सुंदर कथा ९९ (श्री भक्तमाल – श्री पीपा जी ) Sri Bhaktamal – Sri Peepa ji

पूज्य श्री नारायणदास भक्तमाली मामाजी, श्री राजेंद्रदासाचार्य जी , बाबा गणेशदास जी द्वारा श्री रामानंद पुस्तकालय की भक्तमाल और गीता प्रेस भक्तमाल से श्री पीपानंदचार्य जी का चरित्र :

भक्तवर श्री पीपा जी पहले भवानी देवी के भक्त थे । मुक्ति मांगने के लिये आपने देवी का ध्यान किया, देवी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर सत्य बात कही कि -मुक्ति देने की शक्ति मुझमे नहीं है, वह शक्ति तो भगवान मे है । उनकी शरण मे जाना ही सुदृढ साधन है । देवीजी केउपदेशानुसार आचार्य श्रीरामानन्द जी के चरणकमलों का आश्रय पाकर श्रीपीपाजी अति भक्तिकी अन्तिम सीमा हुए । गुरुकृपा एवं अतिभक्ति के प्रभाव से आपमे असंख्य अमूल्य सदूगुण थे, उन्हें सन्तजन सदा गाते रहते है । भक्त ,भगवन्त और गुरुदेव की आपने ऐसी आराधना की कि उसका स्पर्श करके अर्थात् देख-सुन और समझ करके सम्पूर्ण वैष्णवो की आराधना-प्रणाली अत्यन्त सरस हो गयी । आपने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण संसार का कल्याण किया । इसका प्रमाण यह है कि आपने परम हिंसक सिंह को उपदेश देकर अहिंसक और विनीत बना दिया ।

१. श्री स्वामी रामानंदाचार्य का शिष्य बनने की कथा :

गागरौनगढ़ नामक एक विशाल किला एवं नगर है, वहाँ पीपा नामक एक राजा हुए । वे देवी के बड़े भक्त थे । एक बार उस नगर मे साधुओं की जमात आयी । राजाने जमात का स्वागत करके कहा – देवीजी को चालीस मन अन्न का भोग लगता है, सभी लोग प्रसाद लेते है, आपलोग भी देवीजी का प्रसाद ग्रहण कीजिये । साधुओं ने कहा-हमारे साथ श्री ठाकुर जी हैं, हम उन्ही को भोग लगाकर प्रसाद लेते है, दूसरे देवी – देवताओं का नही । तब राजाने उन्हें सीधा-सामान दिया । साधुओं ने रसोई करके भगवान का भोग लगाया और मन ही मन प्रार्थना की -हे प्रभो ! इस राजा की बुद्धि को बदल दीजिये, इसे अपना भक्त बना लीजिये ।रात को जब राजा महल में सोया तो उसने एक बडा भयानक स्वप्न देखा कि एक विकराल देहधारी प्रेत ने उसे पटक दिया है और उस कारण राजा भयभीत होकर रोने लगा । जागते ही राजाने स्वप्न की घटनापर विचार किया, तब उसे वैराग्य हो गया । अब राजा के सोचने -विचारने की रीति दूसरी हो गयी । उसे भगवान की भक्ति विशेष प्रिय लगने लगी ।
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सुंदर कथा ९८ (श्री भक्तमाल – श्री सरस्वती जी ) Sri Bhaktamal – Sri Saraswati ji

श्रीपाद देवादास जी महाराज और अयोध्या के महात्म्या श्री सीतारामशरण जी के कृपाप्रसाद से सुनी सत्य घटना –

श्री महाराज जी ने इस चरित्र को कई बार सुनाया –
अयोध्या के बहुत निकट ही पौराणिक नदी कुटिला है – जिसे आज टेढ़ी कहते है, उसके तट के निकट ही एक भक्त परिवार रहता था । उनके घर एक सरस्वती नाम की बालिका थी । वे लोग नित्य श्री कनक बिहारिणी बिहारी जी का दर्शन करने अयोध्या आते थे । सरस्वती जी का कोई सगा भाई नही था , केवल एक मौसेरा भाई ही था । वह जब भी श्री रधुनाथ जी का दर्शन करने आती, उसमे मन मे यही भाव आता की सरकार मेरे अपने भाई ही है ।

