जी के सामने प्रकट हुआ । उससे दयाल जी ने पूछा की तुम्हारी तो कुछ समय पहले मृत्यु हो चुकी थी ? उस व्यक्ति ने कहां – आप जैसे परम संत की निंदा करने के पाप से मैं प्रेत योनि मे चला गया था और कुछ दिनों से कष्ट पा रहा था परंतु कुछ दिनों के बाद मेरी मृत्यु की घटना सुनते ही आपने मेरा स्मरण किया और प्रभु से मेरे उद्धार की प्रार्थना भी की । मुझ जैसे निंदक पर भी आप जैसे महात्मा कृपा करते है । आप जैसे परम नामजापक संत के संकल्प से मै प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक को जा रहा हूँ ।

There was a notorious person who used to say bad words(Ninda/burai) to saint Dadu Dayal jee. Everyday as soon as dadu deendayal would start roaming for daily alms and prachar, this wicked person would come and abuse saint dadu deendayal. This continued for long period of time. One day dadu deendayal started crying when he did not see that wicked person. The disciples asked – Gurudev what happened ? Why are you crying ? Dadu deendayal said – My nindak is no more. He used to clean my soul and mind everyday. He used to show me my faults and constantly reminded me that i am not perfect. He did all this for me , and that too for free. He was a great person. I will become dirty now, who will clean me everyday ?सुना कि निंदक मर गया , तो दादू दीना रोए ।।

सुंदर कथा ११३ (श्री भक्तमाल – श्री रामकृष्ण दास जी) Sri Bhaktamal – Ramkrishna Das ji

संतो के श्रीमुख से निकला वाक्य सत्य ही होता है -श्री गिरिराज गोवर्धन जी की तरहठी में एक सिद्ध गौड़ीय वैष्णव संत रहते थे श्री रामकृष्ण दास जी जिनको सभी श्री पंडित बाबा के नाम से जानते थे । एक ब्रजवासन स्त्री संत बाबा की सेवा करने रोज आती और उनको फल आदि दे जाती । बाबा किसी को कभी अपना शिष्य नहीं बनाते थे । एक बार वह भोली ब्रजवासन स्त्री बाबा के पास आकर बोली – बाबा ! मुझे कौनसा मंत्र जपना चाहिए ? बाबा ने पूछा – बेटी कौनसे कुल से हो ? कौनसे संप्रदाय से हो ?उस स्त्री ने उत्तर दिया की बाबा मै तो वल्लभ कुल की हूँ। बाबा बोले – बेटी वल्लभ कुल में तो एक ही मंत्र जपा जाता है अष्टाक्षर मंत्र – श्री कृष्णः शरणम् मम , तुम भी यही जपा करो । ब्रजवासन स्त्री बोली – बाबा ! यह नाम ( कृष्ण ) मेरे मुन्ना (बेटे) के चाचा अर्थात मेरे जेठ जी का है , मै नहीं जप सकती । मुझे लाज आती है । बाबा बोले – अच्छा फिर क्या जप सकती हो ?उनको क्या कहकर पुकारती हो ? स्त्री ने कहा – हम तो मुन्ना के चाचा ही कहते है उनको । बाबा बोले – तो तुम “मुन्ना के चाचा शरणम मम ” जपो परंतु रूप ध्यान और मन से स्मरण भगवान् श्रीकृष्ण का ही रखना । फिर बाबा बोले – अच्छा और क्या पूछना चाहती है बता ? स्त्री बोली – बाबा मेरे मन में एक इच्छा है की भगवान् मुझे बड़ी एकादशी के दिन ही अपने धाम लेकर जाए ।बाबा मुस्कुराये और बोले ठीक है ऐसा ही होगा । तू यह बताया हुआ नाम जप और अंदर से भाव स्मरण भगवान् का ही रखना । बाबा के शरीर छोडने के बाद जब वह स्त्री भी बूढी हो गयी और कुछ ही समय बाद जब बड़ी एकादशी आयी तो एकाएक एक नीला तेज प्रकट हुआ ,भगवान स्वयं उसे लेने आये और कहा की चल मेरे साथ, मै तुझे ले जाने आया हूँ । भगवान् ने याद दिलाया की तूने पंडित बाबा से इच्छा कही थी की इसी दिन भगवान् मुझे अपने धाम ले जाए । आज मै बाबा की वाणी सत्य करने आया हूं । मंत्र तो अजब गजब का था पर संत के मुख से निकल था ,इसी मंत्र का स्मरण करती हुई वह स्त्री श्री भगवान् के साथ गोलोक धाम को चली गयी ।