उसकी आयु उस समय मात्र दो वर्ष की थी । रक्षाबंधन से कुछ समय पूर्व उसने सरकार से कहा की मै आपको राखी बांधने आऊंगी । उसने सुंदर राखी बनाई और रक्षाबंधन पूर्णिमा पर मंदिर लेकर गयी । पुजारी जी से कहा कि हमने भैया के लिए राखी लायी है । पुजारी जी ने छोटी सी सरस्वती को गोद मे उठा लिया और उससे कहा कि मै तुम्हे राखी सहित सरकार को स्पर्श कर देता हूं और राखी मै बांध दूंगा। पुजारी जी ने राखी बांध दी और उसको प्रसाद दिया । अब हर वर्ष राखी बांधने का उसका नियम बन गया । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९७ (श्री भक्तमाल – श्री भगवंतमुदित जी ) Sri Bhaktamal – Sri Bhagvant mudit ji

श्री माधवदास जी के सुपुत्र श्री भगवन्तमुदित जी ने रसिक भक्तों से समर्थित तुलसीकंठी और तिलक धारणकर अपने इष्टदेव श्री राधाकृष्ण की नित्य नियम से सेवा की तथा उदार भगवान के परमोदार सुयश का अपनी वाणी से वर्णन करके उसके रस का आस्वादन किया । श्री कुंजबिहारिणी कुंजबिहारी की नित्य निकुंज लीला इनके हृदय मे सर्वदा प्रकाशित रहती थी । दम्पति श्री राधाकृष्ण का जो पारस्परिक सहज स्नेह और प्रीतिकी जो अन्तिम सीमा है, उससे आपका हृदय प्रकाशित था । अनन्य भाव से सेवा करने की जो रसमयी रीति है, उसीको आपने उत्तम से उत्तम मार्ग मानकर अपनाया, उसीपर चले । भक्ति से भिन्न लौकिक -वैदिक -विधि- निषेधों का सहारा छोड़कर आपका हृदय विशेषकर श्री राधाकृष्ण के परमानुराग मे सराबोर रहता था।

श्री भगवन्तमुदित जी परमरसिक सन्त थे । आप आगरा के सूबेदार नबाब शुजाउल्युल्क के दीवान थे । कोई भी ब्राह्मण, गोसाई, साधु या गृहस्थ ब्रजवासी जब आपके यहाँ पहुँच जाता तो आप अन्न, धन और वस्त्र आदि देकर उसे प्रसन्न करते थे; क्योंकि व्रजबासियों के प्रेम मे इनकी बुद्धि रम गयी थी । आपके गुरुदेव का नाम श्री हरिदासजी था । ये श्रीवृन्दावन के ठाकुर श्री गोविन्ददेव जी मन्दिर वे अधिकारी थे । इन्होंने व्रजवासियों के मुख से श्री भगवन्तमुदित जी की बडी प्रशंसा सुनी तो इनके मन मे आया कि हम भी आगरा जाकर (शिष्य) भक्त की भक्ति देखें । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९६ (श्री भक्तमाल – श्री कान्हार दास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Kanhardas ji

श्री कान्हरदास जी ने सन्तो की कृपा से यह महान् लाभ प्राप्त किया कि अपने हृदय मे भगवान को स्थापित किया । इन्होंने गुरुदेव की शरण मे आकर भक्तिमार्ग को सच्चा, सात्विक, सरल और श्रेष्ठ जाना । आपने संसार धर्म को त्यागकर क्या सत्य है और क्या झूठ है, इस बात को पहचाना और सत् ग्रहण तथा असत् का त्याग किया । भगवद्धर्म को स्वीकार किया । आप संसार से उसी प्रकार अलग रहे, जैसै पेड की शाखा से चन्द्रभा अलग और दूर रहता है, लेकिन दिखाने के लिये पेड़ के पास मे बताया जाता है । आप संसार के सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखते थे । अनेक सद्गुणों से युक्त थे । अत: आप महान् थे । आपने अपने मुख से सदा सज्जनों – भक्तों क्री प्रशंसा की । मिथ्या, कटु और परनिन्दारूप कुवचन आपने कभी नहीं कहे ।

भक्तमाल में श्री कान्हरदास जी के विषय मे विवरण इस प्रकार है :

श्री कान्हरदास जी समदर्शी सन्त थे । किसी सन्त से कोई भूल भी हो जाय तो श्री कान्हरदास जी कटु शब्दों का प्रयोग नही करते थे । आप सन्तसेवी तो थे ही, अत: सन्तो का आवागमन आपके यहाँ बना ही रहता था । एक बार दो सन्त आये, वे कई दिनोंसे भूखे थे । जितना प्रसाद था वह आपने उन संतो को दे दिया । परंतु उसे पाकर भी तृप्त न हुए अत: उन्होने कान्हर दास जी के घरसे एक धातुपात्र(बर्तन) ले जाकर हलवाई के हाथ बेच दिया और दोनों ने भरपेट लड्डू-पेडा खाया । यह जानकर आपका शिष्य सन्तो को फटकारने लगा । उस अज्ञानी शिष्य को आपने समझाया, कि सन्त बर्तन बेचकर खा गये तो अपना ही खाये । हम संतो के दास है । यह सब सामग्री रामजी की है और ये संत भी रामजी के ही है । यह जो चाहे वह करने में समर्थ है ।संत भगवान से भी बढ़कर होते है। पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९५ (श्री भक्तमाल – श्री पूर्ण परमानंदाचार्य जी ) Sri Bhaktamal – Sri Parmanandacharya ji

श्री श्री पूर्णवैराठी रामेश्वर दास जी महाराज का कृपाप्रसाद –

श्री पूर्णजी (परमानंदाचार्य )की महिमा अपार है, कोई भी उसका वर्णन नहीं कर सकता है । आप उदयाचल और अस्ताचल – इन दो ऊँचे पर्वतो के बीच बहनेवाली सबसे बडी ( श्रेष्ठ ) नदी के समीप पहाड़ की गुफामे रहते थे । योग की युक्तियों का आश्रय लेकर और प्रभु मे दृढ विस्वास करके समाधि लगाते थे । व्याघ्र, सिंह आदि हिंसक पशु वहीं समीप मे खड़े गरजते रहते थे, परंतु आप उनसे जरा भी नही डरते थे । समाधि के समय आप अपान वायु को प्राणवायु के साथ ब्रह्माण्ड को ले जाते थे, फिर उसे नीचे की और नहीं आने देते थे । आपने उपदेशार्थ साक्षियों की, मोक्षपद प्रदान करनेवाले पदों की रचना क्री । इस प्रकार मोक्षपद को प्राप्त श्री पूर्णजी की महिमा प्रकट थी ।

१. श्री पूर्ण जी भगवत्कृपा प्राप्त श्री रामभक्त सन्त थे । एक बार आपका शरीर अस्वस्थ हो गया । आपको औषधि के लिये औंगरा ( एक जडी ) की आवश्यकता थी । आस पास उस समय कोई नही था जिससे जडी लाने कहा जाये । इनके मन की बात जानकर भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और औंगरा लाकर दिया । जिससे ये स्वस्थ हो गये । भगवत्कृपाका अनुभव करके आप प्रेम-विभोर हो गये । आप पूर्णतया अकाम और सभी प्रकार की आसक्तियोंसे रहित थे । पढना जारी रखे

सुंदर कथा ९४ (श्री भक्तमाल – श्री केशवभट्ट काश्मीरी जी ) Sri Bhaktamal – Sri Keshavbhatt ji

श्री केशवभट्ट जी मनुष्यों मे मुकुटमणि हुए । जिनकी महा महिमा सारे संसार मे फैल गयी । आपके नाम के साथ ‘काश्मीरी’ यह विशेषण अति प्रसिद्ध हो गया था । आप पापों एवं पापरूप लोगों को ताप देने वाले तथा जगत के आभूषण स्वरूप थे । आप परम सुदृढ श्री हरिभक्तिरूपी कुठार से पाखण्ड धर्मरूपी वृक्षो का समूलोच्छेद करनेवाले हुए । आपने मथुरापुरी में यवनों के बढते हुए आतंक को देखकर उनसे वाद विवादकर उन परम उद्दण्ड यवनों को बलपूर्वक हराया । अनेकों अजेय काजी आपकी सिद्धि का चमत्कार देखकर एकदम भयभीत हो गये । आपका उपर्युक्त सुयश सारे संसार मे प्रसिद्ध है, सब सन्त इनके साक्षी है ।