सुंदर कथा ११२ (श्री भक्तमाल – श्री खेताराम जी) Sri Bhaktamal – Sri Khetaram ji

संत वेश में श्रद्धा और संत प्रसादी का माहात्म्य –

संत श्री खेताराम जी का जन्म एक राज पुरोहित विप्र परिवार मे राजस्थान के आसोतरा मे हुआ था । आपने आसोतरा में ब्रम्हा जी का मंदिर बनवाया और ब्रम्ह पीठ की स्थापना की । आपके बचपन में एक अवधूत कोटि के सिद्ध संत आये और उन्होंने गांव मे भिक्षा मंगाई । एक व्यक्ति ने भिक्षा लायी । सबने कहा – बाबा भिक्षा पाओ और कृपा करके कुछ प्रसाद भी दो । संत ने भिक्षा पात्र में भिक्षा पाकर प्रसाद के रूप में कुछ शेष नही छोड़ा अपितु खायी हुई जूठन उगल दी और बोले लो प्रसादी लेलो – पी जाओ । सब बच्चे और जवान छी ! छी ! राम राम कहकर किसी तरह भाग गए पर खेता राम जी की संतो मे और संत वेश में इतनी श्रद्धा थी की वे संत का प्रसाद आदर से पी गए और तत्काल उसी क्षण सिद्ध हो गए । संत की सीथ प्रसादी से केवल १२ वर्ष की आयु में समस्त सिद्धियां प्राप्त हो गयी ।

सुंदर कथा १११ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath Das Goswami ji