आपका जन्म काश्मीरी ब्राह्मण कुल मे बारहवी शताब्दी के लगभग हुआ माना जाता है । कुछ इतिहासवेत्ताओं का कथन है कि काशी मे श्री रामानन्द जी और नदिया मे श्री चैतन्यदेव जी से आपका सत्संग हुआ था । एक बार दिग्विजय (देश के सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते हुए यात्रा करना ) निमित्त पर्यटन करते हुए आप नवद्वीप (बंगाल) मे आये । वहाँ का विद्वद्वर्ग आपसे भयभीत हो गया । तब श्री कृष्णचैतन्य महाप्रभु अपने शिष्यवर्ग को साथ लेकर श्री गंगाजी के परम सुखद पुलिनपर जाकर बैठ गये और बालकों को पढाते हुए शास्त्रचर्चा करने लगे । उसी समय टहलते हुए श्री केशवभट्ट जी भी आकर आपके समीप बैठ गये । तब श्रीमहाप्रभुजी अत्यन्त नम्रतापूर्वक बोले -सारे संसार में आपका सुयश छा रहा है, अत: मेरे मन मे यह अभिलाषा हो रही है कि मै भी आपके श्री मुख से कुछ शास्त्र सम्बन्धी चर्चा सुनूँ ।
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सुंदर कथा ९३ (श्री भक्तमाल – श्री जापू जी ) Sri Bhaktamal – Sri Jaapu ji

श्री जापू जी परम प्रेमी भगवद्भक्त थे । इनके श्रीमुख से सदा भगवान का नाम सीताराम सीताराम का जाप होता रहता अतः इनका नाम श्री जापू जी पड गया । नित्य ही सन्त-भगवन्त-सेवा एवं उत्सवों की धूम आपके यहाँ मची रहती थी । इन्होंने अपने समस्त धन संतो की सेवा में लगा दिया परंतु कुछ काल मे सब धन व्यय हो गया । अपना सर्वस्व व्यय करने के बाद आप सन्त सेवा के निमित्त राहजनी (लूट, डकैती) करने लगे । एक बार आपके यहाँ संतो की मंडली पधारी और घर पर ना धन था और ना कुछ अन्न । पास ही में एक सुनार रहता था जो सोने में मिलावट आदि करके बेचता था और वह सुनार कभी शुभ कार्य मे धन नही व्यय करता था । आपने उस सुनार को लूटा और आकर संतो को भोजन कराया और वस्त्रादि भी दिया । सुनार ने आपके घरपर आकर झगडा किया । झगडा बढते देखकर राजा के सिपाहियों ने दोनों को पकड़कर राजा के सामने उपस्थित किया ।

राजाने दोनों को कारागार मे डाल दिया । श्री जापूजी को अपनी चिन्ता न थी । पर घर मे सन्त जन् विराजमान है ,उनकी सेवा से वंचित होने से जापूजी चिन्तित हुए । रात को जापूजी सतत सीताराम सीताराम का जाप कर रहे थे । राजा से स्वप्न मे भगवान ने कहा कि – तूने मेरे भक्त जापूजी को कैदखाने मे बन्द कर रखा है । उसे शीघ्र छोड़ दे, नहीं तो तेरा कल्याण नही होगा । सबेरा होते ही राजा ने श्री जापूजी को कारागार से मुक्त करने का आदेश दिया और आपको निरपराध समझा । सुनार को अपराधी समझकर उसको नहीं छोडा । श्री जापूजी ने कहा कि हम अकेले घर नही जाएंगे, पहले तुम इस सुनार को भी मुक्त करो । सुनार के बिना अकेले कैद से मुक्त होना स्वीकार नही किया । सुनार ने सोचा कि अवश्य ही जापूजी के पास कोई शक्ति है। लगता है कि जापूजी रात्रि में जो मंत्र (सीताराम) जप रहे थे, उसी के प्रभाव से राजा ने इन्हें मुक्त करने का आदेश दिया और हमे नही मुक्त कराया । अगली रात जापूजी के साथ सुनार भी नाम का जप करने लगा ।

दूसरी रात को भगवान ने पुन: राजा को स्वप्न दिया और कहा कि जैसा भक्त जापूजी कहते है, वैसा ही करो । राजा ने दोनों को छोड़ दिया । सुनार ने मन मे विचार किया कि यह संत तो बड़े दयालु है – यदि चाहते तो अकेले कैदखाने से निकल जाते परंतु इन्होंने ऐसा नही किया । सुनार को विश्वास हो गया कि भगवान के नाम के बल पर मैं इस छोटे से बंधन से मुक्त हुआ – तो संसार के इतने बड़े बड़हन से भी अवश्य ही मुक्त हो जाऊंगा । उसने निश्चय किया कि अब इस नाम का त्याग अब मैं कभी नही करूँगा । ऊपर से उसके धन का अन्न संतो के पेट मे जाने से भी उसकी बुद्धि अति निर्मल हो गयी । एक क्षण भी सच्चे संत का संग हो तो जीवन परिवर्तित हो जाता है।

बाबा श्री तुलसीदास ने कहा है –

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध ।
तुलसी संगत साधु की, हरे कोटि अपराध ।।

कबीर दास जी कहते है –

कबिरा संगत साधु की ज्यों गंधी का वास ।
जो कछु गंधी देहि नहिं तो भी वास सुवास ।।

अर्थात संतो का संग, इत्र (सुगंध) बेचने वाले की संगत के बराबर है । इत्र बेचने वाला चाहे कुछ न दे तो भी उसके समीप जाने पर खुशबू मिलती है । उसी प्रकार संत चाहे मुख से कुछ भी न बोले तो भी उनके समीप जाने (संग करने) पर मन पवित्र होता है (मन कि दुर्गन्ध नष्ट होती है )।

राजा ने जापू जी को सारी घटना सुना दी और पूछा कि आप जैसे भगवान के भक्त ने सुनार का धन आखिर क्यो लूटा ? जापूजी ने सच्ची घटना बता दी और साधु-सेवा की महिमा बतायी । किसी भी तीर्थ का सेवन करने से पहले ,किसी भी पुराण का श्रवण करने से पहले उसका महात्म्य श्रवण करने से उसमे श्रद्धा अधिक हो जाती है । इसी तरह जापू जी ने संत सेवा की कुछ सच्ची घटनाएं और संत सेवा का बहुत महात्म्य सुनाया । इससे राजा और सुनार दोनों के हृदय मे भगवद्गक्ति एवं सन्त सेवा की निष्ठा दृढ हुई । भगवान् जापूजी की सेवा से सन्तुष्ट हो गये और स्वप्न में जापू जी से कहा कि अब आपको चोरी करने की आवश्यकता नही है , पास ही में जमीन मे गडे धन का पता भगवान ने जापू को बताया। उसी धन से भगवान ने जापू जी सन्त सेवा करने का आदेश दिया । राजा भी और सुनार भी जीवनपर्यन्त निष्ठापूर्वक संत सेवा में लगे रहे ।

सुंदर कथा ९२ (श्री भक्तमाल – श्री कृष्णदास जी ) Sri Bhaktamal – Sri Krishnadas ji

श्री गोवर्धनधारी भगवान् श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर श्री कृष्णदास को अपने नाम मे हिस्सा दिया । श्री कृष्ण दासजी श्री गुरु वल्लभाचार्य जी के द्वारा दिये गये भजन भाव के समुद्र एवं समस्त शुभ गुणों की खानि थे । आपके द्वारा रची गयी कविताएं बडी ही अनोखी एवं काव्यदोष से रहित होती थी । आप ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवायें बड़े चतुर थे । श्री गिरिधर गोपाल जी के मंगलमय सुयश से विभूषित आपकी वाणी की विद्वान जन भी सराहना करते थे । आप श्री व्रज की रज ( धूल ) को अपना परम आराध्य मानते थे । चित्त मे उसी को सर्वस्व मानकर शरीर मे एवं सिर-माथेपर धारण करते थे तथा चित्त मे चिन्तन भी करते थे । आप सदा – सर्वदा श्री हरिदासवर्य श्री गोवर्धन जी के समीप बने रहते थे एवं सदा बड़े-बड़े सन्तो के सानिध्य मे रहते थे । आपने श्री राधा-माधव युगल की सेवा का दृढ व्रत ले रखा था ।