संत श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधाकुंड गोवर्धन मे रहकर नित्य भजन करते थे । नित्य प्रभु को १००० दंडवत प्रणाम, २००० वैष्णवों को दंडवत प्रणाम और १ लाख हरिनाम करने का नियम था । भिक्षा मे केवल एक बार एक दोना छांछ (मठा) ब्रजवासियों के यहां से मांगकर पाते । एक दिन बाबा श्री राधा कृष्ण की मानसी सेवा कर रहे थे और उन्होंने ठाकुर जी से पूछा कि प्यारे आज क्या भोग लगाने की इच्छा है ? ठाकुर जी ने कहां बाबा ! आज खीर पाने की इच्छा है , बढ़िया खीर बना । बाबा ने बढ़िया दूध औटाकर मेवा डालकर रबड़ी जैसी खीर बनाई । ठाकुर जी खीर पाकर बड़े प्रसन्न हुए और कहा बाबा ! हमे तो लगता था कि तू केवल छांछ पीने वाला बाबा है , तू कहां खीर बनाना जानता होगा ? परंतु तुझे तो बहुत सुंदर खीर बनानी आती है । इतनी अच्छी खीर तो हमने आजतक नही पायी, बाबा ! तू थोड़ी खीर पीकर तो देख । बाबा बोले – हमको तो छांछ पीकर भजन करने की आदत है और आँत ऐसी हो गयी कि इतना गरिष्ट भोजन अब पचेगा नही , आप ही पीओ ।ठाकुर जी बोले – बाबा ! अब हमारी इतनी भी बात नही मानेगा क्या? बातों बातों में ठाकुर जी ने खीर का कटोरा बाबा के मुख से लगा दिया । भगवान के प्रेमाग्रह के कारण और उनके अधरों से लगने के कारण वह खीर अत्यंत स्वादिष्ट लगी और बाबा थोड़ी अधिक खीर खा गए । मानसी सेवा समाप्त होने पर ठाकुर जी तो चले गए गौ चराने और बाबा पड गए ज्वर (बुखार) से बीमार। ब्रजवासियों मे हल्ला मच गया कि हमारा बाबा तो बीमार हो गया है । बात जब जातिपुरा (श्रीनाथ मंदिर) मे श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने वैद्य से कहाँ की जाकर श्री रघुनाथ दास जी का उपचार करो, वे हमारे ब्रज के महान रसिक संत है । वैद्य जी ने बाबा की नाड़ी देख कर बताया कि बाबा ने तो खीर खायी है ।ब्रजवासी वैद्य से कहने लगे – २० वर्षो से तो नित्य हम बाबा को देखते आ रहे है, ये बाबा तो ब्रजवासियों के घरों से एक दोना छांछ पीकर भजन करता है । बाबा कही आता जाता तो है नही , खीर खाने काहाँ चला गया? ब्रजवासी वैद्य से लड़ने लगे और कहने लगे कि तुम कैसे वैद्य हो – तुम्हें तो कुछ नही आता है ।
वैद्य जी बोले – मै अभी एक औषधि देता हूं जिससे वमन हो जाएगा (उल्टी होगी) और पेट मे जो भी है वह बाहर आएगा । यदि खीर नही निकली तो मैं अपने आयुर्वेद के सारे ग्रंथ यमुना जी मे प्रवाहित करके उपचार करना छोड़ दूंगा । ब्रजवासी बोले – ठीक है औषधि का प्रयोग करो । बाबा ने जैसे ही औषधि खायी वैसे वमन हो गया और खीर बाहर निकली । ब्रजवासी पूछने लगे – बाबा ! तूने खीर कब खायी? बाबा तू तो छांछ के अतिरिक्त कुछ पाता नही है , खीर कहां से पायी?रघुनाथ दास जी कुछ बोले नही क्योंकि वे अपनी उपासना को प्रकट नही करना चाहते थे अतः उन्होंने इस रहस्य को गुप्त रहने दिया और मौन रहे । आस पास के जो ब्रजवासी वहां आए थे वो घर चले गए परंतु उनमे बाबा के प्रति विश्वास कम हो गया, सब तरफ बात फैलने लगी कि बाबा तो छुपकर खीर खाता होगा । श्रीनाथ जी ने श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी को सारी बात बतायी और कहां की आप जाकर ब्रजवासियों के मन की शंका को दूर करो – कहीं ब्रजवासियों द्वारा संत अपराध ना हो जाए । श्री विट्ठलनाथ गुसाई जी ने ब्रजवासियों से कहां की श्री रघुनाथ दास जी परमसिद्ध संत है । वे तो दीनता की मूर्ति है, बाबा अपने भजन को गुप्त रखना चाहते है अतः वे कुछ बोलेंगे नही । उन्होंने जो खीर खायी वो इस बाह्य जगत में नही , वह तो मानसी सेवा के भावराज्य में ठाकुर जी ने स्वयं उन्हें खिलायी है ।

सुंदर कथा ११० (श्री भक्तमाल – श्री दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी जी) Sri Bhaktamal – Sri Durgaprasad ji

पूज्य श्री दुर्गाप्रसाद चतुर्वेदी जी (मोटेगणेश वाले संत जी) श्री वृंदावन के महान सिद्ध संत हुए है । वे सदा श्री भरतलाल जी के भाव से भगवान की सेवा मे लगे रहते थे और जिस प्रकार भरत जी १४ वर्ष रहे उसी प्रकार से वे भी रहते थे । एक दिन श्री मानस जी का पाठ करते करते उन्होंने पढ़ा –

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ।। जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ।।

अर्थात – यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में जीवों को पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं ।।

भाव मे भरकर वे मन से ही श्री अयोध्या पहुँच गए और श्री अयोध्या और सरयू जी को साष्टांग प्रणाम किया । सरयू जी मे गोता लगाया तो देखा कि चारो भाई जल में है और जैसे ही बाहर आये चारो उनपर जल उछालने लगे, श्री राम जी सहित तीनो भाइयो ने उन्हें हृदय से लगाया । श्री सीता जी ने आशीर्वाद दिया और जैसे ही नेत्र खोले तो स्वयं को आसान पर बैठे वृंदावन में अपने स्थान पर पाया । उनकी पत्नी कुछ देर में आयी और देखा कि उनका शरीर और वस्त्र जल से भीग रहे है , वस्त्रों और पैरों पर रज के कण लगे है । पत्नी के बहुत पूछने पर उन्होंने सारी बात बतायी और दोनों ने सरकार की कृपा का अनुभव करके भाव मे डूब गए ।

उन्होंने जीवन मे सभी को एक अमूल्य उपदेश दिया है – श्रीकृष्ण के बनकर, श्री कृष्ण के लिए , श्री कृष्ण का भजन करो ।