१. जलेबियों का भोग
श्री कृष्णदास जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे । महाप्रभु ने ठाकुर श्री श्रीनाथजी की सेवा का सम्पूर्ण भार इन्हे सौपा था । एक बार आप श्री ठाकुरजी के सेवाकार्य के लिये दिल्ली गये हुए थे । वहाँ बाजार मे कडाही से निकलती हुई गरमागरम जलेबियों को देखकर , जैसे ही उसकी सुवास अंदर गयी वैसे ही आपने सोचा कि यदि इस जलेबी को हमारे श्रीनाथ जी पाते , तो उन्हें कैसा अद्भुत आनंद आता । उस बाजार में खड़े खड़े मानसी-सेवा मे (मन ही मन) ही कृष्णदास जी उन जलेबियों को स्वर्ण थाल में रखकर श्री श्रीनाथजी को भोग लगाया, भाववश्य भगवान ने उसे स्वीकार कर लिया ।

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सुंदर कथा ९१ (श्री भक्तमाल – श्री गोस्वामी विट्ठालेशसुत जी ) Sri Bhaktamal – Sri Goswami Vitthaleshsut ji

गुसाईं श्री विट्ठलनाथ जी के पुत्रों को सर्वभूत सुहृद साक्षात श्री गिवर्धनधारी श्रीकृष्ण जानकर उनका ध्यान करना चाहिए । उनके नाम है –

१. श्री गिरिधर जी, जो बड़े रसिक एवं अत्यंत सुंदर शील स्वभाव वाले थे । २. श्री गोविन्दजी का स्वभाव भी वैसा ही था। ३. श्री बालकृष्णजी महायशस्वी हुए । ४. श्री गोकुलदास जी बडे धीर महापुरुष हुए । ५. श्री रघुनाथ जी महाराज एवं ६. श्री यदुनाथ जी महाराज अपने समगुणों से भजने योग्य हुए । ७. श्री घनश्याम जी सदा-सर्वदा प्रभुप्रेम मे पगे रहते थे, बड़े अनुरागी थे, हृदय मे हमेशा प्रभुक्री स्मृति सँजोये रहते थे । इनका भजन करना चाहिए ये सातों प्रत्यक्ष भगवादविभूति  थे, भगवद्भजन मे परम प्रवीण एवं समर्थ थे तथा श्री कृष्ण की ही भाँति ये भी संसार का उद्धार करनेवाले थे । भक्तमाल में श्री नाभादास जी स्पष्ट कहते है कि इन सातों महापुरुषों का यशोगान करना चाहिये , नित्य स्मरण करना चाहिए ।

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सुंदर कथा ९० (श्री भक्तमाल – श्री श्वपच वाल्मीकि जी ) Sri Bhaktamal – Sri Shwapach Valmiki ji

श्वपच वाल्मीकि नामक एक भगवान् के बड़े भारी भक्त थे, वे अपनी भक्ति को गुप्त ही रखते थे। एक बार की बात है, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने बड़ा भारी यज्ञ किया। उसमेंइतने ऋषि-महर्षि पधारे कि सम्पूर्ण यज्ञ स्थल भर गया भगवान् श्रीकृष्ण ने वहां एक शंख स्थापित किया और कहा कि यज्ञ के सांगोपांग पूर्ण हो जाने पर यह शंख बिना बजाये ही बजेगा। यदि नहीं बजे तो समझिये कि यज्ञ में अभी कुछ त्रुटि है, यज्ञ पूरा नही हुआ। वही बात हुई। पूर्णाहुति, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणादि सभी कर्म विधिसमेत सम्पन्न हो गये, परंतु वह शंख नहीं बजा। तब सबको बड़ी चिन्ता हुई कि इतने श्रम के बाद भी यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ। सभी लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के पास आकर कहा कि प्रभो ! आप कृपा करके बताइये कि यज्ञ में कौन-सी कमी रह गयी है। भगवान् श्री कृष्ण बोले-शंख न बजने का रहस्य सुनिये – पढना जारी रखे