बाबा गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी की वाणी से दास ने जैसा सुना वैसा लिखा है ।

सुंदर कथा १०९ (श्री भक्तमाल – श्री रघुनाथ शरण जी) Sri Bhaktamal – Sri Raghunath sharan ji

आज स्मृति मे एक अद्भुत संत की लीला आयी- हमारे नामजपक संत की वह लीला सुनता हूं । श्री रघुनाथ शरण बाबा एक बार संत मंडली के साथ कथा के निमित्त मुंबई आये थे । विचरण करते एक हॉस्पिटल (नाम नही लिखूंगा) सामने कोई संतप्रेमी मिला तो उससे बात कर रहे थे । हाल ही मे नया नया हॉस्पिटल बनाया था और अच्छा चलने भी लगा था ।

इतने में वहां का मालिक बडा डॉक्टर निकला और चिल्लाया – ए यहां क्या बात कर रहे हो, क्यो आये हो यहां, कामधाम होता नही बाबाजी लोगो को दिनभर राम राम करते डोलते है , राम राम करने से सब हो जाता है क्या ?
संत जी ने उसको प्रेम से राम नाम का महात्म्य बताया पर वह घमंड दिखाने लगा । संत ने कहा- डॉक्टर साहब, राम नाम की शक्ति देखनी है तो ठीक है । हाथ मे जल लिया और कहां सीताराम -जल छोड़ दिया । डॉक्टर से बोले अब कुछ दिन छुट्टी ले लो, कुछ दिन यहां कोई इलाज कराने नही आएगा -ऐसा बोलकर चले गए । डॉक्टर को समझ मे आया नही और वो घर चला गया ।

कुछ देर मे उसके हॉस्पिटल के बाबू (सेवक) ने घर जाकर बताया कि साहब आज पता नही क्या हो गया , सारे मरीज एकदम स्वस्थ हो गए -बड़े बड़े गंभीर बीमारी में पड़े मरीज भी अचानक उठ खड़े हुए और जांच करने पर शरीर पूरा अच्छा रोगमुक्त मिला । कई दिनों से बेहोश पड़े लोग भी पता नही कैसे उठ खड़े हुए । कुछ दिन तक वहां जो आता, उसकी जांच कराने पर कुछ नही मिलता । अंत मे वो डॉक्टर समझ गया की मै तो संतो को दरिद्री-भिक्षुक- बेकार सनाझता था पर मै तो मूर्ख और अपराधी हूं, उसने भगवान से क्षमा मांगी । कुछ दिन बाद बाबा अपने आश्रम वापस जाने को थे उस दिन हॉस्पिटल गए, डॉक्टर अपने कक्ष के बाहर परेशान हुए बैठा था।

बाबा सरकार को देखते ही चरण पकड़ लिया। बाबा बोले एक राम नाम मे कितनी शक्ति है यह तुम देख चुके, अब भजन खूब करो – संत कभी चमत्कार नही दिखाते पर कुछ लोगो को मार्ग पर लाने के लिए ठाकुर जी लीला करते है । नाम का महात्म्य जानकर वह सब छोड़कर कही भजन करने निकल गया और पुनः नही आया ।

सुंदर कथा १०८ (श्री भक्तमाल – श्री राममंगल दस जी और एक भक्ता ) Sri Bhaktamal – Sri Rammangal das ji aur Ek premi Bhakta

पूज्यपाद श्री जानकीदास बाबा सरकार ने कृपा कर के कई वर्षो पूर्व इस लीला को सुनाया था, वही लीला यहां संतो की कृपा से लिखने का प्रयास कर रहा हूं –

श्री अयोध्या मे एक सिद्ध कोटि के संत हुए है श्री राममंगल दास जी महाराज । वही महाराज जी के निवास स्थान के पास में एक मिथिला क्षेत्र की स्त्री रहती थी । उसके पास किसी वस्तु का संग्रह नही था , बस एक गाय के दूध से भरा लोटा और एक कपड़े में श्री रामचरित मानस जी की पोथी । पूरे दिन उसका यही काम था कि जहां भी जाती – प्रभु को रामायण की कथा सुनाती । कनक भवन जाती तो वहां चौपाइयों के रस का आस्वादन करती , कही अन्यत्र जाती तो वहां भी यही नियम था । वह स्त्री ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी बस हिंदी पढ़ और समझ लेती थी । श्री मानस जी मे उसका दृढ़ विश्वास था । एक दिन महाराज जी रेल गाड़ी में बैठकर प्रयाग (इलाहाबाद) के माघ मेला में जा रहे थे ।

वह भक्ता भी उसी डिब्बे में बैठ गयी । संत महाराज जी को देखकर उसने चरणों मे प्रणाम किया और दोनों मे कुछ संवाद हुआ । महाराज जी ने पूछा – बेटी ! तुम्हारे गुरुदेव कहा विराजते हैं , गुरुद्वार (गुरुस्थान) कहां पर है तुम्हारा ? उस भक्ता ने श्री रामचरितमानस की पोथी मस्तक से लगाकर अश्रुपात करते हुए एक चौपाई कही –

गुरु यही, गुरुद्वार यही । इन्ही की सेवा मे मन लाऊं ।।
जहां जहां जाऊ ,वहां तुलसीकृत रामायण ही गाऊं ।।

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सुंदर कथा १०७ (श्री भक्तमाल – श्री टीला जी ) Sri Bhaktamal – Sri Teela ji

बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी ने दास को जैसा सुनाया वैसा लिख रहा हूं :

नाभादास जी वर्णन करते है – संसार में भरतखंड रुपी सुमेरुपर्वत के शिखर से समान श्री टीलाजी एवं उनके विरक्त शिष्य श्री लाहा जी की परंपरा बहुत प्रसिद्ध हुई ।ब्रह्माण्ड में सबसे ऊँचा पर्वत सुमेरु पर्वत कहा जाता है । पर्वतो का राजा सुमेरु जम्बुद्वीप के मध्य में इलावृत देश में स्थित है ।यह पूरा पर्वत स्वर्णमयी है । इसके शिखर पर २१ स्वर्ग है जहां देवता विराजते है । सभी देवताओ के लोक और ब्रह्मा जी का लोक भी सुमेरु पर्वत पर स्थित है । जैसे सभी देशो में भारत और सभी पर्वतो में सुमेरु ऊँचा है उसी प्रकार श्री कृष्णदास पयहारी जी के शिष्य टीला जी के भजन की पद्धति सुमेरु के सामान है अर्थात सर्वोपरि पद्धति है । यह भजन की पद्धति कौनसी है ? वह है संतो और गौ माता की सेवा।

जन्म और बाल्यकाल :

श्रीटीला जी महाराज का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल १०, सं १५१५ वि.को राजस्थान के किशनगढ़ राज्यान्तर्गत सलेमाबाद मे हुआ था । कुछ संतो का मत है की जन्म खाटू खण्डेला के पास कालूड़ा गाँव में हुआ था । इनकेे पिता श्री हरिराम जी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पण्डित और माता श्रीमती शीलादेवी साधु-सन्त सेवी सद्गृहिणी थी । पिता परम प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध जोशी गोत्रीय ब्राह्मण थे । इनके माता-पिता को बहुत समयतक कोई संतान नहीं थी, बादमे आबूराज निवासी एक सिद्ध संत के आशीर्वाद से इनका जन्म हुआ था । सन्तकृपा, तीर्थक्षेत्र का प्रभाव, पूर्वजन्म के संस्कारो और और माता – पिता की भक्ति के सम्मिलित प्रभाव से बालक टीलाजी मे बचपन से ही भक्ति के दिव्य संस्कार उत्पन्न हो गये थे, जो आयु और शस्त्रानुशीलन के साथ-साथ बढते ही रहे ।

श्री गायत्री महामंत्र जप के प्रभाव सेे टीला जी को श्री गायत्री और सरस्वती जी का साक्षात् दर्शन हुआ । ४ वेद ६ शास्त्र १८ पुराण उनके अंतःकरण में प्रकट हो गए । बचपन मे ही यह बालक किसी ऊँचे टीलेपर (ऊँची जगह अथवा रेत के पहाड़ के ऊपर )चढकर बैठ जाता और किसी सिद्ध सन्त की भाँति समाधिस्थ हो जाता, इस प्रवृत्ति को देखकर ही लोगो ने इनका नाम टीलाजी रख दिया ।

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